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Tag: राजेन्द्र लाहिरी

चंद अल्फाज़
कविता

चंद अल्फाज़

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आप में सुशीलता है या नखरो नाज, आपके मुंह से निकला चंद अल्फाज, बयां कर जाता है आपका किरदार व अंदाज, आपके रहन सहन का तरीका, आपके जीवन जीने का सलीका, ए आइ के जमाने में आज हम पहुंचे हैं भले, मगर भांपने का तरीका रहा है पहले, आपकी सोच, आपके मित्र, आपके जीवन जीने का अंदाज और ये इत्र, बहुत कुछ बता देता है, आप इस धोखे में मत रहिए कि चरित्र को छुपा लेता है, ये अल्फाज ही है जो दिलाता है मान सम्मान, तो कभी दिलाता है रुसवाई और अपमान, कब,कहां,कौन से शब्द कहने है लो जान, समाज में रहकर ही सीखा जाता है ज्ञान, दिख जाता है बहुत जगह पढ़ा लिखा गंवार, जो नहीं जानता तहज़ीब और प्यार, तो अल्फाजों को संभाल कर रखिए, किसके सामने क्या बोलना है आंखें खोलिए और देखिए। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिर...
छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे
आंचलिक बोली, कविता

छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) हम वो करम करबो जउन इंसानियत अउ मानवता बर जरूरी हे, बाकी हर हमेशा हम देखत हन हमर घेंच म हर बेरा लटके छुरी हे, ए सब करे बर न कोनो देबी चाही न कोनो देवता, हमर अपन छत्तीसगढ़िया परब आय छेरता, जिहां अपन उपज के खुशी म सगरो मिलजुलके मनाथन तिहार, एही म हमर जीत अउ एही म हमर हार, जीत एखर बर के हम दिलवाला हन, हार एकर बर नइ दिखय चढ़ाय जालापन, एमा काखरो कोनो योगदान नइ हे, सब दान करत हन अइसना हमर हिरदई हे, मुठी भर अन्न अउ पेट भर खाना, सदा दिन ले करत आत हे छत्तीसगढ़िया दीवाना, जतको कमाएन पायेन, जादा रहय चाहे कम अपन बर हाथ बढ़ायेन, छेरछेरा कोनो धार्मिक तिहार हे न कोनो सामाजिक, हमर हिरदे ले जुरे तिहार हे वास्तविक, त आवव तिहार खुलके मनावव, छत्तीसगढ़िया मन दिलवाला होथे सबो ल बतावव। ...
नया साल
कविता

नया साल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अमीर-अमीर होते जाएंगे और गरीब और भी ज्यादा गरीब, भरमाया मस्तिष्क कहेगा है ये हमारा नसीब, नहीं बदलेगा किसी का सूरतो हाल, ज्यादा उम्मीद मत पालना अच्छा होगा नया साल, खेल वही जारी रहेगा, चालाक धर्म, जाति पाती और अछूत कहेगा, दुश्वारियों से जान नहीं छूटेगा, लुटेरा खुलकर लूटेगा, भाग्य मानने वालों का भाग फूटेगा, जहरीली हवाओं से दम घुटेगा, होगा वही लड़ाई व मारकाट, होगा हमेशा की तरह बंदरबाट, नेता विभिन्न मुद्दे उछालेंगे, सब लोग उधर ही दिमाग डालेंगे, विपक्ष अपना खेल संभालेंगे, प्रशासन सबका तेल निकालेंगे, हां पैसे वालों के लिए होगी कुछ दिन खुशियां, त्राहिमाम करते रहेंगे जो है दीन दुखिया, मन मस्तिष्क में वहीं सड़ांध होंगे, ऐसे ही लोग सभ्रांत होंगे, बस इस गुजरते जैसा न हो नया साल, जिसका स्वा...
हां रामसकाल आ गया है
कविता

हां रामसकाल आ गया है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जयंती समारोह के एक कार्यक्रम में कड़वे आसवित जल के सुरूर लेकर वो आ गया, सीधे आयोजकों से टकरा गया, बोला बैनर जो टंगा है उसमें मेरा क्यों चित्र नहीं है, कार्यकर्ताओं में मेरा कोई मित्र नहीं है, इसीलिए इस बैनर को यहां से हटाओ, मेरे फोटो वाला बैनर लगाओ, एक युवा कार्यकर्ता तमतमा गया, भयंकर गुस्से में आ गया, समता समानता के इस कार्यक्रम में कोई किसी पर दबाव नहीं बनाएगा, कोई अपनी राजनीति नहीं चमकाएगा, दूर दूर से भी और कुछ पास से अतिथि आये, कार्यक्रम के उद्देश्य और अपने विचार बताये, मगर रामसकाल कभी नजदीक बैठता तो कभी दूर, पूरे कार्यक्रम के दौरान कम नहीं हुआ उनका सुरूर, कभी कहता कि इन सब का खर्चा मैंने उठाया है, मेरे कारण आयोजन सफल हो पाया है, उस दिन एक मछली तालाब कैसे गंदा करता है, सकार...
भालू और हम
बाल कविताएं

भालू और हम

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां हूं मैं भालू, पर तुम इंसानों जैसा नहीं हूं चालू, ऐ मानव मेरी रहवास क्यों खा जाते हो, अपनी लालच में आकर मेरी जंगल मिटाते हो, हां भालू जी मैँ हूं शर्मिंदा, तुम्हारे जीवन के कारण इस दुनिया में मैं हूं जिंदा, तुम्हारे आक्रामकता का कारण मैं हूं, सारे तुम्हारे समस्याओं का निवारण मैं हूं, प्रकृति के नियमों को मैंने छेड़ा है, अपनी सीमाओं को लालच में मैंने तोड़ा है, जरा सोचो जंगल से निकल रहवास में हम क्यों आते हैं, तुम पर हम क्रोधित हो जाते हैं, मत उजाड़ो मेरा आवास, तुम गलत हो कैसे दिलाऊं विश्वास, अब आपको दिलाता हूं मैं भरोसा, सदा मिलजुलकर रहेंगे नहीं दूंगा मैं धोखा, यदि मैंने मर्यादा तोड़ा तो तुम मुझे सबक सिखाना, बना लेना मुझे दुश्मन मुझ पर तान देना अपना निशाना। परिचय :-  ...
इत्तेफाक
कविता

इत्तेफाक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आज हमारा समाज जिस जगह खड़ा है मैं नहीं समझता कि यह इत्तेफाक है, लाखों करोड़ों जुल्म ज्यादतियां सह कर मुस्कुराने में कोई तो बात है, शांत स्वभाव में हरदम रहना, लेकिन अत्याचार को नहीं कभी सहना, लेकर शांत पड़े रहे दिल में ज्वालामुखी की धधक, जब चाहे प्रतिक्रिया दे दे नहीं ऐसी सनक, भविष्य की स्वाभाविक चिंताएं लेकर, करते हर काम अपनों की बलाएं लेकर, अच्छे कामों की सराहना भी की उज्जवल भविष्य की दुआएं देकर, खौलते खून की उबाल दिखाये हैं शस्त्र से लैस भीमा कोरेगांव में, जब तक अत्याचारियों को समूल नष्ट न कर दिए सुस्ताये नहीं किसी पेड़ की छांव में, हमने लड़े और जीते भी कई युद्ध, मगर हमने जग को दिये भी हैं दैदीप्यमान बुद्ध, अस्पृश्यता की बात कर बैठाया गया समतायुक्त शिक्षालय से निश दिन बाहर, भावना...
चलो बताओ
कविता

चलो बताओ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी के अथाह संघर्षों से मिला हुआ हर चीज खा रहे हो,खुले आम चिल्ला रहे हो, चलो बताओ उस महामानव को कितना वापस देते जा रहे हो, जब समाज को वापस करने वाला धन कहीं और देकर आते हो, अपने आप को दिखावे में ले जाते हो, बनाकर बैठे रहते हो दस लोगों का संगठन, लालच से भरा हुआ आदमी कभी कर लिया करो अपने अंतस का मंथन, जीने की ललक नहीं जा रही दूसरों के छिलकों पर, अपना ही फसल जा रहे हो कुतर, संख्या ज्यादा होने से कुछ नहीं होता, कोई पत्थरों पर फसल कभी नहीं बोता, चंद संख्या वालों का हुजूम एक मजबूत दबाव गुट बना सकता है, अपनी समूह की चाही गयी लक्षित सोच का सकारात्मक परिणाम ला सकता है, सोचो जरा कि हम क्या कर रहे हैं? केवल गुब्बारों में हवा भर रहे हैं? हमें ये समझना होगा कि गुब्बारे उड़ाने से कोई समाज न ऊपर उड़ेगा न ऊपर...
जरूर कोई बात है
कविता

जरूर कोई बात है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** धुरंधर लठैत मुस्कुरा रहा है, विरोधी लठैत भी मुस्कुरा रहा है, पता करो पीछे जा भौंकने वालों दोनों मिलकर कोई खिंचड़ी तो नहीं पका रहा है, हर कोई इन पर भरोसा कर रहा मगर ये भरोसे के काबिल नहीं है, नहीं पता तो चुप रहा कीजिए जनाब सपने में भी मत कहना कि ये हमारी बर्बादी में बिल्कुल शामिल नहीं है, मत ताकते रहो चेहरा और लिबास, खोजो और ढूंढो कहां है कालिख छुपा खास, कहीं ढंक ले तुम्हें वातावरण आभासी, कोई भी बन सकता है अडिग सत्यानाशी, अतीत के अपने अंजाम क्या याद नहीं, उनके पुरखों के कर्म कभी लगे सही? बहुतों के कर्म सही लगते हैं होते नहीं, वे कुकर्म भूल जाते हैं उसे कभी ढोते नहीं, बावरे मन और बावरे चित्त लेकर अब तक कितनों को हम समझ पाये हैं, थोड़े की चाह में सब कुछ तो लुटाये हैं, क्यों नहीं दिख रहा लेकर खड़े व...
रिश्तों में दरार
कविता

रिश्तों में दरार

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सबको अपनी पड़ी है कोई नहीं कर रहा विचार, पता नहीं क्यों आ जाते हैं रिश्तों में दरार, अपनों का रूखापन, अपनों की दगाबाजी, किसी को मजबूत कर देता है तो कई बन जाते हैं अपराधी, रिश्तों की दरारों से बढ़ सकता है बैर, एक दूजे को भूल, नहीं सोचते कभी खैर, करने लग जाते हैं एक दूसरे की बुराई, इसकी न उसकी नहीं किसी की भलाई, तब हो जाये शायद बच्चों का बंटवारा, दुलार भी नहीं सकते चाहे हों सबसे प्यारा, आना जाना खतम और बढ़ती है दूरी, पहल कोई भी कर सकता है नहीं कोई मजबूरी, मगर इस हालात में आड़े आता है अहम, बुराई मेरी ही कर रहे सब हो जाता है भरम, लग जाते हैं पहुंचाने को नुकसान और अपनाते हैं साम-दाम- दंड-भेद की नीति, भूल जाते खून से बंधे संबंध व प्रीति, हां ये मेरा भी दर्द है, घुस चुका मुझमें भी ये मर्ज ह...
बंधे हुए शब्द
कविता

बंधे हुए शब्द

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** छोड़ दो शब्दों को स्वतंत्र, बिना दुराव छिपाव बिना घुमाव, कहने दो अपनी बात सरल और सीधी शब्दों में, ताकि न पड़े लोगों को खोजना कुछ कठिन शब्दों के अर्थ, ताकि संभावना ही न रहे कि निकल पाये अर्थ के अनर्थ, साफ शब्दों को जानने में सब है समर्थ, कवि के दिली अहसास यदि न पहुंच पाए जन मन के दिलों तक, तब उनके लिए हो जाते हैं वे तमाम शब्द बेमतलब, हां होते हैं कवियों की तलब कि वह भी शामिल हो जाये उन तमाम लोगों की फेहरिस्त में, जिन्हें लोग कहते हैं शब्दों के जादूगर, बेजोड़, बेहिसाब, बेझिझक, निडर, असल मुद्दा होता है अपनी रूह को पाठकों की रूह से जोड़ना, उड़ेलना जरूरी है उन तमाम शब्दों को जो बंध कर नहीं रहते किसी भाषाई लोगों के बंधन में, जो स्वतंत्र है अपनत्व में, खंडन में, जिस तरह नदी की बहाव को बांधकर...
हां वो भूल रहा है
कविता

हां वो भूल रहा है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उनके पैदा होते ही खुश हुए लोग सारे, अब उनके लिए भी गर्वित पल आया जो थे पुत्र के मामले में बेचारे, बूढ़े दादा जी तो लगभग पगला गया, झूमते नाचते बच्चे के पास ननिहाल आ गया, उनकी खुशी देखते बनती थी, पल पल गर्व से छाती तनती थी, क्योंकि बहुत सारे पैदा हुए पुत्रों की मौत के बाद वो दुनिया में आया था, बहुतों की निराश जिंदगी में खुशहाली लाया था, उनके बाद कई भाई-बहन परिवार की खुशियां बढ़ाने आए, मगर पहले पुत्र को गिरफ्त मेंप ले चुके थे पराये पन के साये, परायों ने उन्हें संभाला, गाली दे खिलाते थे हर निवाला, परिवार के संकट को अकेले ढोया, और हर रिश्ते का रिश्ता मुफ्त में खोया, हर रिश्ता खोने के बाद अब वो भूलने लगा है अपने आप को, अब नहीं सोचता अच्छाई या संताप को, उनको अब कोई फर्क नहीं पड़ता बचे हुए हैं कितने...
सब कुछ नेता होता है
हास्य

सब कुछ नेता होता है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यहां उपस्थित सभी लोगों के साथ सिंहासन पर विराजमान सरपंच और पंच को नमन करता हूं, उसके बाद उपस्थित अन्य लोगों के साथ बारंबार इस मंच को नमन करता हूं, यहां मेरे विभाग के मेरे अधिकारी भी हैं, हमारे बीच तालमेल और तैयारी भी है, उन्हें नमन करना भूल गया तो भी किसी न किसी तरीके से मना लूंगा, हमारे बीच की बात है मुद्दा सुलझा लूंगा, मगर मुझे नेता से सबसे ज्यादा डर लगता है, इन प्रतिनिधियों का चेहरा कहर लगता है, ये बार-बार हिस्सा नहीं देने की बात करता है, कड़ी सजा दिलवाने, देख लेने की बात करता है, जिन्हें बोलना, लिखना नहीं आता है, वो बस्तर फिंकवा देने की धमकी सुनाता है, लोग कहते हैं कि डर के आगे जीत है, लेकिन वो तो इनसे भी भयानक चीफ़ है, सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए बिना सीधे मुंह बात नहीं करता है, अपने जुबां पर द...
कुछ तो दोष मेरा भी है
कविता

कुछ तो दोष मेरा भी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सारा दोष दूसरों पर मढ़ कर मैं अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता, लोग स्वेच्छा से चलने लगे हैं सामाजिक जागरूकता की राहों पर तो क्या मैं खुद जाग नहीं सकता, ताउम्र मैं, मैं, मैं की नीति पर चला हूं, अपना कर्तव्य भूल बहुतों को छला हूं, स्वार्थी परमारथ की राह में नहीं जाते, कांटे बोने वाले कभी कांटे नहीं उठाते, मगर राह के हमें ही उठाने होंगे, उन टेढ़े-मेढ़े राहों पर हमें ही आने जाने होंगे, पढ़ने की औकात नहीं थी पर पढ़ा, बाबा साहब के अहसानों से एक उचित स्थान गढ़ा, खुद को देखता रहा अपनी राह गया आया, अभी तक समाज को कुछ नहीं लौटाया, न किसी की शिक्षा में सहयोग, न किसी के उत्थान में सहयोग, सारी कमाई का करता रहा स्वयं उपभोग, प्रचलित परिपाटी के विरुद्ध मुंह नहीं खोला, सामाजिक मुद्दों पर कभी खुल कर नहीं बोला...
बेखबरी का आलम
कविता

बेखबरी का आलम

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ये मेरी बेखबरी ही है कि लुटता जा रहा है मेरा सब कुछ, बढ़ता जा रहा मेरा दुख पर दुख, पर्दे डाले गए मेरे सुनहरे इतिहास पर, विरोधी इतना घातक है कि तुला हुआ है करने मेरे सत्यानाश पर, है उनके पास अजीब हथियार जो है रासायनिक अस्त्रों से भी घातक, जिससे हो जाते हैं मदहोश सब देख उनके निश दिन का नाटक, गिरवी पड़ा है मेरे अपनों का मष्तिष्क किसी नापाक इरादों वाले के चरणों में, हम पूरी तरह फंसे हुए हैं उन्हीं विरोधियों के विभिन्न धारणों में, ऊपर से हमारी पेट की आग, दिन भर इसी में उलझे रहते हैं और अपनों के प्रति कर्तव्य नहीं पाता जाग, अपने कर्तव्यों के प्रति मेरी सोच व समझ आखिर बेखबरी ही कहा जाएगा, मेरा यह रुख आगामी पीढ़ी से नहीं सहा जाएगा, मेरे जैसे लाखों करोड़ों लोग कब जाग पाएंगे, जोश, जुनून, जज्बे की कब आग जला...
जिंदगी के दिये
कविता

जिंदगी के दिये

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** लंबा होता जा रहा है सफर, काम का भी और जिंदगी का भी, आकलन करने पर परिणाम दिखता है सिफर, जब जब जिस-जिस जगह से हुआ लगाव, जल्द ही मिला बिछड़ाव, क्या करे बंधे हुए हैं कुछ नियम तो कुछ परिपाटी से, दूर हो गए बचपन में खेली सोंधी माटी से, जनाब ये जीवन की गाड़ी है, चलना-चलाना नहीं आता अनाड़ी हैं, बस छोड़ दिए हैं खुद को प्रकृति और कुदरत के हाथों, हर आदेश को लगाए सर माथों, पर मैं इन स्थितियों से उदास नहीं हूं, उमंगों से भरा हूं हताश नहीं हूं, हां कर नहीं पाया अपने मन की, कभी परवाह नहीं कर पाया धन की, अपनी आवश्यकताओं को रखा हूं सीमित, पर अपनों की चाहत है असीमित, अपनी पहुंच तक हाथ-पांव मार रहा हूं, मगर अभी भी चादर जितनी पांव पसार रहा हूं, भले आशाएं आकांक्षाएं नहीं मारता उछाल, जिसके लिए रखा हूं ...
करिया अउ वोखर रूख
आंचलिक बोली, कविता

करिया अउ वोखर रूख

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) करिया ल बनेच रिस आगे, ओखर तत घलो छरियागे, मोर लगाय रूख ल काट के कोन लेगे, मोर हिरदे ल बड़ दुख देगे, मोर कइ पीड़ही बर छैंहा बनाय रहेंव, सुखी रही संहंस लिही तेखर जोगाड़ जमाय रहेंव, लइका ह इसकुल ले घर आके बताइस, के गुरूजी कहे हे एक ठन रूख अपन दाई के नांव म लगाबे, पानी पलो के वोला बड़का बनाबे, करिया अकचका गे, सुन के झंवुहागे, खटिया म बइठे रहिस त नइ गिरीस, पानी ठोंके म संहंस हर फिरिस, अब आन संग अपन आप ल कइसे समझावां, अपन पीरा ल काला बतावां, जब पइसा वाला मन दोगलाई म उतर जाथें, त हमर अस गरीब के जंगल ल कटवाथें, हमर पुरखा मन अपन महतारी भुंइया के हरियर रूख ल कभु नइ काटिन, ए जंगल ह हमर दुख दरद ल बांटिन, फेर कथनी करनी के फेर ल देखव तमनार अउ हसदेव जइसन जंगल के हजारों लाखों पे...
पता नहीं क्यों?
कविता

पता नहीं क्यों?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जब तक निःस्वार्थ भाव से कोई जुड़ा रहता है समाज सेवा में, तब तक उनका ध्यान रत्ती भर नहीं जाता मलाई व मेवा में, तब मन में चलता रहता है कि मेरा समाज कहीं दुखी तो नहीं है, नजर आ जाता है कमी यही कही है, लोगों को हर उस नियम को बताता है, जिसे अपना कुछ मुस्कान लाया जाता है, संविधान की एक एक अनुच्छेद रह रह याद आने लगता है, भ्रष्ट लोगों को चमकाते नहीं थकता है, वो भूल जाता है अपना दुख, लोगों से की हंसी में खोजता है अपना सुख, मगर जैसे ही वो सामाजिक कार्यकर्ता से एक कदम आगे बढ़ नेता बन जाता है, बदलाव नजर आने लगता है सीना तन जाता है, उनके पिछले कार्य उन्हें दिलाता है कुर्सी, यहीं से शुरू हो जाता है मनमर्जी, अब वो बहाने बनाना जान जाता है, झूठ बोलने की बहुत बड़ी दुकान लगाता है, अब उन्हें लोग प्यारे नहीं लगते प...
परिवर्तन लाना पड़ता है
कविता

परिवर्तन लाना पड़ता है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अपने आप आती है बारिश, थमने नहीं स्वीकारती कोई गुजारिश, आंधी के आने का कोई काल नहीं है, जिसे रोकने के लिए कोई जाल नहीं है, खुद-बखुद आ जाती है तूफान, क्या पता ले ले कितनों की जान, मगर किसी की जान लिए बिना महापुरुष गण परिवर्तन लाते हैं, तात्कालिक अवरोधों से बेफिक्र टकराते हैं, भले ही सड़े गले लेकिन तत्कालीन समय के सशक्त प्रचलित व्यवस्था से टकराना, कोई बांये हाथ वाला खेल नहीं है, जहां विचारों का होता मेल नहीं है, अवैज्ञानिक, अमानुषिक नियम हर किसी के लिए समान नहीं होते, विभेदों से भरे ग्रंथवाणी में ज्ञान नहीं होते, इंसान होकर भी इंसान इंसान नहीं होते, ऐसी प्रथाओं के लिए खपना बलिदान नहीं होते, इस दुनिया में अंधविश्वास, पाखंड और भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है, नैतिकता, सत्य, दया से बड़ा भगवान नहीं है...
ददा के कदर कर लव
आंचलिक बोली, कविता

ददा के कदर कर लव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी रचना) जइसे मैं हर थोरकुन रिसहा गोठ कहेंव मोर लइका फुस ले रिसागे, ओखर अक्कल के कोनो तिर घिसागे, दिन भर घर म आबे नइ करय, घर के चुरे भात साग खाबे नइ करय, दिन भर ऐती ओती छुछवावय, मोला देख मुंह अंइठ रिस देखावय, मैं अड़बड़ परेसान, का होही सोच सोच हलकान, के ए हर कब तक बइठ के खाही, अपन जिनगी चलाय बर कब कमाही, अभी के संगी संगवारी ल देखत हे, आघु चल के का होही नइ सरेखत हे, ओखर कइ झन संगी मन घर चलात हे, बिहान होत बुता म लग जात हे, रात दिन के पइसा उड़ाइ ओ दिन सटक गे, जब दु सौ रूपिया कमाय खातिर दिन भर के मेहनत म संहस अटक गे, एके दिन के बुता म कुछु समझ नइ आही, पइसा बचाय अउ उड़ाय के फरक चार महीना कमाय के बाद जान पाही, ददा के जिंयत ले सगरो सुख संसार हे, बाप के सीख ल मान लौ बेटा होव...
जान कर भी क्या कर लोगे
कविता

जान कर भी क्या कर लोगे

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हकीकत जान कर भी क्या कर लोगे, उन्हें ही गरियाओगे और उन्हीं को सेवा दोगे, यह वो तबका है जो गाली सुन सकता है, मालिक कभी भी धुन सकता है, ताज्जुब की बात यह है कि मार खाने वाला इस पर नहीं गुन सकता है, सेवा स्वीकार है सत्ता के बदले, उन्हें याद नहीं सब कुछ निहत्थों ने बदले, सेवा स्वीकार है दरी बिछाने के एवज, असंवैधानिक शब्दों से पुकारे जाने के एवज, सेवा स्वीकार है चंद सिक्कों के बदले सामाजिक दलाल कहलाना, अपमानों को सह-सह खुद को बहलाना, मगर अपने समाज को दे क्या रहे हो? उसी घिसी पिटी व्यवस्था की परिपाटी, अपनों से ऊंचा दिखने की चाह संग ख्याति? कुछ मेहनतकशों के बनाये रास्ते मिल जाने से दे सकते हो मूछों को ताव, बढ़ सकते हो आगे अपनों को देकर घाव, तुम्हारे जैसे चंद चमचे देंगे तुम्हें भाव, ...
आंख मूंद न अपना कहो
कविता

आंख मूंद न अपना कहो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** कौन हितैषी, दुश्मन कौन ये हम को पहचानना होगा, किसी की झूठी बातों को आंख मूंद नहीं मानना होगा, बनके आएंगे बहुत हितैषी, मंशा पाले वो कैसी कैसी, हो सकता है वो बड़ा दलाल, कहेंगे खुद को बहुजन लाल, चढ़ा लोगे जब उसे नजर में, निकल पड़ेगा सौदे की सफर में, अच्छे से पहचानो उसको, मान रहे हो अपना जिसको, जो करता है संग रह अय्यारी, पड़ेगा समाज पर वो तो भारी, सरल राह यूं ही न मिलेंगे, छुप रिपुओं से गले मिलेंगे, बढ़ जाता जब प्रभाव व दौलत, फिर दुश्मन से मिलेगा उसी बदौलत, महापुरुषों का पहले लेगा नाम, गड्ढे खोदने खातिर समाज में करेगा वो हर काम तमाम, एन वक्त पर धोखा देकर बन सकता है वो दरीबाज, बहुतों में हम देख चुके हैं दलाली वाला ये अंदाज, तर्क करो व सतर्क रहो, बारीकी से पहचानो सबको आंख मूंद न अपना कहो। ...
किस कीमत पर
कविता

किस कीमत पर

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसने कहा कि देखो अवाम को उनसे कितना प्यार है, जरा उनकी कड़ी मेहनत तो देखो चारों तरफ बहार ही बहार है, दरअसल ठाठ था राजसी राजाओं का, जबकि जोर था हर ओर फिजाओं का, खाने को तरसते लोग, औरों पर बरसते लोग, गुजर रही थी जिंदगी दान के दाने पर, पहुंच जा रहे कई लोग मौत के मुहाने पर, छा गई है भुखमरी की घटा घनघोर, बढ़ गए हैं गरीब कई कई करोड़, बाहर ढिंढोरची पीट रहा था ढिंढोरा कर दी है हमने गरीबी दूर, नहीं नजर आएगा कोई भूखा मजबूर, कोई पास आने को तैयार नहीं, परिस्थितियां उन्हें स्वीकार नहीं, पर है हल्ला सब तरफ कि जोर शोर से बज रहा है डंका, मत रखो मन में कोई सुबहा शंका, धड़ल्ले से चल रहा रोज स्तुति गान, बांट रहे देशभक्ति पर रोज रोज ज्ञान, नजरों को बांध दिखा रहा जादू जादूगर, बो रहे हो जहर बताओ क...
खिसियानी बिल्ली
कविता

खिसियानी बिल्ली

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** कर नहीं पा रहा कुछ भी छोटा है तो छोटा ही सोचे, हंस-हंस कर लोग बोले खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। बहुत उम्मीद पाल, जल्द बदल सकता है हाल सोच नेताजी ने चुनाव लड़ा, होकर निर्दलीय खड़ा, घोषणाएं बड़ा-बड़ा, सेवा की आस में चुनाव में पड़ा, पर ये क्या किस्मत निकला सड़ा, जमानत जप्त करा शर्म से गड़ा, सात पीढ़ी के लिए तो थे सोचे, पर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। बड़े साहब से थी मधुर संबंध की चाह, शायद निकल आये तरक्की की राह, चापलूसी में गुजर रही जिंदगी पर किस्मत निकला श्याह, साहब दोस्ती न सका निबाह, असमंजस है अब किस तरीके से साहब का मोर पंख खोंचे, खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रच...
पता नहीं कैसे जिंदा हूं
कविता

पता नहीं कैसे जिंदा हूं

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ये है ही बेहद ताज्जुब की बात, कि कुरेदा गया दिल बचपन से जिसका लेकिन कैसे बचा हुआ है आज, था जिनके भरोसे ताना मिला उन्हीं की ओर से कि जिंदा हूं आज भी खाकर जूठन, ना आयी लाज बाल्यकाल में और न शर्मिंदगी ढलते जवानी में भी, उलाहना देने वालों में सभी निपुण हो चुके थे रहे हों चाहे मित्र या संबंधी, सबके ताने रहे प्यार भरी बातों से सुषज्जित मगर थे भयंकर विध्वंशी, अब जाके पता चल रहा है कि असल में मैं फौरी तौर पर था तेज पत्ते की तरह अत्यावश्यक, जिसे फेंका जाता है सर्वप्रथम, मुझे भी फेंका गया मगर मुझे तनिक भी भनक लगने दिए बिन, रोष तब और मिल गया सबको जब पता चला कि मैं खड़ा हो कैसे गया अपने पैरों पर, आंख मूंद भरोसा कर अपनों व गैरों पर, मेरा जीना न जीना चलिए आज किसी के लिए कम से कम कोई मायने ...
बेचना है जल्द
कविता

बेचना है जल्द

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आस, उम्मीद, आकांक्षा सबको अपने से दूर हटाना चाहता हूं, क्योंकि ये पूरे होते नहीं, या फिर दिल में दबी रह जाती है, कहने को तो लोग कहते हैं इसे खूबसूरत और खांटी, पर सबसे ज्यादा तकलीफ देने का ठेका इन्ही के पास होता है, थोड़ा सा मोह देकर लूट लेते हैं सब रिश्तेदार, मन में बसी हुई एक उम्मीद, और बिखेर देते हैं सारे सपने, बने हुए सारे लालची अपने, जो कुछ भी हासिल किया जा सकता है वो सब सिर्फ अपने दम पर, क्योंकि टांग खींचेंगे सारे अपने ईर्ष्या और घमंड लेकर, खड़ा हूं बीच राह स्वच्छंद, दिखता हुआ निरीह, पर मुझे अब आवश्यकता नहीं नोचने को तैयार बैठे किसी रिश्तेदार की, आज वक्त ने सीखा दिया किसी पर भरोसा न करना, अब बेचना है जल्द भरोसे को और रिश्ते को भी। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी ...