हे प्राणप्रिय …
शैल यादव
लतीफपुर कोरांव (प्रयागराज)
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जब-जब घर से जाना होता,
बहुत दिनों पर आना होता,
नत नयनों को नम करके,
अंतिम दिन का खाना होता !
प्रिय से बोली प्राणप्रिया तब,
बोझिल लगता कर्म क्रिया अब,
अबकी लौट के आना जल्दी,
बिना आप के शून्य यहाॅं सब!
बिना आप के मेरे आर्य,
ठीक न लगता कोई कार्य,
रजनी दिवस स्वपन जागृत में,
हो गये हैं आप अब अपरिहार्य!
दो जिस्मों में एक है जान,
सच कहती हूॅं झूठ न मान,
तुम बिन मेरा अस्तित्व नहीं है,
मेरी तो केवल तुम शान !
बच्चों का भी यही है हाल,
टिफिन बैग स्कूल बवाल,
जाती हूॅं थक ताम झाम से,
सब लगता जी का जंजाल!
क्यों पढ़ना-लिखना छोड़ दिए,
क्यों अपने मुंह को मोड़ लिए,
पथ के कांटों को फूल बनाकर,
क्यों अपनी राह को मोड़ लिए!
नयन राह की ओर निहारे,
सबकी आशा हो तुम प्यारे,
ओ मेरे जीवन आधार,
आ जाओ जी चाह पुकारे!!
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