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Tag: शिवदत्त डोंगरे

ऐ बारिश …
कविता

ऐ बारिश …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ऐ बारिशों तुम इंसाँ न बनो यूँ मत करो कि जब ज़मीं की साँसें प्यास से थमने लगें दरिया के दीदे सूख जाएँ पेड़ों की हथेलियाँ दुआ में उठकर बिखर जाएँ तब तुम कहीं समंदर की छतों पर गीत गाती फिरो। और फिर एक रोज़ अचानक इस कदर टूटकर बरसो कि बस्तियाँ डूब जाएँ घरोंदे टूट जाएँ ख़्वाब छूट जाएँ, और इंसाँ तुम्हें इंसाँ होने की दुहाई दें। यह हुनर तो इंसानों का है ज़रूरत के वक़्त साथ न देना और जब ज़रूरत गुज़र जाए तो एहसानों की बारिश लेकर बरसते हुए लौट आना। तुमने देखा तो होगा रिश्तों को सूखी धरती सा तड़पते हुए, तेरी बूंदों सा बिखरते हुए एक हाथ, एक साथ की आस में रिश्तों के आसमाँ को तकते हुए। इंसाँ आए भी तो ऐसे जैसे सैलाब हो लिए सूखे में बारिश का ख़ाब हो लिए साथ कम देते हैं हिसाब ज...
भरोसा टूटे तो …
कविता

भरोसा टूटे तो …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* भरोसा टूटे तो एक दफ़ा फिर उठ खड़े होना साथी को बिना कोसे बिना कुछ कहे। दुनिया बहुत बड़ी है बहुत से लोग हैं, जो शायद तुम्हें ही ढूँढ़ रहे हों आशा के मोती एक बार फिर पिरो लेना और विश्वास की एक मज़बूत माला बना लेना। यह नितांत व्यक्तिगत है कि तुम फिर कभी किसी को न चाहो या अपना मन किसी और को सौंपने का साहस न कर सको लेकिन, यदि कभी लगे कि साथ की आवश्यकता है तो अपनी इस अनुभूति से लज्जित मत होना उसे आकार देना, एक और प्रतिमा गढ़ना जिसे 'प्रेम' कहा जाए जिसे 'साथ' पुकारा जाए जिसे फिर से खड़े हो जाने का पर्याय माना जा सके। एक बार स्वयं पर यह उपकार करना अपने नए सृजन पर गर्व करना कृतज्ञ रहना उस नए आदम के प्रति जो तुम्हारे अधरों की मुस्कान का कारण बना मन धीरे-धीरे रमेगा तुम थ...
एक सैनिक का प्रेम
कविता

एक सैनिक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हाथों में यह कलम ना होती, निकलते न ये भाव, आंखें कभी ना रोती तन्हाई हमें यूं न चुभती यदि तुम मेरे पास होती आने वाला पल याद तुम्हारी लाता है जाने वाला पर टीस पीछे छोड़ जाता है जितना चाहा तुम्हें भूलना उतना ही तुम याद आती हो तुम्हें याद करने की जरूरत ना होती यदि तुम मेरे पास होती तुम्हें कुछ लिखना चाहा, जब भी मैंने भावों को शब्दों में ना बांध पाया दिल की आवाज सुन लेती आंखों की जुबान समझ लेती यदि तुम मेरे पास होती बाहों में तुझे ले लूँ, चाह ये बार-बार होती दामन में तेरे, सर रख रोता सिंदूर मांग में तेरी भर देता सोचते-सोचते दिन कितने गुजर गए हालत हमारी यूं ना होती यदि तुम मेरे पास होती।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी ...
पत्थर और माटी
कविता

पत्थर और माटी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पत्थर गिरा माटी पर माटी हो गई चूर पत्थर हुआ घमंड से भरपूर बोला अकड़ कर, देखा मेरा बल तुममें-मुझमें हैं कितना अंतर। माटी बोली सच कहा तुमनें पत्थर हैं बड़ा मुझमें और तुममें अंतर, मैं माटी तुम हो पत्थर, मैं देती जीवन जड़-चेतन कों, तुमसे मिलती केवल ढोकर, मैं खेतों में फसल ऊगाती, बागों में फू़ल महकाती, हरी-भरी धरती करती। पेड़-पौधे , फल-फूल, धरती का हर प्राणी, तुमसे होता आहत, रह जाते सब मन मारकर तुम देते केवल ठोकर, तुममें-मुझमें है अंतर मैं देती जीवन, तुम देते केवल ठोकर।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानि...
सब ठीक होने की कीमत
कविता

सब ठीक होने की कीमत

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में हम हर दर्द को सहते चले जाते हैं और समय चुपचाप हमसे सब कुछ छीनता चला जाता है। हम कहते हैं बस थोड़ा और सह लो बस हालात बदल जाएँगे बस सुबह आ ही जाएगी। पर सुबह आती है तो चेहरे बदल चुके होते हैं जिन्हें बचाने की चाह थी वे यादों में बदल चुके होते हैं। हम घाव भरने का इंतज़ार करते हैं और जीवन लहू बहाकर आगे बढ़ जाता है हम भविष्य सँवारते रहते हैं, और वर्तमान दफन होता जाता है। सब कुछ ठीक होने तक सपने थक जाते हैं रिश्ते चुप हो जाते हैं! फिर एक दिन हालात सच में सुधरते हैं पर जश्न मनाने वाला कोई नहीं बचता क्योंकि जो चाहिए था सुख के लिए वह सब संघर्ष में खत्म हो चुका होता है!! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरव...
एक नई शुरुआत करें
कविता

एक नई शुरुआत करें

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* माह में एक बार ही सही कभी कोई ऐसा दिन या एक ऐसी रात बहुत जरुरी है जो सिर्फ खुद के लिए हो खुद की खुशी के लिए हो. जिसमें कोई रोक टोक कोई हिचक न हो जो भाए उसके ही साथ खुलकर जीना जो मन करे, दिल कहे दुनिया को भूलकर सारी जिम्मेदारियां एक तरफ रखकर बस चुरा लेना कोई चरम आनंद का लम्हा वक्त की डायरी से. बस खुद के लिए अपनी मस्ती में मस्त होकर ख्वाहिशों को खुलकर जीना जरूरी है बेहद. तो इस भागदौड़ वाली समझौतों से भरी जिंदगी इसकी उलझनों से लिपटी जद्दोजहद को बिल्कुल परे धकेलकर खुद की परवाह में एक नई शुरुवात करें. अपने लिए माह में एक दिन या एक रात तृप्ति पल जरूर चुराएं नीरस जिंदगी में कुछ जगमगाहट भरने के लिए खुलकर जीने के लिए मन को छोटी छोटी बेसुमार खुशियों से भरने के लिए.....! ...
कुछ स्त्रियाँ
कविता

कुछ स्त्रियाँ

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम्हारी किताबों से इतर हैं तुमारी क़लम उनको रच नही पाई कुछ स्त्रियाँ सिमोन की लेखनी से भी बच गयीं और अमृता भी उनको स्याही से उकेर नही पाई कुछ स्त्रियाँ जिनके बारे में अरस्तू नही जान पाया जबकि वो आधा ब्रम्हांड जान चुका था वो कुछ स्त्रियाँ जिनको पिकासो रंग नही पाया अपनी कूची से और न ही लियोनार्डो उनकी मुस्कान को मोनालिसा बना पाया वो कुछ साधारण सी स्त्रियाँ जिनको प्रेमचंद देख नही पाये और जो महादेवी की लेखनी से भी चूक गयीं वो अलबेली गुलाबी स्त्रियाँ रेगस्तानी, झुरमुटी बालों वाले रेतीले से लड़कों के माथे चूमती उन पर बिखर बिखर जाती हैं वो कुछ अनगढ़ सी सुरीली स्त्रियाँ अपने होने का शगुन जिंदगी को देती हैं खुद अपनी बलाएं उतार कर पेड़ पर खोंस आती हैं उन्होंने उतार दिए तुम्हारी आ...
वो कम ख़ुदा न थी
कविता

वो कम ख़ुदा न थी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चार जने बैठे थे जीमने रात का भोजन सब बच-बच कर खा रहे तीनों बच्चे तक समझदार पीते बीच-बीच में पानी पिता लेते नक़ली डकार. पर कम ख़ुदा न थी परोसने वाली बहुत है खुदा अभी इसमें मैंने तो देर से खाया कहते परोसती जाती. माँ थी सबके बाद खाने वाली जिसके लिए दाल नहीं देवकी में बची थी हलचल चुल्लू भर पानी की और कटोरदान में भाप के चंद्रमा जैसी रोटी की छाया थी। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
अंतर्मन का द्वंद्व
कविता

अंतर्मन का द्वंद्व

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सबसे भयंकर युद्ध सीमाओं पर नहीं लड़े जाते वे मन के भीतर होते हैं जहाँ कोई तालियाँ नहीं बजाता। यहाँ दुश्मन यादें बनकर आता है, कभी डर बनकर वार करता है कभी उम्मीद बनकर उठाता है और कभी तोड़कर छोड़ जाता है। इस लड़ाई में खून नहीं बहता, पर सपने रोज़ मरते हैं चेहरा हँसता रहता है पर अंदर हजारों चीखें होती हैं। कभी मन हार मान लेता है कभी आत्मा उठ खड़ी होती है हर रात गिरती है हर सुबह फिर लड़ती है। यह युद्ध सब लड़ते हैं पर कोई दिखाता नहीं क्योंकि कमजोरी बताना इस दुनिया में अपराध समझा जाता है। भीतर की लड़ाई इंसान को थका देती है पर खत्म नहीं करती जो सह जाता है वही मजबूत बनता है बाकी टूटकर खामोश हो जाते हैं! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी ...
चाहतों का क्या है
कविता

चाहतों का क्या है

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चाहतों का क्या है!1030 चाहतें तो पागल होती हैं। जैसे अक्सर मैं चाहती हूँ कि नंगे धूसर पहाड़ों को बसंत के हरेपन से ढँक दूँ, नदियों को प्रदूषणमुक्त पानी से लबालब भर दूँ, घाटी के सूख चुके सोतों को फिर से जीवित कर दूँ। चाहती हूँ कि उत्पादन, राजकाज और समाज के पूरे तंत्र पर उत्पादन करने वाले क़ाबिज़ हों और फ़ैसले की पूरी ताक़त उनके हाथों में हो। चाहती हूँ बराबरी और आपसी सम्मान से भरा ऐसा प्यार जो मुक्ति का पर्याय हो और जिसकी मौन उपस्थिति में आत्माएँ संवाद करें कविता की भाषा में। जो नहीं है और जिसे होना ही चाहिए उसकी कामना में खरचती हूँ जीवन और सोचती हूँ कि दुनिया में अगर नहीं हुआ करतीं कुछ पागलपन भरी चाहतें तो मनुष्यता का भविष्य क्या होता! लेकिन सिर्फ़ चाहने से क्या होता है! इसलिए...
स्त्री की आवाज
कविता

स्त्री की आवाज

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम पुकारे जा रहे हो और मुझसे पूछते हो कि अजनबी सी ख्वाहिशें क्यों पाल बैठी हूँ? मैं उसी आदमी से चाहत कर बैठी हूँ जो अपने ही शोर में खुद को खो चुका है। न तुम इत्मिनान से बैठ पाते हो, न नींद तुम्हें पूरा अपना मानती है और फिर भी पूछते हो मुझसे कि इस मुख़्तसर सी ज़िंदगी से मैं क्या चाहती हूँ? मैं तो बस इतना चाहती थी कि तुम थक कर किसी शाम मेरे पास बैठ सको, बिना कुछ साबित किए, बिना खुद से लड़े। पर तुम तो अपनी तन्हाई की शाम का भी चराग़ नहीं जला पाए… और अब मुझसे पूछते हो कि मैं हवा जैसी चाहत क्यों लेकर आई हूँ? शायद मेरी गलती यही थी कि मैंने उस आदमी से दिल लगा लिया जो खुद से ही दोस्ती निभा नहीं पाया. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे ज...
विराम कायरता नहीं
कविता

विराम कायरता नहीं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कुछ लोग संवाद नहीं करते वे रणनीति खेलते हैं। वे जानबूझकर ऐसे शब्द चुनते हैं जो आपके तर्क पर नहीं, आपकी नसों पर वार करें। उनका उद्देश्य समाधान नहीं होता, बल्कि आपको भावनात्मक रूप से असंतुलित करना होता है। ताकि आप मुद्दे से हटें, और वे आपकी प्रतिक्रिया को आपकी हार बना सकें। ऐसे लोग बहस के बीच अचानक से आपके चरित्र पर प्रश्न उठाएंगे, आपकी किसी पुरानी भूल को उछालेंगे, या आपकी आवाज़, भाषा, लहजे पर टिप्पणी करेंगे। असल विषय वहीं पड़ा रह जाता है और संवाद एक निजी युद्ध में बदल दिया जाता है। क्रोध की अवस्था में तर्क धुंधला पड़ जाता है। शब्द तेज़ हो जाते हैं, पर अर्थ कमजोर हो जाता है। और ठीक यही वह क्षण होता है जहां चालाक व्यक्ति जीत का भ्रम रच लेता है। इसलिए जब भी ऐसे किस...
पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल
कविता

पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पत्थरों पर उकरे हुए हैं सदियों से कई सवाल हर किसी ने वक़्त के सीने पे अपना हाल उतारा है। किसी ने शिलालेख में गुदवा दी अपनी दास्तां, किसी ने काग़ज़ की पनाह ली, कुछ हवाओं से कह गए दिल का हाल, किसी ने फूलों को अपनी कहानी सुना दी, चाँद के पास भी होंगे अनगिनत फ़साने, रात की खामोशियाँ… ये खामोश खड़े पर्वत-पठार, दरख़्त और समंदर की नम रेत में, कोहरे में भीगी घास की नमी और पत्तियों की सरसराहट में किसी ने नदियों को सौंप दिए होंगे भावनाओं के अधजले ख़त, कोई सागर की लहरों में अपने अरमान बहा गया होगा, और कहीं झरनों की फुहार में अपने अधूरे सपने भिगो दिए होंगे सन्नाटों में भी कुछ गूंज रहे होंगे अनकहे गीत, कुछ शिशिर की हवाओं में अपने राज़ छोड़ गए होंगे, पवन की सरसराहट में सूरज की पहली किर...
अंतर्मन से परिचय
कविता

अंतर्मन से परिचय

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* मैंने स्वयं को शब्दों की भीड़ में नही मौन की गहराइयों में पहचाना है जहाँ हर प्रश्न उत्तर नहीं माँगता और हर उत्तर सच नहीं होता। समय ने मुझे तोड़ा नही बस परत-दर-परत खोल दिया- जो दिखा वो मेरा नहीं था और जो मेरा था उसे देखने की दृष्टि सबके पास नहीं होती। रिश्तों की भाषा अब सरल नहीं रही यहाँ सम्मान भी शर्तों पर मिलता है। जो समझ सका वही ठहरा बाक़ी सबने भीड़ को अपनाया और मुझे फालतू कह दिया। मैंने शिकायतों को शब्द नहीं बनाया क्योंकि मौन में भी मेरी अस्मिता बोलती है अब न सफ़ाई देने की आदत है न हर चोट का हिसाब रखने का धैर्य। जो चला गया वो ग़लत नहीं था बस मेरी गहराई के योग्य नहीं था और जो ठहर गया वो कोई वादा नही एक अनुभूति है। अब मैं स्वयं से भागता नही ना ही किसी को ...
जीवन एक प्रश्न
कविता

जीवन एक प्रश्न

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक प्रश्न जो हर मोड़ पर नया हो जाता है कभी धूप में तप कर मजबूत कभी ओस बनकर पल में खो जाता है। हम चलते हैं मंज़िल की तलाश में पर रास्ते ही हमें पहचान देते हैं कभी हार में छिपा सबक कभी जीत में नम्रता सिखा देते हैं। सत्य यह है कि जीवन किसी ठहरे पानी जैसा नहीं यह बहती नदी है जो पत्थरों से टकराकर और भी निर्मल और भी प्रखर हो जाती है। हम जिस क्षण को पकड़ना चाहते हैं वह हवा बनकर फिसल जाता है और जो क्षण हमें तोड़ देता है वही हमें नया आकार दे जाता है। अंत में समझ आता है जीवन को समझना नहीं जीवन को जीना पड़ता है हर अनुभूति को स्वीकार कर खुद को धीरे-धीरे प्रकाश की ओर ले जाना पड़ता है। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी...
९० के दशक का प्रेम
कविता

९० के दशक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ९० का प्रेम भी अजीब था किसी को देखने के लिए जाने कितने प्रेमियों की साइकिल की चेन हमेशा ही उतरा करती थी. कितनी खिड़कियों को आँखें मिलती थी किस टाइम पर उन्हें खुलने का अधिकार मिला था सिर्फ वही समझती थी. रंगबिरंगे कागज़ पर कितने जवां दिलों ने कांपते हाथों से प्रेम की दास्तान लिखी. कितने प्रेमियों ने नोटबुक के आखरी पृष्ठ पर अनजान सी आँखें बनायी होगी तो किसी ने मेहंदी की डिजाइन पर अपने महबूब का नाम छुपा कर लिखा होगा. अगर प्रेम गीत नहीं लिखे गए तो मोहब्बत अंदर ही अंदर घुटती रहती फिर एक दिन टेंट हाउस का सामान डाले टेंपो आता तो पता चलता अपना चांद किसी दूसरी की छत की चांदनी बन चुका. कितनी अच्छी मोहब्बत थी बिल्कुल "उसने कहा था" ये कहानी हर किसी ने पढ़ी थी कितने...
हवाओं को लौट आने दो
कविता

हवाओं को लौट आने दो

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पीपल पर अपनी प्रार्थनाएँ टाँग सूर्यास्त का पीछा करते हुए जो आत्माएँ आकाश के भी आकाश में गरुड़ों सी चली गई हैं। देखना, अभी वे लौटेंगी क्योंकि पृथ्वी ही सबको अर्थ और संदर्भ देती है यह पृथ्वी ही है। जो शून्य को आकाश की संज्ञा देती है, यह पृथ्वी ही है। जो प्रकाश को धूप की संज्ञा देती है केवल हवाओं को लौट आने दो- ये सारे के सारे वन; कानन और अरण्य जो अभी भाषाहीन लग रहे हैं आकंठ प्रार्थनामय हो जाएँगे। सारी सृष्टि संध्याकालीन प्रार्थना-पुस्तक-सी पवित्र हो जाएगी। एक-एक पत्र संकीर्तन करता हुआ वैष्णव लगेगा केवल हवाओं को लौट आने दो- यही पीपल पत्र-प्रार्थनाएँ करता हुआ चैतन्य लगेगा, सारी वनस्पतियाँ माधव-गान करती हुई प्रभु के वन-विहार के अनुष्ठान-सी लगेंगी। महाभाव और क्या ...
मैं और मेरी कविता
कविता

मैं और मेरी कविता

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जब मैं लिखने बैठता कविता, लेखनी मुझसे रूठ जाती है, वह कहती मेरा पीछा छोड़ दो, मुझसे अपना नाता तोड़ दो, क्या तुम मुझे सौंदर्य में ढाल सकोगे, इस घुटन भरे माहौल से निकाल सकोगे, क्या तुम कुछ अलग लिख सकोगे, या तुम भी दुनिया की बुराइयों को, अपनी रचना में दोहराओगें ? दहेज, भूख, बेकारी के शब्द में अब ना मुझको जकड़ना, हिंसा दंगों या अलगाव के चक्कर में ना पड़ना, नेताओं को बेनकाब करने में मेरा सहारा अब ना लेना, बुराइयां ना गिनाना अब बीड़ी सिगरेट या शराब की, उकता गई हूं अब मैं, बलात्कार हत्या या हो अपहरण, इन्हीं शब्दों ने किया है जैसे मेरे अस्तित्व का हरण। लेखनी बोलती रही, मुझे मालूम है तुम इंसानियत की दुहाई दोगे, इसलिए मैं पास होकर भी हूं पराई। अगर लिखना हो तो लिखो, प्रकृति की गोद में बैठ कर , ...
आने वाली पीढ़ी के नाम
कविता

आने वाली पीढ़ी के नाम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हमारी सन्तानों! याद रखना अपने बेहतर दिनों में और अचानक टूट पड़ने वाली विपत्तियों के समयों में भी कि बीसवीं सदी के अन्त में जब लगभग सारा कुछ नष्ट हो गया था एक ज़लज़ले में, हमने तम्बू गाड़े थे दिन को आग उगलते, रात को हड्डी कँपाते निचाट रेगिस्तानों में। हम बहुत थोड़े ही बचे थे और जो भी थे, बिखरे हुए थे। हाँ, लगभग सब कुछ खो दिया था हमने। बस, अपने साथ बचाकर ले आ पाये थे जीने की ज़रूरत और कुछ उम्मीदें, थोड़ी आग और रोशनी। ख़ून और पसीना अपना था ही, बची हुई उम्र थी, विचार और अनुभव थे अपनी पिछली पीढ़ियों से और अपने ख़ुद के प्रयोगों से अर्जित। याद रखना कि इतनी सी, बस इतनी ही सी चीजों से हमने एक नयी शुरुआत की थी एक बेहद कठिन समय और बेहद ख़राब मौसम में तमाम-तमाम विभ्रमों, तटस्थताओं और रहस...
पश्चाताप क्या हैं?
कविता

पश्चाताप क्या हैं?

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पश्चाताप स्मृति रंध्रों से पीड़ा का रिसाव है पश्चाताप हमारी समझ और विवेक का अधूरापन है और हमारे बेहतर मनुष्य होते जाने का प्रमाण भी। पश्चाताप हमारी वस्तुपरकता को ठण्डी निर्ममता से बचाता है और सारी गतिविधियों के केन्द्र में मनुष्य को रखना सिखाता है। पश्चाताप इतिहास का संवेदनामूलक समाहार है और संवेदना का इतिहास लिखने की सबसे अच्छी भाषा है। हम बार-बार पीछे मुड़कर देखते हैं और जीवित रहने के लिए पश्चाताप करने लायक कुछ न कुछ ढूँढ लाते हैं। पश्चाताप प्रेरणा की विकल आत्मा है। पश्चाताप यदि देवता के सामने पाप स्वीकृति या क्षमायाचना बन जाये तो हम कमज़ोर, स्वार्थी और घुटे हुए पापी बन जाते हैं पश्चाताप आत्मकथा का विवेक और कविता की प्राणवायु है। पश्चाताप हमें तानाशाह बनने और त...
नादान है इंसान
कविता

नादान है इंसान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अभी तक नादान है इंसान उसी डाल को काटे जिस पर खुद बैठा नादान। अपने पैर कुल्हाड़ी मारे दिखा दंभ अभिमान। जानबूझ सच भूल गया सब मन के माने-मान, उलटी पढ़ी ज्ञान की पाठी उल्टा हो गया ज्ञान। सदा नकारे सच को मूरख होश करे न भान स्वार्थ में हो अंधा ऐसा बेचा सब ईमान। खुद की करनी छुपे न खुद से झूठी -धरता शान, अंदर-अंदर रहता हरदम परेशान -हलकान। तन को खाना-पीना सबको हासिल सभी जहान मन की भूख अपूर सदा ही मन की माँग अजान। मन मूरख खुद भी नहीं जाने क्या उसका अरमान पगलाया फ़िरता दुनिया में चढ़ गई मुफ्त थकान। मन के संग-संग मूरख लागे ज़रा करे न ध्यान मन के संग-संग घायल होकर घर लौटे नादान। मन नहीं जाना जब तक अपना सच न हो संज्ञान मन नहीं जाना तब तक अपना बोध हुआ न ज्ञान. अभी तक नादान है इ...
स्वच्छंदता
कविता

स्वच्छंदता

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कितनी उन्मुक्तता है स्वतंत्र विचरण करते हैं। सम्पूर्ण धरा और गगन के बीच ना आने का व्यय ना ही वाहन शुल्क देना है आय व्यय का ब्यौरा. पर क्या इनके ह्रदय में शांति की अनुभूति है ? संभवत: नहीं क्योंकि शांति होती तो इधर उधर विचरण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो फिर इस स्वच्छंदता रूपी स्वतन्त्रता का परिणाम क्या है ? फिर भी सभी उन्मुक्त सभी स्वछंद रहने को आतुर रहते हैं पंछी की तरह। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। ...
अपभ्रंश…
कविता

अपभ्रंश…

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* प्रेम- अद्भुत भ्रम है हम दूर रहकर भी साथ रहते हैं और हम साथ रहते हुए भी अलग रहते हैं। तुम्हारे साथ रहकर भी मैंने अपने भीतर एक अज्ञात शून्य पाया। स्मृतियों की परतों में न जाने कितनी बार हमने संग-साथ रचा- पर समय की कलम ने हर अध्याय को अधूरा ही छोड़ा।। तुम मेरे समीप थे, फिर भी मेरे स्पर्श तक कभी नहीं पहुँचे।। मानो एक पारदर्शी दीवार हमारे मध्य खड़ी थी, जो किसी अक्षर की तरह देखी जाती रही, पढ़ी कभी नहीं। विचित्र है- जीवन की व्याख्या हमने मिलकर लिखी, पर अर्थ अलग- अलग निकाले। और मैं आज सोचता हूँ- क्या प्रेम सचमुच दो आत्माओं का एकाकार होना है? या फिर अलग-अलग आत्माओं का अपने-अपने एकांत को जी भरकर जीने का अवसर? क्योंकि मैंने जाना है, तुम्हारे साथ रहकर भी मैं अप...
स्वछंद पंछी की तरह
कविता

स्वछंद पंछी की तरह

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कितनी उन्मुक्तता है स्वतंत्र विचरण करते हैं। सम्पूर्ण धरा और गगन के बीच ना आने का व्यय ना ही वाहन शुल्क देना है आय व्यय का ब्यौरा पर क्या इनके ह्रदय में शांति की अनुभूति है ? संभवत: नहीं क्योंकि शांति होती तो इधर उधर विचरण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो फिर इस स्वच्छंदता रूपी स्वतन्त्रता का परिणाम क्या है ? फिर भी सभी उन्मुक्त सभी स्वछंद रहने को आतुर रहते हैं पंछी की तरह परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४" से सम्मानित घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। ...
अ अत्याचार … ह से हत्या …
कविता

अ अत्याचार … ह से हत्या …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अ से अनार या अमरूद नहीं वर्तमान समय के अनुरूप अ से अनर्थ या अत्याचार लिखने की जरूरत है. कोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँ लेकिन मैं लिखने लगता हूँ क से कर्कशता या कट्टरता. ख से खरगोश लिखता आया हूँ लेकिन ख से अब किसी ख़तरे की आहट आने लगी है. मैं सोचता था फ से फल ही लिखा जाता होगा बहुत सारे फल लेकिन मैंने देखा तमाम फल जा रहे थे ज़ालिमों के गले में ग्रास बनकर हज़म होने के लिए. कोई मेरा हाथ जकड़ता है और कहता है भ से लिखो भय जो अब हर जगह मौजूद है द दमन का और प पतन का सँकेत है. आततायी छीन लेते हैं हमारी पूरी वर्णमाला वे भाषा की हिंसा को बना देते हैं समाज की हिंसा ह को हत्या के लिए सुरक्षित कर दिया गया है हम कितना ही हल और हिरन लिखते रहें वे ह से हत्या लिखते रहते ह...