तू ही नारी तू ही प्रकृति
निर्मल कुमार पीरिया
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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हो! पंचतत्व की वाहिनी,
सृष्टि की, तू ही जननी,
भाव समाहित हर तुझमें,
नव रस की, तू ही पोषनी...
बहता निर्मल आब तुझमे,
मन पुलकित सुन रागिनी,
ताप छूपा उर में, महकी,
थिरकी बन कभी मोरनी...
सप्त रंगों की तूलिका तू,
उकेरे कानन बन दामिनी,
स्याह हुआ, छाया तम तो,
खिली बन तू फिर चाँदनी...
नारी हो या प्रकृति हो तुम,
तू ही अवनि, तू ही जननी,
अंनत की हैं कृति सुंदर तू,
तू ही हैं वो जीवनदायिनी...
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परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया
शिक्षा : बी.एस. एम्.ए
सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि.
निवासी : इंदौर, (म.प्र.)
शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं
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