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Tag: राजेन्द्र लाहिरी

मुझे नफरत है पापा
कविता

मुझे नफरत है पापा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां मैं बहुत नाराज हूं आपसे, आपसे मुझे नफरत है पापा, हमेशा हमसे झूठ बोलते हो, जहां प्रखर आवाज चाहिए वहां क्यों सब कुछ म्यूट बोलते हो, सारी परेशानियां सर पर लेकर कहते हो कोई समस्या नहीं है, मैं हूं ना सारी समस्याओं का मुकम्मल समाधान यहीं है, हमसे सच छुपाने की ये नौबत आ गई, खून बेचकर राशन लाने की क्यों नौबत आ गई, हमारी भूख सहने पर क्या भरोसा नहीं है, हम पर अविश्वास क्या धोखा नहीं है, हां पैसा तो कमाते हो, पर पैसा आने का सोर्स क्यों नहीं बताते हो, कहीं औलाद की उदर भरने के लिए हम औलादों से धोखा नहीं है, हमें विश्वास में ले लेने खोते क्यों मौका नहीं है, भीख मांगना पाप है आपने ही सिखाया, रिश्तेदारों से मांगने का गुर कहां से आया, कर्ज में डूब हमें क्यों पाल रहे हो, हमारे संघर्ष मय जीवन से ...
हाथ मिला
कविता

हाथ मिला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाँ- यदि दम है… तो हाथ मिला। हमें गले लगा, हमें हँसा-खिलखिला। चाय नहीं तो कम से कम अपने घर पानी पिला। मगर… आपके रवैये से हम निराश हैं, इंसानियत के लिए इंसानों से ही हताश हैं। कहो- सचमुच मिट गया है जातिभेद? तो आ… सबको बता। हमें छूने दे वही घड़ा, जिसके लिए कभी अपना प्राण गँवाना पड़ा। सिर्फ समरसता की बयार बहाते हो, अपने घर से लाया भोजन अपनी ही थाली में फोटो खिंचवा खाते हो। मूर्ख बना सकते हो चंद अनपढ़ों को, मगर तोड़ोगे कैसे ये जमे हुए सामाजिक घड़ों को? हमने हमेशा अमन और शांति का साथ दिया है, हुई ज्यादतियाँ- प्यार पाकर भुला दिया है। हमने नहीं रखा कभी कोई गिला… पर आज भी पूरे दम से पूछते हैं- यदि सच में बराबरी का हौसला है, तो आओ… हाथ मिला। परिचय...
इस वक्त मैं …
कविता

इस वक्त मैं …

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बड़े-बड़े अधिकारियों के रहमोकरम पर डोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं, हर पहुंच कार्यालय में मेरा हरदम नाम होता है, इधर से उधर हिस्सा निकाल पहुंचाना मेरा काम होता है, अब घर में रहूं या कार्यालय में मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है, अरे आपका भाई बिंदास है कभी किसी से नहीं डरता है, मुझसे डरते मेरे सारे साथी हैं, दूल्हा कोई और रहे पर आपका भाई होता सबसे पहला बाराती है, पैसे की बात आ जाए तो मेरा जिगरी भी एतबार नहीं करता है, आपका भाई कुछ जन्मजात जलवे धरता है, मगर सोच रहा हूं कि सेवानिवृत्त पश्चात क्या कोई मुझे पहचानेगा, निस्वार्थ वाला सहकर्मी मानेगा, अरे जाने भी दो यारों अभी अपने पत्ते नहीं खोल रहा हूं, साथियों मैं इस वक्त सूरजपुर से बोल रहा हूं। परिचय :-  रा...
बेरूखी क्यों
कविता

बेरूखी क्यों

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** रह तो रहे हैं, इसे घर कह तो रहे हैं, पर घर में मकड़ियों का जाला है, अव्यवस्थाओं का बोलबाला है, कोई किसी को अपने आगे कुछ समझ नहीं रहा है, क्या तुम्हे नहीं लगता कि अंदर ही अंदर कुछ सुलग नहीं रहा है, सोच अलग हो सकता है, विचार अलग हो सकता है, पर अपनों के प्रति प्यार क्या दिल में नहीं रहा या गए हो भूल, इतने बड़े या इतने जिम्मेदार बन गए कि अपने आप में हो चुके हो मशगूल, परिवार के बीच रह रहे हो तो अपनों के प्यार को चख, सबको अपने स्वार्थ के हिसाब से न परख, अब लग ही नहीं रहा कि खून खून को पुकारता है, मगर कैसा खून है जिसका स्वार्थ चिंघाड़ता है, जब अपनों के प्रति इतनी बेरूखी है तो क्या खाक देश से प्यार दिखा पाओगे। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्...
एक हाथ से ताली
कविता

एक हाथ से ताली

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** एक हाथ से ताली बजाने वालों, ध्यान से मेरी बात सुनो तुम्हें कभी न कभी ज़रूरत पड़ेगी दूसरे हाथ की… साथियों के साथ की… जब खुद पर बीतेगी, तब खोजोगे दूसरा हाथ, और अपनी ही ताली पर दोगे सफ़ाई की सौ-सौ बातें, पर याद रखना जिस दिन अति आवश्यकता होगी, उस दिन पीछे कोई खड़ा नहीं होगा। कुछ चुनिंदा सरपरस्त जब खुद फँसने लगेंगे, तो सबसे पहले तुम्हीं पर उँगली उठाएँगे, अपना दामन पाक-साफ, और तुम्हें दाग़दार बताएँगे। औरों का नुकसान करने की हनक में तुम अपना ही पैर तुड़वाओगे, रह-रह कर छटपटाओगे कि जो साथ खड़े थे वे कहाँ गए? कीमती हीरे-मोती कैसे गंवा गए? नहीं है तुम्हारे भीतर कोई कस्तूरी जिसे तुम बाहर खोजोगे, अपने ही किरदार की सुगंध तुम सदा के लिए खो दोगे। एक हाथ से ताली बजाना तुम्हें मुबारक़ हो, ...
नउकरी के बंधना
आंचलिक बोली, कविता

नउकरी के बंधना

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) घुम-घुम, किन्दर-किन्दर अपन रचना ल सुनावव जी, कभु रइपुर, कभु कोरबा अउ कभु रइगढ़ म अंजोर बगरावव जी, बंधाय हे हमर अंग-अंग बंधना म, रचना पढ़े के फुरसत नइ हे अपन दुवारी अउ घर अंगना म, राती-राती भर गोष्ठी करव दिन म ऊंघे के बेरा हावय, गेरवा ले गर बंधाय हे हमर आउ चारो कोती घेरा हावय, तुंहर घुमइ फिरइ देख के लालच हमरो बाढ़त हावय, दंउरी कस बइला फंदाय हवन छाती म पथरा माढ़त हावय, दु पइसा कमाए के चक्कर म हाल डोल नइ पावत हावन, फाग, ददरिया चाहे भजन दय मालिक ह नाच-नाच के सब गावत हावन, पुरुस्कार ल तुंहर देख के संगी हिरदे हमर गदगद झुमत हावय, तुमन ल रचना सुनावत देखके मन हमरो छत्तीसगढ़ भर घुमत हावय। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
सिर्फ सोलह लाइन में
कविता

सिर्फ सोलह लाइन में

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसने सुझाव दिया कि अपने दिल का अरमान लिखो, अपनी चाहत, शत्रु, दिलोजान लिखो, मैंने कहा यार सिर्फ सोलह लाइन में आप ही बताओ क्या-क्या लिखूं, अपनी मर्ज लिखूं या दवा लिखूं, अपने दोस्त लिखूं या दुश्मन लिखूं, या दोस्त के खोल में छुपे स्वजन लिखूं, मेरी उन्नति के लिए उनका ढिंढोरा लिखूं, या सच में उनका बहलाता मन छिछोरा लिखूं, अपनी आन बान या शान लिखूं, या मुझे बर्बाद करने का उनका अरमां लिखूं, समाज के लिए जां लुटाना लिखूं, या उनका स्वार्थ और बरगलाना लिखूं, अब दिल चीर कर और कितना बताऊं, सोलह लाइन में क्या दिखाऊं क्या छुपाऊं। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
जानकारी जरूरी है
कविता

जानकारी जरूरी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी और शहर जाने के लिए एक खास नाम का बस विनय था, जिसके आने जाने का समय तय था, मुझे इंतजार में कुछ वक्त बिताना था, मैं सामने बैठे बुजुर्ग के पास आया, नमस्ते करते हुए बतियाया, अंकल जी अपना हालचाल बताइए, कुछ अच्छी बात सुनाइए, तब वह अनवरत बोलता रहा, बीच बीच कभी गुस्सा और प्यार से डोलता रहा, उन्होंने बुद्ध के बारे में विस्तार से सु ताया, ज्ञान विज्ञान के उनके मार्ग को बताया, कभी कबीर जी के बारे में, कभी रैदास जी के बारे में, कभी गुरू नानक देव जी के बारे में, कभी ज्योतिबा, सावित्रीबाई फुले के बारे में, कभी झलकारी बाईं के बारे में, कभी नारायणा गुरू के बारे में, कभी तिलका मांझी के बारे में, कभी बिरसा मुंडा जी के बारे में, कभी बाबा साहेब के बारे में, तो कभी कांशीराम जी के बारे में बताया, ये स...
दोष किसे दूँ
कविता

दोष किसे दूँ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** वही ब्रह्मांड, वही दुनिया, वही मुल्क, वही प्रकृति, वही पर्यावरण, वही आबो-हवा, वही नैतिकता, वही संस्कार, वही जीव-जगत… फिर भी गिरते स्तर के लिए दोष किसे दूँ? मानव, अब मानव नहीं रहा दानव हो चुका है। संस्कार, अब संस्कार नहीं रहे सिर्फ़ दिखावे का आवरण बन चुके हैं। नैतिकता, अब आत्मबोध नहीं दूसरों से की जाने वाली उम्मीद बन गई है। इंसान ढीठ हो चला है, ढिठाई ऐसी कि हर जगह दिखता है “मैं… और सिर्फ़ मैं!” किसी के पास अब हृदय शेष नहीं, जिसे त्यागना चाहिए उसे कसकर पकड़ा जाता है। होड़ मची है- अपने स्तर को सबसे नीचे ले जाने की, और गर्व से दिखाने की। तो कहो… इस पतन के लिए दोष किसे दूँ? परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प...
औचित्य क्या?
कविता

औचित्य क्या?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यथार्थ को त्याग, सच्चाई को कुचल, कल्पनाओं को सच बता इतराऊं मचल-मचल, सारे संसार का ज्ञान ठूंस लूं अपने अंदर, पर यकीन करूं हो जाए कोई अलौकिक चमत्कार, तो फिर औचित्य क्या उस ठूंसे हुए ज्ञान का, लदे रहूं हीरे मोतियों से, ढका रहूं नवीन वसनाें से, और रखूं अस्वच्छ तन को, तो औचित्य क्या अथाह धन का, सबको पढ़ाता फिरूं विज्ञान, बटोरूं नित सम्मान, जा जा व्याख्यान दूं विद्यालयों में, महाविद्यालयों में, और अंधा यकीन करूं पाखंडों और अन्धविश्वास पर, तो औचित्य क्या अथाह ज्ञान का, प्रकृति से प्रेम करूं, हर जीव की उपयोगिता समझूं, सिर्फ अपनी सनक खातिर कैद में रखूं तोता, मैना, बुलबुल, तो औचित्य क्या खुले आसमान का, कामना है न बंधूं किसी ऐसे नियम से जो मुझे इंसान न रहने दे, और हां जिसे जो कहना है कहने ...
आओ सिर्फ भारतीय बनें
कविता

आओ सिर्फ भारतीय बनें

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हर तरफ नजर आ रही व्यवस्था चौबंद चाक, अपने ही शहीदों के बलिदान रहे हैं क्यों नाप, बताओ जरा क्या उन सबने दी थी कुर्बानी अपनी जाति, धर्म या सम्प्रदाय के उत्थान खातिर, फिर क्यों बन रहे इन सबके नाम पर शातिर, आत्मबलिदान था केवल अपने देश के लिए, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और परिवेश के लिए, विदेशों में जा क्या देते हो परिचय अपनी जाति का, अपने मशहूर खानदान और ख्याति का, नहीं वहां कहना पड़ता है खुद को भारतीय, समता,समानता होता है जहां न पूजा न आरती, सम होने के प्रतीक बन हाथ मिलाते हो, रंग रूप को भूलकर सबको गले लगाते हो, फिर लौटकर अपने ही वतन में, भूल वही सभ्यता क्यों आग लगाते हैं चमन में, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, ले विश्वबंधुत्व का मूलमंत्र, कहते हैं कि चलना है केवल शांति की राह, आंतरिक सा...
है दम तो करो दावा
कविता

है दम तो करो दावा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जमीन के चंद टुकड़ों पर कब्जा करके समझ रहे हो खुद को मालिक इस जहां का, लटके पड़े हैं बड़े बड़े गोले आसमानों में क्या बन सकते हो मालिक वहां का, अपनी सोच से आगे भी सोचने की कोशिश करो, सिमट के बैठे हो पुरानी तुच्छ मान्यता ले चांद से चंद चांदनी अमावस में एक बार दो बार बार-बार नोचने की कोशिश करो, अपने ग्रंथों पर ही अटके हो जाते क्यों नहीं आगे, इंसान इंसान क्यों नहीं लगता या लपेटने की क्षमता नहीं रखते तुम्हारे कच्चे धागे, यूं ही कहते फिरते हो कि सभी बंध जाते हैं बांधे गए बंधन में, या सिर्फ लाभ देख लिपटने की हुनर है जैसे लिपटा हुआ भुजंग है चंदन में, प्रकृति को भी मजबूर कर चुके हो रोने के लिए, क्या चार गज जमीं काफी नहीं तुझे सोने के लिए, प्राणदायी वायु खो रहे हो बचा नहीं पा रहे पानी मुंह धोने...
चंद अल्फाज़
कविता

चंद अल्फाज़

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आप में सुशीलता है या नखरो नाज, आपके मुंह से निकला चंद अल्फाज, बयां कर जाता है आपका किरदार व अंदाज, आपके रहन सहन का तरीका, आपके जीवन जीने का सलीका, ए आइ के जमाने में आज हम पहुंचे हैं भले, मगर भांपने का तरीका रहा है पहले, आपकी सोच, आपके मित्र, आपके जीवन जीने का अंदाज और ये इत्र, बहुत कुछ बता देता है, आप इस धोखे में मत रहिए कि चरित्र को छुपा लेता है, ये अल्फाज ही है जो दिलाता है मान सम्मान, तो कभी दिलाता है रुसवाई और अपमान, कब,कहां,कौन से शब्द कहने है लो जान, समाज में रहकर ही सीखा जाता है ज्ञान, दिख जाता है बहुत जगह पढ़ा लिखा गंवार, जो नहीं जानता तहज़ीब और प्यार, तो अल्फाजों को संभाल कर रखिए, किसके सामने क्या बोलना है आंखें खोलिए और देखिए। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिर...
छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे
आंचलिक बोली, कविता

छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) हम वो करम करबो जउन इंसानियत अउ मानवता बर जरूरी हे, बाकी हर हमेशा हम देखत हन हमर घेंच म हर बेरा लटके छुरी हे, ए सब करे बर न कोनो देबी चाही न कोनो देवता, हमर अपन छत्तीसगढ़िया परब आय छेरता, जिहां अपन उपज के खुशी म सगरो मिलजुलके मनाथन तिहार, एही म हमर जीत अउ एही म हमर हार, जीत एखर बर के हम दिलवाला हन, हार एकर बर नइ दिखय चढ़ाय जालापन, एमा काखरो कोनो योगदान नइ हे, सब दान करत हन अइसना हमर हिरदई हे, मुठी भर अन्न अउ पेट भर खाना, सदा दिन ले करत आत हे छत्तीसगढ़िया दीवाना, जतको कमाएन पायेन, जादा रहय चाहे कम अपन बर हाथ बढ़ायेन, छेरछेरा कोनो धार्मिक तिहार हे न कोनो सामाजिक, हमर हिरदे ले जुरे तिहार हे वास्तविक, त आवव तिहार खुलके मनावव, छत्तीसगढ़िया मन दिलवाला होथे सबो ल बतावव। ...
नया साल
कविता

नया साल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अमीर-अमीर होते जाएंगे और गरीब और भी ज्यादा गरीब, भरमाया मस्तिष्क कहेगा है ये हमारा नसीब, नहीं बदलेगा किसी का सूरतो हाल, ज्यादा उम्मीद मत पालना अच्छा होगा नया साल, खेल वही जारी रहेगा, चालाक धर्म, जाति पाती और अछूत कहेगा, दुश्वारियों से जान नहीं छूटेगा, लुटेरा खुलकर लूटेगा, भाग्य मानने वालों का भाग फूटेगा, जहरीली हवाओं से दम घुटेगा, होगा वही लड़ाई व मारकाट, होगा हमेशा की तरह बंदरबाट, नेता विभिन्न मुद्दे उछालेंगे, सब लोग उधर ही दिमाग डालेंगे, विपक्ष अपना खेल संभालेंगे, प्रशासन सबका तेल निकालेंगे, हां पैसे वालों के लिए होगी कुछ दिन खुशियां, त्राहिमाम करते रहेंगे जो है दीन दुखिया, मन मस्तिष्क में वहीं सड़ांध होंगे, ऐसे ही लोग सभ्रांत होंगे, बस इस गुजरते जैसा न हो नया साल, जिसका स्वा...
हां रामसकाल आ गया है
कविता

हां रामसकाल आ गया है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जयंती समारोह के एक कार्यक्रम में कड़वे आसवित जल के सुरूर लेकर वो आ गया, सीधे आयोजकों से टकरा गया, बोला बैनर जो टंगा है उसमें मेरा क्यों चित्र नहीं है, कार्यकर्ताओं में मेरा कोई मित्र नहीं है, इसीलिए इस बैनर को यहां से हटाओ, मेरे फोटो वाला बैनर लगाओ, एक युवा कार्यकर्ता तमतमा गया, भयंकर गुस्से में आ गया, समता समानता के इस कार्यक्रम में कोई किसी पर दबाव नहीं बनाएगा, कोई अपनी राजनीति नहीं चमकाएगा, दूर दूर से भी और कुछ पास से अतिथि आये, कार्यक्रम के उद्देश्य और अपने विचार बताये, मगर रामसकाल कभी नजदीक बैठता तो कभी दूर, पूरे कार्यक्रम के दौरान कम नहीं हुआ उनका सुरूर, कभी कहता कि इन सब का खर्चा मैंने उठाया है, मेरे कारण आयोजन सफल हो पाया है, उस दिन एक मछली तालाब कैसे गंदा करता है, सकार...
भालू और हम
बाल कविताएं

भालू और हम

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां हूं मैं भालू, पर तुम इंसानों जैसा नहीं हूं चालू, ऐ मानव मेरी रहवास क्यों खा जाते हो, अपनी लालच में आकर मेरी जंगल मिटाते हो, हां भालू जी मैँ हूं शर्मिंदा, तुम्हारे जीवन के कारण इस दुनिया में मैं हूं जिंदा, तुम्हारे आक्रामकता का कारण मैं हूं, सारे तुम्हारे समस्याओं का निवारण मैं हूं, प्रकृति के नियमों को मैंने छेड़ा है, अपनी सीमाओं को लालच में मैंने तोड़ा है, जरा सोचो जंगल से निकल रहवास में हम क्यों आते हैं, तुम पर हम क्रोधित हो जाते हैं, मत उजाड़ो मेरा आवास, तुम गलत हो कैसे दिलाऊं विश्वास, अब आपको दिलाता हूं मैं भरोसा, सदा मिलजुलकर रहेंगे नहीं दूंगा मैं धोखा, यदि मैंने मर्यादा तोड़ा तो तुम मुझे सबक सिखाना, बना लेना मुझे दुश्मन मुझ पर तान देना अपना निशाना। परिचय :-  ...
इत्तेफाक
कविता

इत्तेफाक

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आज हमारा समाज जिस जगह खड़ा है मैं नहीं समझता कि यह इत्तेफाक है, लाखों करोड़ों जुल्म ज्यादतियां सह कर मुस्कुराने में कोई तो बात है, शांत स्वभाव में हरदम रहना, लेकिन अत्याचार को नहीं कभी सहना, लेकर शांत पड़े रहे दिल में ज्वालामुखी की धधक, जब चाहे प्रतिक्रिया दे दे नहीं ऐसी सनक, भविष्य की स्वाभाविक चिंताएं लेकर, करते हर काम अपनों की बलाएं लेकर, अच्छे कामों की सराहना भी की उज्जवल भविष्य की दुआएं देकर, खौलते खून की उबाल दिखाये हैं शस्त्र से लैस भीमा कोरेगांव में, जब तक अत्याचारियों को समूल नष्ट न कर दिए सुस्ताये नहीं किसी पेड़ की छांव में, हमने लड़े और जीते भी कई युद्ध, मगर हमने जग को दिये भी हैं दैदीप्यमान बुद्ध, अस्पृश्यता की बात कर बैठाया गया समतायुक्त शिक्षालय से निश दिन बाहर, भावना...
चलो बताओ
कविता

चलो बताओ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किसी के अथाह संघर्षों से मिला हुआ हर चीज खा रहे हो,खुले आम चिल्ला रहे हो, चलो बताओ उस महामानव को कितना वापस देते जा रहे हो, जब समाज को वापस करने वाला धन कहीं और देकर आते हो, अपने आप को दिखावे में ले जाते हो, बनाकर बैठे रहते हो दस लोगों का संगठन, लालच से भरा हुआ आदमी कभी कर लिया करो अपने अंतस का मंथन, जीने की ललक नहीं जा रही दूसरों के छिलकों पर, अपना ही फसल जा रहे हो कुतर, संख्या ज्यादा होने से कुछ नहीं होता, कोई पत्थरों पर फसल कभी नहीं बोता, चंद संख्या वालों का हुजूम एक मजबूत दबाव गुट बना सकता है, अपनी समूह की चाही गयी लक्षित सोच का सकारात्मक परिणाम ला सकता है, सोचो जरा कि हम क्या कर रहे हैं? केवल गुब्बारों में हवा भर रहे हैं? हमें ये समझना होगा कि गुब्बारे उड़ाने से कोई समाज न ऊपर उड़ेगा न ऊपर...
जरूर कोई बात है
कविता

जरूर कोई बात है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** धुरंधर लठैत मुस्कुरा रहा है, विरोधी लठैत भी मुस्कुरा रहा है, पता करो पीछे जा भौंकने वालों दोनों मिलकर कोई खिंचड़ी तो नहीं पका रहा है, हर कोई इन पर भरोसा कर रहा मगर ये भरोसे के काबिल नहीं है, नहीं पता तो चुप रहा कीजिए जनाब सपने में भी मत कहना कि ये हमारी बर्बादी में बिल्कुल शामिल नहीं है, मत ताकते रहो चेहरा और लिबास, खोजो और ढूंढो कहां है कालिख छुपा खास, कहीं ढंक ले तुम्हें वातावरण आभासी, कोई भी बन सकता है अडिग सत्यानाशी, अतीत के अपने अंजाम क्या याद नहीं, उनके पुरखों के कर्म कभी लगे सही? बहुतों के कर्म सही लगते हैं होते नहीं, वे कुकर्म भूल जाते हैं उसे कभी ढोते नहीं, बावरे मन और बावरे चित्त लेकर अब तक कितनों को हम समझ पाये हैं, थोड़े की चाह में सब कुछ तो लुटाये हैं, क्यों नहीं दिख रहा लेकर खड़े व...
रिश्तों में दरार
कविता

रिश्तों में दरार

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सबको अपनी पड़ी है कोई नहीं कर रहा विचार, पता नहीं क्यों आ जाते हैं रिश्तों में दरार, अपनों का रूखापन, अपनों की दगाबाजी, किसी को मजबूत कर देता है तो कई बन जाते हैं अपराधी, रिश्तों की दरारों से बढ़ सकता है बैर, एक दूजे को भूल, नहीं सोचते कभी खैर, करने लग जाते हैं एक दूसरे की बुराई, इसकी न उसकी नहीं किसी की भलाई, तब हो जाये शायद बच्चों का बंटवारा, दुलार भी नहीं सकते चाहे हों सबसे प्यारा, आना जाना खतम और बढ़ती है दूरी, पहल कोई भी कर सकता है नहीं कोई मजबूरी, मगर इस हालात में आड़े आता है अहम, बुराई मेरी ही कर रहे सब हो जाता है भरम, लग जाते हैं पहुंचाने को नुकसान और अपनाते हैं साम-दाम- दंड-भेद की नीति, भूल जाते खून से बंधे संबंध व प्रीति, हां ये मेरा भी दर्द है, घुस चुका मुझमें भी ये मर्ज ह...
बंधे हुए शब्द
कविता

बंधे हुए शब्द

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** छोड़ दो शब्दों को स्वतंत्र, बिना दुराव छिपाव बिना घुमाव, कहने दो अपनी बात सरल और सीधी शब्दों में, ताकि न पड़े लोगों को खोजना कुछ कठिन शब्दों के अर्थ, ताकि संभावना ही न रहे कि निकल पाये अर्थ के अनर्थ, साफ शब्दों को जानने में सब है समर्थ, कवि के दिली अहसास यदि न पहुंच पाए जन मन के दिलों तक, तब उनके लिए हो जाते हैं वे तमाम शब्द बेमतलब, हां होते हैं कवियों की तलब कि वह भी शामिल हो जाये उन तमाम लोगों की फेहरिस्त में, जिन्हें लोग कहते हैं शब्दों के जादूगर, बेजोड़, बेहिसाब, बेझिझक, निडर, असल मुद्दा होता है अपनी रूह को पाठकों की रूह से जोड़ना, उड़ेलना जरूरी है उन तमाम शब्दों को जो बंध कर नहीं रहते किसी भाषाई लोगों के बंधन में, जो स्वतंत्र है अपनत्व में, खंडन में, जिस तरह नदी की बहाव को बांधकर...
हां वो भूल रहा है
कविता

हां वो भूल रहा है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उनके पैदा होते ही खुश हुए लोग सारे, अब उनके लिए भी गर्वित पल आया जो थे पुत्र के मामले में बेचारे, बूढ़े दादा जी तो लगभग पगला गया, झूमते नाचते बच्चे के पास ननिहाल आ गया, उनकी खुशी देखते बनती थी, पल पल गर्व से छाती तनती थी, क्योंकि बहुत सारे पैदा हुए पुत्रों की मौत के बाद वो दुनिया में आया था, बहुतों की निराश जिंदगी में खुशहाली लाया था, उनके बाद कई भाई-बहन परिवार की खुशियां बढ़ाने आए, मगर पहले पुत्र को गिरफ्त मेंप ले चुके थे पराये पन के साये, परायों ने उन्हें संभाला, गाली दे खिलाते थे हर निवाला, परिवार के संकट को अकेले ढोया, और हर रिश्ते का रिश्ता मुफ्त में खोया, हर रिश्ता खोने के बाद अब वो भूलने लगा है अपने आप को, अब नहीं सोचता अच्छाई या संताप को, उनको अब कोई फर्क नहीं पड़ता बचे हुए हैं कितने...
सब कुछ नेता होता है
हास्य

सब कुछ नेता होता है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यहां उपस्थित सभी लोगों के साथ सिंहासन पर विराजमान सरपंच और पंच को नमन करता हूं, उसके बाद उपस्थित अन्य लोगों के साथ बारंबार इस मंच को नमन करता हूं, यहां मेरे विभाग के मेरे अधिकारी भी हैं, हमारे बीच तालमेल और तैयारी भी है, उन्हें नमन करना भूल गया तो भी किसी न किसी तरीके से मना लूंगा, हमारे बीच की बात है मुद्दा सुलझा लूंगा, मगर मुझे नेता से सबसे ज्यादा डर लगता है, इन प्रतिनिधियों का चेहरा कहर लगता है, ये बार-बार हिस्सा नहीं देने की बात करता है, कड़ी सजा दिलवाने, देख लेने की बात करता है, जिन्हें बोलना, लिखना नहीं आता है, वो बस्तर फिंकवा देने की धमकी सुनाता है, लोग कहते हैं कि डर के आगे जीत है, लेकिन वो तो इनसे भी भयानक चीफ़ है, सामने हाथ जोड़कर खड़े हुए बिना सीधे मुंह बात नहीं करता है, अपने जुबां पर द...
कुछ तो दोष मेरा भी है
कविता

कुछ तो दोष मेरा भी है

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सारा दोष दूसरों पर मढ़ कर मैं अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता, लोग स्वेच्छा से चलने लगे हैं सामाजिक जागरूकता की राहों पर तो क्या मैं खुद जाग नहीं सकता, ताउम्र मैं, मैं, मैं की नीति पर चला हूं, अपना कर्तव्य भूल बहुतों को छला हूं, स्वार्थी परमारथ की राह में नहीं जाते, कांटे बोने वाले कभी कांटे नहीं उठाते, मगर राह के हमें ही उठाने होंगे, उन टेढ़े-मेढ़े राहों पर हमें ही आने जाने होंगे, पढ़ने की औकात नहीं थी पर पढ़ा, बाबा साहब के अहसानों से एक उचित स्थान गढ़ा, खुद को देखता रहा अपनी राह गया आया, अभी तक समाज को कुछ नहीं लौटाया, न किसी की शिक्षा में सहयोग, न किसी के उत्थान में सहयोग, सारी कमाई का करता रहा स्वयं उपभोग, प्रचलित परिपाटी के विरुद्ध मुंह नहीं खोला, सामाजिक मुद्दों पर कभी खुल कर नहीं बोला...