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कविता

यादों का ज़हर
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यादों का ज़हर

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। मौत आएगी मुझे इक सुकून बनकर, मिट जाएँगे सब शिकवे खाक में मिलकर। पर तुम्हें तो कतरा-कतरा, पल-पल मरना होगा, जिंदा रहकर ही यादों का ज़हर पीना होगा। वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। न कोई मज़ार होगी मेरी, न कोई निशान होगा, मिटा दूँगा खुद को ऐसा, कि बस धुआँ-धुआँ होगा। जहाँ कभी हम मिले थे, वो हरसूँ वीरान होगा, बस मेरी तन्हाइयों का ही एक जहान होगा। वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। हम तो आज़ाद हो जाएँगे राख होकर हवाओं में, खो जाएँगे खामोशी में, टूटे से ख़्वाबों में। पर तुम उम्र भर कैद रहोगे यादों के खौफ में, हर सांस सज़ा बनेगी, टूटे हर एक ख्वाब...
शाश्वत प्रेम
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शाश्वत प्रेम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तुम वो फूल हो जिसको मैं बिना स्पर्श के खिलता हुआ और महकता हुआ देखना चाहता हूं। तुम मेरी वो अधूरी ख्वाहिश हो जिसके पूरे होने का इंतजार मैंने कई युगों तक किया है। तुम मेरे जीवन का वो अंतिम अध्याय हो जिसके पूरा होने पर शाश्वत आनंद मुझे स्पर्श कर जाएगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
मंजिलों तक का सफर
कविता

मंजिलों तक का सफर

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** लम्हे गमों के अकेले बिताने पड़ते हैं कदम एक एक कर जमाने पडते हैं सीधे सीधे कुछ नहीं मिलता जमाने मैं काटों में भी रास्ते बनाने पडते हैं मिलते मिलते रह जाती हैं मंजिले मौके कई ऐसे भी गवाने पड़ते हैं रात दिन एक हुए किसने देखे सबूत कामयाबी के दिखाने पडते हैं मिली हैं मंजिलें जिनको पूछो जरा उनसे कितने जोखिम डर डर के उठाने पड़ते हैं ऐसे ही नहीं मिलता मुठ्ठी भर आसमां जमीं के ऐसे कई हिस्से गबाने पड़ते हैं हारने वाले तन्हा लड़ते रहते हैं खुद से जीतने बालों के साथ जमाने लड़ते हैं किनारों पे मोती मिलते नहीं अक्सर गहराइयों में गोते लगाने पड़ते हैं एक खुआब मुकम्मल करने के वास्ते शोक अपने सारे दफनानें पड़ते हैं परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती ...
है दम तो करो दावा
कविता

है दम तो करो दावा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जमीन के चंद टुकड़ों पर कब्जा करके समझ रहे हो खुद को मालिक इस जहां का, लटके पड़े हैं बड़े बड़े गोले आसमानों में क्या बन सकते हो मालिक वहां का, अपनी सोच से आगे भी सोचने की कोशिश करो, सिमट के बैठे हो पुरानी तुच्छ मान्यता ले चांद से चंद चांदनी अमावस में एक बार दो बार बार-बार नोचने की कोशिश करो, अपने ग्रंथों पर ही अटके हो जाते क्यों नहीं आगे, इंसान इंसान क्यों नहीं लगता या लपेटने की क्षमता नहीं रखते तुम्हारे कच्चे धागे, यूं ही कहते फिरते हो कि सभी बंध जाते हैं बांधे गए बंधन में, या सिर्फ लाभ देख लिपटने की हुनर है जैसे लिपटा हुआ भुजंग है चंदन में, प्रकृति को भी मजबूर कर चुके हो रोने के लिए, क्या चार गज जमीं काफी नहीं तुझे सोने के लिए, प्राणदायी वायु खो रहे हो बचा नहीं पा रहे पानी मुंह धोने...
सीता-लव-कुश- वार्ता
कविता

सीता-लव-कुश- वार्ता

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** एक दिवस लवकुश ने माता सीता से यह प्रश्न किया, कौन हैं मेरे पिता हे माता किस कुल मैंने जन्म लिया, मैया बोली यथा समय मैं ये सब तुझे बताउंगी, तेरी जिज्ञासा को एक दिन तुझको मैं समझाऊंगी, कुछ ही दिनों के बाद विपिन में लक्ष्मण का आगमन हुआ, सेना भी थी साथ अस्त्र से दिशा-दिशा झंझनन हुआ, जब आश्रम के पास वे पहुंचे लव कुश से सामना हुआ, चचा भतीजे में जमकरके बाणों से आघात हुआ, घायल होकर जब लक्ष्मण पहुंचे निज कौशल धाम में, व्यथित हो गए राम देखकर अनुज लड़े संग्राम में, बोले अनुज कहो किसने तुम्हें ऐसा रक्त रंजित है किया, जिसने मेघनाद को मारा कैसे वह अब विजित हुआ, लक्ष्मण बोले भैया वन में दो बालक हैं ऐसे वीर, जिनने मुझको घायल करके बना दिया अत्यंत गंभीर, क्रोध से प्रभु के आंख हो गए लाल भुजायें फड़क उठीं, रथ पर चढ़ कर चले विपिन को ...
विराम कायरता नहीं
कविता

विराम कायरता नहीं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कुछ लोग संवाद नहीं करते वे रणनीति खेलते हैं। वे जानबूझकर ऐसे शब्द चुनते हैं जो आपके तर्क पर नहीं, आपकी नसों पर वार करें। उनका उद्देश्य समाधान नहीं होता, बल्कि आपको भावनात्मक रूप से असंतुलित करना होता है। ताकि आप मुद्दे से हटें, और वे आपकी प्रतिक्रिया को आपकी हार बना सकें। ऐसे लोग बहस के बीच अचानक से आपके चरित्र पर प्रश्न उठाएंगे, आपकी किसी पुरानी भूल को उछालेंगे, या आपकी आवाज़, भाषा, लहजे पर टिप्पणी करेंगे। असल विषय वहीं पड़ा रह जाता है और संवाद एक निजी युद्ध में बदल दिया जाता है। क्रोध की अवस्था में तर्क धुंधला पड़ जाता है। शब्द तेज़ हो जाते हैं, पर अर्थ कमजोर हो जाता है। और ठीक यही वह क्षण होता है जहां चालाक व्यक्ति जीत का भ्रम रच लेता है। इसलिए जब भी ऐसे किस...
राष्ट्र की धरोहर
कविता

राष्ट्र की धरोहर

अमित कुमार शर्मा "आनंद" प्रयागराज (उत्तरप्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना राष्ट्र की धरोहर संस्कृति की पहचान है कविता आसमान में लहराते तिरंगे की शान है कविता आज़ाद के बंदूक से निकली जो आखिरी गोली भगत सिंह के देश भक्ति की सम्मान है कविता। कश्मीर घाटी,हल्दी घाटी की आवाज है कविता झेलम के जल में चलते नाव की साज है कविता राणा प्रताप ने जब खाई थी घास की बनी रोटियां दुश्मनों पर टूट पड़े ऐसे चेतक की ताज है कविता। हिमालय से निकली गंगा की कल कल है कविता पवित्र करती तन मन जो शीलत जल है कविता शंकर की जटाओं में भी बंधकर जो बहती निरंतर भागीरथी के निरंतर तप का पुण्य फल है कविता। वर्षा ऋतु में किसान के चेहरे की चमक है कविता बसंत ऋतु में गाते हुए पंछियों की चहक है कविता चद्दर ओढ़कर ठंडी रातों से कांपती हुई ...
भारतीयों की शान हैं हिंदी
कविता

भारतीयों की शान हैं हिंदी

प्रिया पाण्डेय हूघली (पश्चिम बंगाल) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना भारत का सार हैं हिंदी, हिमालय की मस्तक पर विराजमान हैं हिंदी, कण-कण में बसते हैं जिसके, हम भारतीयों की शान हैं हिंदी, लड़ी, खड़ी और जग में नाम किया, उस भाषा का नाम हैं हिंदी, मीरा के पद में, कबीर के दोहे में, प्रेमचंद की कहानियों में छुपी हैं हिंदी, जशंकर प्रसाद के "आंसू"बन बही हिंदी, तो नागार्जुन की "अकाल और उसके बाद की व्यथा सुनाती हिंदी," शोषित हुई पर खड़ी रही, अंग्रेजी ने कितना दबाया, पर उड़ती रही आसमानों में, तुलसीदास का रामचरित मानस हैं हिंदी। परिचय :- प्रिया पाण्डेय जन्मतिथि- २२/१०/१९९९ शिक्षा- बी.ए तृतीय वर्ष (राजनीती शास्त्र ) स्थान- ९२, चरकतल्ला, पोस्ट -माखला, जिला- हूघली (पश्चिम बंगाल ) कार्य- शिक्षिका साहित्य...
सादगी
कविता

सादगी

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना कबीर सा साधारण कौन निपट गंवार अनपढ़ जात-पात से परे गृहस्थी में रहे बुनते रहे कपड़े छोड़ा कुछ नहीं पाया सब कुछ नहीं विशिष्टता कोई जान लिया आत्मिक सौंदर्य सादगी को साधते रहे राम चदरिया कातते रहे। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आप सभी को नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है इस अवसर पर आप को प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना लिंक को टच कर पढ़ने का कष्ट कर प्रोत्साहित करेंगे एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करेंगे ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवा...
हिंदी में संस्कृति मुस्काती है
कविता

हिंदी में संस्कृति मुस्काती है

याशिका दुबे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना हिंदी केवल शब्दों की रचना नहीं, यह सभ्यता की साँसों का प्रमाण है। ऋषियों की वाणी से जन-जन के मन तक पहुँचा संवाद है। यह वेदों की गंभीरता भी है, और लोकगीतों की मधुर तान। यह तुलसी की मर्यादा, और कबीर का निर्भीक ज्ञान। हिंदी में संस्कार पलते हैं, हिंदी में संस्कृति मुस्काती है सरल होकर भी कालजयी, हिंदी विश्व में भारत की पहचान बन जाती है। परिचय : याशिका दुबे निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें...
मैं कुम्हारी हूँ
कविता

मैं कुम्हारी हूँ

बृज गोयल मवाना रोड, (मेरठ) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना मैं कुम्हारी हूँ कुम्हारी हूँ निर्माण करती हूँ मिट्टी लाई सुखाया कूटा एक रस किया गूंथा फिर चार दीये बनाये आकर्षक आकृति दी सुखाये तपाये सुंदर रंगों से सजाया प्रज्ज्वलित किया महकाया आज वे चारों दिशाओं में प्रकाश फैला रहे हैं जासमीन से महका रहे हैं गर्व महसूस करती हूं मेरी मेहनत रंग लाई है। परिचय :- बृज गोयल निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
संस्कृति की मुस्कान है हिंदी
कविता

संस्कृति की मुस्कान है हिंदी

पूजा महाजन पठानकोट (पंजाब) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना ना यह सीमाओं में बंधी है, ना दूरी इसे कमज़ोर बना पाई है हिंदी ने हर दिल में उतरकर अपनी अलग पहचान बनाई है कबीर के दोहे में, युवाओं की आवाज़ में, माँ की ममता की लोरी में, दोस्तों की मीठी तकरार में, हर भावना की सच्ची आवाज़ बसती है इसके हर उच्चार में संस्कृति की मुस्कान है हिंदी, हम सब की पहचान है हिंदी हमारी राजभाषा है हिंदी, हम सब भारतीयों का ताज है हिंदी जय हिंद, जय भारत का नारा है दुनिया में गूंज रहा भारत की पहचान बनकर है आगे बढ़ता जा रहा विश्व हिंदी दिवस पर यह प्रण है, इसकी गरिमा को बढ़ाना और कायम रखना हमारा कर्म है परिचय :- पूजा महाजन निवासी : पठानकोट (पंजाब) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाध...
आन बान यह हिन्दी है
कविता

आन बान यह हिन्दी है

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना प्यारे भारत के जन-मन का, स्वाभिमान यह हिन्दी है। अमर तिरंगे की गरिमा की, आन-बान यह हिन्दी है।। जन-मन के भावों, विचार के विनिमय का जो साधन है। विश्व पटल पर शिष्ट सलीकेदार ध्वनित अभिवादन है । भारत माँ के माथे पर की, अरुणोदय-सी बिन्दी है। अमर तिरंगे की गरिमा की, आन-बान यह हिन्दी है।। अँग्रेजों ने भी जिसके प्रसरण का भर-सक यत्न किया। संविधान ने संघ राजभाषा धिकार का रत्न दिया।। दयानन्द, गाँधी, सुभाष ने, अपनाई यह हिन्दी है। अमर तिरंगे की गरिमा की, आन-बान यह हिन्दी है।। भारतेन्दु दिनकर माखन के, राष्ट्र-प्रेम की परिभाषा। सूरदास मीरां तुलसी की, भक्ति भाव की अभिलाषा।। भावात्मक बन्धुत्व प्रेम का, मधुर गान यह हिन्दी है। अमर तिरंगे...
हिंदी दिलाती पहचान
कविता

हिंदी दिलाती पहचान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना विश्वभर में हिंदी दिलाती है हमसबको हिंदी से सम्मान आओ करें हिंदी का गुणगान काम करें हिंदी में, करें सम्मान कामकाज में रखें साथ, हिंदी में अनुवाद हरकाम में हरवक्त बोले लिखें हिंदी साहित्य कला संस्कृति को निखारने में हिंदी निभाती योगदान विश्वभर में भाषा हिंदी हमारी बढ़ाती है पहचान आओ मिलकर करे गुणगान बढ़ाये विश्वभर में हिंदी का सम्मान परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आप सभी को नववर्ष पर हार्दिक शुभकामनाएँ। आशा है इस ...
श्रेष्ठ हमारी हिन्दी है
कविता

श्रेष्ठ हमारी हिन्दी है

राजीव रावत भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना करोड़ो लोंगो की मधुर भाषा, यह प्यारी-प्यारी हिन्दी है विश्व पटल की पांच भाषाओं में, श्रेष्ठ एक हमारी हिन्दी है १० जनवरी ७४ को नागपुर में, इतिहास गढ़ा था हिन्दी ने २२ देशों के प्रतिनिधियों का, एक इतिहास रचा हिन्दी ने कोई भाषा भी बुरी नहीं, ये बात सोलह आनी सच्ची है लेकिन अपनी मातृभाषा ही, सच होती सबसे अच्छी है रहो किसी भी देश में जाकर, दिल में तेरे स्वाभिमान रहे होठों पर हिंदी भाषा हो और सदा दिल में हिन्दुस्तान रहे गंगा सी निश्छल-पावनता ले, युगों-युगों से बहती आई भला कौन भाषा छू सकती है, हिन्दी भाषा की ये गहराई जिनको अपने राष्ट्र, अपनी भाषा पर होता है प्यार नहीं सच! ऐसे जयचंदो को देश में, है रहने का अधिकार नहीं परिचय :...
हिंदी
कविता

हिंदी

निकिता तिवारी हलद्वानी (उत्तराखंड) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना ह से कहते हैं हम हिंदी जिसके माथे सजेगी बिंदी हर व्यक्ति बोले हैं हिंदी अनपढ-गंवार चाहे पढ़ी-लिखी संस्कृत इसकी जननी है तभी तो यह सम्मान हैं हिंदी भारतीयों की तो शान बढ़ाए हम सबका अभिमान बचाए पूरा भारत एक है चाहे धर्म अनेक हैं फिर भी बोले भाषा एक हैं हिन्दी॥ परिचय :-  निकिता तिवारी निवासी : जयपुर बीसा, मोटाहल्दू, हलद्वानी (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी...
मेरी हिंदी
कविता

मेरी हिंदी

श्रीमती अनिता गौतम राजनांदगांव भरका पारा ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना हिंदी मेरी बोली नहीं, मेरा अभिमान है मेरा अस्तित्व है, मेरी पहचान है मेरी आत्मा है, आत्मसम्मान है संस्कृति और संस्कारों की मुस्कान है हिंदी मेरी आवाज़ है हिंदी विश्व का सरताज है दिल की दिल से जोड़ती प्रीत का पैग़ाम है सहज है सरल है पर अर्थों में महान है हिंदी मानवता और एकता की जान है युगों युगों तक इसकी गौरव गाथा का बखान है मेरी हिंदी भाषा सबसे महान है। परिचय :-  श्रीमती अनिता गौतम जन्म दिनांक : १४ दिसम्बर १९७५ निवासी : राजनांदगांव भरका पारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी...
विश्व हिंदी दिवस
कविता

विश्व हिंदी दिवस

पूनम धीरज राजसमंद, (राजस्थान) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना अक्सर हिंदी खेला करती मेरे मन के बाग में शब्दों की चुनर ओढ़ ठुमकती कविता के अनुराग में बन मेघ विचारों पर छा जाती चिंतन के आकाश में गीत ग़ज़ल की सरगम से कागज़ सींचे नव राग में वो भाव के मोती चुगती है फुदके कल्पना की डाल पे निबंध, कहानी में चहकती उड़ती जीवन के विराग में है पगडंडी सी सरल सुलभ सागर सी असीम अद्भुत अनुपम वो स्नेह सूर्य सी चमक रही रचना के सुरभित सन्मार्ग में एक दिन हिंदी ने सखी बना ली हर भाषा को विस्तार दिया अब इंद्रधनुष खिलता क्यारी में ज्यों नदियों का संगम प्रयाग में परिचय : पूनम धीरज जन्म : १८ जून १९८३ निवासी : राजसमंद, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित ...
हिंदी सभ्यता की आत्मा
कविता

हिंदी सभ्यता की आत्मा

अभिषेक मिश्रा चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना मैं अभिषेक मिश्रा, चकिया, बैरिया, जनपद बलिया (उत्तर प्रदेश) से आने वाला एक नवोदित हिंदी कवि हूँ, जिसकी लेखनी भाव, संस्कृति और समाज से संवाद करती है। मेरी रचनाओं का मूल उद्देश्य हिंदी भाषा की सांस्कृतिक गरिमा और मानवीय मूल्यों को अभिव्यक्त करना है। कविता मेरे लिए आत्मानुभूति और समाज-बोध का माध्यम है। विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर प्रस्तुत यह रचना हिंदी को केवल भाषा नहीं, एक जीवंत संस्कृति के रूप में समर्पित है। न ये महज़ संवाद की भाषा, न अक्षरों का श्रृंगार है, ये 'सत्यम शिवम सुंदरम' का, साक्षात् दिव्य अवतार है। ऋषियों की पावन तपस्या से, ये चेतना बन उभरी है, ये वो अमर संस्कृति है, जो रोम-रोम में बिखरी है। इसमें वेदों की गरिमा है, संस्...
हिन्दी हिंदुस्तान की
कविता

हिन्दी हिंदुस्तान की

आनंद कुमार पांडेय बलिया (उत्तर प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना हिन्दी हिंदुस्तान की मोहताज नहीं पहचान की। विश्व भी लोहा माना है मेरे इस नव उत्थान की।। अमर असंख्यक कवियों को पहचान मिला, कविताओं का अद्भुत एक उद्यान मिला। सभी बोलियाँ इसमें घुल-मिल जाती हैं, तभी मातृ भाषा का भी सम्मान मिला।। हिन्दी हीं है नीव मेरे इस मुस्कान की। विश्व भी लोहा माना है मेरे इस नव उत्थान की।। हिन्दी की यह सृजन शीलता, नित नव पाठ पढ़ाती है। प्रेम भाव की निर्मल धारा, जन-जन तक पहुँचाती है।। कलम हुई आभारी इस एहसान की। विश्व भी लोहा माना है मेरे इस नव उत्थान की।। हिन्दी हिंद की बागडोर है, सत्य सनातन की पहचान। भाषाओं का अमृत संगम, हम सबकी आन-बान और शान।। यही किरण आनंद के हर विहान की। विश्व भी लोहा माना है मेरे इस ...
हिन्दी है हम – प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त रचना
कविता

हिन्दी है हम – प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त रचना

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त रचना हिन्दी है हम, हिन्दुस्तान ये हमारा। फिर क्यों न मने हिंदी दिवस प्यारा। हिन्दी है … भाषाएँ अनेक, हिंदी सब मे सितारा। हिंदी सर्वव्यापी जोड़ने की सूत्रधारा हिन्दी है… ओम् है सृष्टि , मस्तक पर है बिन्दी। भाषाएँ रहें अधूरी हो न जहाँ हिंदी। हिन्दी है… सोच हो हमारी हिंदी हो राष्ट्र भाषा। बहुसंख्यक भाषी की पूरी हो आशा। हिन्दी है… सशक्त राष्ट्र भाषा जिसकी पहचान। मिला है देश की संस्कृति को सम्मान। हिन्दी है … बहु भाषी देश हमारा सब से न्यारा। अनेकता मे एकता हिंदी ही सहारा। हिन्दी है … परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक :१४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश)...
मगर पता कब चला
कविता

मगर पता कब चला

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** समय को सब कुछ सहते देखा मजबूर सत्य को बहकते देखा मगर पता कब चला घर की दीवारों को... गिरने लगे तो फिर गिरते ही गये रास्ते पतन के अविरल बढते गये मगर पता कब चला विश्वास के आधारों को... कदम बढा भी दिये गये अब आगे स्वार्थ के लिए सिद्धांत ऊंचे टांगे मगर कब किसने देखा लौट कर आते सवारों को... हंस हंस कर जीवन जी ही लिया खुशियों को गम छूने ही ना दिया मगर कब किसने देखा नभ में रोते हुये तारों को... चांद के उजालों में रात रोते देखा पाप और धर्म को संग सोते देखा मगर कब किसने देखा खाली होती मजारों को... भाई ने भाई से मुंह फेर लिया संबंधों को सियासत घेर लिया मगर कब किसने देखा जात-धर्म के चटखारों को... नेताओं से डर को सहमते देखा कुर्सी हेतु धर्म को मिटते देखा मगर कब पता चला लुटने का अपने ह...
शौर्य यात्रा
कविता

शौर्य यात्रा

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** शोर्य वीरता स्वाभिमान है वीर पराक्रमी योद्धा यहां, चाहे रक्त बहा धर्मवीरों का पर धर्म सनातन अमर यहाँ, वार किया विध्वंस किया मूल नाश किया उन आतताईयो ने, मुगलों ने मंदिरो को तोड़े है पर "आस्था" तोड़ न सके मन का। मुगलों का आक्रमण झेला है, कितने मंदिरों को तोड़ा है, आखिर में हार गए पापी, पर धर्म को सनातनियों ने नहीं छोड़ा है। थे एकजुट हे एक लक्ष्य हे मानवता हे प्रेम यहां, हे वीर पराक्रमी योद्धा यहां, हे देशभक्त हे संत यहां, हे धर्म संस्कृति का पाठ यहां हे तप तपस्या का भाव यहां, हे ज्ञान का दीप, सहानुभूति यहां, हे भाईचारे जैसे संबंध यहां। चाहे साल शताब्दी संवत बीते, नहीं मिटा सके कोई धर्म यहां, रग रग कण-कण में व्याप्त यहां हे परमेश्वर का हे वास यहां। इसे मिटा नहीं सकता कोई मिट गए यहां मिटान...
आया बसन्त
कविता

आया बसन्त

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बसन्ती बयार बह रही घर, आगंन, चौखट, द़ारे रविकिरण लजा रही छुप-छुप कर गगन मे। बेले झुम रही अधखिली कलियो का बोझ लिए । भौरो का गुन्जन होता पुष्प पराग से पेडो के पर्ण हिल-हिल कर लेते बलय्या मां सरस्वती को देते बसन्त की बधाई या। कही कोयल कूकती स्वागत मे कही झरनो की फुहारे भरे स्फुरण कही झरना नहलाता बसन्त को तो कही पलाश फूल लाल टीका लगता। भरमाये भागते बादल बसन्त से धूप-छाँव का खेल खेलते नदी, तडाग की लहरे देती बसन्त को झुले सागर की मीन नृत्य करती बसन्त की अगवानी मे। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना ...
चंद अल्फाज़
कविता

चंद अल्फाज़

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** आप में सुशीलता है या नखरो नाज, आपके मुंह से निकला चंद अल्फाज, बयां कर जाता है आपका किरदार व अंदाज, आपके रहन सहन का तरीका, आपके जीवन जीने का सलीका, ए आइ के जमाने में आज हम पहुंचे हैं भले, मगर भांपने का तरीका रहा है पहले, आपकी सोच, आपके मित्र, आपके जीवन जीने का अंदाज और ये इत्र, बहुत कुछ बता देता है, आप इस धोखे में मत रहिए कि चरित्र को छुपा लेता है, ये अल्फाज ही है जो दिलाता है मान सम्मान, तो कभी दिलाता है रुसवाई और अपमान, कब,कहां,कौन से शब्द कहने है लो जान, समाज में रहकर ही सीखा जाता है ज्ञान, दिख जाता है बहुत जगह पढ़ा लिखा गंवार, जो नहीं जानता तहज़ीब और प्यार, तो अल्फाजों को संभाल कर रखिए, किसके सामने क्या बोलना है आंखें खोलिए और देखिए। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिर...