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पद्य

गुरु
कविता

गुरु

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** गुरु! तुम हो सृजनहार धरा पर! और माटी के लोंदे हम!! रौंध-रौंध के...थाप-थाप के... सजग प्रहरी-सी संभाल से... देकर भीतर से सहारा! रचा तूने ओ सृजनहारा!! सारी खर-पतवार निकाली... जितने भी खोट के थे उगे! सारे कंकड़-पत्थर बीने... जो घट की सुंदरता छीने!! अहंकार की गांँठ कुचल के! दी विनम्रता की लुनाई!! अज्ञानता की गहन कारा से ले चला निकाल, पकड़ बाहें.. ज्ञान के आलोकमय पथ पर.. निज साँसों की ऊर्जा देकर!! प्रभु ने तो बस जन्म दिया! गुरु ने जीवन को अर्थ दिया!! आहार निद्रा भय मैथुन से उठा... धर्म कर्तव्य का पाठ पढ़ाया!! पशुता की कोटी से निकाल... मनुजता के आसन पर बिठाया!! लोभ मोह ईर्ष्या द्वेष स्वार्थ से ऊपर स्नेह सौहार्द्र त्याग परोपकार बताया!! बताया: हम हैं कुल से विखण्डित जीवात्मा! सर्वोपरि है सृष्टि कर्ता गोविंद परमात्मा!! गुरु तुम हो पारस से बढ़कर! ...
गुरु नवचेतना वर दो
कविता

गुरु नवचेतना वर दो

आशा जाकड़ इंदौर म.प्र. ******************** ज्ञान चाहता है अंतर्मन हर्षित हो जाएं जन जन करते मन में हम यह प्रण शिक्षा का करें अभिनंदन अनुपम प्रकाश भर दो गुरु नवचेतना वर दो। चारों ओर है घोर अंधेरा कर सकते हो तुम उजेरा ज्ञान का होवे यहाँ बसेरा सुख सूर्य का रोज सवेरा ऐसी शक्ति भर दो। गुरु नवचेतना वर दो। नफरत और ईर्ष्या मिट जाए ऊंच-नीच का फर्क मिट जाए जाति-पांति का भेद मिटजाए परस्पर समता भाव लहराए ऐसा ज्ञान भर दो। गुरु नवचेतना भर दो। आज समय की मांग पुकारे कर सकते हो तुम्हें उबारे तुम्ही हो भारत के रखवाले राष्ट्र निर्माता पूज्य हमारे ऐसे गुरु भक्ति दो। गुरु नवचेतना भर दो।। जगती का उद्धार तुम्हीं हो मुक्ति का सही मार्ग तुम्हींहो प्रेम का सद्व्यवहार तुम्हीं हो नैया की पतवार तुम्हीं हो बुद्धि विकास वर दो। गुरु नवचेतना वर दो।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, स...
सपनों को सच होने दो
कविता

सपनों को सच होने दो

रूपेश कुमार (चैनपुर बिहार) ******************** सपनों को सच होने दो, जीवन को मत रोने दो, जीवन है बहुमूल्य हीरा, जीवन को जग से जीने दो, सपनों को सच होने दो तुम! रह ना जाए कोई बेकार, जीवन को मत भूलने दो, जीवन है फूलों का हार, जीवन को जग जितने दो, सपनों को सच होने दो तुम! प्यार के चक्कर मे पडोगे तो, मोबाइल मे रहोगे तुम, जीवन दो पल की चीज है, इस पल को बर्बाद करोगे तुम, सपनों को सच होने दो तुम! जीवन मे ऐसा करो तुम, तुम्हारे पीछे पूरी जहाँ घूमे, ना किसी के प्यार के चक्कर मे पड़ो तुम, ऐसा करो की तुम्हारे चक्कर मे दुनिया पड़े, सपनों को सच होने दो तुम! कॉल करके रास्ते मे बुलाती हो, मिलने के बहाने पढ़ने जाती हो, अभी तक तुम ना सम्भलोगी तो तुम, तुम्हारी दुनिया नर्क बन जाएगी एक दिन, सपनों को सच होने दो तुम! शिक्षक तुम्हें ज्ञान सिखलाते, कभी ना तुमको गलत राह दिखलाते, तुम शिक्षकों का आदर करोगी तो...
दर्दे जख्म
कविता

दर्दे जख्म

प्रवीण कुमार बहल गुरुग्राम (हरियाणा) ******************** कभी पूछा तो होता दर्द क्यों होता है मैं क्या बताऊं दर्द रिश्तो को तोड़ भी सकता है दर्द रिश्तो को जोड़ भी सकता और जोड़ता भी है समय-समय पर इससे पहले कि दर्द उठे वक्त-इज्जत-का ध्यान तो हर बार रखो चेहरा तो हंसता रहे-जब दिल में दर्द हो यह चेहरा ही है जो दर्द ओ गम दिखाता है रिश्ते टूट जाए तो दिल का परिंदा उड़ जाता है कांच का टुकड़ा गिरता है तो इंसानी जख्म बना देता है यह जख्म कभी कभी-नासूर बन जाते हैं जिंदगी के दर्दों से-बच के चलो हिम्मत से चलो-संभल के चलो देखो किसी को चोट ना लगे सामान को भी संभाल कर रखो तन मन को भी संभाल कर रखो देखो किसी के जख्मों पर चोट ना लगे आप अपना फर्ज निभाते चले जाओ इसका परिणाम मत लो जिंदगी की खुशबू है इस खुशबू को चारों ओर फैलने दो बस मुझसे मत पूछो दर्द क्या परिचय :- प्रवीण कुमार बहल जन्म : ११-१०-१९४९ पिता : ड...
राधा
छंद, धनाक्षरी

राधा

नीलम तोलानी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अखियाँ ये द्रोह करे, अब न किसी को देखें, कृष्ण की ही माला जपे, छवि मन भायी है। राधा मैं शरीर नहीं, प्राण में हूँ तेरे बसी, श्वास श्वास आस रहे, प्रेम ऋतु आयी है। नित दौड़ी दौड़ी आऊँ, बस में न चित रहा, मुरली की धुन कान्हा, बड़ी सुखदायी है। छुप छुप रास करें, झूमे यमुना के तीर, चैन मेरा सब गया, तू ही हरजायी है। परिचय :- नीलम तोलानी निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजि...
सिक्के के पहलू
कविता

सिक्के के पहलू

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** सिक्के के दो पहलू जैसे, निर्णय में होते दो जवाब। अच्छा या कम अच्छा, एक हो सकता बहुत खराब। अलौकिक दुनिया में कभी, भाग्य एक सा नहीं होता। देखा नहीं दुख अभी तलक, कोई उम्मीद रोशनी खोता। दुख दरिया का पड़ाव, कब बन जाता सैलाब। सिक्के के दो पहलू जैसे, निर्णय में होते दो जवाब। अच्छा या कम अच्छा, एक हो सकता बहुत खराब। किनारे नज़र ना आये कभी, जुगनू भी नहीं होता। कुछ आशाओं की मंशा में, रात रात नहीं सोता। हाथ खींचते नज़र चुराते, काम ना आये कभी शराब। सिक्के के दो पहलू जैसे, निर्णय में होते दो जवाब। अच्छा या कम अच्छा, एक हो सकता बहुत खराब। वक़्त पलटकर रख देता, निश्चय फिर पलटे जरूर। कर्मरथी के राही को, दायित्व बोध बने सुरूर। जब सीखे संस्कार घरों से, जीवन जीते ज्यों नवाब। सिक्के के दो पहलू जैसे, निर्णय में होते दो जवाब। अच्छा या कम अच्छा, एक हो ...
वो देश के शहीद
कविता

वो देश के शहीद

बबली राठौर पृथ्वीपुर टीकमगढ़ (म.प्र.) ******************** जब एक उम्र थी हमारी जोश था देश के लिए कुछ तो करने का सपना ऐसा कि कुछ मैं कर जाऊँ जैसे वो देश के शहीद कर गए हम घरों में बैठे होते हैं हर सुख लिए हो गर्मी, सर्दी, बरसात कि उमंग लिए मेरी भी दीवानगी देश प्रेम की है ऐसी जैसे वो देश के शहीद कर गए हम न कभी डरे ना कभी पीठ दे भागे हर दाँव का जवाब हम देते गए मौका मिला करने का तो कोशिश की जैसे वो देश के शहीद कर गए हिन्द को आजाद कराने में भूमि को नेताओं, क्रांतिकारियो की है रही देश भक्ति महिलाओं में भी हमनें देखी जैसे वो देश के शहीद कर गए जवानों के नाम गुमनाम नहीं हैं हर माँ, बहन, पत्नी, दोस्तों के दिल में हैं समाज को भी उनकी कुर्बानी याद है जैसे वो देश के शहीद कर गए हम तो उस घर की बेटी हैं जहाँ पिता, भाई, चाचा सेवा करते हैं पिता ने देश के लिए सुख छोड़े जैसे वो देश के शहीद कर गए परिचय ...
गुरु महिमा
दोहा

गुरु महिमा

डॉ. भगवान सहाय मीना बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, (राजस्थान) ******************** गुरु ओजस्वी दीप है, नव चेतन हर ओर। अपने गौरव ज्ञान का, मनन करें हर छोर। गुरु वितान नव ज्ञान के, गुरु पावन परिवेश। हर युग के महानायक, आप मूर्ति अनिमेश। गुरुवर जागरूक हैं, गुरु करें नवाचार। आप गोविंद से बढ़े, बोलें सच विचार। गुरु भाषा का मर्म है, गुरु वाणी भंडार। आप अनुभूत सत्य है, गुरुवर सरल विचार। गुरु विशेष की खान है, गुरु कोमल अहसास। गुरु अज्ञान विनाशक है, गुरु नायक विश्वास। अभिनंदन गुरुदेव का, है सादर सत्कार। नव ज्ञान मिलें शिष्य को,करते नित उपकार। विद्यास्थली मंदिर है, गुरु मेरे भगवान। करता नित मैं वंदना, गुरुवर का सम्मान। गुरु संस्कृति की रोशनी, गुरु विशेषण विशाल। आप समान सगा नहीं, गुरु अनमोल मिशाल। नित गुरु शिष्य भला करें, जीवन रचनाकार। संस्कार की विशेषता, गुरु सफल सरक...
श्रद्धा ही श्राद्ध है
कविता

श्रद्धा ही श्राद्ध है

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** श्रद्धा ही श्राद्ध है। इसमें कहाँ अपवाद है। सत्य .....सनातन सत्य। जो वैज्ञानिकता का आधार है। इसमें कहा अपवाद है। श्रद्धा ही श्राद्ध है। सत्य-सनातन संस्कृति पर, जो उंगलियां उठाते है। इसे ढोंगी, ढपोरशंखी बताते है। वो भरम में ही रह जाते है। आधें सच से, सच्चाई तक, कहाँ पहुंच पाते है। श्राद्ध श्रद्धा और विश्वास है। यह निरीह प्राणियों की आस है। यह मानव कल्याण का सृजन है। यह पर्यावरण का संरक्षक है। यह ढ़ोग नही है। यह ढ़ाल है। यह मानव का आधार है। इसीसे निकलें, सभी धर्म और विचार है। सत्य सनातन को , कौन झुठला सकता है। लेकिन अफवाहें फैला कर। इस पर आक्षेप तो लगा ही सकता है। रीतियों को, कुरीतियां बता कर, कटघरे में खड़ा तो, कर दिया गया। क्या......? हमनें और आप ने, सच को समझने का, कभी हौंसला किया। हम समझें नही। लेकिन हमने, हां में हां तो ...
गुरु सेवा
भजन

गुरु सेवा

संजय जैन मुंबई ******************** गुरुदेव मेरे, गुरुदेव मेरे, चरणों में अपने हमको बैठा लो। सेवा में अपनी हमको लगा लो, गुरुदेव मेरे गुरुदेव मेरे। मुझको अपने भक्तो की दो सेवादारी। आयेंगे सत संघ सुनने, जो भी नर नारी, मै उनका सत्कार करूँगा, बंधन बारंबार करूँगा।। गुरुदेव मेरे, गुरुदेव मेरे, चरणों में अपने हमको बैठा लो। मुझको अपने रंग में, रंग लो तुम स्वामी। में अज्ञानी मानव हूँ , तुम अन्तर्यामी। मेरे अवगुण तुम विश्रा दो, मन में प्रेम की ज्योत जला दो।। गुरुदेव मेरे, गुरुदेव मेरे, चरणों में अपने हमको बैठा लो। सेवा में अपनी हमको लगा लो, गुरुदेव मेरे, गुरुदेव मेरे। गुरुदेव मेरे, गुरुदेव मेरे, चरणों में अपने हमको बैठा लो।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन...
मानवता
कविता

मानवता

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** आज धरा पर उन्माद बड़ा है, मानवता खतरे में पड़ा है! "महाविनाश" की तैयारी मे विश्व-पटल पर कुचक्र बढा हैं! चीन राष्ट्र ही इसकी धुरी हैं यह विस्तार वाद की नीति गढा है आज "मानवता" खतरे में पड़ा है। जल, थल, नभ में खतरे की, महायुद्ध की उन्माद जगह है। पुनः हिमालय कि तुंंग शिखर को, दुश्मन फिर ललकार रहा है। एटम, हाइड्रोजन नये प्रक्षेपास्त्र से रण कौशल में सैन्य सजा है आज धरा पर उन्माद बड़ा है। भुखमरी बेरोजगारी से लड़ने के बदले मानव-मानव का शत्रु बना है। भारत की शांति नीति को चीन पाक ठुकरा रहा है। विश्व युद्ध की आहट से मानवता खतरे में पड़ा है। खबरदार हो जाओ दोनों पुनः बुद्ध मुस्कुरा रहा है। परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय रूपहारा) ग्राम - गंगापीपर जिला - पूर्वी चंपारण (बिहार) सम्मान - राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com...
तुम साथ रहना
कविता

तुम साथ रहना

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** दिन हो चाहे रात, तुम साथ रहना बिगड़े कोई बात, तुम साथ रहना! जिंदगी की डोर है अब तेरे ही हाथ समझ मेरे जज्बात, तुम साथ रहना! दूरियों के दिन भी जैसे-तैसे गुजरेंगे रंग लाएगी मुलाकात, तुम साथ रहना! हमारा मिलना भी अखरेगा कुछ को उठते रहेंगे सवालात, तुम साथ रहना! हर पल खड़ा मिलूंगा मैं तुम्हारे साथ चाहे जो हो हालात, तुम साथ रहना! परिचय :- आशीष तिवारी निर्मल का जन्म मध्य प्रदेश के रीवा जिले के लालगांव कस्बे में सितंबर १९९० में हुआ। बचपन से ही ठहाके लगवा देने की सरल शैली व हिंदी और लोकभाषा बघेली पर लेखन करने की प्रबल इच्छाशक्ति ने आपको अल्प समय में ही कवि सम्मेलन मंच, आकाशवाणी, पत्र-पत्रिका व दूरदर्शन तक पहुँचा दीया। कई साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित युवा कवि आशीष तिवारी निर्मल वर्तमान समय में कवि सम्मेलन मंचों व लेखन में बेहद सक्रिय ...
लोक अदालत और गांधी दर्शन
कविता

लोक अदालत और गांधी दर्शन

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** सभी सुखी खुशहाल रहे सब, गांधी जी का ये सपना था। भले कोई कितना दुश्मन हो, वो भी तो उनका अपना था गांधी के सपनों का भारत, ये था इसको याद रखें हम। उनके पदचिह्नों पर चलकर, भारत को आबाद रखे हम।। सत्य अहिंसा की ताकत से, कबतक कतराएगी दुनिया। है विश्वास यकीनन एकदिन, इस पथ पर आएगी दुनिया।। जिसकी लाठी भैंस उसी की, क्या ये सोच बनी फलदाई। झगड़े से झगड़ा बढ़ता है, क्या दिल से आवाज न आई।। सदा युद्ध के परिणामों में, जीता एक, एक हारा है। पर क्या हार जीत ने कोई, समाधान को स्वीकारा है।। समाधान की दिशा अहिंसा, इसमें कोई हार नहीं है। जश्न जीत का दोनों ही मिल, मना सकें त्यौहार यही है।। नही फैसले, समाधान की, ओर बढ़ें तो सुख पाएंगे। लोक अदालत गांधी दर्शन, है ये सब को समझाएंगे।। जड़से अगर समस्या कोई, खत्म हमे करना है लोगों। "अनन्त" गांधी दर्शन को ही, आज ...
इश्क़ करना नहीं
कविता

इश्क़ करना नहीं

धीरेन्द्र पांचाल वाराणसी, (उत्तर प्रदेश) ******************** इश्क़ पर तुम किताबें लिखे जा रहे हो। मशवरा है मेरा इश्क़ करना नहीं। दर्द कागज पे अपने लिखे जा रहे हो। मशवरा है मेरा दर्द कहना नहीं। मुस्कुराने की उनकी अदब देखिए तो। देखकर यूँ ही खुद से फिसलना नहीं। लाख कह लें तुम्हें , तुम हो मेरे लिए। मुस्कुराकर कभी सर झुकाना नहीं। चाँद तारों की बातें वो बेशक करें। अपने अंजुली पे सूरज उठाना नहीं। हमसफ़र हैं वो बस कुछ सफर के लिए। हर सफर अपने दिल को जलाना नहीं। बह रही है हवा मौसमी चारों ओर। इन हवा में दुपट्टा उड़ाना नहीं। हैं फिसलती निगाहें जमीं पे यहाँ। पांव कीचड़ से अपने सजाना नहीं। जब भी बारिश की बूंदे भींगाए तुम्हें। रो कर आँखों का पानी छिपाना नहीं। हो मोहब्बत तनिक इस धरा से तुम्हें। कड़कड़ाती बिजलियाँ गिराना नहीं। भेजता हूँ बता क्या रजा है तेरी। चिट्ठियों का भी अब तो जमाना नहीं। तोड़ दो तुम...
उतरन
कविता

उतरन

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उ.प्र.) ******************** स्वयं में गूढ़ अर्थ समेटे हुई है उतरन इसकी उतरन उसकी उतरन, कभी पोशाकों की उतरन कभी विचारों की उतरन। कभी एक अक्स सी उतरती हुई उतरन कभी किसी और के साए में उतरती हुई उतरन सांसों की उतरन, धड़कन की उतरन बोझ से उतरी उतरन। कभी जो समझ सको उतरन की परिभाषा को मरीचिका भी है, वीथिका भी है, गुणों का भंडार है उतरन। गीता की उतरन, रामायण की उतरन, बाइबिल की उतरन, कुरान की उतरन राम से लेकर रहीम मोहम्मद की उतरन पासको यदि कहीं ये उतरन, तो समेट लेना संजो लेना क्योंकि, जिंदगी का सही सार है उतरन।। परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी पति : श्री राकेश कुमार चतुर्वेदी जन्म : २७ जुलाई १९६५ वाराणसी शिक्षा : एम. ए.,एम.फिल – समाजशास्त्र,पी.जी.डिप्लोमा (मानवाधिकार) निवासी : लखनऊ (उ.प्र.) विशेष : साहित्यि...
बताओ ना… आपको क्या लिखू
कविता

बताओ ना… आपको क्या लिखू

हितेंद्र कुमार वैष्णव सांडिया, पाली (राजस्थान) ******************** सुबह की पहली किरण लिखू, या वर्षा की रिमझिम फुहार लिखू मनभावन सावन की झड़ी लिखू या बरसते बादल की बुँदे लिखू बताओ ना, आपको क्या लिखू चन्दन की महक लिखू, या उपवन की शीतल छाँव लिखू, चंदा की श्वेत ज्योत्सना लिखू या अंधकार में दीप संग बाती लिखू बताओ ना, आपको क्या लिखू ऋतुराज बसंत की फुलवारी लिखू या पुष्प मधुकर का गुंजन लिखू बगिया में नव पल्ल्वित कुसुम लिखू या तरु शाखा विराजित कोकिला लिखू बताओ ना, आपको क्या लिखू मेरी भुली बिसरी यादे लिखू या मेरे गुजरे हुए पल लिखू बिखरी हुई अभिलाषा लिखू या अपूर्ण हुआ सपना लिखू बताओ ना, आपको क्या लिखू परिचय :- हितेंद्र कुमार वैष्णव शिक्षा : बी.ए सम्प्रति : एसईओ, इंटरनेट मार्केटिंग मैनेजर निवासी : ग्राम - सांडिया, जिला : पाली (राजस्थान) विधा : कविता सर्जन शपथ : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता...
नारी और न्याय
कविता

नारी और न्याय

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सदा दर्द में जीती आई, मिला नहीं न्याय, सदियों से शोषित रही, होता रहा अन्याय, आजीवन कष्टों में रहती, कहलाती बेचारी, चीर हरे, कभी हरण करे, जग व्याभिचारी। कमजोर नहीं काम में, फिर भी है अबला, उसकी सुंदरता समक्ष, पुरुष बजाये तबला, न्याय की खातिर जगत, दर-दर भटके नारी, काम वासना के लिए, बहुतों को लगे प्यारी। सतयुग में तारामती, करती थी घर में काम, हरिश्चंद्र मरघट करे, बिके सरदार डोम नाम, रोहित उनका मारा गया, पहुंची मरघट द्वार, न्याय नहीं मिला वहां, अंत में जीत गई हार। त्रेता में सीता नारी, रावण ने किया अपहरण, सीता को न्याय मिले, श्रीराम पहुंचे तब रण, रावण पापी नष्ट हुआ, देर में मिला था न्याय, फिर एक जन बोल से, वन गमन था अन्याय। द्वापर युग भी नहीं भला, द्रोपदी का हरा चीर, भटकती रही हर द्वार पर, कृष्ण हर लिया पीर, द्रोपदी के चीर हरण का,...
मै भारत की बेटी हूं
कविता

मै भारत की बेटी हूं

अर्पणा तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मै भारत की बेटी हूं, क्यों ना मै अभिमान करू रज कण जिसके चंदन है, नतमस्तक मै गुणगान करू, आर्या वर्तो की श्रेष्ठ भूमि है, सुरजन वंदन करते है, राम कृष्ण की पावन भूमि, नित अभिनंदन करते है, उत्तुंग शिखर हिमगिरि, श्रेष्ठ धरा पर उन्नत भाल हमारा है, वारिध जिसके चरण पखारे, सप्त स्वरों में गाता है, वेद ऋचाएं जनमी है, दसो दिशाएं सुरभि त है, हवन कुंड से उठता धुंआ, करता मन आनंदित है, पुण्य भूमि है भरत भूमि यह, जिसका मै यश गान करू मै भारत की बेटी हूं क्यों ना मै अभिमान करू..... विंध्या चल है कमर मेखला सतपुड़ा से श्रृंगार हुआ गंगा यमुना ने सींचा जिसको रेवा तट उपहार हुआ ज्ञान दीप हुआ प्रज्ज्वलित देश मेरा दिनमान रहा एक अलौकिक युग दृष्टा आदर्शो का प्रतिमान रहा संस्कृतियों का पलना अद्भुत राष्ट्र भक्ति की त्रिवेणी है जन गण मन का मंत्र जिसका मै रसपान करू ...
प्रतिज्ञा
कविता

प्रतिज्ञा

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** ये कैसा महारथ ये कैसा पराक्रम ये कैसी श्रेष्ठता भरे दरबार मे एक स्त्री के शील की रक्षा करने में असमर्थ महारथी ,कुल शिरोमणि। ये कैसा पुरुषार्थ ये कैसा साहस निशक्त विचित्रवीर्य के लिए कर लेते हो अपहरण अंबा, अम्बिका, अंबालिका का उनकी कामना के विरुद्ध जाकर बांध देते हो उन्हें परिणय सूत्र में तुम महारथी, कुल शिरोमणि। पिता शांतनु की काम लोलुपता पर अपने स्वप्नों व दायित्व का बलिदान कर दिया तुमने, देवव्रत काश, किंचित सोच लेते मातृभूमि के लिए तत्समय जो तुम्हारे निज नाम से बड़ी थी महारथी, कुल शिरोमणि। तुम्हारा मौन तुम्हारी सहमति बन कुल को ला खड़ा कर देता है विनाश के द्वार पर तुम क्या सोचते रह गए हस्तिनापुर के सिंहासन के लिए महारथी, कुल शिरोमणि। उतरे भी रणभूमि में अनीति का साथ देते परिलक्षित हुए, काश की तुम भी दिखाते साहस युयुत्सु जैसा तुमने अपने प...
शिक्षक
कविता

शिक्षक

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर म.प्र. ******************** अंधकार था मेरा जीवन, मैं मूर्ख अज्ञान था, चैतन्य प्राणी होने पर भी, मैं सबसे अंजान था, जिसने दिशा का ज्ञान कराया, मानो उसका एहसान, इसीलिए तो सब करते हैं, शिक्षक का सम्मान। हम गीली मिट्टी के पुतले, हर पल उन्होंने हमें संभाला, हाथों से आकृति बनाई, फिर सांचों में हमको डाला अपना सर्वस्व समर्पित, तभी बने महान, इसीलिए तो सब करते हैं, शिक्षक का सम्मान। खुशबू के बिना फूल अधूरा, हरियाली के बिना चमन, जल के बिना अधूरी मछली, गुरु के बिना अधूरा जीवन कलपतरु के जैसे हैं वे, असंख्य गुणों की खान, इसीलिए तो सब करते हैं, शिक्षक का सम्मान। शिक्षक साहिल है नैयाके, वही राष्ट्र निर्माता हैं, इस देश के कर्णधार, भारत के भाग्य विधाता हैं, उनके चरणों में नतमस्तक, कोटि-कोटि प्रणाम, इसीलिए तो सब करते हैं, शिक्षक का सम्मान। परिचय :- श्रीमती शोभारानी तिवारी पति...
जीवन का खेल
कविता

जीवन का खेल

रुमा राजपूत पटियाला पंजाब ******************** कुछ खोना है, कुछ पाना है। जीवन का खेल, पुराना है। जब तक सांस, चलेगी हम में, हम को चलते, ही जाना है। यह झूठ का, ज़माना है। यहां सच्च को, दबाया जाता है। जब तक सच्च, बोले तो हम को, मार ही खाना है। कुछ खोना है, कुछ पाना है। जीवन का खेल, पुराना है। यह मुकाबला का, ज़माना है। यहां हारना और, जीतना है। जब तक सांस, चलेगी हम को, संघर्ष करते रहना है। कुछ खोना है, कुछ पाना है। जीवन का खेल, पुराना है। यहां कुछ ऐसे, प्राणी मिलते हैं। जो प्रेम भाव, से रहते हैं। जब तक प्रेम, भाव रहेगा। नफ़रत खत्म, होते जाना है। कुछ खोना है, कुछ पाना है। जीवन का खेल, पुराना है। जब तक सांस, चलेगी हम में, हम को चलते, ही जाना है। परिचय :- रुमा राजपूत निवासी : पटियाला पंजाब घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
श्री राधा जन्माष्टमी पर
भजन

श्री राधा जन्माष्टमी पर

तेज कुमार सिंह परिहार सरिया जिला सतना म.प्र ******************** सूना सूना सा था मेरे मन का अगन आज बेला सुहानी, सुहानी लगन राधा रानी के स्वागत में झूमे जगत झूमती है जमी नाचता वृंदावन बज रहे ढोल कांसे बजते मृदंग लहराते ध्वज तोरण बरसते सुमन खोली कलियों ने पलखे जो अलसायी सी लागे दुल्हन से ब्रज औऱ बृंदाबन राधा राधा कहे पर भव से हुए पल्लवित हो कुटुम्ब मैन जग बढ़े मिल गयी यदि चरण रज श्री राधे की समझ लो उसके बस में कन्हैया हुए सोते जगते भजन कर श्री राधे का पाप मोचक नाम मंत्र है श्री राधे का हैं अभिन्ना वो तो द्वारिकाधीश की भव पार करे नाम कीर्तन श्री राधे का परिचय :- तेज कुमार सिंह परिहार पिता : स्व. श्री चंद्रपाल सिंह निवासी : सरिया जिला सतना म.प्र. शिक्षा : एम ए हिंदी जन्म तिथि : ०२ जनवरी १९६९ जन्मस्थान : पटकापुर जिला उन्नाव उ.प्र. आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्...
बेटियाँ आती है
कविता

बेटियाँ आती है

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बेटियाँ आती है पीहर इसी बहाने कोई इसे चाहे माने या ना माने जो खो गया बचपन उसे तलाशने जो छूट गया रिश्ता उसे निभाने स्नेह का बन्धन फिर से बांधने बेटियाँ आती है पीहर... देहरी पर फिर से दीपक जलाने रंगोली और अल्पना से आगंन सजाने वो रस्म और रिवाज निभाने बेटियाँ आती है पीहर... फिर से घर आगंन को महकाने भर-भरकर झोली ममता लुटाने फिर अल्हड़ सी वो राग सुनाने बेटियाँ आती है पीहर... माँ की गोद का सिरहाना बनाने पिता से अनदेखा प्यार जताने नोक झोंक में भाई से हार मनवाने बेटियाँ आती है पीहर... सखियों के संग फिर से बतियाने कुछ उनका सुनकर कुछ अपना सुनाने हो जाए मन हल्का इसी बहाने बेटियाँ आती है पीहर इसी बहाने कोई इसे चाहे माने या ना माने परिचय : रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” निवासी : मुक्तनगर, पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) घोषणा : मैं यह शपथ...
जो गुजरे पल
छंद

जो गुजरे पल

विशाल कुमार महतो राजापुर (गोपालगंज) ******************** कभी सोचे जो गुजरे पल तो मन उदास होता है मतलबी ये जमाना है, कोई ना खाश होता है भरोसा टूट जाए तो ये मन निराश होता हैं। धोखा वही से मिलता हैं, जहाँ विश्वास होता है। पता चलता नही है अब कौन कब खास होता है, छोड़ेंगे साथ नही तेरा, बहुत बकवास होता है। छुपी है जो सच्चाई वो न अब बर्दाश होता है, हजारों दोस्त बनते है जब पैसा पास होता है। सच्चाई मुँह पे बोलना, मेरी वर्षों की आदत है इसी की राह पर शायद मेरी जीवन सलामत है, जो समझे ही मुझको जीवन मे मेरा होकर के मुझे बुरा कहने का तो उन्हें पूरा इजाजत है। परिचय :- विशाल कुमार महतो निवासी : राजापुर (गोपालगंज) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित...
विरह वेदना
कविता

विरह वेदना

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता लेखन प्रतियोगिता विरह वेदना में सर्वश्रेठ रही कविता) दीप-बाती बन, जल रही मैं, तकती सूनी भीतो को, प्रीत-दीप, रौशन कर बैठी, तकती बरबस राहों को... विरह-अग्न में, तप रही, हुक उठती, हिय-विकल हैं, निर्झर-नैना, तोड़े बंध सारे, श्वासों का, आवेग प्रबल हैं... अस्त-बिंदु हैं, व्यस्त-वसन हैं, सुधि रही ना, तन मन की, उलझी अलकें, स्थिर पलकें, ताक रही,छवि साजन की... कैसे कह दु ? क्या तुम मेरे हो, बानी को मैं, तरस रही, तपता तन हैं, भीगा मन है, बिन सावन मैं, बरस रही... अरमानों की, सेज सजाएं, भूलि-बिसरी, महकाए रही, कंपित अधरों से, गीत मिलन के, होले से, बुदबुदाए रही... हर आहट पर, आस जगे हैं, तरसु भुज वलय, समाने को सुरभित-मुकलित, यौवनं चाहें, रंग "निर्मल" घुल जाने को... पल पल, हर पल,...