खोज रही है पलकें
मनोरमा जोशी
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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राहें नयी दिखा जाता जो,
दुखः से भरे जहाँन को।
ढूंढ रही है कब से दुनियां,
ऐसे वीर जवान को।
अंगारों पर चलने वाला
दीपशिखा सा जलने वाला,
जिसनें पिया जहर का प्याला
पर बांटा जग को उजियारा।
आंच नहीं आने दी जिसने
संकट में भी आन को।
ढूंढ रहीं है कब से दुनियां,
ऐसे वीर जवान को।
जिसने सुख की बात न जानी
तूफानों से हार न मानी,
अंगत सा निशछल अभिमानी,
निर्धन किन्तु कर्ण सा दानी।
तैरा कर जिसनें दिखलाया
जल में भी पाषाण को।
ढूंढ रही है कब से दुनियां
ऐसे वीर जवान को।
जीवन जो कर्मो में बीता,
नहीं प्यार का पनघट रीता
जिनका जीवन तप की गीता,
लोभ मोह को जिसने जीता।
कर साकार दिखाया जिसने
तन में ही भगवान को।
ढूंढ रही है कब से दुनियां
ऐसे वीर जवान को।
परिचय :- श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्...

























