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कविता

समता की बातें
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समता की बातें

विवेक नीमा देवास (मध्य प्रदेश) ******************** हर घर में नारी अपने ख्वाबों का आकाश चुने पाने को अपनी हर मंजिल अपना दृढ़ विश्वास बुने। जीवन की हर खुशियों पर उसको नित अधिकार मिले बाबुल हो या आंगन प्रिय का आदर और सम्मान मिले। सूनी राहों पर बैठे गीदड़ चरित्र हीन तिनका भर हैं जो दंभ भरे अपने पौरुष का क्या सच में भी वो नर हैं? कदम-कदम पर अबला को लूट रहे जो अभिमानी दुःशासन से दानव देखो राह सरे करते मनमानी। जन्मी बेटी है बोझ बढ़ेगा ये सोच नहीं बर्बादी है करते हैं जो गर्भ में हत्या परिजन वे भी अपराधी हैं। नारी से ही जन्मा नर है भूल रहा क्यों ये सच्चाई माँ, बहन, पत्नी और बेटी संग रही बनकर परछाई। उसे भी हक है पंख फैलाए आसमान में उड़ने का पाने को बेटों सा मान सदा अपनों से भी लड़ने का। दिल्ली हो या राहें मणिपुर की खौफ न हो नारी के मन में दहेज प्रताड़न...
सोशल मीडिया वाला प्यार
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सोशल मीडिया वाला प्यार

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** ऑनलाइन मुलाकात फिर नंबर मिला, बात हुई ढेरो फिर मिलने की जगी आस......! बारिस का दौर मिलने की चाह, तड़प थी इतनी नजरो को था उनका इंतजार......! चाय पकौड़े छोड़कर मोहब्बत की भूख, चढ़ा जो नशा हमे उतरता वो कहा जल्दी......! प्यार हो जाये तो बारिस और ठंड लगती अच्छी, वो दिन भी आया जब चलकर वो आयी......! काश बारिस भी आती तो मोहब्बत हमारी निखर जाती, खैर मिलकर कुछ उसने और सब कुछ हमने कहा......! नही थी आगे और बात की जरूरत, देखकर उसकी उम्र हमे निकलना ही सही लगा......! फिर पहुँचे दोस्तो की महफ़िल दर्द हमारा बाहर आया बिन देखे मोहब्बत न करना, जिसको कहाँ था बाबू-सोना वो निकली मोहल्ले की एक अम्मा......!! परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रक...
खुद शर्म आज शर्मिंदा है
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खुद शर्म आज शर्मिंदा है

डाॅ. रेश्मा पाटील निपाणी, बेलगम (कर्नाटक) ******************** विपक्ष का मुद्दा मणिपुर सरकार का राजस्थान सब राज नेताओं ने मील के कर दिया इस देश का बंटाधार।। जनता गयी तेल लगाने, जिसे जीना है जीए, जिसे मरना है मर जाए बस मेरी प्यारी कुर्सी कभी ना जाए बस यही हमारी तमन्ना और यही हमारा एजेंडा भाई जो कुछ हो रहा है उस पर तो जनता शर्मिंदा है हम नही हम ने तो कब की शर्म बेच खाई तभी तो हम राजनेता है भले ही खुद शर्म आज शर्मिंदा हो हम बेशर्मो की तरह ही बयान बाजी करेंगे दुनिया मे भला कोन दूध का धुला है, जो हम पे आरोप धरेंगें जनता के सेवक बस कहने की बात है साहब असलियत मे तो हम सम्राटों के भी सम्राट है भला हमे काहे का डर दुनिया में नही बची अक्ल दो हमारा क्या दोष? जनता को नही समझ आती बात तो हम क्या करे हम सब तो कब से चीख-चीख कहे रहे है की हम झूठे मक्कार है बस...
मैं मुर्दों के शहर में रहती हूँ
कविता

मैं मुर्दों के शहर में रहती हूँ

डॉ. अर्चना मिश्रा दिल्ली ******************** मैं मुर्दों के शहर में रहती हूँ जहाँ सिर्फ़ आरोप और आरोप सिर्फ़ और सिर्फ़ इल्ज़ाम स्त्री मन क्या चाहता है कोई परवाह नहीं कोई इतना भी बुरा कैसे हो सकता है कोई पास फटके ही ना सिर्फ़ और सिर्फ़ आरोप दिमाग़ जैसे फट के कई टुकड़ों में विभाजित हो गया क्या क्या उम्मीद उस से सब बेकार जैसे वो सिर्फ़ एक सड़ी हुई बीमार लाश सिर्फ़ बदबूदार इतनी सड़न की जहाँ जायें सब जगह बीमारी फैला आयें वो इतनी बेबस है आज सबके हाथ में ज़ुबान रूपी पत्थर कैसे-कैसे कहाँ-कहाँ फेकें सबने खून के रिश्तें भी बेकार किसी को नहीं वो स्वीकार ऐसे में कहाँ वो जाएँ कहाँ अपना सिर छुपाये सबके लिए अब वो बेकार नहीं किसी को वो स्वीकार कोई तो, कहीं नहीं किसी का नामोनिशान जिसे वो हो एक प्रतिशत भी स्वीकार मरी हुई लाश सी पड़ी है, बदबू ही बदबू, कटे फटे अंग जमा हुआ...
नंदी
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नंदी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शिव है सत्य, नंदी हैं धर्म नंदी के बिन शिव अराधना है व्यर्थ नंदी को हमने छोड़ दिया, गौ वंशों का संहार किया भूख प्यास से तड़प तड़प, सड़कों पर दम तोड़ रहे ये कैसी पूजा है शिव की ये कैसे भक्त बने शिव के ??? बछड़ो को अधिकार है जीने का, नंदी बन पूजे जाने का कैसे कहलाएंगे सनातनी, अपनी ही संस्कृति भूल रहे !! नंदी की विह्वल पुकार सुन, दिल रोता पल प्रतिपल, इनके अश्रु विध्वंस बने, विकराल, प्रचंड, विनाश बने जो लील रहा है जन-जीवन ये आँसू वो सैलाब बने! हे मनुज उठो हे जन जागो, रोको ये ध्वंस, विनाश, प्रलय, मानव के भीतर दानव का अब उठ कर के संहार करो नव चेतना नव विज्ञान से संचित करो अनमोल है हैं ये नंदी ही नंदीश्वर हैं, यही साधना नील कंठ की, नंदी ही ना बच पाए जो कैसे होगा फिर शिव पूजन!! परि...
पर्यावरण के बनें हम पहरेदार
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पर्यावरण के बनें हम पहरेदार

महेन्द्र साहू "खलारीवाला" गुण्डरदेही बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** धरणी स्वच्छ हो, स्वच्छ हो अम्बर, हरियाली फैलाना है। पेड़-पौधों की करें सुरक्षा, हमें जागरूकता लाना है। पेड़-पौधों से हम सबकी, सांसें गतिमान है। आओ पेड़ लगाएं, इनसे ही हम सबका प्राण है। सांसों को सांसों से है जोड़ना, कुंठा की कड़ी को है तोड़ना। आओ मिलकर हम पेड़ लगाएं, धरा हरियाली कर जाएं। पड़ रही है सांसे कम, हो रहा है चहुंदिशी दंगल। हरा - भरा हो जंगल, तब हो पाएगा जीवन मंगल। यदि हर एक आदमी ख़ुद से एक-एक पेड़ लगा जाए। उनका जीवन हो सार्थक, जीवन सफल बना जावें। पर्यावरण के बनें हम पहरेदार, यही जीवन का आधार। इनसे मुंह ना मोड़े हम, नाता इनसे जोड़े हम। परिचय :-  महेन्द्र साहू "खलारीवाला" निवासी -  गुण्डरदेही बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ...
बढ़ती दुनिया
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बढ़ती दुनिया

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** आज का आधुनिक युग डिजीटल युग में बेहिसाब सा बदल गया बेहिसाब लोगों का बेहिसाब दैनिक कामकाज डिजीटल युग की प्रक्रियाओं में सरल कर रहा डिजीटल का भरोसा बढ़कर सम्पर्क अब खूब बढ़ सा रहा कामकाज का रूप बेहिसाब सबका एक नया अध्याय खड़ा कर रहा डिजीटल की दुनिया में कामकाज का नमूना खूब बदल गया शिक्षित क्या अशिक्षित हाथ से लिखने की आदत से हट रहा कामकाजी रूप को डिजीटल खूब कर रहा हाथों के कामकाज को विराम करने में भलाई समझ रहा डिजीटल के भरोसे दैनिक काम मानव खूब लगन से कर रहा कलम पकड़ने का मन प्रायः लोगो का नहीं रहा कागज में लिखने का प्रायःमन हट सा गया डिजीटल में मानव कामकाज का रूप खूब सरल करता ख़ुद स्मार्ट और डिजीटल कर रहा समय की बचत करता डिजीटल में मानव का सबसे सम्पर्क चंद मिनट में हो रहा रोजगार पर्यटन व्या...
राजनीति रोटी
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राजनीति रोटी

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** राजनीति की रोटियां, जितनी चाहो सेंक। सत्य तथ्य रखते परे, निडर मानकर फेंक।। भ्रष्ट रोटी जो मिले, मानें खुद को शूर। पर होता इंसाफ है, होकर लज्जित दूर।। मुनि संतों के देश में, शैतानों का उत्पात। वनवास काल ’राम’ ने, दी चुन चुनकर मात।। काम किसी के आ सकें, खुल जाता था द्वार। अदभुत दधीचि दान था, केवल अब कुविचार।। चलता देश विवेक से, रखें सभी अभिमान। फिर मनचाहा तो नहीं, होता है गुणगान।। मुल्क नीति अवमानना, विचलित दिखे अनेक। सिर्फ भ्रम फैला रहे, रोटी लालच एक।। देश प्राण जब एक है, भारत माता आन। समान घटना नजर से, क्यों रहते अनजान।। बोली बहुत मुखर हुई, देते बात मरोड़। ’मुन्ना’ तर्क इस राह से, निकले कोई तोड़।। परिचय :- विजय कुमार गुप्ता जन्म : १२ मई १९५६ निवासी : दुर्ग छत्तीसगढ़ उद्योगपति : १९७८ से विजय इंडस्ट्रीज द...
औरत
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औरत

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** जिसने जन्म दिया उसका मान नही है क्या? ममता की कंही सम्मान नही है जिस्म के लिए यह कैसे व्याभिचारी है औरत को औरत होने की लाचारी है खूब लगाते नारीवाद के नारे सभी क्या सम्मान दे पाये नर उन्हें अभी क्या? वो जीने के अधिकारी नही है औरत को औरत होने की लाचारी है समता का जब उनको अधिकार है क्यों रखते उनके प्रति दुर्व्यवहार है घात लगाकर बैठे क्यों शिकारी है औरत को औरत होने की लाचारी है क्यों उनको सब अधिकार देते नही बराबर का अधिकार क्यों देते नही क्यों कहलाई जा रही वह बेचारी है औरत को औरत होने की लाचारी है अब सम्मान और समता से जीये क्यो जीवन भर वह विष को पिये स्वाभिमान से जीने के अधिकारी है समता, स्वभिमान के वो अधिकारी है परिचय :- प्रमेशदीप मानिकपुरी पिता : श्री लीलूदास मानिकपुरी जन्म : २५/११/१९७८ निवासी : आमाच...
प्रकृति
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प्रकृति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** शब्दों को पूर्ण वीराम ना लगाओ शब्द, तार है मन सरगम का छंद अलंकारों से श्रृंगारित शब्द अवलंबन है जिव्हा का। कर, लेखनी, काली स्याही व्यंजन, परिमार्जन शब्दों का शब्द चमत्कृत, शब्द झंकृत शब्द-शब्द से कहानी है। स्वर व्यंजन से रचा गढ है परकोटा है अलंकारों का अंदर बाहर गिरि गव्हर है नव रसों की फुलवारी। व्यंग, राग का परी तोषण करते हास्य करें मनुहारी, क्रोध, शांत रस दर्शाते मानव मन के भाव को तू अकेला नहीं, कहता कोई अभिन्न मित्र बना लो शब्दों को। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से नि...
लहरें
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लहरें

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** सदियों से चलती रहतीं, लगातार तुम धरती सी सूरज, चंदा, ग्रह और तारे, साथी, संगी हैं तुम्हारे पवन तुम्हारी रक्षा करती, धूप कलेवर चाँदी का देती वृक्ष तुम्हें पा हरिया जाते, और तीर गदगद हो जाते तुम धरती को जीवन देतीं, खेतों में धान उगातीं आत्मा में प्राण जगाकर, कृतज्ञता कर्ता को दर्शातीं अगाध नीर की नीली स्वामिनी तुम सा जीवन लासानी, तुम सा जीवन लासानी। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर निवासी : सिलिकॉन सिटी इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका) शिक्षा : एम.ए. अंग्रेजी, एम.ए. भाषाविज्ञान, पी.एच.डी. भाषाविज्ञान सर्टिफिकेट कोर्स : फ़्रेंच व गुजराती। पुनः मैं अपने देश को बहुत प्यार करती हूं तथा प्रायः देश भक्ति की कविताएं लिखती हूं जो कि समय की‌ मांग भी‌ है। आ...
सपनों का आसमान
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सपनों का आसमान

संगीता दरक मनासा, नीमच (मध्यप्रदेश) ******************** ना बंदिशों की परवाह है ना बंदिशों की परवाह है, ना परंपराओं की जकड़न आत्मविश्वास का पहना, मैंने अचकन उम्मीद से भरे पंख मेरे, हौसलों से भरी उड़ान है , समेट लूँ आज,सारा जहां में कि साथ मेरे सपनों का आसमान है। ना मन को समझाऊं मैं, ना पग धरु पीछे में, ना ख्वाहिशों को अपनी छिपाऊँ में, काबिलियत अपनी सारे जहां को दिखाऊँ मैं। कि साथ मेरे सपनों का आसमान है। तारों के साथ आज, उजाले की बात करते हैं। काले अँधेरो पर आज रौशनी बिखेरते है। सपनों के आसमान में सूरज सा जगमगाते है, धरती के तिमिर को पल में हराते है। बस इतना सा अरमान है, साथ मेंरे आज सपनों का आसमान है। परिचय :- संगीता दरक निवास :  मनासा जिला नीमच (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानिया...
हां सब कुछ मेरा है पर
कविता

हां सब कुछ मेरा है पर

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सूरज मेरा है, चांद मेरी है, हवा मेरा है, कुदरती दवा मेरा है, ये फूल, पवन पुरवाइयां मेरी है, मेहनत मेरे हैं, पर जमीन उनका है, हर नाजनीन उनका है, सर्वत्र घूम रहे हैं जहरीले सर्प और बीन उनका है, व्यवहार मेरा है, संस्कार मेरा है, सारे पाखंडों पर लूट जाने का अधिकार मेरा है, पर सारे नियम उनके हैं, जिनकी नजरों में हम तिनके हैं, भले बाजुओं में दम है, हमारे सीनों में गम है, उनके लिए लफंगे हम हैं, कीड़े मकोड़े, भिनभिनाती कीट पतंगे हम हैं, पर चिराग उनका है, झपट्टे मारता हर बाज उनका है, जंगल पहाड़ हमारे हैं, सद्व्यवहार हमारे हैं, नैतिक मूल्य, व्यवहार हमारे हैं, पर व्यवस्था में बड़ा आकार उनका है, तन हमारे हैं, मन हमारे हैं, जन हमारे हैं, खोट हमारा है, वोट हमारा है, पर सम्पूर्ण सत्ता उनका है...
शहीद बिरसा मुंडा जी
कविता

शहीद बिरसा मुंडा जी

देवप्रसाद पात्रे मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** वीर जन्मा जनजाति अभियान के लिए जल जंगल जमीन स्वाभिमान के लिए हमको देने जीवन दान, वीरसा हो गए कुर्बान। चले हथेली लेके जान। वीरसा हो गए कुर्बान।। अदम्य साहस निडर वीरता से भरपूर। आदिवासी क्रांतिकारी नाम से मशहूर। भुजा सजे तीर कमान। वीरसा चले सीना तान।। चले हथेली लेके जान। वीरसा हो गए कुर्बान।। स्वतंत्रता सेनानी आदिवासी लोक नायक थे। ब्रिटिश शासन हिलाने वाले प्रेरणादायक थे।। नीति नियम की मार, दर्द झेल आदिवासी। चरम पर नर-संहार, कितने झूल गए फांसी।। इतिहास के पन्ने बने शान वीरसा हो गए महान।। चले हथेली लेके जान। वीरसा हो गए कुर्बान।। जमी के ठेकेदार कैसे हक छीन जाते थे? उनके मुँह का निवाला कैसे लूट खाते थे? मालिकाना हक से अब बनने लगे मजदूर। कसूरवार ठहराए, जबकि वो थे बेकसूर।। आदिवासियों के शान ...
बंधन जरूरी है
कविता

बंधन जरूरी है

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ********************   चित्र देखो कविता लिखो प्रतियोगिता हेतु प्राप्त रचना तय समय के बाद प्राप्त होने से प्रतियोगिता में सम्मिलित नहीं हो सकी ...अतः क्षमा ....🙏🏻 उत्कृष्ट रचना हेतु रचनाकार को शुभकामनाएं ...🙏🏻💐💐💐 प्यारी परी, नन्ही कली। तेरी डगर, आशा से भरी।। इक पैर तेरा, संकल्प का। दूजा चरण, संयम भरा।। ठान ले तू, ना बहकेगी कभी प्यारी परी, नन्ही कली। तेरी डगर, आशा से भरी।। सर पर पल्लू, भले कर ले। दुपट्टा तन पे, भले धर ले।। पढ़ ले, जीवन गढ़ ले पायल से बंधे रहना खड़ी।। प्यारी परी, नन्ही कली। तेरी डगर, आशा से भरी।। स्त्री आजादी के, घाव गहरे हैं। उजले दिखते, स्याह चेहरे हैं।। बंधन बांध कर भी तू बन सकती है रण चंडी।। प्यारी परी, नन्ही कली। तेरी डगर, आशा से भरी।। परिचय :- महेश बड़सरे राजपूत इंद्...
हमारा भी जमाना था
कविता

हमारा भी जमाना था

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** पीढ़ी देखे चरम बदलाव, चिंता बिन अफसाना था। भला=बुरा का ज्ञान नहीं पर, हमारा भी जमाना था। बिन शर्म संकोच बचपन में, पैदल साइकल जो हुआ। दूर_पास विचार नहीं संग, मां पिता गुरु ईश दुआ। चला करते पीढ़ी के रिश्ते, चाचा मामा बहन बुआ। ढपोरशंख पदवी से दूर, प्रतिशत उच्च अंक छुआ। बगैर संकोच पुस्तक शॉप, क्रय विक्रय ठिकाना था। परिवार सहयोग में कितनी, लाइन भी लग जाना था। अपनी पीढ़ी चरम बदलाव, बिन चिंता अफसाना था। भला-बुरा का ज्ञान नहीं पर, हमारा भी जमाना था। प्रभु प्रलोभन मिठाई का, कम मेहनत विनय करते। पढ़ाई खर्च का बोझ वहन, कभी उजागर ना करते। सिलवटी ड्रेस सस्ते खेल से, जमकर खुशियां पा लेते। कंचा भौंरा पिट्टुल कौंडी, लूडो चेस चला करते। जरा सी पॉकेट मनी बचे, अन्य शौक भी पाना था। घर का मुरमुरा चूड़ा भेल, अपना श...
सरज़मीं
कविता

सरज़मीं

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** वो मेरा है ये जमाने को बताना है सोहनी मैं महीवाल उसे बनाना है सजा सख्त पाई दिल लगाने की मोहब्बत के दर्द को यूँ छुपाना है वो ही मेरी शोख यादों में समाया है दिल की सरजमी पर उसे लाना है नजर न लगे कहीं बेदर्द जमाने की हर एक शय से बस उसे बचाना है स्वाति की बूँद का वो मोती सा है साँसों की तसबी में उसे पिरोना है कर न पाया इज़हार-ए-इश़्क कभी मुहब्बत भरा एक लुटा खजाना है मैं वो आँसू हूँ जो छलका ही नहीँ मेरा निगाहों को बस मुस्कुराना है वो मसीहा सारे जमाने भर का है उसकी बेवफाई से दिल लगाना है वो मेरे नाम की गहराई में छुपा है अधरों पर "मधु" उसे ही सजाना है परिचय :- मधु टाक निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां...
बोलो पीर सहूँ मैं कब तक
कविता

बोलो पीर सहूँ मैं कब तक

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** बोलो पीर सहूँ मैं कब तक, तुम्हें दया नहिं आती। पेड़ काट कर गिरा रहे हो, फटती मेरी छाती। धरती माता बोल रही हूँ, अपना दर्द सुनाती। माँ का सीना छलनी करते, तुझे लाज नहिं आती। तेरा बचपन मुझ पर बीता, अब यौवन पाया है। अपने आँचल तुझे दुलारा, दी शीतल छाया है। पर्वत सब उरोज हैं मेरे, बनी वृक्ष से काया। माँ का कर्ज आज तक तूने, क्यों कर नहीं चुकाया? सभी जीव छाया पाते हैं, कोयल मधुरिम गाती। जब कटते हैं वृक्ष धरा से, छलनी होती छाती। ओ निष्ठुर, बेदर्दी मानव, पीर बढ़ा मत मेरी। कब तक पीर सहूँ मैं बोलो? माता हूँ मैं तेरी। परिचय :- अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवासी : निवाड़ी (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.एस.सी एम.एड स्वर्ण पदक प्राप्त सम्प्रति : वरिष्ठ व्याख्याता शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय क्रमांक २ निव...
इंसान से इंसानियत खो गया है
कविता

इंसान से इंसानियत खो गया है

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** परहित परोपकार की बातें करना समाज के लिए जीना और मरना सब कुछ खोखली बातें हो गया है इंसान से इंसानियत खो गया है अच्छे-बुरे की अब परख नही है जीने-मरने मे कोई फरक नही है स्वार्थी अब हर इंसान हो गया है इंसान से इंसानियत खो गया है प्यार-मोहब्बत सब झूठी बातें बेईमानी मे कटती है अब रातें दगा देना,नामे वफा हो गया है इंसान से इंसानियत खो गया है पल-पल बदलती जग की तस्वीर जाने लिखने वाला सबकी तकदीर जीवन कोई फलसफा हो गया है इंसान से इंसानियत खो गया है विकास का क्या असर हो गया है मानव से मानवता ही खो गया है क्यूँ इंसान अब ऐसा हो गया है इंसान से इंसानियत खो गया है परिचय :- प्रमेशदीप मानिकपुरी पिता : श्री लीलूदास मानिकपुरी जन्म : २५/११/१९७८ निवासी : आमाचानी पोस्ट- भोथीडीह जिला- धमतरी (छतीसगढ़) संप्रति : शिक्ष...
वज़न
कविता

वज़न

रंजना श्रीवास्तव नागपुर (महाराष्ट्र) ******************** सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने की हिम्मत रखती हूँ, हवाओं के विपरीत चलने का जिगर रखती हूँ, इसलिए मैं भीड़ में अलग दिखती हूँ। खटकता है मेरा आत्मविश्वास और तड़पाती है मेरी ईमानदारी व सच्चाई, नहीं करने देती मनमानी। रोड़ा बन जाता है मेरा हुनर, परेशान करती है लोगों के बीच मेरी पहचान। हाँ !! अकेली ही स्वयं में पर्याप्त हूँ। भीतर बसा हुआ है मेरे भरा पूरा ज़माना। दिल से खिलखिलाती हूँ, बाँटती हूँ मुस्कुराहटें और खुशियाँ, पहचानते हैं कुछ काबिल लोग मेरी काबिलियत को। बस यही... बुरा लगता है कौरवों को और शकुनि के साथ मिलकर रचने लगते हैं चक्रव्यूह। स्वयं में कितने कमजोर हैं!! पैने झूठे वारों से खत्म कर देना चाहते हैं मिलकर मेरे आत्मविश्वास को, मेरे वजूद को। चतुरंगिणी सेना घेर लेती है चारों ओर से मुझे। अक्सर....
दिल में आया है एक ख्याल सुनहरा सुनहरा
कविता

दिल में आया है एक ख्याल सुनहरा सुनहरा

अलका जैन इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दिल में आया है एक ख्याल सुनहरा सुनहरा निजी गुलशन में लगाए एक अंगूर की डाल खट्टी मीठी याने तेरे नाम की हरिभरी बेल दिल में आया है एक ख्याल सुनहरा सुनहरा गलि मे लगा डालूं एक चंदन का पेड़ सावन में ओर प्राप्त करु भीनी-भीनी तेरे बदन सी खुशबू दिल में आया है एक ख्याल सुनहरा सुनहरा सा किसी गुलशन में लगाए जाये गुलाब के फूल यार प्राप्त करूं गुलाब यानी तेरे लब से सुर्ख लाल गुल दिल में आया है एक ख्याल सुनहरा सुनहरा सा किसी दिन कराया जाये मुकाबला हुस्न और गुल में शायद गुल जीते जाये हुस्न भी है दावेदार मुकाबले मे सुनंदरता के इस मुकाबले में टक्कर कांटे की होगी सुनो चाहे हुस्न जीते या गुलशन के फूल दोनों मेरे अपने हुस्न और गुलशन हिफाज़त करना फर्ज दिवानो का पर्यावरण जब रक्षा होगी समाज की हिफाज़त होगी ...
प्रकृति संरक्षण
कविता

प्रकृति संरक्षण

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** प्रकृति का दोहन करते हो, और पर्यावरण दिवस मनाते हो, हम सबको मिलकर, प्रकृति संरक्षण करना है, पेड़-पौधे नित नव लगाना हैं, पेड़ काटने से रोकना हैं, वायु प्रदूषण रोकना हैं, व्यर्थ जल बहने से रोकना हैं, जल संरक्षण का संकल्प लेना हैं। अधिक से अधिक पेड़ लगाना हैं, जन्मदिन पर एक पेड़ अवशय लगाना हैं, यही नारा चहुंओर फैला कर, जन-जन को जागृत करना है, वैवाहिक वर्षगांठ पर, एक पौधा उपहार में भेट देना है, वायु प्रदूषण रोकना हैं, अपने मित्र के जन्मदिन पर, एक पौधा अवश्य भेंट करना है, जो भी फल खाएं, उसके बीज संभाल कर रखना हैं। जब कभी अपने शहर से बाहर जाएं, तो रास्ते में किनारे पर, फेंकते जाना है, अपनी कॉलोनी और पूरे मोहल्ले में संगठित हो, अधिक से अधिक को पौधे लगाना हैं। सारे भारतवासियों क...
पिता
कविता

पिता

श्रीमती शोभारानी तिवारी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मां धरती और पिता आकाश है, टिमटिमाते तारों का विश्वास है, पिता रब की,सच्ची अरदास है, जीवन में इनकी जगह, खास है। टूटे हुए मनोबल का सहारा हैं, ऊंगली पकड़ चलना सीखाते है, मां वर्तमान को ही संवारती हैं, पिता भविष्य की चिंता करते है। पिता पतझड़ में भी मधुमास है, माता-पिता ही हमारे भगवान है, जिस घर में पिता का साया न हो वह घर नहीं, उजड़ा रेगिस्तान है। पिता साथ हैं तो दुनिया रंगीन है, वर्ना जीवन में, उदासी के साए हैं, रिश्ते, व्यवहार सब पिता से ही हैं, वर्ना तो सारे अपने भी, पराए हैं। पिता तो बस नाव की पतवार है, उनसे होते सारे सपने साकार है, पिता ही परिवार का पालनहार है वही सिखाते सभ्यता, संस्कार है। पिता से ही बच्चों की पहचान है, मॉ के मंगलसूत्र का वही शान है, हिमालय बनकर रक्षा करते सदा उनसे ह...
वो दिन कब आएगा
कविता

वो दिन कब आएगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां मानता हूं कि दलित आदिवासियों के पास समस्याएं हैं, पर उनके पास अपनी परंपराएं हैं, उनके मन में भी सवाल है, यदि दाग दे तो बवाल है, व्यवस्था ऊपर आरोप है, सत्ता की ओर से प्रत्यारोप है, अपने पुरखे रूपी भगवान से उम्मीद है, अपने धरोहरों से अटूट प्रीत है, कुछ अतार्किकता है, दिलों में मार्मिकता है, जातियों में खंड खंड है, कहीं कहीं थोड़े बहुत पाखंड है, प्रशासनिक ज्यादिता है, अपनी रूढ़िवादिता है, यहां तक वोट देने का अधिकार है, पर कुछ दलालों के कारण बन जाता एकदिनी व्यापार है, केकड़ावृत्ति वाला समाज है, खंडित जिनका हर साज है, पर अफसोस मानवीयता और अमानवीयता में से चयन करने में पीछे रह जाते हैं, समाज के गोद में बैठे दलालों के कारण हरदम, हरपल धोखा खाते हैं, शिक्षा का सही उपयोग क्यों नहीं कर पाते...
नौकर
कविता

नौकर

मनोरमा जोशी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरा पता पूछकर, मुझकों अपमानित, मत करना। छलक जायगा, दुखः का मनघट, दुखित न मन को करना। दिन अपने कट, जाते हंसकर, सो जाता रातों, को रोकर, मैं होटल का नौकर। दुखः के घूंट, निगलकर अपने, आंसू पी लेता हूँ, फटकारों से फटा, हुआ दिल हँसकर, मै सी लेता हूँ, साहस है मुझमें, जीने का झूठे, बर्तन धोकर, मै होटल का नौकर। तुम्हीं बताओं उम्र है, मेरी ललकारें सुनने की, मैले फटे पुराने कपडे़, पहनू मै नित धोकर, मै होटल का नौकर। किसी चमन का साथी, फूल बना हूँ, जीवन की बहती, धारा का फूल बना हूँ, धुतकारों या पुचकारो तुम तुमकों है अधिकार सभी, मुझको पता नहीं है, कब किसने छोड़, दिया है बोकर, मै होटल का नौकर। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्...