
डॉ. प्रताप मोहन “भारतीय”
ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी
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*गिरगिट ने आत्महत्या कर ली और सुसाईड नोट में लिखा-इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता।* हमें हमेशा अपने लिए अच्छा सोचना चाहिए, क्योंकि गलत सोचने के लिए तो दुनिया बैठी है। *कभी भी अफवाहों पर ध्यान मत दीजिए, क्योंकि अफवाह जलने वाले पकाते हैं, इसे मूर्ख परोसते हैं और बेवकूफ उसे खाते हैं।* ‘सब्र का फल मीठा होता है’, इसी कहावत के चक्कर में मेरे २ सब्र के फलों की शादी हो गई और कल एक और की सगाई होने वाली है। *जमाने का सच देखिए- “अफवाहें बिना पैर के दौड़ती है और सच लंगड़ाकर चलता है।*
अगर आपको उपवास करने का शौक है तो विचारों का करें, अगर भूखे रहने से भगवान खुश होते तो गरीब सबसे सुखी होते। *आजकल रोटी गैस पर बनती है, इसलिए खाने के बाद पेट में गैस बनती है।* आजकल रिश्तेदार भी बदल गए हैं, बचपन में जब वो हमारे घर आते थे तो पैसे देकर जाते थे। अब जब पैसों की जरूरत है, तो केवल आर्शीवाद देकर चले जाते हैं। यदि आप अपने खानदान का इतिहास सुनना चाहते हैं तो पत्नी के मायके की बुराई करें और पाएं अपने खानदान का गौरवशाली इतिहास सुनने का अवसर। ज़िंदगी का तजुर्बा यह कहता है कि साफ दिल रखने का सिर्फ एक ही नुकसान है, लोग आपको बेवकूफ समझकर हर बार आपका इस्तेमाल कर जाते हैं। *ज़िंदगी में कोई अगर आपसे जलता है, तो उसे जलने दीजिए। याद रखिए, जलने वाली चीज हमेशा राख हो जाती है।*
मंदिर जाने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि ‘चरण’ मंदिर तक पहुंचते हैं और ‘आचरण’ भगवान तक। यदि आप खुश रहना चाहते हैं, तो स्वयं का मूल्यांकन करें और हमेशा परेशान रहना चाहते हैं तो दूसरों का मूल्यांकन करें। यदि आपको जीवन का आनंद लेना है, तो अपने तरीके से लेना चाहिए। लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है। *’विनम्रता’ गुरुत्वाकर्षण के नियम को नहीं मानती। आदमी जितना नीचे झुकता है, उतना ऊपर उठता है।* जुलाई माह का नाम जुलाई क्यों पड़ा ? एक शोधकर्ता के अनुसार -बरसात में नहाकर लड़कियाँ सिर में ‘जूं’ लाई, इसलिए इस महीने का नाम जुलाई पड़ा।
पुरुष और स्त्री में एक बहुत बड़ा अंतर होता है। पुरुष गुस्सा होने पर एकांत ढूंढते हैं, ताकि शांति मिल सके और स्त्री गुस्सा होने पर पति को ढूंढती है, ताकि लड़कर अपना गुस्सा शांत कर सके। देखिए, वक्त कैसे बदल गया है पहले हम किसी को रेलवे स्टेशन छोड़ने जाते थे, तो आँखें भर आती थी और इस समय तो श्मशान घाट में भी किसी की आँख नम नहीं होती है। आजकल बिना सीजेरियन के कोई बच्चा पैदा नहीं रोता है और बिना वेंटीलेटर के कोई मरता नहीं है। *दूसरे का हक मारकर आप बादाम नहीं खा सकते, आपको दवाइयाँ ही खानी पड़ेगी।* रिटायर हुए पति को पत्नी समझा रही थी, कि तुम अब थोड़ा सेहत का ध्यान रखो और अपनी मूल भूख का ५० प्रतिशत ही खाया करो पेंशन की तरह। खामोश रहना सीखें, क्योंकि बातों से लोग नाराज बहुत होते हैं। जरूरी है ज़िंदगी में जिम्मेदारियों का भार होना, क्योंकि बिना वजन की नौका अक्सर दिशाहीन हो जाती है। इस दुनिया में ‘दु:ख’ हमारा परम मित्र है, यह हमसे ईश्वर की खोज करवाता है।
बुढ़ापा हमारे जीवन की एक ऐसी अवस्था है, जब हमारे पास, हर प्रश्न का उत्तर होता है लेकिन प्रश्न पूछने वाला कोई नहीं होता। *वो एक दिन छोड़कर पीते थे। कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि रोज पीता था तो आदत बिगड़ती थी। रोज नहीं पीता था तो तबियत बिगड़ती थी। अब एक दिन छोड़कर पीता हूँ तो ‘तबियत’ और ‘आदत’ दोनों ठीक रहती है।* जीवन में सबसे महंगी चीज भरोसा होता है, जिसे कमाने में कई साल लगते हैं और खोने में एक पल। मैंने कंडक्टर से पूछा-आप कितने घंटे बस में रहते हो ? उसने कहा- २४ घंटे। मैंने कहा- वो कैसे ? उसने बताया ८ घंटे तो सिटी बस में रहता हूँ और बाकी के १६ घंटे ‘बीबी के बस’ में रहता हूँ।
*बाप से डरने वाली हम आखिरी नस्ल हैं और औलाद से डरनेवाली पहली।*
मेरे हिस्से की ज़िंदगी तेरे हिस्से में आए और तेरी मौत की मौत हो जाए।
परिचय : डॉ. प्रताप मोहन “भारतीय”
निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी
घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है।
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