जब भावों में जीते हो
शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
*******************
जब भावों में जीते हो
तो जीवंत हो, हृदय में हो
जब विचार में जीते हो
मूर्छा में हो, मस्तिष्क में हो।
हृदय और बुद्धि एक नही
हृदय आपका स्वभाव है
उसका अनुभव सत्य का
अनुभव है
उसकी सुनना ही
वास्तविक धर्म है
जब बुद्धि में जीते हो
बुद्धि से निर्णय लेते हो
तब अस्तित्व की अनंत
संभावनाओं से चूक जाते हो
बुद्धि का और प्रेम का
कोई संबंध ही नहीं.
बुद्धिमान, चालाक और चतुर
प्रेम कर ही नही सकते
वे प्रेमी हो ही नही सकते
उनके लिए प्रेम व्यर्थ है
वे बुद्धि के तल पे जीते हैं
लाभ और हानि के गणित
में पड़ते हैं
और प्रेम से चूक जाते हैं
उनके लिए भावजगत
संवेदना का जगत
निर्मूल्य है महत्वहीन है।
वे एक नीरसता भरे जीवन
में अकेली पड़ गई आत्माए हैं
जो मृत मुर्दा वस्तुओ के
लोभ से ग्रसित हैं
वे मरणासन्न हैं, य...

