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मशाल
कविता

मशाल

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कलम को चिराग बना कर अज्ञान का तमस फ़ना कर सोया है सदियों से वो जगा उसे शोला बना कर अहिंसक है या नपुंसक पूछ उससे मर्द बना कर कुछ मूषक है कुछ विदुषक ला सामने शेर बना कर जिसने इसे सुलाये रखा पेश कर गुनहगार बना कर रोक ले जाने वालों को वो जा रहे बात बना कर मुझे ज़मीर जिंदा चाहिए लाना मत मुर्दा बना कर नूर पर डाल रखा पर्दा जला उसे आग बना कर दिया है धोका लोगो को भेड़िये को भेड़ बना कर हर तरफ उजाला कर दिया कलम को मशाल बना कर परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वार...
ख्याल रखना
हिन्दी शायरी

ख्याल रखना

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** किस्मत कहिए अपनी कि रास्ता साथनिभा रहा है होते हुए हम सफर भी फिर भी अकेला जा रहा हूं प्यार की सौगात बड़े मुश्किल से मिलती है जिंदगी प्रेम बिना मुश्किल से कटती हैं यारों की याद आते ही कहर बरपाती है तन्हाई बहारे आते-आते तनहाई में तब्दील हो जाती है जिंदगी के चंद् लम्हों को याद रखना ख्वाबों के दरख्तो पर ना जाना है दोस्त जमी पर खाके सुपुर्द का ख्याल रखना ख्याल रखना कि हम सब इंसान हैं खुदा के बंदों का ख्याल रखना परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों...
दुनिया का कुछ भान नहीं था
गीत

दुनिया का कुछ भान नहीं था

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दुनिया का कुछ भान नहीं था, सभी लोग लगते थे अपने। नवयौवन के मादक दिन थे, नित आते थे सुन्दर सपने! प्रेम अनल ने घेर लिया था, नयनों से बहता था पानी! सुध-बुध सारी बिसराई थी, बैठी थी सिर पर नादानी। प्रेम रोग के कारण हरदम, तन-मन बहुत लगे थे तपने! नवयौवन के मादक दिन थे, नित आते थे सुन्दर सपने! मानव मन की मर्यादा है, सहनशीलता की भी हद हैं! कष्ट और कठिनाई हों तो, डगमग-डगमग होते पद हैं! जब दुख की आँधी चलती थी, लगता था उर अधिक तड़पने! नवयौवन के मादक दिन थे, नित आते थे सुन्दर सपने! टूट गए थे बाँध सब्र के, आशा के दीपक कंपित थे! रुका हुआ था भाग्य सितारा, नियति के निर्णय लंबित थे! संकट की छाया में प्रायः, ईश नाम लगते थे जपने! नवयौवन के मादक दिन थे, नित आते थे सुन्दर सपने! परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित...
अच्छा हमें अब लगने लगा है
कविता

अच्छा हमें अब लगने लगा है

पवन सिंह पंवार नसरूल्लागंज (मध्य प्रदेश) ******************** अच्छा हमें अब लगने लगा है, मार्केट जो फिर से खुलने लगा है, रहती थी जो वीरान गलियां, वहां भी अब रस होने लगा है। बच्चों को डर सा लगने लगा है, स्कूल खुलने की आहट जब से वो सुनने लगा है, अब तक मजे करे थे वो छुट्टियों में, अब दिल उनका घबराने लगा है। श्रमिकों का चेहरा खिलने लगा है, लाॅकडाउन खुलते जब से वो देखने लगा है, बैठे थे वो बेरोजगार अब तक घरों में, उन्हें फिर से अब कामधंधा मिलने लगा है। सच में सबकुछ पहले जैसा होने लगा है, मिलने जुलने का चलन फिर से जो बढ़ने लगा है, डर था इस वायरस का जो मन में भरा हुआ, वो भी अब कम होने लगा है। पर खतरा अभी कहाँ पूरी तरह टलने लगा है, फिर ना जाने क्यों इंसान कोरोना अनुरूप व्यवहार को छोड़ने लगा है, दूसरी लहर असावधानी और लापरवाही का ही परिणाम थी, क्या ये बात व...
मोक्षदायिनी गंगा
कविता

मोक्षदायिनी गंगा

मंजुला भूतड़ा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सबसे लम्बी नदी, पुण्य सलिला हिमालय पुत्री गंगा। गंगा दशमी अवतरण दिवस, सभी गंगा स्नान कर पाते यश। हिन्दुओं की सबसे पवित्र नदी, हर घर में गंगाजल पूजन-नमन, पूर्वजों का स्मरण श्राद्ध तर्पण, पिंडदान जल-अर्पण, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, जमनोत्री गंगा किनारे ये चारों धाम। हरिद्वार, बनारस, इलाहाबाद पाते गंगा सामीप्य का लाभ। शिव की जटाओं से प्रवाहित, गंगा शक्ति और भक्ति। अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी हुगली नामों से भी जानी जाती। फरक्का, टिहरी आदि बांध, अनेक नहरों का जीवन, उपजाऊ गंगा का डेल्टा, गंगा स्वयं सिंचाई का स्त्रोत। गंगा में होता अस्थि विसर्जन, न जाने कितने अवशेषों का वहन, निरन्तर कर रही सरकार प्रयत्न, प्रदूषण से बचाने का हरेक जतन। जीवनदायिनी, पापनाशिनी, मोक्षदायिनी पुण्य स्थली, भारत की भा...
पुरवैया
कविता

पुरवैया

गरिमा खंडेलवाल उदयपुर (राजस्थान) ******************** प्रेम नगर से चली आई पुरवैया ये तो बता प्रियतम कैसे है जिनके पास है दिल हमारा सनम बिना मेरे कैसे है? कोई संदेशा देजा पुरवैया साजन की बगिया से आई है उनके नाम से शर्माती अखियां वो भी क्या मुझ बिन तड़पे है? आंचल लहराए जब पुरवैया रंग चुनरिया का तो बता दे जिनकी याद में रहे जागते उनकी शामें ढलती कैसे है? कोई निशानी प्रेम की पुरवैया उनकी सुगंध संग ले आना जिनकी चाहत में खोए रहते वो भी तलाश में क्या मेरे है? झोका हवा का लाई पुरवैया ये तो बता साजन की गली की हंसी ठिठौली कैसी है सनम याद में क्या रोते हंसते है? परिचय :- गरिमा खंडेलवाल निवासी : उदयपुर (राजस्थान) संप्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अ...
किंकरी  देवी
कविता

किंकरी  देवी

सपना दिल्ली ************* किंकरी  देवी न तो वह शिक्षित नहीं क़ानून का ज्ञान बेहद आम सी औरत हिमाचल में था आशियाना उनका किंकरी देवी था जिनका नाम...... पहाड़ों से  बेहद लगाव खनन माफिया से बचाने पहाड अकेली ही विरुद्ध खड़ी हो गई उनके.... डराया गया, धमकी भी मिली फिर भी अजब निडर थी जान की परवाह किये बिना डटी रही अपने लक्ष्य पर.... हिम्मत न हारी, विरोध हुए बहुत कर खुद पर विश्वास, न्याय खातिर भूख हड़ताल भी की उन्नीस दिन.. आखिर वह समय आया सपना हुआ पूरा, अधिकार मिला खनन माफिया का मिटा कारोबार.... जाते जाते लोगों को पर्यावरण का महत्व सिखा दिया नई पीढ़ी को दिए कई ऐसे उपहार .. ऐसी नारी शक्ति को नमन शत् शत् नमन। परिचय :- सपना पिता- बान गंगा नेगी माता- लता कुमारी शैक्षणिक योग्यता- एम.ए.(हिंदी), सेट, नेट, जेआर. एफ. अनुवाद में डिप्लोमा ( अंग्रेज़ी से हिंदी), पी.एचडी. (ज़ारी) सा...
सार्थक उपासना
लघुकथा

सार्थक उपासना

डॉ. भोला दत्त जोशी पुणे (महाराष्ट्र) ******************** सार्थक उपासना वही है जिसके साथ अच्छे कर्म भी जुड़े हों। पूजा-उपचार बाह्य क्रियाएँ हैं | श्रेष्ठ कर्म को उपासना मान लिया जाय तो वह उपासना सार्थक हो जाती है | एक समय की बात है जब दो लोग साथ-साथ रहते थे | एक दिन गाँव की पाठशाला में अध्यापन करने वाले शिक्षक ने उनके सामने दो समान पत्थर रखे गए | उनके द्वारा की जाने वाली प्रतिक्रिया का इंतजार था | पहले आदमी ने अपने सामने रखे पत्थर को देखा और हाथ जोड़कर खड़ा रहा | कुछ क्षण मन को रोककर आँखें बंद कीं और ध्यान करने लगा | पत्थर अपनी प्रकृति के अनुसार अचेत पड़ा रहा | दूसरे आदमी ने ध्यान से पत्थर को निहारा और चंद क्षण सोचकर फिर अपनी आँखें खोलीं, मन को उत्साहित किया और फिर छेनी, हथौड़ी लेकर पत्थर को तराशने लगा | वह अपने काम में मगन हो गया, उसे इतनी लगन लग गयी कि समय कैसे गुजर रहा था उसे कुछ पत...
निर्मल साहित्य एक पहल” का कवि सम्मेलन संपन्न
साहित्य समाचार

निर्मल साहित्य एक पहल” का कवि सम्मेलन संपन्न

निर्मल साहित्य एक पहल संस्था के तत्वाधान में १६.०४.२०२१ बुधवार को द्वितीय ऑनलाइन कवि सम्मेलन का आयोजन गूगल मीट के माध्यम से किया गया आ.ऋचा मिश्रा रोली जी के संचालन में अनेकों कवि/ कवयित्रियो के काव्य पाठ के साथ संपन्न हुआ। संस्था के संस्थापक आदरणीय निर्मलजी ने सभी कवियों /कवयित्रियों का स्वागत अभिनंदन किया। नारी शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हुई आदरणीया वंदना खरे जी के द्वारा मां शारदे का आवाहन किया गया और इसके पश्चात आ.अशोक राय वत्स जी ने अपनी पंक्तियां पढ़ी "जब राणा की शमशीरों से समरांगण का रंग लाल हुआ, तब लगा स्वयं रणचंडी ही शत्रु खून पीने निकली, आ.प्रेम करेला जी ने अपनी ओजस्वी वाणी में पढ़ा "अधरों पे वंदे मातरम वंदे मातरम का गुणगान होना चाहिए, सब कुछ बाद में सबसे पहले दिल में हिंदुस्तान होना चाहिए", आ.वंदना खरे जी ने अपनी पंक्तियां पढ़ी "चिडियों को उड़ने दो, चहकने दो चिडियों को, अभी तो घो...
मुझसे बात नहीं करोगी
कविता

मुझसे बात नहीं करोगी

आदर्श उपाध्याय अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश ******************** मुझसे बात नहीं करोगी तो मेरी रात नहीं होगी, अगले कल से कभी भी मेरी मुलाक़ात नहीं होगी। तुमसे ही बात करके ही जो जीता हूँ मैं, मेरी ज़िन्दग़ी में अब "खुशी" की बरसात नहीं होगी। तुम्हारा मुझे डाँटना मुझ पर गुस्सा करना सबकुछ मुझे प्यारा लगता है, बिना इसके मेरी ज़िन्दग़ी की कभी सुबह-ओ-शाम नहीं होगी। जबसे दोस्ती हुई तुमसे हर कोई मेरी तारीफ़ करने लगा, बिना तुम्हारी दोस्ती के मेरी ज़िन्दग़ी कभी खास नहीं होगी। माँ का दर्जा दे दिया हूँ तुमको मेरी "खुशी", बिन माँ के किसी मोहब्बत की शुरुआत नहीं होगी। सारी उम्र आपको अकेले ही याद करता रहूँगा, शायद इससे हमारी दोस्ती में कोई खटास नहीं होगी। भूलने का नाटक भले कर लेना "खुशी" पर मुझे भूल नहीं पाओगी, इससे ज्यादा किसी की दोस्ती कभी खास नहीं होगी। भगवा...
माता और पिता
कविता

माता और पिता

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** शुक्र है भगवान तेरा जो तूने माता पिता को बना दिया सूर्य और चंद्रमा की तरह तूने माता और पिता को बना दिया पिता को सूर्य की तरह तेज तो माता को चांद की तरह शीतल एक आशा की किरण देता तो दूजी जीवन मे शांति शुक्र है तेरा भगवान जो तूने माता पिता को बना दिया फूल और नारियल की तरह तूने माता और पिता बना दिया माता को पूजा का फूल तो पिता को नारियल के जैसा बना दिया एक पूजा को सुगंधित करती तो दूजा पूजा को पूर्ण शुक्र है तेरा भगवान तूने माता पिता को बना दिया परिचय : संध्या नेमा निवासी : बालाघाट (मध्य प्रदेश) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, र...
जीवन के मूलाधार पिता
कविता

जीवन के मूलाधार पिता

अखिलेश राव इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन का मूलाधार पिता सुख स्वप्नों का साकार पिता ऊबड़ खाबड़ पगडंडी पर पथ सत्य दिखाती राह पिता।। कलुषित तम में प्रकाश पिता निराश हृदय की आस पिता आपाधापी दुर्गम पथ पर पुष्पों संग सजा हे थाल पिता जीवन का मूलाधार पिता।। मेरा जीवन अभिमान पिता स्वावलंबन स्वाभिमान पिता कच्ची मिट्टी के लोंदें हम गढने वाला कुम्हार पिता। सुख स्वप्नों का साकार पिता।। संघर्षों के आधार पिता संकट में ढालाकार पिता दुख सुख लाभ हानि समक्ष पर्वत सी अटल दीवार पिता।। हम सबकी जीवन आस पिता।। परिचय :- अखिलेश राव सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक हिंदी साहित्य देवी अहिल्या कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय इंदौर निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं...
मेरे पिता
कविता

मेरे पिता

डॉ. मोहन लाल अरोड़ा ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) ******************** मुझे था अपने पिता जी पर बहुत नाज था कोमल मन और सदृढ आवाज शांत स्वभाव और खुश मिजाज ना कभी गुस्सा ना ही कभी नाराज शायद मेरी हर बात जानते थे मेरी हर नब्ज पहचानते थे हर काम में सहयोग करते और मेरी हर बात मानते थे कड़ी मेहनत और लग्न से हमे पढाया ऊँची शिक्षा दिला कर डाक्टर बनाया आर्थिक, सामाजिक शिक्षा का ज्ञान बताया धार्मिक और परिवारिक संस्कार का पाठ सिखाया क्या लेना क्या देना का गणित समझाया चोरी और झूठ से कोसो दुर भगाया नीति और नियत का मतलब बताया भूखे को रोटी असहाय की मदद का फर्ज सुनाया मेरे गुरु मेरे मित्र थे मेरे पिता मेरा अस्तित्व, मेरा मान, थे मेरी पहचान मेरी माँ के माथे का सिंदूर, थी माँ की शान स्पष्टवादी, राष्ट्रवादी थे नेक दिल इंसान हे भगवान, हे पालनहार, हे दाता मोहन करे बिनति मुझे हर जन्म ...
कहने की ही शान हुआ हूँ
ग़ज़ल

कहने की ही शान हुआ हूँ

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कहने की ही शान हुआ हूँ। मैं कितना नादान हुआ हूँ। रखते-रखते खैर-ख़बर सब, ख़ुद से ही अंजान हुआ हूँ। सोचे लेकिन मिल ना पाये, उन सपनों की खान हुआ हूँ। सुनकर बातें सब अंदर की, दीवारों के कान हुआ हूँ। कर के थोड़ी किस्सागोई, मैं अपनी पहचान हुआ हूँ। नींदों के संग ख़्वाब नहीं हैं, सुनकर मैं हैरान हुआ हूँ। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक ...
राजनीति
कविता

राजनीति

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** राजनीति कुत्सित हुई और लोकतन्त्र लाचार हुआ आदर्शों की बात न पूछो मन में व्याप्त विकार हुआ निज हित ही सर्वोपरि सबसे राष्ट्र नहीं चिंता उनकी वीर शहीदों का सपना तो सब का सब बेकार हुआ संविधान की खिल्ली उड़ती संसद के भीतर बाहर जाति और मज़हब का मुद्दा अच्छा कारोबार हुआ भोग तंत्र में बदल गया है लोकतंत्र इस देश में सत्ता के ऊँचे आसन पर उल्लू का अधिकार हुआ पढ़ालिखा तो बेल बीनता अनपढ़ मंत्री मालिक हैं रोटी कपड़ा का भी सपना कब उनका साकार हुआ बापू अपने अनुयायी से कोई एक सवाल करो फटेहाल जो कल थे आख़िर अरबों का संसार हुआ साहिल जिनको समझ रहे थे वो ही नाव डुबोते हैं दीमक जैसा चाट रहे हैं घर का बंटाधार हुआ परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मन...
सुंदर अहसास
कहानी

सुंदर अहसास

राकेश कुमार तगाला पानीपत (हरियाणा) ******************** विनीता रिक्शा में नए घर की तरफ जा रही थी। उसे बार-बार ऐसा लग रहा था किसी की निगाहें उसका पीछा कर रही है। वह भी चाहती थी कि एक बार पलट कर देख लें। पर पता नहीं क्यों उसका मन नहीं मान रहा था? वह रिक्शा वाले से बोली, भैया थोड़ा जल्दी करो। मौसम खराब हो रहा है। ऐसा लग रहा है कोई तूफान आने वाला है। नहीं-नहीं, यह बस तेज हवाएं हैं। आप यहां पर नई है ना। इसलिए यहाँ के मौसम से अनजान हैं। यहाँ, मौसम पल-पल बदलता है। मेरा मतलब यह नहीं था। मैडम पहाडों में तो इस तरह की तेज हवाएं चलती रहती हैं। कभी-कभी तेज हवाओं के साथ तेज बौछारें भी हो जाती हैं। तभी तो यहाँ पर दूर-दूर से लोग घूमने आते हैं। इस शानदार मौसम का आनंद लेते हैं। विनीता, को वह रिक्शावाला कम, गाइड ज्यादा लग रहा था। वह पूरे रास्ते उसे पहाड़ियों के बारे में ही बताता रहा था। उसका सफर भी आराम ...
रक्तदान कार्य महान
कविता

रक्तदान कार्य महान

ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' तिलसहरी (कानपुर नगर) ******************** रक्त दान सब मिलकर अपनाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। हुई दुर्घटना मानव खून बह रहा, देखो प्राण संकट अब बढ़ रहा, रोगी के लिए फरिश्ता बन जाओ जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... आज मानव ईर्ष्या अग्नि में तप रहा, मानव ही मानवता का शत्रु बन रहा मानवता संग प्रेम का दीप जलाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... जीवन में कुछ कुछ दान सभी करते, अन्न, धन, विद्यादान तो सभी करते, एक विशिष्ट दान का संकल्प उठाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... इस जगत में रक्तदान है कार्य महान, मानव के प्राण रक्षा का सुंदर विधान, विधान में पुण्य भागीदार बन जाओ, जग में खुशियाँ चहुंओर बरसाओ। रक्तदान सब मिल.... परिचय :- ओमप्रकाश श्रीवास्तव 'ओम' जन्मतिथि : ०६/०२/१९८१ शि...
हिन्दी कविता में आम आदमी
आलेख

हिन्दी कविता में आम आदमी

सलिल सरोज नई दिल्ली ******************** हिन्दी कविता ने बहुधर्मिता की विसात पर हमेशा ही अपनी ज़मीन इख्तियार की है। इस बात की पुष्टि हर युग के कवियों द्वारा की गई कृत्यों से प्रतीत होती रही है। हिंदी कविता ने रामधारी सिंह दिनकर की क्षमता का उपयोग कर के राष्ट्र आह्वान का मार्ग प्रशस्त किया और साथ ही साथ आम आदमियों की दिक्कतों और रोज़मर्रा की समस्याओं को भी बेहद गंभीरता से उजागर किया है। अगर कोई साहित्य उस वर्ग की बात नहीं कर पाता जो मूक और बधिर है तो फिर साहित्य को अपने नज़रिये को बदलने की महती आवश्यकता होती है। रामधारी सिंह दिनकर सरीखे कवियों ने अपनी लेखनी में जनमानस की विपरीत परिस्थितियों का सजीव चित्रण ही नहीं किया बल्कि धनाढ्य और रसूखदारों पर करारा प्रहार भी किया और यह प्रश्न अक्षुण्ण रखा कि गरीबी और लाचारी के लिए क्या गरीब स्वयं जिम्मेदार है या फिर वह वर्ग भी जिमीदार है ज...
खामोशी
कविता

खामोशी

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** हर जुबां कुछ कहती है, खामोशी से हर दर्द सहती है...! कुछ दर्द का नाम खामोशी है तो कुछ खामोशी दर्द के नाम है..!! रात के अंधेरों मे निकलते है, जो आँसू उनको सह लेती है खामोशी...! दिन के उजालों मे झूठी सी मुस्कान दे जाती है खामोशी..!! न जाने कितनी ही फाइलों मे दर्ज हुई है, खामोशी...! कुछ खुली तो कुछ अभी-भी छुपाई गई है खामोशी..!! खामोश है आज भी वह अखबार इस बात से...! कि फेल न जाए, कोई अफवाह सच के नाम से..!! खामोशी से आज भी सह लेता है, वो टूटा हुआ दिल हर गम...! कि कोई आँख न हो जाए उसकी वजह से नम..!! परिचय :- कु. आरती सुधाकर सिरसाट निवासी : ग्राम गुलई, बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानि...
रूठ न जाए
गीत

रूठ न जाए

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** इस बात का डर है, वो कहीं रूठ न जायेंI नाजुक से है अरमान मेरे, कही टूट न जायें।। फूलों से भी नाजुक है, उनके होठों की नरमी। सूरज झुलस जाये, ऐसी सांसों की गरमी। इस हुस्न की मस्ती को, कोई लूट न जायें। इस बात का डर है, वो कहीँ रूठ न जायें।। चलते है तो नदियों की, अदा साथ लेके वो। घर मेरा बहा देते है, बस मुस्कारा के वो I लहरों में कही साथ, मेरा छूट न जायें I इस बात का डर है, वो कहीं रूठ न जायें I। छतपे गये थे सुबह, तो दीदार कर लिया I मिलने को कहा शामको, तो इनकार कर दिया I ये सिलसिला भी फिरसे, कहीं टूट न जायें। इस बात का डर है, वो कहीं रूठ न जायें I। क्या गारंटी है की फिरसे, कही वो रूठ न जाएं। मिलने का बोल कर कही भूल न जाये। हम बैठे रहे बाग़ में, उनका इंतजार करके। वो आये तो मिलने पर देखकर हमें चले गये।।...
उत्तर बंग के महाविद्यालय में वेबिनार् का आयोजन
साहित्यिक

उत्तर बंग के महाविद्यालय में वेबिनार् का आयोजन

रुपेश कुमार (स्वतंत्र पत्रकार) : - परिमल मित्र स्मृति महाविद्यालय, मालबजार, जलपाईगुड़ी, पश्चिम बंगाल के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित १७ दिवसीय छात्र वेबिनार का दूसरे दिन भी कार्यक्रम पूर्णरूपेण सफल रहा। मुख्य अतिथि के रूप में महाविद्यालय की प्रभारी अध्यक्ष श्रीमती नंदिता मुखर्जी ने छात्रों का उत्साहवर्धन करते हुए उन्हें कोरोना से सुरक्षित रहने और सुरक्षा के नियमों का पालन करने का संदेश दिया। उन्होंने इस आयोजन को छात्रों के हित मे एक नई पहल माना। साथ ही विषय विशेषज्ञ के रूप में ननी भट्टाचार्य स्मारक महाविद्यालय की विभागध्यक्ष डॉ सरोज कुमारी शर्मा ने पत्रकारिता और अनुवाद तथा काव्य लक्षण के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण और सारगर्भित विचार रखें। पत्रकार रीता दास ने भी छात्र-छात्राओं का मार्ग दर्शन किया। विभाग के छात्रों द्वारा इन विषयों पर पत्र भी पढ़े गए। प्रश्नोंत्र सत्र के अंतर्गत सभी बढ़ चढ़ क...
क्या रोजगार पा सकेंगे हम
गीत

क्या रोजगार पा सकेंगे हम

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** एक बात पूंछनी है रेहबरों बताओगे, सच-सच बताओगे, क्या रोजगार पा सकेंगे हम। यूँ रोजगार पा सकेंगे हम।। वादा किया था आप हमको देंगे रोजगार। आएंगी रोनकें घरों में आएंगी बहार।। उतरेगा बदन का लिबास जो है तार-तार। सरकारी नौकरियों से कर पाएंगे श्रृंगार।। सोचा न था निजीकरण पे आप जाओगे। सारी ही नौकरियाँ ठेकों पे उठाओगे।। कुछ को बढ़ाओगे, क्या रोजगार पा सकेंगे हम। यूँ रोजगार पा सकेंगे हम।। विश्वास किया आपको हम चुनके ले आए। परचम उठाए आपके गुणगान भी गाए।। कुर्सी पे बिठाया है ऐसे पैर जमाए। जिनको हिलाने कोई शूरवीर न पाए।। उम्मीद न थी हमसे यूँ नजरें चुराओगे। विश्वास एक जगा था बड़े काम आओगे।। खुशियां लुटाओगे, क्या रोजगार पा सकेगें हम। यूँ रोजगार पा सकेंगे हम।। जाकर के नजर फेर लोगे किसको पता था। आश्वासनो...
जीवन जीने के लिए लड़े जाने वाले अंतहीन युद्ध को समर्पित है पुस्तक “यही सफलता साधो”
पुस्तक समीक्षा

जीवन जीने के लिए लड़े जाने वाले अंतहीन युद्ध को समर्पित है पुस्तक “यही सफलता साधो”

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** पुस्तक का नाम - यही सफलता साधो रचनाकार - कवि संदीप द्विवेदी प्रकाशक - ब्ल्यूरोज़ संस्करण - प्रथम (मार्च २०२१) कीमत - १६० रूपये समीक्षक - आशीष तिवारी निर्मल अपने दौर को तो सभी साहित्यकार अपनी कलम के माध्यम से दर्ज करने का सफल प्रयास करते हैं, लेकिन ऐसे चंद ही रचनाकार होते हैं, जिन्हें उनका दौर इतिहास में उनके प्रभावी लेखन के कारण कुछ ख़ास तरह से दर्ज करता है। जी हाँ! मै आज एक ऐसे ही उर्जावान रचनाकार और उनकी रचनात्मकता की चर्चा करने जा रहा हूँ, जो अपने सुघड़ लेखन के कारण हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान के बाहर सुने जाते हैं और पढ़े जाते हैं। कवि श्री संदीप द्विवेदी देश के उन युवा रचनाकारों की श्रेणी में आते हैं जो किसी भी पाठक या श्रोता के हृदय में सदैव सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। कवि संदीप द्वारा विरचित काव्य कृति "यही सफ...
अदाकारा नहीं है वो
कविता

अदाकारा नहीं है वो

रुखसाना बानो अहरौरा, चुनार, (मिर्ज़ापुर) ******************** अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर किरदार निभाने पड़ते हैं। माँ के रूप में है ममता का अम्बार, बेटी के रूप में है वो सम्मान। ज़रूरत से ज़िम्मेदारी तक, वन्दनवार सजाने पड़ते हैं। अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर किरदार निभाने पड़ते हैं।। बहन के रूप में है वो अभिमान, पत्नी के रूप में है वो स्वाभिमान। विश्वास से लेकर वफादारी तक, हर रिश्ते पिरोने पड़ते हैं। अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर किरदार निभाने पड़ते हैं।। संगी, साथी और मित्र क्या नाम दे उसे, हर क़दम पर जिसने संभाला है हमें। अँधेरे बनकर रौशनी की किरण, उजालों के दिए जलाने पड़ते हैं। अदाकारा नहीं है वो फिर भी, उसे हर क़िरदार निभाने पड़ते हैं।। परिचय :-  रुखसाना बानो विद्यालय : कम्पोजिट विद्यालय अहरौरा निवासी : अहरौरा, चुनार, (मिर्ज़ापुर)। घ...
अनंत प्यास जरूरी है।
कविता

अनंत प्यास जरूरी है।

श्रीमती विभा पांडेय पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** हर दिन के बाद रात आती है सही है, पर रात हमेशा टिकती नहीं, जाती है। फिर प्रभात के साथ गुनगुनाता हुआ सूर्य अपनी लालिमा बिखेरता जीवन के लय में मगन खुशी के गीत गाता है। रे मन अंत से निराश न हों क्योंकि हर अंत के बाद नया आरंभ होता है। टूटते है स्वप्न, चुभती है काँस। गले में अटक-सी जाती है हारने की फाँस। पर हार से हारना नहीं झुकना नहीं, रुकना भी नहीं। रे मन हार से निराश न हो क्योंकि हर हार नई जीत का संदेश लाती है। नए जीवन के प्रस्फुटन के लिए विध्वंस जरूरी है। विरह के स्वाद को चखे बिना प्रीत होती कहाँ पूरी है? तो विध्वंस से डर कैसा? रे मन प्यास से व्याकुल न हो क्योंकि संपूर्ण तृप्ति के लिए अनंत प्यास जरूरी है। परिचय :- श्रीमती विभा पांडेय शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी एवं अंग्रेजी), एम.एड...