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मां तो मां होती है
कविता

मां तो मां होती है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** आंचल के छांव में, ममता के मोह में, मां तो सब सह जाती है। मां तो मां ही होती है।। स्नेह भाव, मम्मत्व से भरी। पुत्र प्रेम में सब भूल सारे कष्ट सहकर भी हंसकर जीती जाती है। बिटिया से करे हंसी ठिठोली, आंखों ही आंखों में सब कुछ समझाती। मां तो मां ही होती है।। पाल पोस कर किया बड़ा अब फिर भी सीने से लगाती है। सपने देखे बहुओं का, दामाद ढूंढे भविष्य के सपने बुने, घर को स्वर्ग बनाती है। घर संभाले, बच्चों की इच्छा पूरी करें, लाड़ लुटाए लड़के पर इतनी इतराती है। मां तो मां होती है।। सब कुछ सह कर भी जीवन नौछावर कर जाती है। ‌मिला न कोई अपना सा, अब तो मां की यादों में रहता हूं, सपनों में जीता हूं, अकेले में ही मां से बातें करता हूं ‌।‌ मां तो मां होती है।। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प...
रोम-रोम आनंदित करदे …
भजन

रोम-रोम आनंदित करदे …

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** रोम-रोम आनंदित करदे, जगत का पालन हारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। प्रेम रस की मूरत है वो, सब से है वो न्यारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। छवि निहारे जब जब, लगता है सब से दुलारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। मोर मुकुट पिताम्बर धारी, मोहन मुरली वाला। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। गिरि धारी वो कुंज बिहारी, नैनों का है तारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। रंग रसिया के रंग मे रमा है, बृज मंडल सारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। युगों मे अवतरित होता है, धर्म का ये रखवाला। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। भक्तों के कष्टों को हर, कर देता है उजियारा। वो श्री कृष्ण है प्य...
लिखता रहूंगा
कविता

लिखता रहूंगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जब से मैंने होश संभाला, मां-बाप ने विद्यालय में डाला, गुरुजनों और साथियों ने साथ निभाया, शब्दों को कैसे गढ़ना है- यह हुनर सिखाया। तभी से लिखता चला जा रहा हूँ, कभी अपनी उलझनें, कभी दिल के फ़साने, कभी प्रेरणा देने वालों से मुलाक़ातों के तराने। कभी प्रेम, कभी पीड़ा, कभी जीवन की टीस, तकनीक की दौड़ में भी ढूंढता रहा अपनी ही किसी चीज़। अपनों के रंग, उनके वार और प्रतिघात, भरोसेमंद हाथों से भी खाई दिल पर चोट की घात। भले ही मैं कवि या लेखक न दिखता हूँ, पर शब्दों के संग निरंतर चलता हूँ। परिवार को मुस्कान देने की कोशिश में लगा, कभी अपने ही खून से भी मिला धोखा जगा। जिसे सबसे अधिक विश्वसनीय माना, उसी से जीवन का सबसे गहरा घाव पाया, तभी तो खुद की पहचान का आईना भी कभी-कभी मुझे मेरी औका...
अतरी की वादियाँ
कविता

अतरी की वादियाँ

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आकर देखिए जरूर यहाँ , मोहक अत्री की वादियाँ। लें खुशबू सोंधी मिट्टी की, अवलोकन करें ये घाटियाँ।। यहीं तपोवन की पुण्यभूमि , गर्म कुंड झरना पहाड़ियाँ। प्रकृति अति सुहानी लगती है , छोटी झुरमुट लताएँ-झाड़ियाँ।। जेठियन घाटी लगे अद्भुत, यहाँ दृश्य मनोरम झाँकियाँ। आकर देखें गहलौर घाटी, दशरथ की जुनूनी कहानियाँ।। शान यहाँ किसानों की है, खेतों की टेढ़ी-मेढ़ी आरियाँ। आकर निहारें अद्भुत छटा को छोटी-बड़ी यहाँ की क्यारियाँ।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
यौवन
कविता

यौवन

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** दिन जवानी के आते जाते रहेंगे। मोहब्बत के गीत हम भी गाते रहेंगे। नाम लेकर खुदा तेरा हम उसे मनाते रहेंगे। अफसाने तो बहुत लिखे हैं हमने हर अफ़साने में तेरे नाम के साथ उसका नाम लिखते रहेंगे। लोग पूछेंगे जब भी दर्द की वजह हम भी सर्द हवाओं के साथ उसका नाम भी हम लिखते रहेंगे। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी...
सतरंगी दुनिया- २१
कविता

सतरंगी दुनिया- २१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** अपनी ज़िंदगी को खुली किताब मत बनाइए, क्योंकि लोगों को पढ़ने में नहीं, बल्कि पन्ने फाड़ने में मजा आता है। *खिचड़ी की विशेषता देखिए- अगर बर्तन में पकती है तो बीमार को ठीक कर देती है और दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है।* अजीब है दुनिया मरने वाले को रोने वाले हजार मिल जाएंगे, मगर जो जिंदा है, उसे समझने वाला एक भी नहीं मिलता है। समय का खेल भी निराला है, भरी जेब ने दु‌निया से पहचान कराई, और खाली जेब ने इंसानों की। जो लोग हमें पसंद नहीं करते हैं, उनके बारे में अजीब बात यह है, कि वे हमारी हर चीज पर नजर रखते हैं। हमारी ज़िन्दगी भी अजीब है, होती तो है हमारी, पर जीना दूसरों के लिए पड़ता है। गर्लफ्रेंड को शराब पीते देख ब्वाय फ्रेंड ने पूछा- तुम लड़की हो के भी शराब पीती हो ? गर्लफ्रेंड ने जवाब दिया, कि क्या २-४ पैग पीने के...
मजदूर
कविता

मजदूर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं। दिन-रात वह मेहनत करता है। चैन सुकून से वह रहता है। पसीने की कमाई वह खाता है। गीत खुशी क वह गाता हैं। मजदूर है, मजबूत है……।। माना साधन उनके पास भरपूर नहीं। औरों स वह मशहूर नहीं। कंधे पर बोझ वह ढोता है। अपनी हालत पर वह नहीं रोता हैं। मजदूर है, मजबूत है….।। परिवार का पोषण करता है। नाम मालिक का रोशन करता है। गम अपना वह छिपाता है। आँसू वह नहीं बहाता है। मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करे...
सब ठीक होने की कीमत
कविता

सब ठीक होने की कीमत

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में हम हर दर्द को सहते चले जाते हैं और समय चुपचाप हमसे सब कुछ छीनता चला जाता है। हम कहते हैं बस थोड़ा और सह लो बस हालात बदल जाएँगे बस सुबह आ ही जाएगी। पर सुबह आती है तो चेहरे बदल चुके होते हैं जिन्हें बचाने की चाह थी वे यादों में बदल चुके होते हैं। हम घाव भरने का इंतज़ार करते हैं और जीवन लहू बहाकर आगे बढ़ जाता है हम भविष्य सँवारते रहते हैं, और वर्तमान दफन होता जाता है। सब कुछ ठीक होने तक सपने थक जाते हैं रिश्ते चुप हो जाते हैं! फिर एक दिन हालात सच में सुधरते हैं पर जश्न मनाने वाला कोई नहीं बचता क्योंकि जो चाहिए था सुख के लिए वह सब संघर्ष में खत्म हो चुका होता है!! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरव...
मैं… कहाँ रह गया मैं…?
कविता

मैं… कहाँ रह गया मैं…?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं... मैं था कभी.. मेरा स्वाभिमान.. मेरा दंभ मगर... अब मै कहाँ रह गया हूँ मैं...... तरंग विहीन उमंग विहीन धड़कते स्पंदनों के घेरे से बाहर नाना रूपी विलग स्वरूपी संवेदनाओं से ऊपर उठ कर स्वप्न सागर में तैरने का अहसास लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? मिचमिचाते तारों भरे नील गगन में मटमैले से प्रकाश में चंदा विहीन तारा पूरित नभ पर शायद अमावस्या है भाव विहीन भावों के गहन समंदर में तिरोहित भाव लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? चलाचल के समागम में हरित वसुंधरा पर ढह गई मानवीय सोच सभ्यता और संस्कृति विरासत के गुण बह गये आडंबरीय सैलाब में भौतिकता की मोह धारा में चमकता मार्तंड जगाता है विश्वास पर कैसे मानूं... फिर भी अस्तित्व है मेरा पर प्रश्न है... क्य...
पाति
कविता

पाति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ओ निरझर बता मैं किसे सुनाऊं तेरी पाति बंधे हुए सलील को उगते हुए रवि को या स्वार्थ भरे मानव को बता तू ही बता क्या धरा का वक्ष फट नही रहा बंधे बांधों के कारण। क्या बंधा जल कोस नहीं रहा अपने आपको तुझे बहता देख तेरी व्यथा पाती से अधिक है धरती का फटना बांधों का बंधना मिट्टी का कटना वृक्षों का कटना। केवल मानव कै लिए धरती फटती हैं सहती हैं जल विहिन हो जब वह मानव को अपने मे समाती हैं तो इसमे धरती का दोष कैसा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों स...
चलो चले भैया हम गांवों की ओर
कविता

चलो चले भैया हम गांवों की ओर

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** पीपल की छैंया और अमुआ की बोर, खटमिट्ठी अमिया ले आमराई से झोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी जाए खेतों की ओर, कुहू कुहू गूंजे जहां कोयल का शोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। सुरभित सुहानी सी लगे जहां नित भोर, शीतल समीर बहती जहां चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। इठलाती बलखाती बहे नदी जिस ओर, ममता की छांव में सोंधी रोटी के कौर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। गूंजे गीता की वाणी गूंजे अजान चहुं ओर, मंदिर में गूंजे है घंटों का शोर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। प्रीति का पराग झलके जहां पोर पोर, संस्कृति के रंग जहां बिखरे चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय ...
सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता

सुभद्रा कुमारी चौहान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** वीरत्व की ज्वाला से दहकती, वाणी में था हुंकार, जन-जन में जागृत करतीं वे, स्वाधीनता का संचार। कलम बनी जब शस्त्र उनका, शब्द बने रणभेरी, रानी की गाथा गाकर, भर दी हिम्मत अनेरी। नारी शक्ति का रूप प्रखर, साहस जिनका आभूषण, अंग्रेजी सत्ता से टकराईं, लेकर स्वाभिमान का वचन। झांसी की वीरांगना का, गाया अमर गान, आज भी गूंजे भारत में, उनका ओजस्वी सम्मान। ऐसी वंदनीय कवयित्री को, शत-शत नमन हमारा, वीर रस की वह अमिट ज्योति, जग में रहे उजियारा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन क...
गुरु गोविंद सिंह जी
कविता

गुरु गोविंद सिंह जी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गुरु ग्रंथ गुरु की वाणी सत मार्ग पर चलाएं, दसवें गुरु गुरु गोविंदसिंह जी नमन हमारा सो सो बार। धर्म देश रक्षा के खातिर किया देह बलिदान, साहस और वीरता से किया मुगलों पर है वार, झुके नहीं वह डटे रहे अपने पथ पर आज, सिख धर्म के कट्टर त्यागी बलिदानी है आप, देश भक्ति की भावना उनके लिए सम्मान, कितने गुरु अवतरित हुए गुरु ग्रंथ का मान, गुरु की वाणी धर्म हमारा पथ पर चले महान। डरे नहीं वह झुके नहीं वह थे योद्धा महान, धर्म में रहना उद्देश्य हमारा चाहे जाए प्राण, धर्म ना बदला नहीं झुकना ऐसे वीर महान । आज उनके चरित्र पर चलना है हमें साथ, नहीं तो राष्ट्र समाज संस्कृति गर्त में जा रही आज। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन ...
नमन उन शहीदों को …
कविता

नमन उन शहीदों को …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भारत आजाद कराने, दीवानों की वो टोली चली थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। न जाने कितने परवानों ने, सीने पर खाई गोली थी, मन में अडिग संकल्प लिए, उन्होंने ही क्रांति जगाई थी। इतिहास के पन्नों में पढ़ लेना, आजादी जिनकी दीवानी थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। माँ भारती की मुक्ति को, वीरों ने हँसकर कुर्बानी दी थी, कोई कैसे कह दे हमको, केवल अहिंसा से आजादी मिली थी? हाँ यह भी पढ़ना, कितनी 'लक्ष्मी' रणचंडी बन लड़ी थीं, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। स्वातंत्र्य-यज्ञ की वेदी पर, कितनी ही माँओं की गोद सूनी थी, न जाने कितनी बहनों ने, अपनी राखी वाली कलाई खोई थी। खदेड़ दिया फिरंगियों को, जमकर धूल चटाई थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। जह...
कैसे बताऊँ …?
संस्मरण

कैसे बताऊँ …?

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ********************  न जाने मुसीबतें स्वयं मुझे ढूंढ लेती हैं या मैं उन्हें बुला लेती हूं. यह घटना १९६५ या १९६६ की है । मैंने १९६५ में लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड किया था. आगे एम .एड. करने की इच्छा थी परंतु लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.एड नहीं करना चाहती थी क्योंकि लखनऊ विश्वविद्यालय से एम्.एड. करने वालों को अधिकतर तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण होते देखा था। इसी ऊहापोह में एडमिशन का समय निकल गया। मैंने अगले वर्ष एम्.एड करने का मन बना लिया था, तभी एक परिचित लड़की मेरे पास आई। उसने बताया कि एक जूनियर हाई स्कूल उसी वर्ष हाई स्कूल कक्षाएं चालू करना चाहता था। परंतु उन्हें ऐसी शिक्षिका नहीं मिल रही थी जो ट्रेंड भी हो और उसके पास बी.ए. में अंग्रेजी विषय भी हो। बता दूं कि वह छोटा नगर अर्थात बदायूं था। उस जमाने में वहां केवल इंटरमीडिएट तक कॉलेज उपलब्ध थे। अतः अच्छ...
रूप चाँदनी भा रही
दोहा

रूप चाँदनी भा रही

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** रूप चाँदनी भा रही, रही आज मन मोह। अंतर्मन में नेह है, हर पल है आरोह।। सन्नाटा छाया हुआ, चुप है हर आवाज़। सुर भी सब मायूस हैं, खामोशी में साज़।। हर दिल को तो भा रही, तेरी मृदु मुस्कान । हर दिल में रहती सदा, इसकी पावन आन।। आँसू लगते नेक हैं, जब हो मन में प्यार। रिश्तों की संजीवनी, अपनेपन का सार।। भटक न जाना बंधुवर, प्रभु दिखलाते राह। रखो सत्य उर में सदा, निकलेगी तब वाह।। अंधकार को मारकर, धारण कर उजियार। तभी बनेगी ज़िन्दगी, फूलों का संसार।। प्रभु को मानो हर समय, तभी बनेगी बात। बन जाएगी ज़िंदगी, सुख की तो बारात।। कभी न करना लोभ तुम, कभी न करना पाप। वरना है यह ज़िन्दगी, केवल तो अभिशाप।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मे...
कृत्य और बर्बादी
कविता

कृत्य और बर्बादी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यौवन कभी तो घटेगा, बिजली संयंत्र का बायलर कभी तो फटेगा, तब नहीं होगा मुझे किसी प्रकार का आश्चर्य, वो दिन भी होगा सामान्य दिन नहीं समझूंगा कोई विशेष तिथि पर्व, क्योंकि आग इस कदर जलाया जा रहा है, हर किसी के द्वारा घी का होम दे आग भड़काया जा रहा है, नहीं मतलब किसी को देश धर्म राग से, सब संतुष्ट है भड़कती हुई आग से, नहीं पड़ना फर्क कहां लगी है आग, हर कोई भड़का रहा अग्नि धवल आग, मतलब नहीं ये आग कब कहां किसे जलायेगा, जहां ए दौर में कैसा मंजर लाएगा, वस्तु स्थिति का सामना करने बैठा है हर कोई तैयार, ग्रस्त है मानसिक रोग से राष्ट्र यार किंचित हृदय स्पंदन नहीं हो रहा है, हर हिय एक बकवास ढो रहा है, जिए जा रहा लेकर मन में इक आस, संपूर्ण लग रहा सबको किसी का बकवास, कुकृत्य कुछ अंधों की आबा...
चिरई
आंचलिक बोली, कविता

चिरई

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिरई चुरगुन के चिंव-चिंव बोली अउ फुँदक-फुँदक के रेंगना हर घाते सुग्घर लागथे। प्राकृतिक सौंदर्य हर चिरई चुरगुन ले हवय। चिरई चुरगुन बिना जंगल झाड़ी अउ महल अटारी ह सुन्ना लागथे। फेर गरमी दिन म नदियाँ नरवा, तरिया, डबरी सबो ह सुखा जाथे त चिरई चुरगुन मन बूँद-बूँद पानी बर तरसत रहि जाथे। कतकोंन चिरई मन तो दाना-पानी बिना अपन परान ल तियाग देथे। ऐसना समय म चिरई चुरगुन के जीव ल बचाय बर उदिम कर सकथन अपन घर के छत छानी मा, बारी बखरी मा अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राख के चिरई चुरगुन के पियास ल बुझा स सकथन। जेकर ले लहकत घाम म उड़त परकी परेवना अउ जम्मों चिरई चुरगुन मन अपन पियास ला बुझा सके। आज कल तो सहर तो बहुत दूरिहा के बात आय गांव म घलोक आघु कस चिरई चुरगुन देखे बर नइ मिलय। दिनों दिन चिरई चु...
लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
आलेख

लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
यादों का घर
कहानी

यादों का घर

देवेन्द्र देव "मिर्जापुरी" बुलंदशहर (उ.प्र.) ******************** शाम ढल चुकी थी। आकाश में धूप का अंतिम रंग जैसे धीरे-धीरे सिमटकर अँधेरे में खो रहा था। घर के आँगन में खड़ा पुराना नीम का पेड़ अब भी वैसे ही खड़ा था, पर उसके नीचे बैठने वाला आज कोई नहीं था। अजय बरामदे में रखी उसी कुर्सी पर बैठा था, जहाँ कभी उसके पिता जी अख़बार पढ़ते हुए उसे जीवन की बहुत-सी छोटी-छोटी सीखें दिया करते थे। आज कुर्सी खाली थी, पर उस पर जैसे अब भी किसी के होने का अहसास बाकी था। हवा का एक झोंका आया और पास रखे अख़बार के पन्ने अपने आप फड़फड़ा उठे। अजय ने चौंककर देखा। “पिताजी…?” उसके होंठों से अनायास निकल पड़ा। कुछ क्षण के लिए उसे लगा जैसे वही परिचित आवाज सुनाई देगी- “अरे, ऐसे चौंकते क्यों हो? बैठो, कुछ बातें करते हैं…” पर वहाँ सिर्फ खामोशी थी। पिता जी को गए हुए कई महीने बीत चुके थे, लेकिन हर शाम...
बैरन कोयल कूके प्रियतम
गीत

बैरन कोयल कूके प्रियतम

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** बैरन कोयल कूके प्रियतम, प्रीति गगरिया छलकाती। कंगन खनकें नथनी डोले, सजनी चलती बलखाती।। अधर गुलाबी कंपन करते, कुंतल लट मुख पर आए। घूँघट पट से झाँके गोरी, छम-छम पायल झनकाए।। अल्हड़ यौवन ललचाता मन, चंचल चितवन शरमाती। प्रेम-वलय उर बगिया पलती, कलियाँ लेतीं अँगड़ाई। कत्थक करती मोहक मणियाँ, झूला झूले तरुणाई।। डाल-डाल मधुमासी डेरा, चतुर चमेली इतराती। करें सुवासित मस्त बयारें, गुल मकरंद लुटाते हैं। अठखेली करते भँवरे हैं, प्रेमिल उर मुस्काते हैं। मन में निश्छल प्रेम पला है, कामदेव छवि बहकाती। मनभावन गीतों की लड़ियाँ, रस पीयूष भरी प्याली। बौराते हैं बौर प्रीति के, कहती होठों की लाली।। प्रेम पताका फैली नभ तक, चूमे माथा लहराती। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य...
नोहर की बदलती आबोहवा
कविता

नोहर की बदलती आबोहवा

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भूल गए बिहानी का वैभव, भूला वो सम्मान यहाँ, भगतसिंह के नाम पे सिसक रहा ईमान यहाँ। परशुराम चौक की गरिमा, अब धुएं में खोई है, नोहर की ये पावन माटी, आज अकेले रोई है। वो गोल गटा कुआं जहाँ, जुटती थी टोलियां कभी, आज वहां सट्टे की लत ने, छीनी सबकी खुशियां सभी। शिवाजी स्टैंड की चौखट पर, कैसा ये मंजर आया है, नोहर की गलियों के साये में, डोडों का व्यापार समाया है। न लाज रही बुजुर्गों की, न खौफ रहा अब शासन का, हर नुक्कड़ पर खेल चल रहा, नशीले उस राशन का। जहाँ गूंजते थे नारे आज़ादी और क्रांति के, वहां सौदा हो रहा है आज, समाज की शांति के। घर की दहलीज लांघ कर, अब नारी भी कदम बढ़ाती है, चंद रुपयों की खातिर वो, ज़हर घरों तक लाती है। मैली हवा में हाथ धोना, अब दस्तूर बन गया, जो शहर कभी था हीरा, वो आज नासूर...
कुण्डलिया छंद
कुण्डलियाँ, छंद

कुण्डलिया छंद

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** कुण्डलिया छंद सबसे ज्यादा आजकल, अपने लगते भार। कलयुग का यह सार है, लगभग हर परिवार। लगभग हर परिवार, सुनें हम यही कहानी। सभी सुनाते आज, कथाएं आप जुबानी। कहें मित्र यमराज, शिकायत नहीं किसी से। सभी दुखी हैं आज, मगर हम अच्छे सबसे।। अंर्तमन की पीर का, होता गहरा घाव। आज छोड़कर कल उसे, आप दीजिए भाव। आप दीजिए भाव, रंग चेहरे मत लाना। नाहक उसको आज, नहीं दो पानी दाना। इसका रौरव छंद, तोड़ देता है हर तन। कहें मित्र यमराज, गजब होता अंर्तमन।। दिखता है दृश्यमान जो, करता सबको तंग। जो हो रहा समाज में, आज बहुत बदरंग।। आज बहुत बदरंग, जमाना कैसा आया। कलयुग के दौर ने, जगत को है भरमाया।। कहें मित्र यमराज, सत्य भी खूब है बिकता। मान लीजिए आप, झूठ ही आगे दिखता।। आया मुश्किल समय है, होते सब बेहाल। सूर्यदेव इतने कुपित, तप...
पहचान जाहिर हो
कविता

पहचान जाहिर हो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ********************1132 सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित्र अब दरों दीवार पर सिर पटकना होगा, तथाकथित आत्माओं, भूतों की तरह अतृप्त हो इधर-उधर भटकना होगा, जिस तरह हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं, उसी तरह लोगों को अपनी संतुष्टि जताने उछलना कूदना मटकना होगा, बंधे नहीं हो मोटी जंजीरों में, आशावादी हो अपनी अनदेखी तकदीरों से, मगर सिर फंसाए हो अंधभक्ति में, आश्वस्त हो इसकी शक्ति में, तो तैयार हो ये सोच कि मूत्र पी गोबर गटकना होगा, तब तक स्वीकार्य नहीं हो, अंधत्व की सारी अदाएं शिरोधार्य नहीं हो, इन अदाओं के साथ पूरी तरह तैयार हो, देश को खोखला करने वाले अब अय्यार हो, तैयार किये गये हो छांट चुनकर, बर्बाद ए मस्तिष्क को भरोसा है तुम पर, स्वतंत्र रहने के लिए नियमों को झटकना होगा सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित...
आंगन
कविता

आंगन

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हर दरख्त सूना है सूनी हर शाम बिछा दि ए राहो मे हर पलक औ पांव। तुम बहुत दूर हो तन्हाई है पास अंबर पर पसर गऐ खग वृन्दो के पांख। सूना है आगंन सूनी-सूनी बगीया सूने-सूने घर द्वारे सूना सब सन्सार। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर...