पाती
सुधा गोयल
बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
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ये पाती
अनुबंध न कोई
भावों का
अनुदान न कोई
जाने कितने
स्वप्न सलोने
कितने
अभिलाषा के सागर
कितने
सौगंधों के ढेर
पार न कोई।
वहीं तुम्हारी
प्यारी
बतियां
डस लेती हैं
काली रतियां
मन की भाषा ही
पढ़ती है
तन से है
संबंध न कोई।
पुरवा के
झोंके सी खुशबू
मन प्राणों में
महके खुशबू
तन में महक
समाई ऐसे
महक उठा हो
उपवन कोई।
भावों का
छलका घट सारा
भुजबंधों का
मिला सहारा
फिर कोई
सूरज उग आया
भीगे वर्षाजल में जैसे
मन की धरती
धूप नहाई।
फिर गरजे हैं
बादल काले
रिमझिम रिमझिम
बरसे सारे
पता नहीं क्यों
तुमसे अब तक
टूटा है
तटबंध न कोई।
परिचय :- सुधा गोयल
निवासी : बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
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