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सतरंगी दुनिया- ३३
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  *हमारे समाज को सब पता है कि कौन किसके साथ घूम रहा है, किसकी बहू, बेटी कहाँ जा रही है, और किसके बेटे का कहाँ लफड़ा है ? लेकिन किसके घर आज खाना नहीं बना, ये समाज को नहीं पता और न ही जानना चाहते हैं।* शेर को पकड़ने के ३ तरीके हैं। (१) न्यूटन का तरीका- शेर को अपने पास आने दो जैसे ही हमारे पास आ जाए, उसे पकड़ लो। (२) आइंस्टाइन का तरीका-शेर का तब तक पीछा करो, जब तक कि वह थक न जाए, जैसे ही वह थक जाए, उसे पकड़ लो और अंतिम तरीका पुलिस का-खरगोश को पकड़ो और उसे तब तक पीटते रहो; जब तक कि वह स्वीकार न कर ले कि वही शेर है। कलियुग चल रहा है गलत को गलत ही रहने दो। अगर गलत को गलत साबित करने जाओगे तो खुद ही गलत साबित कर दिए जाओगे। सुबह पत्नी चाय-नाश्ता पूछने आई तो मैंने कहा-बना दो। फिर रुक कर पूछने लगी- ये मोदी जी १ दिन में तीन देश कैस...
मेरा-मेरा क्यों करता है
भजन

मेरा-मेरा क्यों करता है

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मेरा-मेरा क्यों करता है, सांस रुकी सब छूट जाएगा। तेरा पैसा, गाड़ी, बंगला, तेरे साथ नहीं जाएगा। मेरा-मेरा क्यों ... संकट में तो निकट पड़ोसी, ही पहला सहयोगी होगा। यदि उससे संबंध मधुर है, तो वो तुझको संबल देगा। सबमें ईश्वर का दर्शन कर, तो ईश्वर खुश हो जाएगा। मेरा-मेरा क्यों ... सारी सृष्टि प्रभु की रचना, उसमें ही परिवार है तेरा। दृष्टिकोण व्यापक रख, मत कह केवल ये परिवार है मेरा। यदि संकीर्ण भाव तज पाया, तो ईश्वर को भा जाएगा। मेरा-मेरा क्यों ... रुपया पैसा बहुत कमाया, कुछ सात्विक धन भी तू कमां ले। करुणासागर लुटा रहा है, तू भी निज झोली फैला दे। भौतिक माया यहीं छूटनी, सात्विक धन ही साथ जाएगा। मेरा-मेरा क्यों ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणि...
सब चेहरों में उलझे हैं
कविता

सब चेहरों में उलझे हैं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब चेहरों में उलझे हैं, चरित्र गढ़ने के लिए क्षण पास नहीं. दर्पण हर घर में है, किंतु आत्मदर्शन के लिए अवकाश नहीं. शब्दों का श्रृंगार बहुत है, पर अंत‌स में सत्य का वास नहीं. ऊँची-ऊँची बातें चहुँओर, आचरण में उनका प्रकाश नहीं. शपथों की शैल-शृंखला, पर कर्मों का हिमालय नहीं. शोर बहुत है आँगन-आँगन, पर मन में शिवालय नहीं. भीड़ में यशोलिप्सा है, पर स्व से मिलन का प्रयास नहीं. जन-जन जग जीतने निकला, अंतर्मन पर विश्वास नहीं. संबंधों की गर्माहट खोई, अपनत्व का कोई आभास नहीं. मुस्कानों का व्यापार बहुत है, पर उर में प्रेम का वास नहीं. धन-दौलत की चकाचौंध में, मूल्यों का कोई सम्मान नहीं. जीवन की भाग-दौड़ में, जन की जन से अब पहचान नहीं. आओ पहले स्वयं को गढ़ लें, इससे बड़ा कोई विकास नहीं. ...
नेता जी के टारच
आंचलिक बोली, कविता

नेता जी के टारच

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) नेताजी अड़ गे, कहिथे हमर सरकार आय ले प्रदेश हर किलोमीटर भर आघु बढ़ गे, मय अकचका गंय, त फेर हमन काबर अपन जगेच म हवन, खिसकीच नहीं काबर हमर कुंदरा वाला भवन, कथे तैं नइ समझे जोजवा, तोर आंखी हेवय नवा खोजवा, हमर सरकार हर घर-घर गइच हवय, जेला जउन चीज के जरूरत रहिच वो हर चीज ल बांटिच हवय, फेर मय कहेंव तुंहर किलोमीटर भर वाला टारच कति कति बारे हवा, कति के अंधियार ल संघारे हवा? भाषण के उजियार ह नेताजी, सिरिफ पोस्टर म चकाचक दिखथे, हमर गाँव के नरवा-गरवा म, आज घलो अंधियारी रेंगथे, तुंहर बिकास ल कोन गरुवा हुदेनथे, कका,भतीजा,नोनी,बाबू, जम्मो झन अइसने बेहाल हवन, तुंहर आघु बढ़े के गोठ सुनके, हमन अपन जगे म थिरक आय हवन, बतावा त अइसन बिकास कति पाय हवन? परिचय :-  राजे...
हे! जगन्नाथ जी
मुक्तक

हे! जगन्नाथ जी

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** हे! जगन्नाथ जी सब पे कृपा करो। मांगलिक शुभ पलों को सदा ही झरो। जो भी अवगुण लिए है, मनुज अब यहाँ, उनको इस जग के स्वामी, अभी ही हरो।। हैं उड़ीसा में स्वामी जगन्नाथ जी। जिनकी रथयात्रा धर्म के साथ जी। संग में हैं बहन और बड़े भ्रातृ भी, तीनों करुणा जगतहित लिए हाथ जी।। कितनी पावन घड़ी पल्लवित हो रही। रथ की शुभयात्रा, चेतना वो रही। जो मलिनता जगत में हुई व्याप्त है, उसको देवों की महिमा सदा धो रही।। पाप कटने लगा, श्राप हटने लगा। धर्म बढ़ने लगा, सत्य पलने लगा। आज रथयात्रा का हुआ योग है, इस धरा पर परमताप खिलने लगा।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास...
मातृभूमि को नमन हमारा
भजन

मातृभूमि को नमन हमारा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भारत मां से पंचतत्व ले, ईश्वर ने है हमें बनाया। इसीलिए भारत माता है, सब संतों ने यही बताया। भारत मां ... मां की सेवा रक्षा करना, सर्वोपरि कर्तव्य हमारा। भारत भूमि ने ही अबतक, सात्विक पोषण किया हमारा। जो दायित्व दिया ईश्वर ने, उसने ही है पूर्ण कराया। भारत मां ... जो अर्पित सीमा रक्षा को, उनको प्रतिपल नमन हमारा। उनको भी नमन कि जिन्होंने, राष्ट्र पे अपना सबकुछ वारा। जो विकास का लक्ष्य ले चले, अखिल विश्व में मान बढ़ाया। भारत मां ... जो भी जहां दे रहा सेवा, सर्वोतम का लक्ष्य बना ले। सबकुछ दिया मातृभूमि ने, निष्ठा से वो कर्ज चुका ले। जो निष्काम लगा सेवा में, उसने सबका प्यार है पाया। भारत मां ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेर...
पशुपतिनाथ
कविता

पशुपतिनाथ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अद्भुत सौंदर्य उतरा था धरा पर एक रात हमने देखा, जहाँ मौन था किंतु शब्द बोल रहे थे, प्रकृति की सुन्दरता भिन्न-भिन्न रूप रंग में अपनी छटा बिखेर रही थी , तारे भी इस मनमोहक छवि को निहार रहे थे, शांत निस्सीम क्लांत रात गौशाला की रात थी !! तभी एक शब्द कानो में पड़ा गौ माता पुकार रही थीं, कह रही थीं सो जाओ बहुत रात हो चुकी है , उनकी आवाज सुन बत्तखों ने गान शुरू कर दिया , बाकी पक्षी भी सुर ताल में गीत गुनगुनाने लगे ! कुछ जीव सूकून की नींद सो रहे थे कुछ विचरण कर रहे थे, मंद-मंद मलय उनको सहला रही थी ! अचानक सूकून की तंत्रा भंग हुई, कोई जीव करूण गुहार लगा रहा था, वो दर्द में था उसके साथ बहुत से जीव जो असहाय थे नेत्रहीन थे, जो हड्डी हड्डी हो चुके थे वो भी जाग रहे थे ! उनकी तकलीफें...
मानसून का सरकारी आवंटन
व्यंग्य

मानसून का सरकारी आवंटन

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “सोचिए, अगर ऊपरवाले ने मानसून का ज़िम्मा नीचेवाले सरकारी तंत्र को सौंप दिया होता तो...?” सरकारी तंत्र! बाप रे बाप... यह व्यवस्था नहीं, कोई चमत्कारी प्रयोगशाला लगती। बारिश की बूँदें नहीं, नोटशीटें टपक रही होतीं-एक दफ़्तर से दूसरे दफ़्तर तक! मानसून सीधे कैसे आ जाता? पहले फ़ाइलों की मार्किंग होती, फिर रीमार्किंग। अतिरिक्त टिप्पणियाँ लगतीं, और फ़ाइलों की ड़दौड़ शुरू हो जाती- तहसील से पटवारी, पटवारी से एस.डी.एम., एस.डी.एम. से कलेक्टर और कलेक्टर से लेकर चायवाले तक सभी से सुझाव लिए जाते। जनमत सर्वेक्षण कराए जाते।फिर नेता लोग यह तय करते कि किस क्षेत्र में उन्हें कितने वोट मिले हैं- उसी अनुपात में वहाँ मानसून आवंटित होता। टेंडर भरे जाते, सिफ़ारिशी पत्र लगाए जाते, उन पर वजन डाला जाता। फिर जाकर म...
जपें राम या श्याम
भजन

जपें राम या श्याम

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** होती है भक्ति, होती है पूजा, आते वहीं श्रीराम। होती है पीड़ा,होती है करुणा, आते वहीं श्याम। होती ... शक्ति का दुरुपयोग ना होता, होते नहीं नराधम। युग युग में अवतार लेकर, आते ना धरा पर राम। होती ... सक्षम होकर अन्याय देखते, लगाते नहीं लगाम। चुप रहने पर देखना पड़ता हैं इसका दुष्परिणाम। होती ... अधर्मियों से ही होता है, पाप कर्मों का आयाम। मानवता की राह दिखाने, इस धरती पे आते राम। होती ... जीवन जीना कला है चाहे, शांति हो या संग्राम। कर्म सबके उत्तरदायी, इस धरा पर ही परिणाम। होती ... मानव तन का इस श्रृष्टि मे, सब से उच्च मुकाम। राजा हो या फिर रंक सभी के, पालक है श्री राम। होती ... एक ही माया,एक ही है काया, सुंदर दोनों नाम। चाहे पुकारें राधा कृष्ण, चाहे पुकारों सीताराम। होती ... परिचय :- ...
सच कहना है अब बुरा
दोहा

सच कहना है अब बुरा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) सच कहना है अब बुरा, कहे यहाॅं सच कौन। सच के दुश्मन हैं सभी, अच्छा है जो मौन।। भूल गया है मौत को, लालच से मजबूर। तन्हा जाना क़ब्र में, फिर भी करे ग़ुरुर।। मेरी क्या पहचान है, ढूॅंड रहा मैं कौन। दिखता जो वो मैं नहीं, अंदर कुछ है मौन।। फ़ितरत है इंसान की, सबके अलग विचार। कुछ तो सच को सच कहें, कुछ करते इनकार जीते जी का साथ है, मरने पर है भार। चले सभी इस पार तक, चले नहीं उस पार।। साक़ी ऐसी मत पीला, चढ़कर उतरे यार। एक बार ऐसी पिला, भव-सागर हो पार।। कुछ दिन का बस खेल है, मौत हॅंसे इक ओर। बचना मुश्किल मौत से, लाख लगा ले जोर।। कीड़े खाऍं क़ब्र में, जब तक रहे शरीर। सोच वहाॅं तकलीफ़ में, कैसी होगी पीर।। जिसके दिल में प्यार है, सही वही इंसान। पत्थर दिल कुछ नफ़रती, घूम र...
सतरंगी दुनिया- ३२
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- ३२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *गिरगिट ने आत्महत्या कर ली और सुसाईड नोट में लिखा-इंसान से ज्यादा मैं रंग नहीं बदल सकता।* हमें हमेशा अपने लिए अच्छा सोचना चाहिए, क्योंकि गलत सोचने के लिए तो दुनिया बैठी है। *कभी भी अफवाहों पर ध्यान मत दीजिए, क्योंकि अफवाह जलने वाले पकाते हैं, इसे मूर्ख परोसते हैं और बेवकूफ उसे खाते हैं।* 'सब्र का फल मीठा होता है', इसी कहावत के चक्कर में मेरे २ सब्र के फलों की शादी हो गई और कल एक और की सगाई होने वाली है। *जमाने का सच देखिए- "अफवाहें बिना पैर के दौड़ती है और सच लंगड़ाकर चलता है।* अगर आपको उपवास करने का शौक है तो विचारों का करें, अगर भूखे रहने से भगवान खुश होते तो गरीब सबसे सुखी होते। *आजकल रोटी गैस पर बनती है, इसलिए खाने के बाद पेट में गैस बनती है।* आजकल रिश्तेदार भी बदल गए हैं, बचपन में जब वो हमारे घर आते थे तो पैसे द...
लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है
कविता

लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन कोई आसान सफर नहीं, काँटों पर चलकर मंजिलों को छूना पड़ता है। गिरते हैं, संभलते हैं, फिर बढ़कर, मेहनत से तकदीर बनती है। उम्मीद का दिया कभी बिना बुझे, अँधेरे में भी रौशनी बनकर, खुद चमकना पड़ता है। समय कभी साथ दे, कभी परीक्षा ले, किस्मत साथ ना दे। शिद्दत से जो जुड़कर, कभी न हारा, हर लम्हा एक लड़ाई है, हर साँस एक कहानी है। जो समय चुराकर मेहनत कर ले, उसी के नाम तारीखें और जवानी है। मंजिल पूछती है मेहनत का हिसाब, और सपने माँगते हैं वक्त की कुर्बानी। जो आज पसीना बहा दे मेहनत में, कल दुनिया उसी की जुबानी को गले लगाता है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचन...
यमराज का ग़ुस्सा
कविता

यमराज का ग़ुस्सा

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** पहली वारिश और ये हाल हर ओर सुनाई पड़ रहा त्राहि माम बेचारा यमराज है परेशान लोग उसे बेवजह कर रहे बदनाम। सुनकर उसे भी गुस्सा आया जोर से भन्नाया-इज्जत का फालूदा बनाया। कहने लगा- ये सब विकास की माया है कमीशन जमकर खाया गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई नदी, नाले, तालाबों पर अतिक्रमण अनियोजित शहरीकरण, गाँवों से पलायन आधुनिकता की आँधी और नित नव सुविधाओं का लोभ बढ़ता प्रदूषण, बिगड़ता मौसम चक्र ऊपर से स्वार्थ, लोभ की विकृति मानसिकता मरती संवेदनाएं, जहरीली होती भाव-भंगिमाएं यही है आज का मानव समाज। बदले में रोता है, खूब खोता है, जो बोता है, वही तो काटता है फिर भी जमकर अफसोस करता और घड़ियाली आँसू बहाता है, मगर खुद को बदलने का विचार भूलकर भी मन में नहीं लाता है, बस! दोष पर दोष सिर्फ औरों को ...
भीड़ का आदमी
कविता

भीड़ का आदमी

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** सबके साथ चलता हुआ आदमी धीरे-धीरे अपने साथ चलना भूल गया। वह हर बात पर सहमति में सिर हिलाता रहा, यह जाने बिना कि एक दिन उसका अपना सिर उसकी अपनी बात के लिए बचा ही नहीं। अब वह भीड़ में है, सुरक्षित भी, स्वीकार भी। बस, आदमी नहीं रहा। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा, पर्याव...
मन की मुराद
कविता

मन की मुराद

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार...
मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की
भजन

मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की, मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी। प्रेम को रंग, प्रीत की पाती, भक्ति गुलाल लगाओ नर नारी। हो... मै तो मन मंदिर को सजाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। ज्ञान शलाका अंजन भर-भर, डाल रहे गुरु, मिटा तिमिर सब। हो... मैं तो ज्ञान के दीप जलाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। काम, क्रोध, मद, लोभ लुटेरे, ये विवेक मानव का हर ले। हो... मै तो ज्ञान के तीर चलाऊंगी।। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। गुरु ही जग में "आशा" बंधावै, आत्मानंद का बोध करावै। हो... मैं तो "गुरु चरण कमल बलि जाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की, मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। आली श्री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। परि...
आज और कल
कविता

आज और कल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चौपालों की दशा आज और कल का चौपाल बडा सा बरगद का पेड़ पेड़ के चारों ओर बना बडा सा चबुतरा प्रतिदिन आबाद रहता था। प्रातः काल में बचपन खेलें दोपहरी में महतारी बतियातीं सन्ध्या लगतीं बैठक वृद्धों की। खूब खेल होते बरगद के फूल और पत्तों से। बनती रोटियां बरगद की छाया में ले हाथ में रोटी का टुकडा थामे हाथ मां का आंचल चबाता हैं रोटी का टुकडा। चौपाल पर चढकर गोल-गोल चक्कर काटता है लाला पर, अब हां पर अब न चौपाल हैं न बरगद का पेड न पिपल की पिपरी न नीम की ठंडी छाया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचन...
मंजिल की तलाश
मुक्तक

मंजिल की तलाश

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मंज़िलों की तरफ, बढ़ना है अब हमें। मुश्किलों से बहुत, लड़ना है अब हमें। कैसी भी हो परेशानी, कठिनाई अब, अपनी ज़िद पर शरद अड़ना है अब हमें।। मंज़िलों की तरफ कूच करना ही है। हर सफलता को अब नित्य वरना ही है। हौसला सँग में होगा, तो हारूँ नहीं, बनके जलधार हमको तो बहना ही है।। आयें व्यवधान तो भी अडिग मैं रहूँ। हर मुसीबत को मैं शौर्य से नित सहूँ। नित्य चेहरे पे मुस्कानें खेलें सदा, ले पराक्रम, सुसाहस, मैं मज़िल गहूँ।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फ...
जरा आगे बढ़कर तो देखो
कविता

जरा आगे बढ़कर तो देखो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परंपराओं से आगे ज़रा बढ़कर तो देखो, पुरातन झंझावातों से थोड़ा उबरकर तो देखो। बदल दो उस व्यवस्था को, जो रोकती हो आगे बढ़ जाने से, समय के साथ कदमताल मिलाने से। हर व्यवस्था समय के साथ बदलती है, हर युग अपनी नई मान्यताएँ गढ़ती है। यदि जकड़े रहोगे बीते हुए विचारों में, तो जड़ता किसी की भी चेतना को ही कुतरती है। पगडंडियों और बैलगाड़ियों से निकलकर, हम रेल और हवाई सफ़र तक आ गए। जिन्होंने समय की चाल पहचानी, वे दुनिया भर में अपनी पहचान बना गए। जब उड़ने को नए पंख निकल आते हैं, घिसी-पिटी राहें फिर कहाँ सुहाते हैं। जब व्यवस्था किसी योग्य को ठुकरा देती है, तभी एक नया विचार जन्म लेता है, और संभावनाओं का नया आकाश देता है। न्यूटन, डार्विन, आइंस्टीन आज भी इसलिए याद हैं, क्योंकि उनके विचा...
मरने की फुर्सत नहीं
व्यंग्य

मरने की फुर्सत नहीं

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** डेस्कटॉप पर वे सारे काम खुले पड़े थे, जिनकी उम्मीद सामान्यतः किसी डॉक्टर से नहीं की जाती- सोशल मीडिया, लेखन, फोटोशॉप, कैनवा और न जाने कितनी रचनात्मक टैबें। तभी श्रीमतीजी का चिर-परिचित ताना कानों में पड़ा- “कंप्यूटर पर आँखें गड़ाए रहते हो, कभी हॉस्पिटल पर भी ध्यान दे लिया करो!” रोज़ ऐसे वाक्य चाय के साथ निगल जाता हूँ, लेकिन उस दिन चाय पहले ही समाप्त हो चुकी थी, इसलिए ताना गले में अटक गया। मैंने निश्चय किया कि आज दुनिया को दिखाऊँगा कि मैं भी एक गंभीर और व्यस्त डॉक्टर हूँ। बाथरूम में चिड़िया-स्नान किया, गीला तौलिया बिस्तर पर छोड़ा, अधोवस्त्र फर्श पर और अलमारी से एक जोड़ी कपड़े निकालते हुए चार जोड़ियाँ नीचे गिरा दीं। डॉक्टर होने में भले कमी रह गई हो, पतिपन के संस्कारों का प्रदर्शन पूरे मनो...
कौन यहाॅं है साथ
छंद, दोहा

कौन यहाॅं है साथ

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) इतना ग़ुरुर मत करो, कौन यहाॅं है साथ। सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।। जीवन तो इक वहम है, कर्मों का है खेल। सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।। कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल। बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।। वैद्य डॉक्टर को यहाॅं, सब कहते भगवान। कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।। हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात। सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।। आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर।। अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।। सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ। उसकी दुकान झूठ की, धन्था है मत रूठ।। फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद। बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद।। राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़। भेद-भाव भी मत करे, सही ...
ऐ बारिश …
कविता

ऐ बारिश …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ऐ बारिशों तुम इंसाँ न बनो यूँ मत करो कि जब ज़मीं की साँसें प्यास से थमने लगें दरिया के दीदे सूख जाएँ पेड़ों की हथेलियाँ दुआ में उठकर बिखर जाएँ तब तुम कहीं समंदर की छतों पर गीत गाती फिरो। और फिर एक रोज़ अचानक इस कदर टूटकर बरसो कि बस्तियाँ डूब जाएँ घरोंदे टूट जाएँ ख़्वाब छूट जाएँ, और इंसाँ तुम्हें इंसाँ होने की दुहाई दें। यह हुनर तो इंसानों का है ज़रूरत के वक़्त साथ न देना और जब ज़रूरत गुज़र जाए तो एहसानों की बारिश लेकर बरसते हुए लौट आना। तुमने देखा तो होगा रिश्तों को सूखी धरती सा तड़पते हुए, तेरी बूंदों सा बिखरते हुए एक हाथ, एक साथ की आस में रिश्तों के आसमाँ को तकते हुए। इंसाँ आए भी तो ऐसे जैसे सैलाब हो लिए सूखे में बारिश का ख़ाब हो लिए साथ कम देते हैं हिसाब ज...
उसूल भूल गए…?
कविता

उसूल भूल गए…?

संजय एम तराणेकर इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** सादगी की राहों पर जो चुपचाप बढ़ गया, ईमान का दीप बनकर अँधेरों से लड़ गया। जिनके महलों में भी "सेवा" का ही शोर है, इस हिसाब में हर सुविधा का कोई छोर है। कुर्सी मिली तो जनता का ही नाम भूल गए, भत्तों की 'फेहरिस्त' में सारे उसूल भूल गए। एक जनाब पैदल चलकर मिसाल लिख रहे, बाकी तो लाल बत्ती में भी सवाल लिख रहे। रिश्वत की धूल से जब 'आईना' धुंधला हुआ, सच का चेहरा देख के हर चेहरा मिला हुआ। यहाँ गांधी के नाम पे भाषण तो रोज़ हो गए, गांधी के रास्ते मगर आज भी कम से हो गए। परिचय :- संजय मुरलीधर तराणेकर एक स्वतंत्र कवि, लेखक व फ़िल्म समीक्षक हैं। आप साधारण परिवार में जन्मे मूलतः मध्य प्रदेश के इन्दौर के निवासी हैं। आपका सन १९९० के दशक से लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी लेखन यात्रा ...
समय
कविता

समय

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समय का कारवां बढता गया मैं पिछे रह गई क्योंकि समय के पंख लगे थे और... और मैं, थी पंख विहिन। समय को साधा नहीं अवसर के सन्धान से काश... समय पंख कटा होता मैं पिछे मुडकर नहीं देखतीं। जग के झंझावातों मैं कब, कैसे समय हाथ से निकल गया मैं समझ नहीं पाई समय के बढ़ते कारवां के इशारों को। मैं समय को झेल न पाई कोई कह भी रहा था मुझे चल दो, कारवां के साथ। पर मैं पकड़ न पाई समय को झुककर प्रणाम करता समय मेरे पास से गुजर गया गुजरते समय के प्रणाम का मैं उत्तर न दे पाई। देखो... हां देखो वह आज मुझे अतीत बन चिढा रहा है और...मै... समय की सीमा पर हाथ मलती रह गई। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रच...
कतरा-कतरा सागर का
कविता

कतरा-कतरा सागर का

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कतरा-कतरा सागर बनता, बूँद-बूँद में शक्ति समाई, छोटे-छोटे शुभ प्रयासों से जीवन ने मंज़िल पाई। हर अनुभव एक मोती बनकर मन की माला में जुड़ जाता, संघर्षों की हर छोटी लहर साहस का दीपक बन जाता। प्रेम, दया, करुणा के कतरे जब मानव-हृदय में खिलते हैं, सूखी धरती जैसे सावन पाकर हरियाली से मिलते हैं। ज्ञान की हर छोटी किरण अज्ञान का तम हर लेती है, सत्कर्मों की हर बूँद मिलकर जीवन-गंगा भर देती है। आओ हम भी कतरा-कतरा मानवता का सागर भर जाएँ, अपने शुभ कर्मों की लहरों से जग में प्रेम-सुगंध फैलाएँ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथ...