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अपना पराया
कविता

अपना पराया

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** अपनों में कितने अपने है, वक्त आने पर आपको सबक मिलेंगे..! जख्म है जिस्म में यक़ीनन छुपा कर रख, ये जालिम जमाना है इनके हाथों में मरहम नहीं नमक मिलेंगे..!! दिखावे की इस दौर में पहचान न पाओगे अपना पराया तुम जो नकली है उनके चेहरे पर असली चमक मिलेंगे..।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) क...
भ्रम का विसर्जन
कविता

भ्रम का विसर्जन

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां हम छोड़ेंगे, तुमसे डरना छोड़ेंगे, सदियों का जो गुरूर11 पाल रखे हो मन में वो भ्रम भी तोड़ेंगे, डरना हमारी बपौती नहीं था, वो थी हमारी मजबूरी, अब खाल खींच लेंगे तुम्हारे ओछी अकड़, तुम्हें अंदाजा नहीं हमारे पकड़ की, गुड़ खाने वालों, क्यों है तुम्हें परहेज गुलगुलों से, कर जाते हो ज्यादती कपोत और बुलबुलों से, तुमने जो बांटी थी नफ़रत की दीवारें, तुमने जो रची थी ऊंच-नीच की कतारें, अब उन बेड़ियों को जड़ से उखाड़ रहे हैं, तुम्हारे पाखंड का पन्ना-पन्ना फाड़ रहे हैं, अब न कोई दबा कुचला, न कोई लाचार रहेगा, बराबर का हक होगा, बराबर का अधिकार रहेगा, उठ खड़ा हुआ है अब इंसानियत का सैलाब, मांग रहा है तुमसे सदियों का हिसाब, पहचान लिया है हमने तुम्हारी चालों को, अब ढहा रहे हैं तुम्हारे इन महलों ...
वीरांगना दुर्गावती
कविता

वीरांगना दुर्गावती

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** चंदेलों की बेटी चण्डी, गढ़-मण्डला की शान की.. चपल, सुंदरी, वीर-बांकुरी दुर्गावती महान थी.... उसकी आँखों के अंगारे, उसके तलवारों के स्वर.. प्राण बचाकर शत्रु भागे हो समक्ष जो रानी गर... योग्य चुनाव स्वयंवर से कर दलपतशाह से ब्याह किया.. पति की सेवा बालक-पालन कुशल नीति से राज किया.. ५२ ताल बनाकर जनता के जीवन अमृत बांटे.. मगर नीति की कौन कहे? वीरों के भाग लिखे कांटे... पति का शोक मनाए कैंसे? कांधे थे दायित्व विकट ... बाजबहादुर आजम खान सरीखे शत्रु जो मरकट.. स्त्री राज करे कैसे? ये बात उसे ना हजम हुई... चुभती मुगलों की आंखों में रानी जैंसे कोई सुई...... हमला करने आते उल्टे मुँह की ख़ाकर जाते थे.. दया-विनय कर जोड़ रानी से अपनी जान बचाते थे.. बार-बार की हार से बाजबहादुर स्वयं अचंभित था... औरत हो...
मित्रता दिवस
कविता

मित्रता दिवस

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** दोस्ती कृष्ण सुदामा सी, नहीं गरीबी अमीरी का भान, मन मिले वही दोस्त बने, प्रेम वही है साथ। दोस्त के मन की बात को, समझ जा जाए वह दोस्त, हर हाल में साथ दे, वही दोस्त मजबूत। छोटे को ऊपर उठाएं, करे बराबर का साथ, नहीं राग नहीं द्वेष जहां, वही दोस्ती का हाथ। गरीबी अमीरी की खाई को, नहीं धोखा नहीं छल, कृष्ण सुदामा सा निश्छल प्रेम, वही दोस्ती का है मेल। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०...
मित्रता दिवस
कविता

मित्रता दिवस

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मित्रों का जीवन में क्या महत्व है। कोई सोचे तो सोचता रह जाता है। जो किसी से भी नहीं मिला, वो मित्र देता है। पैसा भौतिक सुख, और व्यापार देता है। संबंध सामाजिक प्रतिष्ठा, और सम्मान देते हैं। माता-पिता से अनोखा प्यार और स्नेह मिलता है। निस्वार्थ भाव का समर्पण, मात्र, माता-पिता ही देते हैं। पृथ्वी पर उनका स्थान, ईश्वर से भी अधिक मूल्यवान है। इसी प्रकार, एक सच्चे मित्र, का जीवन में होना, सुरक्षा कवच होता है। मित्रता पाना या देना, इस भाव से हटकर त्याग और समर्पण प्रदान करती हैं। संबंधों में एक मर्यादा होती है। परंतु मित्रता अपने मित्र के लिए हृदय से संबंध बनाकर जीती है। बिना कहे हृदय को स्पर्श कर, सुंदर स्वर्णिम भाव संजोती है। मित्रता में छल, कपट, और ईर्ष्या जैसे कलुषित भावों का कोई स्थान नही...
दौड़
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दौड़

महेश बड़सरे राजपूत इंद्र इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हाँ! सब दम लगा दौड़ रहे हैं रोज दौड़ रहे हैं किसलिए दौड़ रहे हैं सुबह शाम दौड़ रहे हैं पता नहीं क्यों दौड़ रहे हैं बिन मंज़िल के दौड़ रहे हैं सीधे कम, तिरछे बाँके दौड़ रहे हैं धरती और आसमान में दौड़ रहे हैं जिसका ना अंत वही दौड़ दौड़ रहे हैं। पर इस दौड़ से क्या हासिल होगा कितनी शांति है इस दौड़ में कितनो को सुकून मिला कितने हुए संतुष्ट दौड़ के बाद नहीं चाहिए ये अंतहीन अंधी दौड़ ये दौड़ अब ना! परिचय :- महेश बड़सरे राजपूत इंद्र आयु : ४१ बसंत निवासी :  इन्दौर (मध्य प्रदेश) विधा : वीररस, देशप्रेम, आध्यात्म, प्रेरक, २५ वर्षों से लेखन घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमे...
कभी-कभी शब्द
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कभी-कभी शब्द

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कभी-कभी शब्द हमारी पीड़ा को दर्शा नही सकते और , संवेदनाओं के बहाव को रोक नहीं सकते तब हम कमजोर पड़ जाते हैं अपने हृदय के आगे उस वक्त हमे समझ नही आती कोई भी बात किसी का भी कुछ समझाना व्यर्थ सा हो जाता है तब ऐसा लगता है जैसे मन के भीतर भीतर ही कोई सैलाब उमड़ रहा हो जो डुबो देना चाहता हो अपने सामने आने वाली हर व्यक्ति हर वस्तु हर भावना हर संभावना को हर सोच को हर सलाह को हर उस दूसरे भाव को जो उससे विपरीत हो. व्यथित मन शांत होने से पहले किसी के काबू में नहीं आता जब तक उसके अंदर का उबाल शांत न हो जाए किसी शांत बहती नदी के समान. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी...
तक दुम
कविता

तक दुम

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** तक दुम... तक दुम.... बीत गई रतिया आये न श्याम तुम.... तक दुम... तक दुम... गर्म सांसों का अहसास मन मोरा भटकाय रहा रमी श्याम तेरे सौरभ में जीवन मेरा महकाय रहा अधर चढे मुरलिया तो करे होश मेरे गुम.... तक दुम.... तक दुम.... रंग रसीला कान्हा मेरा लाया गोटे की अंगिया दिखा दूर से छेड़े मोहे बता कहाँ से ली अंगिया रास रचे जमना तट पे राधा नाचे ठुमक ठुम... तक दुम.... तक दुम.... नटखट नटवर छुप छेड़े दिल भी चुराये माखनचोर डपटे मात तो मन मुस्काये कान पकड़ मनाये चितचोर इक पल ना दिखे मोहन तो मनवा होवै गुम सुम.... तक दुम... तक दुम.... बीत गई रतिया आये न श्याम तुम.... तक दुम... तक दुम... परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़” निवासी : आनंद विहार, दिल्ली विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थ...
ख़ामोशी का फ़ैसला
कविता

ख़ामोशी का फ़ैसला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** तोड़े हैं गलतफहमियों ने मेरे सारे रिश्ते, जिन्हें मैं समझता था फरिश्ते, अब पता नहीं उन सबको खुन्नस किस बात की थी, शायद कभी उनके दिल में नहीं कदर मेरे जज्बात की थी, जिनकी जबान लड़खड़ाती थी आते ही सामने मेरे, आज बदलते वक्त के साथ उनके तेवर बदल गए, उन जबानों से निकले आग से झुलसा है मेरा तनबदन, मेरे खामोश भरोसे का सरेआम कत्ल कर गए, जो कभी साया बनकर साथ थे, आज वो अजनबी से भी बदतर हैं, हर सफाई यहाँ अब एक गुनाह है, और सुनने वाले सब पत्थर हैं, इसलिए, अब मैंने भी बेजरूरत सफाइयां देने की जरूरत नहीं समझता, जो मुझे समझ न सका, उसे समझाने की जहमत नहीं करता, अब मैंने खुद को समेट लिया है, अपनी खामोशी की चादर में, क्योंकि हर रिश्ते की भीख मांगना अब मेरी फितरत में नहीं। परिचय :-  राजेन...
अंतिम तुमको मेरी पुकार
कविता

अंतिम तुमको मेरी पुकार

 राम राज सिंह उन्नाव (उत्तर प्रदेश) ******************** नवल विटप जो पीट हो रहा उसके तुम हो प्राण। नयन मेघ से आज करा दो अमिय प्रेम रस पान।। प्रकृति सजाती निज आँगन में नित नूतन उद्यान। मेरे मन मधुवन में गुंजित किन्तु विरह का गान।। आज विदाई की बेला है, द्वार खड़े है मेरे कहार। अंतिम तुमको मेरी पुकार।। प्रतिदिन पथ में पुष्प बिछाता साथ मधुर मुस्कान। औचक ही मै खिल जाता हूँ तुम्हे निकट ही जान।। किन्तु मिलन वह एकाकी बस क्षण भर का अवधान। फिर उसी वेदना के क्रंदन का होता नित्य वितान।। सुखद प्रणय की अभिलाषा में, जीवन रण न मै जाऊ हार। अंतिम तुमको मेरी पुकार।। मन में है छवि बसी तुम्हारी और तुम्हारा ध्यान। कभी तो होगा दुःख रजनी का मंगल एक विहान।। स्वाति बूँद बिनु सीप सम अधर–कमल, मुख म्लान। आकर जीवन सुधा पिला दो बन वियोग वरदान।। प्राण हमारे पास तुम्हारे...
शान्त विरह
कविता

शान्त विरह

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** विरह वेदना शीतल समान, सूर्य तपे तप्त मृगतृष्णा। दुख में सुख की छाया पाई, ज्यों दावानल में शीकर वृष्णा॥ तव स्मृति चंदन चर्चित सी, हृदय तप्त पर लेप समान। विरह हिमगिरि शिखर सा ऊँचा, श्वास पवन बन बहत शीतलान। प्रेम अग्नि दहन करे मन को, विरह बादल बरसे जलधार। जलकर भी न भस्म हुआ मन, कमल सा खिला प्रेम अपार॥ तव अधरामृत सुधा सरीखा, पिपासित स्मृति पान करे। वियोग रात्रि चाँदनी भरी, तारक सम तव नयन चमके॥ दूर तुम पर निकट तुम्हारी, छाया साथ चलती मानो। विरह वेदना शीतल करे, ज्यों सिन्धु लहर तट छू जानो॥ विरह सरिता जल शीतल बहै, प्रेम कमल खिलावत तीर। स्मृति मञ्जरी गुनगुन भौंरे, भाव भ्रमर मधु पीवत नीर। तप्त दिवस में विरह वटवृक्ष, शान्ति छाया देता सघन। वियोग दुख नहीं, प्रेम सिंचन, ज्यों वर्षा करे धरा तरन॥ ...
शौक है तन्हाइयों का
ग़ज़ल

शौक है तन्हाइयों का

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** शौक है तन्हाइयों का। क्या करें शहनाइयों का। दूरियों के इस सफ़र में, साथ है परछाइयों का। इन परिंदों को भी थोड़ा, ख़ौफ है ऊंचाइयों का। नीतियाँ थोथी पड़ी हैं, ढोंग है अच्छाइयों का। बेहयाई दौर में अब, डर नहीं रुसवाइयों का। झूठ हैं अंज़ाम सारे, नाम है सच्चाइयों का। छोड़ भोलापन पुराना, दौर है चतुराइयों का। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास : अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति : शिक्षक प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान : साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में...
बारिश की नन्ही बूंदें
कविता

बारिश की नन्ही बूंदें

शिव चौहान शिव रतलाम (मध्यप्रदेश) ******************** बारिश की नन्ही बूंदें गिरतीं उछलती मेरे घर-आंगन में मेरी बिटिया के नन्हे क़दम-सी गर्मी से राहत देती ठंडी-सी लहर रूह में उतरती पेड़ों संग झुमती हवा खिड़कियों के कान बजाती रोशनी से टकराते कीट-पतंगे बिजली की दैत्य गड़गड़ाहट शाम को आशियाने ढूंढते पंछी पहली बारिश में भींगने को करता है, मन। परिचय :-  शिव चौहान शिव (रेल मैनेजर) निवासी : रतलाम (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak1...
की बोर्ड
कविता

की बोर्ड

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** "जिंदगी एक कीबोर्ड है, सुर में इसे सजाना होगा, हर अक्षर को संयम देकर जीवन गीत बनाना होगा। जब उँगलियाँ मर्यादा से हर बटन को छू जाती हैं, तब सपनों की मधुर धुनें मन में दीप जलाती हैं। व्यवस्थित जीवन की ताल ही सुंदर राग बनाती है, अनुशासन की हर सरगम मंज़िल तक पहुँचाती है। यदि तारों से छेड़छाड़ हो, स्वर सारे बिखर जाते हैं, अहंकार और अव्यवस्था से रिश्ते भी टूट जाते हैं। कीबोर्ड जैसा संतुलन यदि जीवन में आ जाए, हर दिन भजन-सा पावन बन खुशियों का दीप जलाए। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शु...
मन का सुकून
कविता

मन का सुकून

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन तो दौड़ रहा था, जन्म से ही चहुं ओर कुछ रो रोकर खोज रहा था। कहां हूं मैं, कौन हूं, कैसे अपनी पहचान करुं। अलग-अलग हाथों जाकर, अस्तित्व को लेकर सोच रहा था। जब सभी हाथों से यात्रा कर, मां की गोद में आया। बड़े निश्छल और वात्सल्य भाव से, मां ने हृदय‌ से लगाया। सबने देखा तो समझ आया, सारी चंचलता गौण हो गई। रोने वाली आवाज सहसा, गहरी मुस्कान के साथ नींद में खो गई। सुकून का अर्थ है विश्वास, अब उस अबोध मन को, विश्वास हो गया। यही मेरी सुरक्षित थाती है। संसार क्षण-भंगुर है, पर मां की गोद और प्रेम अद्भुत सुकून दे जाती है। संसार में रहते हुए और, संसार से जाने के बाद भी, सुख-समृद्धि और आरोग्य का, आशीर्वाद लुटाती है। हर वस्तु पैसे से खरीदी जा सकती है। अहंकार को भौतिकता बढ़ाती है, मां तो बिना ...
नारी
कविता

नारी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** नारी का तो रूप निराला, कभी शान्त कभी आग सी ज्वाला। कभी सौम्य ममता की मूरत, कभी प्रेम की सूरत दिखती, कभी अकडपन कभी, लडकपन, कभी रूठना, कभी है हँसना, कभी पल-पल में रोना देखा। कभी मोम सी कोमल रहती, कभी भयंकर क्रोध मे देखी, एक आँख मै आँसु उसके एक आँख मै खुशी है देखी। माता का तो दिल है उजला दूध की नदियाँ आँचल मै बहती, माँ के आँचल में ब्रह्मांड समाया, तभी तो कान्हा सा लाल है जाया, तभी तो राम रूप कौशल्या के घर आया। कभी सूर्य सा तेज है देखा, कभी चन्द्रमा सी शीतलता देखी, कभी गगन सा ह्रदय विशाल, कभी ऊँचाई मन पर्वत सा अपार कभी छूता शिखर आकाश। नारी तू नारायणी, तू ही दुर्गा, तुही काली, तू ही राधा सी सौम्यता (सुन्दर) की खान। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवा...
यादें
कविता

यादें

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अतीत की यादें मन को झकझोरती है क्या करूँ इस मन को कैसे समझाऊं इसे। उडता है पंख लगाकर पंछी सा आघात सहता, आघात देता अतीत की खाई मे गोता लगाता। मन उदास होता है तो आँखें सब कुछ कहती है। मन की तरंगो का पीछा करते करते अतीत भुलाऐ नही भुलते आखिर क्यों मन इतना चन्चल है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय ...
पिता
कविता

पिता

सौरभ डोरवाल जयपुर (राजस्थान) ******************** आज फिर वो शख्स याद आया, मेरे साथ मेरा बचपन खेला। मेरी जरुरत पूरी करते-करते, बड़ी कठिनाइयों को झेला।। सर्द, गर्म बारिश झेली, दिन रात कर दिए एक। मन में इच्छा यही बसी थी, मेरा बेटा बन जाए नेक।। दुःख देखा, सुख देखा, समय नही था उनको खुद के अरमान के लिए। सब कुछ किया, सब कुछ सह कर किया, सिर्फ मेरी मुस्कान के लिए।। गया जिस दिन वो शक्स, मेरा सारा सुरूर चला गया। मेरे पिता के साथ ही, मेरा सारा गुरुर चला गया।। पिता ने परिवार संभाला, संभाली घर की सारी जिम्मेदारी। घर को घर बनाया, सुविधाएँ करी, पर उन सबमे नही थी उनकी हिस्सेदारी।। देखा है संघर्ष पिता का मैंने, उन्ही के पदचिन्हों पर चल रहा हूँ। लोग ना जाने क्या समझते है, मैं तो आज भी उन्ही की मेहनत से पल रहा हूँ।। परिचय : सौरभ डोरवाल निवासी : भोजपुरा, जिला- जयपुर (रा...
चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा
व्यंग्य

चार लोग कुछ नहीं कहेंगे तो क्या होगा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चार लोगों की चिंता इस दुनियादारी में सभी को है। सभी एक-दूसरे को बस यही नसीहत देने में लगे रहते हैं, "देखो, ऐसा मत करो। अगर ऐसा किया तो चार लोग क्या कहेंगे, पता है? चार लोग देख लेंगे तो... अरे, चार लोगों का तो ख्याल करो!" लेकिन सोशल मीडिया ही एक ऐसी जगह है, जहाँ इसके उलट, इन चार लोगों का इंतजार किया जाता है। सोशल मीडिया में वही चार लोग अचानक देवता बन जाते हैं। हसरत भरी निगाह से बस चार लोग आ जाएँ मेरी पोस्ट पर... कुछ कह जाएँ, और कुछ नहीं तो कम से कम लाइक का बटन ही दबा जाएँ। वरना पोस्ट की आत्मा अधर में लटक जायेगी मित्र । पोस्ट डालते ही मन की स्थिति किसी मछुआरे जैसी हो जाती है। काँटा पानी में फेंका और आँखें लहरों पर टिकीं हुई, कब कोई कमेंट रूपी मछली फँसे। मोबाइल स्क्रीन उस तालाब का पानी है,...
नशा (सकारात्मक दृष्टिकोण)
कविता

नशा (सकारात्मक दृष्टिकोण)

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** विज्ञान का मानना है कि किसी वस्तु के सेवन से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं प्रभावित होती हैं और व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तित हो जाता है। किंतु, यह आवश्यक नहीं है कि केवल मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली वस्तुएं ही 'नशा' हैं। यदि नशे को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह कला और भावना के प्रति गहरी दीवानगी को दर्शाता है। न करते औषधियों से प्रेम धन्वंतरि, तो आयुर्वेद का सटीक प्रमाण कहाँ से मिल पाता? न होती ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की लगन राजा हरिश्चंद्र में, तो सामाजिक नैतिकता की स्थापना कहाँ से हो पाती? न होती ज्ञान और संगीत की तल्लीनता देवर्षि नारद में, तो वेदों का प्रचार-प्रसार कहाँ से हो पाता? न होती भक्ति-भावना की पराकाष्ठा भक्त प्रह्लाद में, तो ईश्वरीय आस्था की सिद्धि कहाँ से हो पाती? न होता निःस्वार्थ भाव महर्षि दधीचि मे...
भीगी-भीगी धरती पर
कविता

भीगी-भीगी धरती पर

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** भीगी-भीगी धरती पर, पैरों के निशान बनाते हैं। बारिश की बूंदों संग, बचपन याद करते हैं। मन को भिगो कर गुन गुनाते हैं। जमीन के आँचल में जब बादल उतरे। सारे घाव धरा के भर जाते। मिट्टी की सोंधी खुशबू, साँसों में उतर जाती। मोती सी बूंदें गिरें, बदरा भी ढोल बजाये। झरते झरने मन को कितना रिझाये। नव-श्रंगार कर धरा ने उपवन सजाया। लताओं ने उमंगों का झूला लहराया। उमड़ घुमड़ बरसे बादल, बारिश की घटाएं। झूमते पेड़ों की डालें भी झुक-झुक जायें। भीगी-भीगी धरती पर हरियाली की चादर से, धरा को घूंघट उड़ायें। यह बारिश की घटाएं, देखे मेरा मयूर मन। बादलों की स्याही से कलम भिगोता। मेरा हर भाव नया सृजन हो जाता। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक...
जंतर-मंतर हार गया
गीत

जंतर-मंतर हार गया

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** लोकतंत्र के अंग-अंग से, छिन आखिर शृंगार गया। कपटी पासों के आगे फिर, जंतर मंतर हार गया।। नैतिकता का अंश न बाकी, चुनें हुए मुस्टंडों में। सिसक रहा है लोकतंत्र अब, हिटलर के हथकंडों में। मात्र कुतर्को के दम पर जो, इतना वक्त बिसार गया।। कटी गर्दनें प्रश्नों की फिर, लटक गई मीनारों पर। पहनाएँ हैं नये मुखौटे, धूल सने किरदारों पर।। अहंकार के नये शिखर पर, चढ़ने फिर सरदार गया।। भाँग धर्म की पीकर सारे, मूर्दें ही मदहोश मिले। अंधी श्रद्धा ने जुबान के, जाने क्योंकर होंठ सिले।। वर्तमान है बैसाखी पर, तन पर लकवा मार गया।। दौड़ रहा ढर्रे पर जीवन, जाने कितने बोझ लिए। मन ही मन लड़ने के उसने, शायद नुस्खे खोज लिए।। समझ तर्जनी की ताकत वह, सारा बोझ उतार गया।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र...
अपूर्व प्रेम
कविता

अपूर्व प्रेम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** रोज झुक जाता हूं मैं शिव के आगे मांग लेता हूं हर दुआ में तुम को। ना मांग पाऊं अगर कभी तुमको तो मांग लेता हूं हर खुशी तेरी। वजह ढूंढता हूं कुछ और लिखने की हर अल्फाज में मगर तुम नजर आ जाते हो। तेरे चेहरे की मासूम मुस्कुराहट को देखकर शिव सी समाधि मेरे हृदय तल को लग जाती है। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, ल...
नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।
आलेख

नारे नहीं, राष्ट्र चाहिए : नीट विवाद और व्यवस्था परिवर्तन का समय।

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** किसी भी राष्ट्र का भविष्य संसदों में जितना तय होता है, उससे कहीं अधिक उन परीक्षा-कक्षों में निर्धारित होता है, जहाँ करोड़ों युवा अपने श्रम, संयम और स्वप्नों के साथ बैठते हैं। वहाँ केवल प्रश्नपत्र नहीं खुलते, वहाँ भविष्य के चिकित्सक, वैज्ञानिक, शिक्षक और राष्ट्रनिर्माता आकार लेते हैं। इसलिए जब किसी राष्ट्रीय परीक्षा की पवित्रता पर प्रश्न उठता है, तब आहत केवल एक परीक्षा नहीं होती, घायल राष्ट्र का विश्वास होता है। भारत की संस्कृति ने ज्ञान को कभी व्यापार नहीं माना। हमारे यहाँ विद्या को "सरस्वती" कहा गया, क्योंकि वह केवल जीविका का साधन नहीं, जीवन का संस्कार है। नालंदा और तक्षशिला की परंपरा से लेकर आधुनिक भारत की प्रतियोगी परीक्षाओं तक एक सूत्र निरंतर दिखाई देता है प्रतिभा का सम्मान। यदि यह सूत्र टूटता है, तो केवल व्य...
श्री जगदम्बा ताण्डव स्तुति
स्तुति

श्री जगदम्बा ताण्डव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** जयति जयति जगदम्ब भवानी, आदि शक्ति परमेश्वरी कल्याणी। दनुजदलन-दुष्टदमन-कारिणि, जय जय जननि जगत्तारिणि॥ रणमुण्डमाल-विगलद्रुधिरप्रवाह- प्रचण्डचण्डहास-भयङ्करप्रभा। डमड्डमड्डमड्डमड्डमन्निनादित- प्रचण्डताण्डवप्रिया नमोऽस्तु ते शिवा॥ करालवक्त्र-दीप्तदंष्ट्र-कालकाल- कपालमालभूषिते महेश्वरि। त्रिशूलखड्गचक्रशक्तिधारिणि, प्रसीद देवि विश्वमङ्गलेश्वरि॥ प्रभिन्नशुम्भनिशुम्भदैत्यदर्पहा, प्रमथ्यमानरक्तबीजविग्रहा। महिषासुरप्राणहारिणि प्रभो, नमामि सिंहवाहिनीं परां शिवाम्॥ भुजङ्गहारकुण्डलोल्लसत्कच- प्रभञ्जनप्रचालिताम्बरोज्ज्वला। जटाजूटसंभ्रमोन्मथन्महीतलं, नृत्यन्ति यस्याः पदपल्लवा दिशः॥ प्रदीप्तकोटिसूर्यचन्द्रतेजसा, प्रभासिताखिलाण्डकोटिमण्डला। त्रिलोचनप्रियार्धदेहधारिणी, परा परात्परा परेश्वरी शिवा॥ कृपाकटाक्षवृष्...