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कविता

महफ़िल
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महफ़िल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जमी थी ख्वाबों की महफ़िल ज़मीं पर जिंदगी की हो गया खूशुबहों के पडाव में बचा गया दामन कोई शुबहे की आड़ में। चुप दरख्त चुप फासले चुप है, राहें कदम की जंजीर मकसद की मंजिल अभी दूर है तन्हाई का आवम अभी से क्यो है। और बढादी तन्हाई इस सन्नाटे ने रफ़्ता, बेरफ्ता चलना मुमकिन नहीं है मुमकिन है जिंदगी की फिसलन मैं फिसल जाऊ सम्हालो यारों मंजिल हासिल करना अभी बाकी है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इं...
जिंदगी… बड़ी बेरहमी से सच दिखती है
कविता

जिंदगी… बड़ी बेरहमी से सच दिखती है

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** जिंदगी ......बड़ी बेरहमी से सच दिखती है। कितना भी.... बहलाते रहे खुद को। ऐसा नहीं है...??? ऐसा हो नहीं सकता ...!!!! जबकि ..... ऐसा ही था!!!? साथ सच के बीते लम्हों की हर बात को बड़ी खामोशी से बयां कर जाती है। जिंदगी बड़ी बेरहमी से सच दिखती है। जिंदगी सच को बड़ी बेरहमी से दिखती है। झूठी उम्मीद को पाल-पाल कर। लाख कोशिश करें कोई टूटी उम्मीदों को फिर से संभाल कर। जिंदगी उम्मीद से भी उसकी उम्मीद छीन लेती है। जिंदगी बड़ी बेरहमी से सच दिखती है। जिंदगी सच को बड़ी बेरहमी से दिखती है। अपना-अपना कहकर जोड़ते रहे उमर भर छत और दीवारों को। जिंदगी बड़ी बेरहमी से उन घरों के दरवाज़े गिरा कर निकल जाती हैं। जिंदगी बड़ी बेरहमी से सच दिखती है। जिंदगी सच को बड़ी बेरहमी से दिखती है। मतलब तक जो मतलब र...
खण्डहर
कविता

खण्डहर

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** लोग मुझे खण्डहर कहते हैं कुछ अनजान से होते हैं, खण्डहर समझ कर मुझे ठुकरा कर, आगे बढ़ जाते हैं जानते नहीं वो, मैं भी था कभी एक आलीशान महल, राजसी ठाठ कभी मेरा भी था यौवन, मैं भी सिर उठा खड़ा अभिमान से देखता, हर कोई मुझमें झाँकने का साहस न बटोर पाता। किंतु, समय के गर्त ने मृत्यु के समान अपने अंक में मेरा रूप समेट लिया। आज सभी मुझे बाहर से देख कर आगे बढ़ जाते हैं ! मानव भी तो शव हो जाता है श्रद्धांजलियाँ अर्पित करते हैं हज़ारों, और मेरे इस शव की? उपेक्षा करते हैं, क़दम एक भी रखते नहीं जिससे वो मलिन न हो जाए। रूप दोनों का एक ही, पर स्वागत ? कैसा है प्रकृति का व्यंग्य !! परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी ...
मिलकर दीप जलायें 
कविता

मिलकर दीप जलायें 

डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या" जयपुर, (राजस्थान) ******************** आओ सभी मिलकर दीप जलायें इस दीपावली नवदीप जलायें । जो ज्ञान का दे प्रकाश, चलो ज्ञानदीप जलायें। जो जाति-पाति का मिटा दे अंधेरा, एक ऐसा धर्मदीप जलायें । जो अशुभ रूपी तम को हर ले, इक ऐसा शुभदीप जलायें। विज्ञान के दम पर हो भारत का नाम, एक ऐसा विज्ञानदीप जलायें। जनतन्त्र ना बदले, भीड़तन्त्र में, इक ऐसा जनदीप जलायें। चहुँ और हो प्रेम और सौहार्द, एक ऐसा प्रेमदीप जलायें। जन-जन हो प्रफुल्लित, इक ऐसा हर्षदीप जलायें। शूरवीरों की शहादत को ना भूलें, चलो एक शौर्यदीप जलायें। संस्कृति का परचम फहरे जग में, एक ऐसा संस्कृतिदीप जलायें। भारतभूमि का हो यशोगान, इक ऐसा यशदीप जलायें। मिट जाए भेद ग़रीबी-अमीरी का, एक ऐसा समदीप जलायें। अक्षर के ज्ञान से हों सभी परिचित, इक ऐसा साक्षरदीप जलायें। पर्यावरण को रखना है स...
उजड़ जाती जिंदगी
कविता

उजड़ जाती जिंदगी

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** शराब क्या होती है ख़राब कोई कहता गम मिटा ने की दवा जिंदगी में कितने गम और कितने ही कर्म दोस्तों की शाम की महफ़िल जवां होती ,हसीं होती बड़े दावे बड़ी पहचान के दावे सुबह होते हो जाते निढाल रातो को राह डगमगाती जैसे भूकंप आया या फिर कदम लड़खड़ाते हलक से नीचे उतर कर कर देती बदनाम जैसे प्यार में होते बदनाम शराबी और दीवाना एक ही घूमती दुनिया के तले मयखाने करते मेहमानों का स्वागत जैसे रंगीन दुनिया की बारात आई तमाशो की दुनिया में देख कर हर कोई हँसता/दुबकता दारुकुट्टिया नामंकरण हो जाता रातों का शहंशाह सुबह हो जाता भिखारी बच्चे स्कूल जाते समय पापा से मांगते पॉकेट मनी ताकि छुट्टी के वक्त दोस्तों को खिला सके चॉकलेट फटी जेब और खिसयाती हंसी दे न पाती और कुछ कर न पाती बच्चों के चेहरे की हंसी छीन लेती इ...
घर को घर ही बनाएं
कविता

घर को घर ही बनाएं

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** स्वर्ग बनाने से अच्छा है घर को घर ही बनाएं, मिथ्या स्वर्ग-नरक में न उलझाएं, सिर्फ बेटी में ही दोष न देखें, उनकी भावनाओं को भी सरेखें, घर को मकान ही रहने देने का जिम्मेदार नशेड़ी बेटा भी हो सकता है, लालची भाई भी सुख शांति का धनिया बो सकता है, बहू से कुढ़ती-नफरत करती सास भी घर का माहौल बिगाड़ सकती है, उच्छलशृंख ननदें संबंध उखाड़ सकती है, संयुक्त परिवार की बेटी भी बहू बन एकल परिवार खोजती है, एकता मधुरता को तह तक नोचती है, घर सबसे मिलकर बनता है, तब मुखिया का सीना तनता है, दहेज शब्द घर का नहीं धनलोलुपों के स्वार्थ का नाम है, ये अकड़ दिखा भीख मांगने का काम है, घर में तनाव लेकर न जाएं, सभी अपनी जिम्मेदारी उठाएं, मिलजुलकर समस्याओं का समाधान खोज घर को घर ही बनाएं। परिचय :-...
मेरा गाँव
कविता

मेरा गाँव

सोनल सिंह "सोनू" कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) ******************** बड़ा प्यारा था मेरा गाँव, आँगन में थी पीपल छाँव। जहाँ चलते हम पाँव -पाँव, रुकने के थे अनेको ठाँव। संगी, संगवारी बचपन के साथी, खेल-खिलौने, कबरी गाय। इन संग खेले बड़े हुए हम, पीते कुएँ का मीठा पानी। दादी-नानी की कहानी, याद हमें रहती थी जुबानी। दादा जी की मीठी बानी, आसान बनाती थी जिंदगानी। भोर की सुनहरी लाली, हरी चादर ओढ़े धरती मतवाली। फसलों का खेतों में लहराना, धूम-धाम से हर त्यौहार मनाना। पंछी को दाने खिलाना, मीलों पैदल चलते जाना। साथियों संग धूम मचाना, बफिक्री में वक्त बीताना। एक दूजे का हाथ बँटाना, संग-संग रोना मुस्कुराना। हर किसी से रिश्ता जुड़ जाना, मिलकर गीत खुशी के गाना। रोजी रोटी के चक्कर में, छूट गया अब गाँव हमारा। शेष रहा अब यही फसाना, होगा मेरा कब लौट के जाना। परिचय - सोनल ...
घड़ी
कविता

घड़ी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कांटे की घूमती, सिखाती कहती बिन थमे चलती हूं, हर दिन हर पल नाम है घड़ी, बिन गति बदल मेरी टिक टिक, आती है आवाज समय है कीमती टिक टिक में कहती समय, घड़ी, पल की दिलाती याद न रुका न रुकेगा, कीमती पल साथ घड़ी कहती समय पल घड़ी मत बदल मत रुक एक पल, मूल्यवान हर पल समय व्यर्थ कर न आज, न कर कल न समय न घड़ी न एक पल आएगा कल नाम है घड़ी मेरा, चलती बिन गति बदल हर पल हर दिन रहती अविराम बदलती नहीं बिल्कुल भी गति समझो सीखो कर लो पल कीमती नाम है एक घड़ी, कभी नहीं रुकती समय घड़ी पल की जिमेवारी रखती मैं रुकती नहीं, तू भी मत रुक, कर्म करते बढ़ते कभी न थक न थम न थक बस चल हर पल बिन सांस, चलती हूं हर पल हूं घड़ी, चलती हूं कांटे के बल धूप बरसात न मौसम की बात जब समय घड़ी में आये विध्न बाधा न चिंता तू आज कर, न कर कल चलती हूं ...
हें अनादि परमेश्वर मेरे
कविता, स्तुति

हें अनादि परमेश्वर मेरे

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** जिसका आदि अंत न होता, वह अनादि कहलाता। अंत रहित, प्रभु सदा सर्वदा, हैं अनंत फल दाता। जो शाश्वत हैं, सदा सनातन, वह अनादि भगवन हैं। गर्भवास से मुक्त रहें जो, बसते जो जन मन हैं। आदि अंत से रहित अविद्या, दोष न जिसको होता। नस-नाड़ी बंधन से विलगित, कोई जनक न होता। जो प्रारंभ नहीं होता है, सदा सनातन रहता। आदि रहित उस परम तत्व को, मानव भगवन कहता। जिसकी प्रकृति अनंत अनादी, परमात्मा है प्यारा। सदा अजन्मा, शाश्वत है जो, सारे जग से न्यारा। प्रकृति, जीव, परमात्मा तीनों, आदि अंत से ऊपर। नाशवान वह है दुनिया में, जो आया है भूपर। हैं अनादि परमेश्वर मेरे, अंत रहित हैं स्वामी। सारे जग के पालन कर्ता, हैं प्रभु अंतर्यामी। रूप, रंग, आकार रहित प्रभु, हैं अनादि कहलाते। प्रभु से सब जन्मे, सब जाकर, प्रभु ...
बुढ़ापा
कविता

बुढ़ापा

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** जिंदगी का सच सुबह आईने में देखा खुद ही का चेहरा कितना बदल चूका मन के भाव आज जवान चेहरे पड़ी झुर्रियां को ढांकने की कोशिश बालो को काला करके युवाओं की होड़ में शामिल होने की ललक में थक चुके कई इंसान ऐसा लगता बुजुर्गी का मानो कोई इम्तिहान हो आवाज में कंपन घुटनो में दर्द मानों सब खेल मुंह मोड़ चुके बतियाने को रहा गया अनुभवों का खजाना और फ्लेस बैक यादों का आईने में अकेला निहारता चेहरा और बुदबुदाता सभी को तो बूढ़ा होना ही एक न एक दिन युवा बात करे पल भर हमसे भागदौड़ की दुनिया से हटकर मन को सुकून मिल जायेगा अकेले बतियाने और आईने में चेहरे को देखकर सोचता हूँ, बुढ़ापा क्या ऐसा ही आता है। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्...
बेशक मैं …
कविता

बेशक मैं …

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बेशक मैं अब दुश्मन की श्रेणी में आता हूं। पर जब भी मेरे अपनों को जरूरत पड़ी दिल से दुआएं दे जाता हूं, हां होता रहता है अपनों के बीच गिले शिकवे नाराजगियां, मुसीबतों में खुद से सबकी बलाएं ले जाता हूं, महरूम हूं लाड़ प्यार दुलार से, नाराज नहीं किसी के गाली गलौज या लताड़ से, झंझावतों से जूझते रहने का नाम ही है जिंदगी, पर किया हूं दिल से हर रिश्ते की बंदगी, पर मैं वो जालिम नहीं कि बंधे बंधन की डोर पर बिजली गिराता हूं, बेशक मैं अब दुश्मन की श्रेणी में आता हूं। नहीं मेरे पास अकूत संपत्ति, रुपये-पैसे, जमीन-जायदाद, रूठों को मनाने किसे करूं फरियाद, चल रही है मेरे परिवार की गाड़ी जैसे तैसे, तूफानों से घिर बचा हूं कैसे, मौत से पहले शायद मना न सकूं रूठों को पर अपने हिस्से का फर्ज़ निभाता हूं, बेशक ...
जंजीर
कविता

जंजीर

किरण पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** शादी कर जंजीरों में ना बांधे, मुझे जीवन में कुछ करना है, मेरा हक मेरे भविष्य को अभी तो मुझे सँवारना है, स्कूल जाने का समय है मेरा, नहीं ससुराल में जाने का, डॉक्टर वकील प्रोफ़ेसर है बनना, हक ना छिनो मेरा है, घर के जंजीरों से ना जकड़ो, ना बेडी डालो तुम? स्कूल चले स्कूल चले स्कूल चले सब मिलकर हम, सभ्यता संस्कारों की जननी, "स्कूल" मेरे भविष्य का भाग्य विधाता, शिखर छूकर मुझे हे आना, मेरे पैरों मै जंजीरे ना बाँध तुम, आधुनिक भारत का सपना, आत्मनिर्भर भारत का सपना, साकार तभी हो सकता है, "बेटी पढ़ाओ बेटी बढ़ाओ" तभी साकार हो सकता है, "मेरी पढ़ाई मेरा भविष्य" इसको नहीं गँवाना है, उम्र से पढ़ना, एक उम्र में शादी यही जीवन की सफलता है, "हम पढ़ेंगे हम बढ़ेंगे" नहीं शादी की जंजीरों में बाँधो तुम, अपना "भविष...
सर्व-दीपक जला हम उजाला किए…
कविता

सर्व-दीपक जला हम उजाला किए…

बृजेश आनन्द राय जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** सर्व-दीपक जला हम उजाला किए, दूर होने लगी ये तिमिर, ये निशा। दीप की संस्कृति आज उज्ज्वल हुई, अब चली जा रही है गहनतम अमा। हर नगर हर निलय आज रौशन हुआ, हर जगह आज दीपित है एक शमा। मन हर्षित हुआ, तन है पुलकित हुआ, सप्तरंग सजी है दीया अरु दशा। सर्व-दीपक जला हम उजाला किए, दूर होने लगी ये तिमिर, ये निशा।। 'राग-दीपक' अलापित कहीं हो रहा, ये हृदय आज स्वर में कहीं खो रहा! उठ रही है चहक आज हर द्वार पे, जैसे बाती-दीया का प्रणय हो रहा ! गीत-माला हृदय की महकने लगी, अरु बहकने लगी है हर एक दिशा। सर्व-दीपक जला हम उजाला किए, दूर होने लगी ये तिमिर, ये निशा।। ये 'प्रकट-बाह्य-अन्तर-की' ज्योति जली, जो मन-उत्सवी का सद्व्यवहार है। है सदा ही सृजन जिस मनुज के हृदय, ऐसे हर्षे-रसिक का व्यापार है। समशीतोष्ण-जलवायु प्रकृति ...
चलायमान पथ
कविता

चलायमान पथ

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** घुटन भरी जिंदगी जब जग से उब कर चलते-चलते अलगाव के पडाव पर, कुछ समय रुक ती है सुस्ताती है तो चलायमान पथ उससे पुछता है क्यो तुम रुक गई उड़ नहीं सकतीं पंख नहीं है तुम्हारे चलों उठो आगे बढ़ो मैं साथ हूं तुम्हारे मैं चल दी उठकर उस अचल पथ के साथ उसकी दृढ़ता देख दृढ़ता से निकल पड़ी गंतव्य की खोज में परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर्तमान में इंदौर लेखिका संघ...
सम्पर्क सुख
कविता

सम्पर्क सुख

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** रिमोट बटन कमान में, काम का बदलता रूप हर काम में डिजीटल ले रहा है नया रूप बदलता युग बदला काम डिजीटल से काम की कमान का मानव ले रहा मनचाहा सुख नितप्रतिदिन डिजीटल का बढ़ता बदलता सुख कामकाज का प्रचलन, बनाया सरल बना लिया है बखूब, डिजीटल के काम की आधुनिक पद्धति बना ली है हर क्षेत्र के काम में अपनी बना ली एक स्मार्ट गति दिखता है डिजीटल का काम अनोखा और अद्भुत हाथ से काम की आदतें वे आदते देखने को मिल नहीं रही जिधर देखो वे हाथ की विद्याये डिजीटल के भरोसे अब गई सबकी छूट और अब डिजीटल से ही नजर आता है कैसे कितना बदल डाला है डिजीटल का युग डिजीटल से देख रहा स्थानों को डिजीटल से देखता है सब रुट कर रहा है हर मानव काम, काम कर लिया है आसान जीवनशैली में हर व्यक्ति की भागदौड़ डिजीटल के भरोसे ही ले आय...
याद तुम्हारी मैं बन पाता
कविता

याद तुम्हारी मैं बन पाता

रमाकान्त चौधरी लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) ******************** याद तुम्हारी मैं बन पाता। तो जीवन जीवन होता। मुझे बुलाती ख़्वाबों में तुम अपना मधुर मिलन होता। रोज मुझे तुम लिखती पाती उसमें सब सपने लिखती। जितने ख्वाब संजोए मैंने उनको तुम अपने लिखती। लिखती प्रियतम मुझको अपना मुझपर सब अर्पण होता। याद तुम्हारी मैं बन पाता तो जीवन जीवन होता। लोग नगर के सभी पूछते तुमसे मेरा हाल पता। अधर तुम्हारे चुप ही रहते सबकुछ देते नयन बता। दूर भले ही हम तुम रहते जन्मों का बंधन होता। याद तुम्हारी मैं बन पाता तो जीवन जीवन होता। तुम्हें चिढ़ाती सखियां सारी नाम हमारा ले लेकर। झुंझलाती चिल्लाती सबपर खुश होती तुम छिप-छिप कर। मेरी छवि तुमको दिखलाता इक ऐसा दर्पण होता। याद तुम्हारी मैं बन पाता तो जीवन जीवन होता। परिचय :-  रमाकान्त चौधरी शिक्षा : परास्नातक व्य...
संस्कारों की गुल्लक
कविता, बाल कविताएं

संस्कारों की गुल्लक

प्रीति तिवारी "नमन" गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** मेरे बच्चे मेरे पास आकर कहते हैं, माँ हमें पैसे दो हम अपनी गुल्लक भरेंगे। मैने मुस्कराकर कहा आओ न, करती हूँ मलामाल तुमको, मुझे मिली परवरिश के संस्कारों की दौलत से, सुंदर आचरण करेगें।। समाहित करूँगी तुम्हारे व्यक्तित्व में एक अच्छी आदत। संघर्षों में साहस, सच का सामना करने में हो ना घबराहट।। बड़े-बुजुर्गों, गुरुओं हर नारी का हो सम्मान। छोटों से हो प्रेम परस्पर, हृदय ना हो अभिमान।। दूसरों की मदद करुणा दया सेवा भाव हो शामिल। आत्मविश्वास-उमंग आध्यात्मिकता प्रेम सहानुभूति से परस्पर रहें घुल-मिल।। विनम्रता आत्म निर्भरता, सच्चाई के साथ सदा खुश रहना। सादा जीवन, सादा भोजन, बुरा ना कुछ मुँह से कहना।। श्री हरि नाम से काज शुरूँ हों, नित्य पढें अच्छी पुस्तक, सादे-सच्चे दोस्त बनाये...
जिस रोज तुम …
कविता

जिस रोज तुम …

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** जिस रोज तुम गए थे ..... मुझे छोड़ कर। दो शब्द भी हिस्से न आयें मेरे। कुछ तो कहा..... होता कुछ बोल कर।। जिस रोज तुम गए थे मुझे छोड़ कर।। इंतजार को छोड़ा था मैंने जिस मोड़ पर। दिल को तोड़ा था तूने दिल से जोड़ कर। मैं फरियादें कहा करता रब से कुछ बोल कर। जिस रोज तुम गए थे .... मुझे छोड़ कर।। ना जाते हुए देखा नज़र भर कर। मैं देखता ही रहा... खामोशी से उस मोड़ तक। आज सोचता हूँ.... क्यों रोका नहीं उसे अपनी कसम बोल कर। जब कि वो चला गया मेरी जिंदगी से बिना ... कुछ बोल कर।। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक...
बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं
कविता

बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** अहसास से सींचे हर एक रिश्तों को जग मे साथ निभाते हर फरिश्ते को दिल जो मिले आश अधूरी तो नहीं बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं कभी कम या ज्यादा मिल जाता है बागो मे भी कई फूल खिल जाता है अरमा के फूल खिले जरुरी तो नहीं बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं अब अहसासों से रिश्ते निभाते रहें जीवन के गीले शिकवे मिटाते रहें रूबरू मिलना भी जरुरी तो नहीं बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं जो मिला है वो भी उसकी मेहर है सुख अमृत है तो दुख ही जहर है सदा सुख मिले हमें जरुरी तो नहीं बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं है इश्क अगर तो दर्द मिलेगा जरूर कांटों मे नित गुलाब खिलेगा जरूर प्यार मे अंजाम मिले जरुरी तो नहीं बागो मे नित बहार जरुरी तो नहीं दुख-सुख तो जीवन का हिस्सा है जीवन भी एक अनोखा किस्सा है जीवो हंस के कोई मजबूरी नह...
सागर का वसन्त अनंत
कविता

सागर का वसन्त अनंत

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** सागर का वसंत हैअनंत कभी न मरने वाली, अटखेली करती मतवाली लहरों का है संग, तो क्यों न हो सागर का वसंत अनंत। सागर को तर करने वाली, कूलों को बालू से भरने वाली लहरों का है संग, तो क्यों न हो सागर का वसंत अनंत। चंदा को रिझाने वाली, सूरज को चमकाने वाली लहरों का है संग, तो क्यों न हो सागर का वसंत अनंत। प्रस्तर को मृदु करने वाली, वृक्षों का सिंचन करने वाली लहरों का है संग, तो क्यों न हो सागर का वसंत अनंत। कमसिन सी जल भरने वाली, मीठी तान सुनाने वाली लहरों का है संग, तो क्यों न हो सागर का वसंत अनंत। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका) शिक्षा : एम.ए. अंग्रेजी, एम.ए. भाषाविज्ञान, पी.एच.डी...
जातियता को त्यागे कौन
कविता

जातियता को त्यागे कौन

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सो रहा समता का दिल तो खुद से होकर जागे कौन, स्व को दूजे से ऊंचा समझे जातियता को त्यागे कौन। आने और जाने के क्रम में, सभी बराबर क्यों हो भ्रम में, कदकाठी तन सबका एक, नहीं यहां पर कोई विशेष, खून में सबके लाल रंग है, पेट खातिर सबका जंग है, मानवता बंधुत्व भाव को देखो अब तो सिराजे कौन, जातियता को त्यागे कौन। बंटे हुये हैं लोग हजारों में, लेकर विष घूमे विचारों में, घमंड जात का दिखलाते है नजरों और नजारों में, नहीं खाते हैं एक दूजे घर, भूख से भले ही जाये मर, कब लाएंगे सीने में अपने भाईचारा और बड़ा जिगर, नफरतों को हवा दे देकर दिलों में अब बिराजे कौन, जातियता को त्यागे कौन। नहीं किसी को फिक्र देश की, बातों में नहीं जिक्र देश की, जाति पकड़ कर घूम रहे सब दिल में नहीं है चित्र देश की, ऊंच नीच सर ...
बोनी उड़ान
कविता

बोनी उड़ान

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** फसलों को निहारते मुस्कुराते किसान की खुशियां हो जाती रफूचक्कर जब हो अतिवृष्टि कहर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करता किसान इनके आगे हार जाता उसके सपने और उम्मीदों की बोनी उड़ान से सपने बिखर जाते उड़ान भरता मरती फसलों को बचाने की मगर उसकी बोनी उड़ान नहीं बचा सकती आपदाओं के आगे उसकी उड़ान से आर्थिकता के सूरज से पंख जल जो जाते कर्ज की तेज आंधी उसके जीवन की उड़ान को बोनी कर जाती ये आपदाएं। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक", खट्टे मीठे रिश्ते उपन्...
सत्ता की गलियारों में
कविता

सत्ता की गलियारों में

हितेश्वर बर्मन डंगनिया, सारंगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सत्ता की गलियारों में आहट नहीं होती है बिना लड़े गुलामी से राहत नहीं मिलती है हर फूल सिर्फ कीचड़ में ही नहीं खिलती है रात के अंधेरी साया के बाद ही सुबह होती है आत्मविश्वास को अहंकार मत बनने दे ! पैसा रास्ते को सिर्फ आसान बनाती है नतीजे से पहले जीत का दावा ना कर समय का रेत धीरे-धीरे खत्म हो रहा है जरा रूक जा इंतजार करना सीख जीत का इतना बेसब्री से इंतजार न कर ! अपने दिल को पत्थर सा मजबूत बना ले हार को भी हँसकर सहन करना सीख सत्ता की गलियारों में सिर्फ तू अकेला ही नहीं है अपने पीछे भी मुड़कर देख ले, बड़े ही खामोशी से तेरा पीछा कोई और भी कर रहा है। अपनी स्वार्थ को हद से ज्यादा सोपान न चढ़ा जीतने के लिए आँख मूंदकर झूठ का उफ़ान न बढ़ा तू अपनी ताकत से किसी के बढ़ते कदम को रोक सकता है उसके राह में...
छठ व्रत की महिमा
कविता

छठ व्रत की महिमा

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** सूर्यदेवता के चरणों में सूर्यास्त की किरणों से सूर्योदय की किरणों तक सूर्यदेव की उपासना में व्यस्त सूर्यदेव का करते है व्रत, दीपोत्सव के छह दिन के बाद आता यह, कहलाता छठपर्व व्रतधारी हर नियम धर्म है रखते जलकुंड नदी तालाब पोखरे छठपर्व पर शुद्ध और पूजित होते सूर्यदेवता के आगे नतमस्तक होते नवाते ब्रतधारी जल में खड़े हो अपने शीश दण्डवत करके दऊरा लेके गाते छठ के गीत सूर्यदेव की करते सेवाभक्ति जल में उतरते अर्ध्य देने को तनमन में ब्रतधारी की शक्ति भक्तिमय रूपरंग में व्रतधारी सूर्यदेवता की करते सेवाभक्ति फल फूल ठेकुआ करते अर्पित स्नान ध्यान कर सूर्यदेवता का जल में खड़े करते है प्रणाम व्रतधारी छठपर्व पर करते ध्यान सूर्यपूजा, व्रतधारी का अन्तर्मन भक्तिभाव में लगता तन-मन लौकी भात खीर आदि पूर्व खाते छ...
नियति चक्र
कविता

नियति चक्र

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** जीवन की अंतर्तम गहराई को छलकाने वाले ओ। नयनों की बूँद, तुम्हें कैसे समझाऊँ ! जीवन को सपनों की घाटी बतलाकर ओ नयनों के अश्रु, तुम्हें कैसे बहलाऊँ! मृग तृष्णा बन विश्व चक्र यों घूम रहा है अन्तर की कस्तूरी को, नहीं कोई पहचान रहा है ज्ञात नियति को ख़ुद न समझने वाले ओ नयनों के दीप तुम्हें कैसे समझाऊँ ! जीवन क्या है, क्यों है, नहीं किसी ने जाना इसका कौन रचयिता, नहीं कोई पहचाना किसके अंतर की ज्वाला धधक रही धरती पर ओ नयनों की बूँद तुम्हें कैसे बतलाऊँ ! प्रकृति के हैं रूप अनेक, बसी जहाँ अनुपम माया कहीं रूप है, कहीं रंग है, कहीं रहे केवल छाया प्रकृति शाश्वत, काया नश्वर यह यथार्थ तुम स्वीकार करो ओ नयनों के दीप, तुम्हें कैसे सहलाऊँ !! परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी स...