
सौरभ डोरवाल
जयपुर (राजस्थान)
********************
आज फिर वो शख्स याद आया,
मेरे साथ मेरा बचपन खेला।
मेरी जरुरत पूरी करते-करते,
बड़ी कठिनाइयों को झेला।।
सर्द, गर्म बारिश झेली,
दिन रात कर दिए एक।
मन में इच्छा यही बसी थी,
मेरा बेटा बन जाए नेक।।
दुःख देखा, सुख देखा,
समय नही था उनको
खुद के अरमान के लिए।
सब कुछ किया,
सब कुछ सह कर किया,
सिर्फ मेरी मुस्कान के लिए।।
गया जिस दिन वो शक्स,
मेरा सारा सुरूर चला गया।
मेरे पिता के साथ ही,
मेरा सारा गुरुर चला गया।।
पिता ने परिवार संभाला,
संभाली घर की सारी जिम्मेदारी।
घर को घर बनाया, सुविधाएँ करी,
पर उन सबमे नही थी
उनकी हिस्सेदारी।।
देखा है संघर्ष पिता का मैंने,
उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहा हूँ।
लोग ना जाने क्या समझते है,
मैं तो आज भी उन्ही की
मेहनत से पल रहा हूँ।।
निवासी : भोजपुरा, जिला- जयपुर (राजस्थान)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।
कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें …🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच का सदस्य बनने हेतु हमारे चलभाष क्रमांक 98273 60360 पर अपना नाम और कृपया मुझे जोड़ें लिखकर हमें भेजें…🙏🏻
















