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लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है

संजय कुमार नेमा
भोपाल (मध्य प्रदेश)

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जीवन कोई
आसान सफर नहीं,
काँटों पर चलकर
मंजिलों को छूना पड़ता है।
गिरते हैं, संभलते हैं,
फिर बढ़कर,
मेहनत से
तकदीर बनती है।
उम्मीद का दिया
कभी बिना बुझे,
अँधेरे में भी
रौशनी बनकर,
खुद चमकना पड़ता है।
समय कभी साथ दे,
कभी परीक्षा ले,
किस्मत साथ ना दे।
शिद्दत से जो जुड़कर,
कभी न हारा,
हर लम्हा एक लड़ाई है,
हर साँस एक कहानी है।
जो समय चुराकर
मेहनत कर ले,
उसी के नाम तारीखें
और जवानी है।
मंजिल पूछती है
मेहनत का हिसाब,
और सपने माँगते हैं
वक्त की कुर्बानी।
जो आज पसीना
बहा दे मेहनत में,
कल दुनिया उसी की
जुबानी को गले लगाता है।

परिचय :- संजय कुमार नेमा
निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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