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कविता

मातृभाषा का महोत्सव
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मातृभाषा का महोत्सव

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** हिंदी है दिल की जुबां, हिंदी है जन-गान। भारत माँ की वाणी है, इसका ऊँचा मान।। माटी की खुशबू लिए, बोले हर इंसान। गंगा-जमुनी संस्कृति की, हिंदी पहचान।। तुलसी की चौपाइयों में, सूर की रसधार। कबिरा के दोहों में बसी, जीवन की पुकार।। मीरा के पद झंकारित हों, भक्तिरस का गीत। भारतेंदु का जागरण हो, हिंदी का संगीत।। प्रेमचंद की कहानियों ने, जग में दिया प्रकाश। साहित्य के हर पृष्ठ पे, हिंदी का इतिहास।। महादेवी के भावों में, कोमलता का गीत। दिनकर की गर्जना में है, ओजस्वी संगीत।। रसखान की राधा बानी, रही प्रेम की धुन। हिंदी का उत्सव यही, हिंदी का अभिमान। संविधान की गोद में, राजभाषा का मान। विश्वपटल पर गूंजती, भारत की पहचान।। आज तकनीकी युग में भी, हिंदी लहराए। मोबाइल की स्क्रीन पर भी, हिंदी ही छाए।। कीबोर्ड स...
उड़ान
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उड़ान

डॉ. रागिनी सिंह परिहार रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** सपनों में अगर चाहिए उड़ान तो सुनो गुरु ज्ञान के बिना संभव नहीं सुनो बचपन में मां ने मुझको चलना सिखाया उंगली पकड़ के मेरी सही रास्ता दिखाया जब थोड़ी सी बड़ी हुई विद्यालय पहुंचाया गुरुओं के बीच मुझको नादान बताया फिर गुरुओं ने हमारी हमें मंजिल है दिखाया के से कबूतर ज्ञ से ज्ञानी मुझको सिखाया थोड़ी और बड़ी हुई तो विषय वस्तु बट गए हिंदी,गणित,विज्ञान का मतलब समझ गए पर आज तक अंग्रेजी समझ आई ना हमें A फॉर एप्पल Z फॉर ज़ेबरा समझ आया ना हमें प्रथम गुरु मेरी मां बनी जिसने दिया है जन्म उस जन्म को साकार बनाया है गुरुजन अबोध है अज्ञान है अंधकार में है हम आपके सानिध्य से चीनू बाई, कल्पना चावला बने हम बस आरजू यही कि देश में हर नारी का हो नारित्व हर घर में लक्ष्मीबाई हो हर घर में विवेकानंद सपनों म...
दिल हूं हिंदुस्तान की
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दिल हूं हिंदुस्तान की

डॉ. निरुपमा नागर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** सरल, सहज, सुमधुर वचन संस्कृत से पाया अपना जीवन सकल जगत् को मोह रही है अंक मेरे अपार शब्द शक्ति सहेज रही बोलियों को बनकर मातृशक्ति नवीन तकनीक के लगाकरपंख मैं तो छूने आकाश चली हिंदी कहते मुझको दिल हूं हिंदुस्तान की राजभाषा बन हिन्द की राष्ट्रभाषा बनने की तमन्ना मैं कर रही परिचय :- डॉ. निरुपमा नागर निवास : इंदौर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@g...
आधुनिक व्यक्तित्व
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आधुनिक व्यक्तित्व

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** बहुत कुछ लिखते हैं लिखने वाले मगर लिख नहीं पाते अपने गुनाहों को कभी। बहुत कुछ कहते हैं कहने वाले मगर कह नहीं पाते अपने जुर्मो को कभी। बहुत कुछ सुनाते हैं सुनाने वाले मगर सुना नहीं पाते अपनी कमियों को कभी। बहुत कुछ दिखाते है दिखाने वाले मगर दिखा नहीं पाते दबे हुए जज्बातों को कभी। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक म...
हिंदी
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हिंदी

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भारत मां के माथे की बिंदिया है हिंदी। कलकल करती पावन सरिता है हिंदी। सूर की अमृत वाणी, कबीर की साखी है हिंदी, तुलसी की माला मीरा के पदों की झांकी है हिंदी।। उर्दू की प्रिय बहना, संस्कृत की बिटिया है हिंदी, वेद पुराणों में वर्णित गंगाजल की लुटिया है हिंदी।। हम सबका अभिमान, खुसरो ने गढ़ी है हिन्दी, काली ने मढ़ा जिससे वो, कौस्तुभ मणि है हिंदी।। सरल,सहज,सुरमयी, धवल वीणावादनि शारदा है हिंदी, मनका मनका रची अक्षय, ज्ञान की वर्णमाला है हिंदी।। धरा से नीलाभ तक, स्वच्छंद विचरती पवन है हिंदी , मधुकर सा सुशोभित, पुष्पित हराभरा उपवन है हिंदी।। चंदन सी महकती अमिट, राजभाषा, राष्ट्रभाषा है हिंदी, कि "शशि" सभी भाषाओं की एकमात्र परिभाषा है हिंदी।। परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा...
मुकद्दर
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मुकद्दर

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** मेरे मुकद्दर में है "मुकद्दर" पर कविता लिखना। और उसको प्रकाशन के लिए भेजना। ******* मिलता वही है हमें जो मुकद्दर में लिखा होता है। फिर इंसान क्यों अपने मुकद्दर पर रोता है। ******* हमारे कर्मों से ही हमारा मुकद्दर बनता है। अच्छा करने पर हमें अच्छा ही मिलता है। ******* जो हमारी किस्मत में लिखा हो वो मुकद्दर कहलाता है। यह जन्म के समय विधाता द्वारा लिखा जाता है। ******* कभी किसी की लॉटरी लगती है और गरीब अमीर बन जाता है। यही सब मुकद्दर कहलाता है। ******* लोगों की दुआओं से आपका मुकद्दर बदल सकता है। आपको रंक से राजा बना सकता है। ******** केवल मुकद्दर के आसरे मत बैठे रहिये। कुछ अच्छे काम कर अपनी सफलता की कहानी कहिए। ******** तुमको मैने अपना "मुकद्दर" समझा था। लगता है अब मुकद्दर ने साथ छ...
तर्पण की हकीकत
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तर्पण की हकीकत

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मात-पिता प्यासे मरे, अब कर रहे हैं तर्पण। यह तो ढोंग ही दिखता है, दिखावा है अर्पण।। जब जीवित थे मात-पिता तब ही सब ज़रूरत थी। आज तो यह सारी दिखावे से भरी हुई वसीयत है।। जीवित की सेवा का ही तो होता सच्चा मोल है। बाद में दिखती कर्मों में लम्बी, गहरी पोल है।। अब मात-पिता जल कैसे पी सकेंगे, सोचो। अब मात-पिता कैसे भोजन कर सकेंगे, बाल नोचो।। अब तो श्राद्ध करना पूरी तरह से मिथ्या, बेमानी है। यह तो पाखंड भरी हुई एक निरर्थक कहानी है।। सेवा,सु‌श्रूषा जीवित अवस्था की ही बस सच्ची है। नहीं तो सब कुछ बेकार, झूठी और कच्ची है।। जीवन में तो मात-पिता होते हैं देव समान। इसलिए उनके जीवित रहते में ही करो उनकी सेवा-सम्मान।। मात-पिता प्यासे मरे, अब कर रहे तर्पण। ज़रा देखो संतानो तुम आज तो सच का दर्पण।। परिचय :- प्र...
गुरु बिन ज्ञान न होता
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गुरु बिन ज्ञान न होता

अंजनी कुमार चतुर्वेदी "श्रीकांत" निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** गुरु बिन ज्ञान न हुआ किसी को, सारी दुनिया जाने। राम कृष्ण पहुँचे उज्जैनी, गुरु से शिक्षा पाने। सांदीपनि आश्रम में प्रभु ने, ज्ञान उन्हीं से पाया। सांदीपनि गुरु से शिक्षा ली, सुयश जगत में छाया। गुरु बिन ज्ञान भेद बिन चोरी, संभव कभी न होता। गुरु का शुभाशीष पा शिक्षित, हो जाता है तोता। राम-राम रटकर तोते का, जन्म सफल हो जाता। देह त्याग कर पिंजरित पंछी, प्रभु से सद्गति पाता। गुरु बिन ज्ञान बताओ जग में, भला किसी ने पाया? शिक्षित वंदित हुआ वही जो, गुरु चरणों में आया। गुरु की कृपा प्राप्त कर मूरख, हो जाता है ज्ञानी। गुरु बिन ज्ञान नहीं मिलता है, सदगुरुओं की वानी। गुरु चाहे प्रतिमा स्वरूप हो, गुरु है बहुत जरूरी। बिन गुरु जीवन भर रहती है, दिव्य ज्ञान से दूरी। उर का अंधकार गुरु के ...
क्षणिक
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क्षणिक

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कदम दर कदम सम्भल कर चलो जिन्दगी क्षणिक हे गुनगुनाते चलो। कोई अछूता नही है जिन्दगी के झन्झावातो से इस तुफान को हाँ इस तुफान को मुठ्ठी मे बान्ध कर चलो। दसों दिशाएं देगी तुम्हे अवलम्बन अंधेरी रात मे तारों के प्रकाश मे आकाश ओढते चलो। करेगी पीछा परछाई या अतीत की नए दौर के जमाने मे अतीत को विस्मृत करते चलो। फूलों की सुगन्ध झिगूंरो की चमचम तुम्हे उर्जा देगी कदम दर कदम साथ निभाते चलो। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत...
हिंदी ज्ञान का महारथ
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हिंदी ज्ञान का महारथ

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** भाषाज्ञान से सबका सन्मान हिंदी को बढ़ाए रचाये सीखकर अर्जित करें हिंदी लिखने पढ़ने बोलने का ज्ञान ।।१।। जो है करता, भाषा हिंदी का सन्मान, मनमस्तिष्क में हिंदी कविता साहित्य जगत का, तनमन से रचाकर दिलाती खूब सन्मान ।।२।। वही खूब है रचता हिन्दीभाषा लेखन में शक्तिशाली शब्द भरकर अलंकार हिंदी भाषा के समृद्धि में हिंदी के भरता शब्दरस काम हिंदी में करता हिंदीभाषा का गुणगान कर बीज अंकुरित हिंदी का करता ।।३।। हिंदी भाषा का साहित्य जगत में बढ़ता जाए संसार शब्द भाषा से हिंदी भाषा का जन जन तक फलता फूलता जाए सुदृढ़ समृद्ध हिंदी महारथ का संसार ।।४।। मिले मौका लेखनशैली का हिंदी में, नियमित सूंदर सूंदर रचकर अलंकृत शब्द भरो खजाना रचना और शब्द भाषा ज्ञान हिंदी का हिंदी को करो अलंकृत भाषा में पीओ हिंदी...
शिक्षादाता
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शिक्षादाता

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** हाथ पकड़कर जिस गुरुवर ने, लिखना हमें सिखाया ! जीवन पथ पर कैसे चलना चलकर हमें दिखाया !! कैसे भूलूँ उस गुरुवर को, कभी हार न माना होगा ! गलतियाँ को माँफ कर जिसने काबिल हमें बनाया !! सही गलत का ज्ञान कराकर, सत्य मार्ग बतलाया कैसे जीना हमें चाहिए जी कर हमें दिखलाया !! शिक्षा, और संस्कार के दाता, हमारे भाग्य विधाता ! अज्ञानता को दूर भगाकर ज्ञान का दीप जलाया !! सच्चाई के राह पर चलकर सत्य का राह दिखाया ! मिलती नहीं मंजिल तब तक चलना हमें सिखाया !! थककर कभी बैठ न जाना, मंजिल की इन राहों पर ! कठिनाइयों से लड़कर आगे बढ़ना हमें सिखलाया !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है...
व्यथा
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व्यथा

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** उनींदी बोझिल पलकें लिए मृगनयनी कुछ कुछ सहमी कुछ डरी डरी सी मन-कपोत आतुर उड़ने को फड़फड़ाते पंख लिए पर आत्मा थी एक पीड़ा से भरी भरी सी संवाद अतुल है अक्षुण्ण है मगर अभाव है शब्दों का अभिव्यक्ति है मरी मरी सी अतिशय कहा नहीं जाता इसी द्वंद्व में जीना है पर कही नहीं जाती है खरी खरी सी क्यूँकि ज़मीर सोया है साहस खोया है मगर सत्य रोया है हिम्मत रह गयी है चुप धरी धरी सी इसी अन्तरद्वंद्व में थाह कहाँ पाये अंतरव्यथा मन की बस पीड़ा मन की है बस झरी झरी सी परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में ...
अ अत्याचार … ह से हत्या …
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अ अत्याचार … ह से हत्या …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अ से अनार या अमरूद नहीं वर्तमान समय के अनुरूप अ से अनर्थ या अत्याचार लिखने की जरूरत है. कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से कर्कशता या कट्टरता. ख से खरगोश लिखता आया हूँ लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है. मैं सोचता था फ से फल ही लिखा जाता होगा बहुत सारे फल लेकिन मैंने देखा तमाम फल जा रहे थे ज़ालिमों के गले में ग्रास बनकर हज़म होने के लिए. कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है द दमन का और प पतन का सँकेत है. आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं समाज की हिंसा ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें वे ह से हत्या लिखते रहते ह...
जीव की करूण पुकार
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जीव की करूण पुकार

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** आया पावन गणेश चतुर्थी का त्यौहार, सबको मिले जीवन मे खुशियां अपार! हम भी चाहें थोड़ा सा स्नेह, हे गणपति करो हम पर ये उपकार!! शिव-शक्ति के पुत्र कहलाते, सर्वप्रथम पूजे जाते, मूषक तुम्हारा वाहन होता सहनशीलता का संदेश है देता! गजराज बन पूजे जाते, पर्व ''त्यौहार" में सजाये जाते, फिर क्यों जंजीरों में जकड़े जाते, ये कैसी श्रद्धा कैसी पूजा हम सब भी ये समझ न पाते?? मानव करते क्रूर आघात, इतनी घृणा और अत्याचार, तड़पते घुटते, तिल-तिल मरते, नित प्रतिदिन होता हमारा तिरस्कार, अब तुम ही करो गणपति हमारा उद्धार!! अहंकार, द्वेष, घृणा से परे, एक सुन्दर दुनिया है हमारी, घोर विपदा हम पर है आई क्यूँ हमारे अस्तित्व पर बन आई! अब तुम ही हो हमारे खेवनहार हे गणपति तुम ही करो दुःख का निस्तार!! नही...
पता नहीं कैसे जिंदा हूं
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पता नहीं कैसे जिंदा हूं

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ये है ही बेहद ताज्जुब की बात, कि कुरेदा गया दिल बचपन से जिसका लेकिन कैसे बचा हुआ है आज, था जिनके भरोसे ताना मिला उन्हीं की ओर से कि जिंदा हूं आज भी खाकर जूठन, ना आयी लाज बाल्यकाल में और न शर्मिंदगी ढलते जवानी में भी, उलाहना देने वालों में सभी निपुण हो चुके थे रहे हों चाहे मित्र या संबंधी, सबके ताने रहे प्यार भरी बातों से सुषज्जित मगर थे भयंकर विध्वंशी, अब जाके पता चल रहा है कि असल में मैं फौरी तौर पर था तेज पत्ते की तरह अत्यावश्यक, जिसे फेंका जाता है सर्वप्रथम, मुझे भी फेंका गया मगर मुझे तनिक भी भनक लगने दिए बिन, रोष तब और मिल गया सबको जब पता चला कि मैं खड़ा हो कैसे गया अपने पैरों पर, आंख मूंद भरोसा कर अपनों व गैरों पर, मेरा जीना न जीना चलिए आज किसी के लिए कम से कम कोई मायने ...
सुंदरतम
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सुंदरतम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जल ने प्रलय मचा रखी है आसमाँ की मोहब्बत में दुनिया तबाह कर रखी है। सोचते हो मोहब्बत बस तुमने ही की है यहाँ ओह नहीं नहीं ... हवा ने पानी से पानी ने हवा से आंखों से आंखें मिला रखी है। सोचते हो खूबसूरत बस तुम ही हो यहां ओह नहीं नहीं ... पर्वतों ने अपनी सुंदरता से सारी दुनिया अपने कदमों में झुका रखी है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं...
आजमा कर छोड़ दिया
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आजमा कर छोड़ दिया

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** कौन अपना है कौन पराया है। ये तब पता लगा जब मैने आजमाया है। ****** आजमाने से हकीकत पता चलती है। अगले की हमारे प्रति सोच पता चलती है। ******* सामने से तो सब लोग मीठे बातें बोलते है। पर मौका मिलने पर पीठ में छुरा भोकते है। ******* तस्वीर में तो सभी नज़र आते है। तकलीफ में सारे लोग गायब हो जाते है। ******* सौ नहीं बल्कि एक ही हमदर्द बनायें। जो हर परिस्थिति में आपके साथ नज़र आये। ******* मौका मिलने पर सबको आजमाया करो। जो अच्छा हो उसे मित्र बनाया करो। ******* आजमाने पर जो गलत निकले उसे छोड़ दिया करो। सारे रिश्ते नाते उससे तोड़ दिया करो। ******* हम जिंदगी भर उन्हें अच्छा समझते रहे। और वो पीठ पीछे नाग की तरह हमको डसते रहे। ******* पहिले आजमाओ फिर मित्र बनाओ जिंदगी की दौड़ में आगे बढ...
गुरु तुम दिव्य
कविता

गुरु तुम दिव्य

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** शिक्षक तुम तो हो गुरू, तुम से ही उत्थान। गुरु बन तुम ने ही रचा, जीवन का सम्मान।। शिक्षक से आलोक है, शिक्षक से संसार। शिक्षक से ही शिष्य को, मिलता है उपहार।। तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य का भान। तुमसे ही है दिव्यता, गुरुवर ऐ भगवान।। खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। कर देते जो ज़िन्दगी, सचमुच में नवरंग।। यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान। उनसे ही तो बल मिले, हो जीना आसान।। बिना ज्ञान नहिं चेतना, जीवन जाता हार। गुरु हैं जहाँ, रहे वहाँ, नित चोखा उजियार।। गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण। नहीं कभी लगते यहाँ, मानव को तब बाण।। हर दुर्गुण को दूर करे, लाते मंगलगान। गुुरु से ही जीवन हँसे, रह पाती है आन।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रद...
गुरु को प्रणाम
कविता

गुरु को प्रणाम

हितेश्वर बर्मन 'चैतन्य' डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मेरा गुरु मेरे लिए पूज्यनीय है, खुद से भी ज्यादा आदरणीय है। जिसने दिया मुझे अनमोल ज्ञान, वो ज्ञानी मेरे लिए है सबसे महान। मेरे गुरु ने मुझे भविष्य की राह दिखाया है, कँटीले रास्ते में भी शान से चलना सिखाया है। मेरे जीवन से जिसने अंधकार को दूर किया है, जिसने मेरे मस्तिष्क को ज्ञान से भर दिया है। प्रणाम उनके चरणों में जिसने मुझे तालिम दी, जिनके कृपादृष्टि से मैंने विद्या हासिल की। वो मेरे जीवन का नित्य पथ प्रदर्शक है, वो मेरे जीवन का एक मार्गदर्शक है। उनके चरणों में कोटि-कोटि नमन, प्रफुल्लित मन से हार्दिक अभिनंदन। गुरु-शिष्य का ये पवित्र नाता अमर रहे, पूरा संसार शिक्षक दिवस मनाता रहे। परिचय :-  हितेश्वर बर्मन 'चैतन्य' निवासी : डंगनिया, जिला : सारंगढ़ - बिलाईगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषण...
कुदरत की महिमा
कविता

कुदरत की महिमा

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कुदरत तेरी रचना वाह तेरा क्या खूब कहना प्राणी जीवजन्तु में कमोधिक गुणों में गुण की बसती महिमा खूबसूरत सुंदर रहती विद्यमान कुदरत तेरी रचना ।।१।। कलम, काठ, पेंसिल स्याही, चाक, लिखावट में गुणी पुस्तकें ज्ञान बढाने, पढ़ाने में रहती है हरदम गुण में गुणी डस्टर बार बार लिखावटों को मिटाने में रहता गुणी निर्जीव सजीव में कुदरत तेरी रची है अजीब रचना प्राणी जीवजन्तु गुणों में गुणी कुदरत तेरी रचना ।।२।। केंचुएं में जमीन उपजाऊ का गुण चूहा, जहरीला कीड़ा उगती फसल नष्ट का रखता गुण हिंसक नीचे गिराने सेवक रखता उठाने गुणों में गुण कुदरत तेरी रचना कुदरत तेरी रचना कहीं बाधक का गुण कहीं सम्मान का गुण मुश्किल है कुदरती रहस्य मुश्किल तेरी महिमा समझना ।।३।। परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रू...
विश्व गुरु मोदी जी
कविता

विश्व गुरु मोदी जी

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** मोदी जी का जय घोष हो सनातन संस्कृति को बचाने, कलयुग से सतयुग लाने, मोदीजी को सिंघासन पर बैठाया। संकल्प लिया था जिसने मां भारती को सोने की चिड़िया बनवाया। किसानों का आत्म सम्मान बचाने। नये उद्योगों से भारत का डंका बजवाया। गांधी का गया जमाना, एक गाल में चांटा पढ़े तो, दूसरा मत दिखाना। अब है मोदीजी का २१ वीं शताब्दी का जमाना। कोई मारे तो उसे ब्रह्मोस सुखोई विमान दिखाना। खून का बदला ऑपरेशन सिंदूर दिखाना। मोदीजी अब ट्रंप की भाषा को आंखों से ही समझाते। धर्म युद्ध की रणभेरी में मेकइन इंडिया का मंत्र समझाते। किसानों और उद्योगों को खुशहाली देते। मोदी जी के स्वाभिमान के खातिर तुम भारत माता को हर पल अपने दिल में रख लेना। भारत माता के प्रधानमंत्री मोदी जी की जयघोष हो। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोप...
वक्त के साये
कविता

वक्त के साये

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** क्या जीत है क्या हार है, कहीं वक्त की मार तो कभी वक्त ही उपकार है। वक्त की तिजोरी नसीब में सबके, बेकद्र जो वक्त है टूटते सपने बेशुमार है।। जीवन मिला है सबको वक्त भी मिला वहीं है। भावना जुदा-जुदा है जिंदगी सबकी वही है।। खुद को पका तपा ले सूरज की तपन वही है। रोशन है तुझसे दुनिया तेरी लगन फिर सही है।। समृद्ध हो तब रत्नजड़ित लिबास तन पर सही है। बिन मांगे ही सहयोग करने खजाने बेशूमार वहीं है।। वक्त बदलने दो लिबास उतरने दो, फैली हथेली ही रही है। लाख मुंह तकना अपनों के लोग वही बहाने हजार सही है।। मुकद्दर की रोटी मेरे हिस्से नहीं हर वक्त रही है। चोरों की बस्ती से मेरा निवाला चुराना सही है।। लिबास की चमक में कहां मुफलिसी मेरी दिख रही है। कुरेद कर देख जरा वक्त नया ज़ख्म पुराना वही है।। इबादत एक तेरी...
अपनोंं से निष्कासित
कविता

अपनोंं से निष्कासित

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक टुकड़ा बादल का छोटा सा आंँखों के काजल- सा भटक रहा था यतीम- सा मगर मुझे लगा इसमें कोई बात है मौसम बरसात ‌का हुजूम बादलों का उमड़-घुमड़ बरस रहा फिर क्या वज़ह कि सूखी आंखों से गीली धरती ताक रहा. बस पूछ लिया मैंने अकेला अनमना है क्यों उसने देखा देर तक देखा फिर उदास- सा होके हमसे कहा अपनोंं से निष्कासित हूँ कहा गया था आज बरसना है झुग्गी पर शहर‌ के दांएंँ कोने की तराई पर नीचे देखा कुछ बच्चे खेल रहे थे लगा ये बच्चे डूब जाएंगे मैंने ना कर दी समझाया औरों ने पर मन माना नहीं तब मुझे फिर ये सज़ा मिली जा धूप में मर कल चुपके से जाके हल्की फुहार- सा बरसूंगा आज भय से दुबके बच्चे कल रिमझिम में उछलेगें खेलेगें पर आज मुझे सारा दिन यूँ‌ ही जलना होगा और तब से सोच रहा हूंँ मैं ...
दोहरा मापदंड क्यों…?
कविता

दोहरा मापदंड क्यों…?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं बेटी हूँ सिर्फ इसलिए ही जन्म से पहले कोख में मार दी जाती हूँ कहाँ चली जाती है ममतामयी माँ की ममता क्यों आँखे मूंद लेते हैं सरंक्षक कहलाने वाले पिता क्यों उत्प्रेरक बन सहयोगी बन जाता है समाज कैसी विडम्बना है सब कुछ होता है मर्यादा की ओट में ... खैर ..., ईश्वर कृपा से जन्म ले लेती है धरा पर अधिकांश बेटियाँ पर ... हर कदम दोहरापन थाली बजाई जाता है बेटे के जन्म पर लड्डू बाँटे जाते हैं बेटे के जन्म पर और.... बेटियाँ डूबो दी जाती है मायूसी के समंदर में ... युवा होती बेटियाँ मगर... कहाँ अवसर मिलता पंख फैलाने को इसी धर्म धरा पर पैदा हुई थी मैत्री, गार्गी ... यहीं पूजी जाती है लक्ष्मी, दुर्गा, काली, सरस्वती देश की आँख का नूर रही लक्ष्मी बाई, इंदिरा, सुनिता विलियम मर्दो के कंधे स...
सहचर
कविता

सहचर

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मैं चाहूँ और कोई आ जाए, बिना कुछ पूछे, बिना कोई सवाल किए मात्र इसलिए कि हमने चाहा है! जब कि सच्चाई है कि हमने खुद को कभी वक़्त नहीं दिया, खुद से खुद की कोई बात नहीं की! जीवन के अकेलेपन में मेरी आत्मा में मेरा अस्तित्व बिखर रहा होता है बिना कोई शोर बिना कोई आवाज किए!! क्या कोई स्नेह से मुझे सहला सकता है क्या कोई मेरे सिरहाने बैठ कर मुझमे मेरा विश्वास जगा सकता है?? मुझे सूकून से अपने सानिध्य में सुला सके ये आभास करा कर कि सब अच्छा होगा! क्या कोई ऐसा कर सकता है? हैं, मेरे चार पंजों वाले सहचर, हमारी गतिविधियों से हमारा सुख-दुख समझ सकते हैं, बिना स्वार्थ हमारी पीड़ा, मन का शोर बांट लेते हैं, उनके साथ उनके निस्स्वार्थ प्रेम में हम सूकून से सो सकते हैं!! परिचय :- श...