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पत्थरों पर उकरे हुए हैं कई सवाल

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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पत्थरों पर उकरे हुए हैं
सदियों से कई सवाल
हर किसी ने वक़्त के
सीने पे अपना हाल
उतारा है।
किसी ने शिलालेख में
गुदवा दी अपनी दास्तां,
किसी ने काग़ज़ की
पनाह ली,
कुछ हवाओं से कह गए
दिल का हाल,
किसी ने फूलों को
अपनी कहानी सुना दी,
चाँद के पास भी होंगे
अनगिनत फ़साने,
रात की खामोशियाँ…
ये खामोश खड़े
पर्वत-पठार, दरख़्त और
समंदर की नम रेत में,
कोहरे में भीगी
घास की नमी और
पत्तियों की सरसराहट में
किसी ने नदियों
को सौंप दिए होंगे
भावनाओं के
अधजले ख़त,
कोई सागर की
लहरों में अपने अरमान
बहा गया होगा,
और कहीं झरनों
की फुहार में
अपने अधूरे सपने
भिगो दिए होंगे
सन्नाटों में भी कुछ
गूंज रहे होंगे
अनकहे गीत,
कुछ शिशिर की
हवाओं में अपने
राज़ छोड़ गए होंगे,
पवन की सरसराहट में
सूरज की पहली किरण में
जैसे प्रकृति ही
उनके वो कान है जो
सब सुन रही हो…
बिना किसी सवाल के
हर पत्थर, हर जल-धारा
हर चाँदनी की किरण,
हर फूल, हर पत्ती, हर
गिरती बारिश की बूंद
एक गवाह है उन अनंत
कथाओं की,
जो कभी नहीं लिखी गईं,
फिर भी जिंदा हैं,
और शायद, किसी ने
अपनी आत्मा के अंश को
कहीं छुपा दिया है धूप की
गर्म परछाइयों में,
ताकि वक़्त के साहिल पर
सिर्फ़ इशारे रह जाएँ–
और हर खोजने वाला
अपनी कहानी में खुद
को पा जाए।
हर लकीर, हर शब्द
हर निशान एक दर्पण है,
जिसमें देखे जा सकते हैं
इंसान के अनकहे अफ़साने।

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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