
योगेश पंथी
भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश
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मेरा जीवन था पतझड़
तुम आई हो बाहर लिए !
जैसे भेजा हो तुम्हे प्रभु ने
खुशियों का उपहार लिए ॥छोड़ आइ हो पीहर को
मेरे घर को बसाने को।
माता से संस्कार लिए
बबूल का मान बढ़ाने को॥इस दिल को ठंडक मिलती हे
जब जब तुम मुस्कती हो ।
कितने सेह्ज भाव से दोनो
कुल की रीत निभाती हो ॥मेरी खुशी मेरे दुख में
हर पल सांथ निभाती हो।
जैसे में इक दीपक हूँ
और तुम मेरी बाती हो ॥मेरे चेहरे की रंगत से
तूम रंग रूप बदलती हो।
दीपक तो संपूर्ण तभी हे
जब संग बाती जलती हो॥धन्न हुआ मेरा जीवन
जो तुमने उपकार किया।
अपने पूरे जीवन को
मेरे जीवन पर बार दिया॥भूल के अपना सब कुछ
सब मेरा तुम करती हो ।
भोर भई तो जग जाती हो
देर रात तक जगती हो ॥मेरे घर को सवारती हो
और मेरे लिए संवरती हो।
क्यों न तुम संग प्रीत निभाऊँ
इतनी प्रीत जो करती हो ॥खिल जाती हो मेरे खिलते
बिखर जाने पे बिखरती हो।
हार जाऊ गर टूट के में
तो मुझमें दम भर्ती हो ॥खुशी न होती कोई दिल में
सुना दिल का ये घर होता।
तुम्ही तो बहारें लाई हो
तुम बिन जीवन पतझड़ होत॥
परिचय :- योगेश पंथी
निवासी : टीलाजमालपुरा भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश
राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच से लेखन यात्रा प्रारंभ ….
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