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कविता

दौलत कमाने का नशा
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दौलत कमाने का नशा

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** नशा जब दौलत का लग जाये तो जिंदगी दौड़ने लगती। सफर फिर जीवन का भी बिखरने सच में लगता। समय अभाव का कहकर निभा नहीं पाते अपना कर्तव्य। जिसके चलते भूलने लगते परिवार के सभी अपने भी।। बड़े धनवान होकर भी नहीं सम्मान पा पाते। कभी भी दान धर्म तो इन्होंने किया ही नहीं। तो फिर क्यों ये रोते है मान सम्मान के लिए। और स्वयं को पता होना चाहिए की हम नहीं है इसके हकदार।। न परिवार में मिलते-जुलते इस तरह के ये लोग। जिन्हें खुद ही नहीं पता की घर में क्या कुछ चल रहा। सुबह से रात तक बस इन्हें सिर्फ चिंता रहती व्यवसाय की। और हिसाब-किताब लगाते रहते है सदा ही फायदा और नुकसान का।। बड़ा बुरा है ये नशा जो न सोने देता है। और न ही अपनों से ये मिलने देता है। सभी से एक ही उम्मीद लगाकर ये बैठे है। कि किसी भी तरह से महीने में लाभ ज्...
बिछुड़न तेरी
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बिछुड़न तेरी

सीमा रंगा "इन्द्रा" जींद (हरियाणा) ******************** बिछुड़न तेरी तड़प मेरी धड़कन तेरी आह! मेरी सौदाई तेरी मोहब्बत मेरी यादें तेरी इंतजार मेरा बेवफाई तेरी वफ़ा मेरी भूलना तेरा यादें मेरी लड़ाई तेरी प्रेम मेरा धोखा तेरा विश्वास मेरा फटकार तेरी मिलान मेरा महबूबा तेरी* हमदर्द मेरा जान तेरी दिल मेरा सांसे तेरी तू मेरा.... परिचय :-  सीमा रंगा "इन्द्रा" निवासी :  जींद (हरियाणा) विशेष : लेखिका कवयित्री व समाजसेविका, कोरोना काल में कविताओं के माध्यम से लोगों टीकाकरण के लिए, बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ हेतु प्रचार, रक्तदान शिविर में भाग लिया। उपलब्धियां : गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड से प्रशंसा पत्र, दैनिक भास्कर से रक्तदान प्रशंसा पत्र, सावित्रीबाई फुले अवार्ड, द प्रेसिडेंट गोल्स चेजमेकर अवार्ड, देश की अलग-अलग संस्थाओं द्वारा कई बार सम्मानित बीएसएफ द्वारा सम्मान...
ए चांद! जरा जल्दी आना
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ए चांद! जरा जल्दी आना

दीप्ता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना हाथों में देख मेहंदी लगाई है तेरे नाम की मेहंदी रचाई है माथे पर बिंदिया लगाई है मैंने पूजा की थाल सजाई है ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना हाथों में चूड़ी और कंगना है कानों में झुमका पहना है सजना ही मेरा गहना है सजना के लिए ही सजना है ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना करवा चौथ में चांद का इंतजार रहता है चांद के साथ में सजना का दीदार होता है उसके हाथ से पानी पीकर व्रत मेरा टूटता है हमारा प्यारा रिश्ता और परवान चढ़ता है ए चांद! जरा जल्दी आना साजन का दीदार जल्दी कराना।। परिचय :- दीप्ता मनोज नीमा निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप...
मैं खुद पर अमल नहीं करता हूं
कविता

मैं खुद पर अमल नहीं करता हूं

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** मैं लोगों को बहुत ज्ञान बांटता हूं उदाहरण सहित नसीहतें देता हूं सचेत रहने की सलाहें देता हूं पर मैं खुद पर अमल नहीं करता हूं खास व्हाट्सएप ग्रुप में अच्छी पोस्ट डालने की सलाह देता हूं डर्टी बातें मीडिया में नहीं देखने की बातें जोर देकर बोलता हूं पर मैं खुद उस पर अमल नहीं करता हूं आध्यात्मिक वाणी वाचन बहुत करता हूं संगत को अमल करने की सलाह देता हूं बुरी चीजों से दूर रहने को बोलता हूं पर मैं खुद उस पर अमल नहीं करता हूं भाषणों में मैं विकास की बातें बहुत करता हूं याद से मेरे चिन्ह पर ठप्पा लगाने को कहता हूं जनता जनार्दन हित की बातें बहुत करता हूं पर मैं खुद उस पर अमल नहीं करता हूं समाज को प्रगति पथ पर चलने को कहता हूं उत्साह से उच्च पद कायम करने कहता हूं गरीबों की सेवा करने सबको उत्साहित करता ह...
मर गया
कविता

मर गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** पैदा हुआ, उठा बैठा, खेला कूदा, पढ़ा लिखा, पढ़ाया कभी नहीं, परिवार बनाया, खाया पीया, खिलाया कभी नहीं, सोकर जगा, जगाया कभी नहीं, न बोला, न चीखा न चिल्लाया, न हक़ बचाने सामने आया, ताउम्र मृत रहा, बस बेनाम मौत मर गया। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डा...
बचपन की देहरी
कविता

बचपन की देहरी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बचपन की देहरी पार हो गई जिंदगी के द्वार से क्या खेले क्या पाए कुछ याद नहीं होता है क्षोभ, क्यों क्षणिक सा बचपन बिदा हो गया ना समझ पाए न अनभिज्ञता मैं भोग पाये घृणा, देव्ष से सरोकार न था ना भेद था, ना मुखोटे ओढ़े हंसने वाली हंसी थी क्यों चला गया बिन बताए पुनः वापस ना आने के लिए। अतीत की स्मृतियों को जोड़ने के लिए आती है याद आज पगडंडी बचपन की भागते दौड़ते थे छत मुंडेल की इमली, बेर याद आते हैं आते हैं याद मिट्टी के घरोदे रुठ गई हमसे वह पीपल नीम की छाया देखो तो, लौटकर वह आज तक नहीं आया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर ...
चुनाव
कविता

चुनाव

गुरप्रीत सिंह कोबरा कुरूक्षेत्र  ******************** जित चुनाव आता देखा, शहर गया गाँव आता देखा, लगी-बुझी का मेल होते देखा, चुनाव में अपना गैर होता देखा, गुरप्रीत गेल गैर प्यार होता देखा, जित चुनाव आता देखा.... दो मते, मत पा एक होता देखा, बीच गांम-गाल्ल गल्लियारा देखा, कोई बांटता अर कोई लेता देखा, कोई लूटता ओर लूटाता देखा, जित चुनाव आता देखा.... कर्मठ, शिक्षित, सेवक इमानदार प्रत्याशी देखा, झूठ, फरेब, नशा, राशन बंटता देखा, मजमा बुथ के भीतर बाहर देखा, उंगल स्याही से सना देखा, जित चुनाव आता देखा.... हार-जीत की पूछ कर देखा, जवाब मिला, मत बेचा, प्रत्याशी नहीं देखा, चुनाव नहीं सौदेबाजी होता देखा, नशा, प्रलोभन देने वाला देखा, ना कोई प्रचा रद्द, ना सजा होता देखा, जित चुनाव आता देखा.... प्रलोभन, नशा, निषेध निष्फल होता देखा, अयोग्य, योग्य को मात द...
टुरी खोजाई
आंचलिक बोली, कविता

टुरी खोजाई

परमानंद सिवना "परमा" बलौद (छत्तीसगढ) ******************** छत्तीसगढ़ी कविता ऐ गाँव ले वो गाँव चलत हाबे घुमाई, जेला कथे छत्तीसगढ़ मा टुरी खोजाई.! एक सियान हे ता दो नवजवान हे, गाडी मा बइठे नशा करे बिगडे जुबान हे.! कोनो सच बतात हे खेती किसानी इही मोर अभिमान हे, ता कोनो जुट गाडी बंगला कई ऐकड खेत कही कही के बतात हे.! जुठ लबारी तोर काम नई आये, काम अही तोर व्यवहार हा, टुरी (लडकी) मत खोजो, खोजना हे ता घर बर बेटी खोजो.! पइसा वाले जन देख-देख ले वोकर घर परिवार व्यवहार ला, पइसा वाले मारही पीटही झगडा करही व्यवहारवान बेटी ला सम्मान दीही.! ! परिचय :- परमानंद सिवना "परमा" निवासी : मडियाकट्टा डौन्डी लोहारा जिला- बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भ...
बचपन मे लौट जाये
कविता

बचपन मे लौट जाये

प्रमेशदीप मानिकपुरी भोथीडीह, धमतरी (छतीसगढ़) ******************** निश्छल प्रेम की नित बहती हो धारा मोहक और हम सबका अति प्यारा दोस्तों के संग खेलखुद मे जुट जाये आओ हम सब बचपन मे लौट जाये बच्चे सदा सब के मन को लुभाते है सपनों की सारी बातें सच हो जाते है आओ सपनो की नई दुनिया सजाये आओ हम सब बचपन मे लौट जाये पिता जिसमे खुशियों का खजाना है माँ की आँखों में ममता का तराना है माँ के आँचल मे छुप, गम भुला जाये आओ हम सब बचपन मे लौट जाये ना फिक्र कोई,ना जिम्मेदारी की बोझ खुशियों की बारातें जीवन मे हर रोज पापा के कांधे बैठ सपने सजा जाये आओ हम सब बचपन मे लौट जाये खुशियों का समंदर हरपल पास हो जीवन का यह पल हमेशा खास हो आओ बचपन में फिर से घूम आये आओ हम सब बचपन मे लौट जाये परिचय :- प्रमेशदीप मानिकपुरी पिता : श्री लीलूदास मानिकपुरी जन्म : २५/११/१९७८ निवासी : आमाचानी पोस्ट- भो...
हे सुंदर निशि
कविता

हे सुंदर निशि

दिनेश कुमार किनकर पांढुर्ना, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ******************** ना धोवो मुख अपना, शीतल ज्योत्सना से। तमस की काया लिये, लगती तुम सुंदर निशि।...... थके हुए तन मन लिये, खोते जो सपनो में। गोद तुम्हारी पाकर, पाते स्फूर्ति तनो में। करते विदा रवि तुम्हे जब आते प्राची दिशि। तमस की काया लिये, लगती तुम सुंदर निशि।..... ले मलिनता पुष्पो से, देती तुम उन्हें शांति। तारो ने भी तुमसे, पाइ हैं टिम टिम कांति। सकुचा क्यों जाती हो, छाते जब नभ में शशि। तमस की काया लिए, लगती तुम सुंदर निशि।...... परिचय -  दिनेश कुमार किनकर निवासी : पांढुर्ना, जिला-छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र :  मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ ...
धरती पर हरयाली होगी
कविता

धरती पर हरयाली होगी

अंजनी कुमार चतुर्वेदी निवाड़ी (मध्य प्रदेश) ******************** तस्वीरों में वृक्ष बने हैं, दीवारों के ऊपर। काटकाट वीरान किया है, बचे नहीं हैं भू पर। अंधाधुंध कटाई जारी, कोइ नहीं रखवाला। सुंदर वन संपदा मिटाते, दुख में, ऊपर वाला। प्राणवायु जो हमको देते, जीवन के संसाधन। देते शीतल छाँव सभी को, सब फल फूल सुपावन। केवल अपने हित की खातिर, वृक्ष काटते मानव। मानवता को रखें ताक पर, बन जाते हैं दानव। अरे अभागो अब मत काटो, मिलकर इन्हें बचा लो। वृक्ष मित्र बन कर जीवन को, अपना स्वयं संभालो। वरना वह दिन दूर नहीं है, पल पल पछताओगे। प्राण दायिनी जीवन वायु, बिल्कुल ना पाओगे। बिना वृक्ष के जीवन जीना, संभव कभी ना होगा। सुखमय जीवन अगर चाहते, इन्हें बचाना होगा। आने वाली पीढ़ी को हम, कैसे समझाएंगे। नहीं रहेंगे पेड़ धरा पर, फोटो दिखलाएंगे। जब जागे तब हुआ सवेरा,...
यात्रा
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यात्रा

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** स्त्री की यात्रा सुगम नहीं होती। पीढ़ी-दर-पीढियों ने जिसे प्रताड़ित किया हो। अस्तित्व को हमेशा ही चिन्हित किया हो। असितत्व की ऐसी लड़ाई सुगम नहीं होती। स्त्री की यात्रा सुगम नहीं होती। हर दिन जीने की कोशिश में आये दिन मरती। सबके लिए करते हुए भी सुनतीं हैं.... कुछ नहीं वो करती। अपने अधिकार भूला सपनों को, खुद को भूल जीती। बोझ की एक गांठ बन अपमानित हो स्त्री होने से डरती। स्त्री की यात्रा सुगम नहीं होती। परम्पराओं , रीति -रिवाजों रूढिय़ों की भेंट चढ़तीं। सृजन की अधिष्ठात्री खामोशी से सिसकियां भरती। जन्मों की बेडियों को जो तोडऩे की कोशिश करती। अपमानित हो अपनों से जीवन जहर हैं पीती। स्त्री की यात्रा सुगम नहीं होती। अपने स्वार्थवश समाज ने ढ़ोग रच लिया है। देकर "देवी" की कारा। अपना जीवन सुगम कर लिया है। बैठी रह...
बेटी
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बेटी

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** प्रेम पूजा रिश्तों का बीज होती है बेटी बड़े ही नाजों से घरों में पलती है बेटी बाबुल की हर बात को मानती है बेटी घर में माँ के संग हाथ बटाती है बेटी छोटें भाइयों को डांटती समझाती है बेटी माता-पिता का दायित्व निभाती है बेटी संजा, रंगोली, आरती को सजाती है बेटी घर में हर्ष, उत्साह, सुकून दे जाती है बेटी ससुराल जाती तो बहुत याद आती है बेटी पिया के घर रिश्तों में उर्जा भर जाती है बेटी इंसानी जिन्दगी का मूलमंत्र होती है बेटी दुनिया होती है अधूरी जब न होती है बेटी परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन :- देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प...
एक राष्ट्र एक पथ
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एक राष्ट्र एक पथ

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** संवेदना एक पथ, विवेचना रखो दूर स्वदेश को संभालने, कैसी है विडंबना। सांत्वना मुखर होगी, संतुलन के भार से, जरूरी है भाई साब, शीघ्र ही संवारना। सहेजकर था रखा, सराहना भाव खोया गुजरेगा वर्तमान, व्यर्थ फिर सिसकना। सरसता सरकना, सनकना पीर बना, देश मांगे सदभाव, सोचिए संभावना। सहना ही सिखा गया, संवाद फिजूल हुआ डरना स्वभाव नहीं, फिर भी डराइए। खतरों को भांपकर, कछुआ छिपाए अंग अनहोनी यादकर, हाशिये पे जाइए। तो भूलोगे पहचान, अरमान भी जलेगा दायरे में रहने का, तरीका जताइए। समय की साझेदारी, समंदर को आइना मान स्वाभिमान संग, भारत को जानिए। परिचय :- विजय कुमार गुप्ता जन्म : १२ मई १९५६ निवासी : दुर्ग छत्तीसगढ़ उद्योगपति : १९७८ से विजय इंडस्ट्रीज दुर्ग साहित्य रुचि : १९९७ से काव्य लेखन, तत्कालीन प्रधान मंत्री अटल जी द्वारा प्र...
वास्तविकता
कविता

वास्तविकता

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ ******************** इंसानियत हैवानियत से गलबहियां डाले घूम रहा है गली गली, इंसाफ मुजरा करने को एलान करते करते चली, नैतिकता उल्टियां कर रहे हैं, करुणा और दया खास लोगों के घर सुबह शाम पानी भर रहे हैं, सहयोग नोटों के सहारे स्वसहायता खुल के कर रहे हैं, आस और विश्वास कोने में बैठकर दिन रात सिहर रहे हैं, खेलों में कुर्सियां भाग ले रहे हैं, पदकों के बजाय खुशी खुशी दाग ले रहे हैं, खुशियां पैरों तले कुचला जा रहा, बदमाशियां अश्लील गाने गा रहा, जिससे सबको आस है, कसम से वो खुद निराश है, भीड़ को फैसला करने का हो गया हक़, जिन्हें आत्मविश्वास से डट कर बोलना था वो बोलने से क्यों रहा हिचक, नोट छाप छाप कर विश्वगुरु बनना है, व्यवस्था को पता है किसके आगे कब कब अकड़ना और तनना है। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ घोषण...
मेरा नाज़ुक सा दिल है
कविता

मेरा नाज़ुक सा दिल है

रामेश्वर दास भांन करनाल (हरियाणा) ******************** मेरा नाज़ुक सा दिल है, कोई पत्थर तो नहीं, चोट इतनी ना दे मुझे, कि टुकड़ों में बिखर जाऊं, ना बना मुझको अनजान पहेली, कि फिर मैं कभी सुलझ ना पाऊं, धीरे-धीरे से दर्द दे मुझको, एक साथ सहने की हिम्मत तो नहीं, मेरा नाज़ुक सा दिल है, कोई पत्थर तो नहीं, वक्त क्या था जब साथ थे तुम मेरे, अब घेरे रहते हैं मुझको ये अंधेरे, कुछ रहम खा कुछ तरस रख मुझ पर, प्यार ही तो किया था कोई दगा तो नहीं, मेरा नाज़ुक सा दिल है, कोई पत्थर तो नहीं, गम देते हो क्यों मुझको रूलाकर, क्या मिलता है मेरा दिल दुखाकर, क्यों दिया था भरोसा साथ रहने का मुझको, अब मैं कहां जाऊं ये बता तो सही, मेरा नाज़ुक सा दिल है, कोई पत्थर तो नहीं परिचय :-  रामेश्वर दास भांन निवासी : करनाल (हरियाणा) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करत...
बच्चों में भगवान बसते हैं
कविता

बच्चों में भगवान बसते हैं

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** हर छल कपट दांव पेंच से दूर रहते अबोध बच्चे खिलखिलाकर हंसते हैं किसी के ऊपर ताने तंज़ नहीं कस्ते हैं क्योंकि बच्चों में भगवान बसते हैं बच्चे न कोई शिकायत गिले-शिकवे करते हैं वह बेटी या बेटा हूं अनजान रहते हैं ना किसी की बुराई ना गुणगान करते हैं क्योंकि बच्चों में भगवान बसते हैं नारी को मां बनने का सम्मान देते हैं पिता के गौरव और अभिमान होते हैं मत मारो कोख में वह एक नन्हीं सी जान है बच्चों मैं समाए होते भगवान होते हैं घर की चौखट चहकती है बच्चे जब हंसते हैं महकता है घर जिसमें बच्चे बसते हैं संस्कारवान बच्चे धन सम्मान सेवा के रस्ते हैं बच्चों में भगवान बसते हैं गम खुशी नहीं समझते हमेशा हंसते हैं दिल जुबां में कुछ नहीं बस हंसते हैं स्कूल जाते पीठ पर भारी बस्ते हैं तकलीफ़ नहीं बताते बस हंस्तें है...
इम्तिहान
कविता

इम्तिहान

बबीता कुमारी आसनसोल (पश्चिम बंगाल) ******************** जीवन में कभी खत्म नहीं होता है इम्तिहान एक के बाद एक आता रहता है इम्तिहान वाकई जिन्दगी भरी हुई है इम्तिहानों से। यूजी के बाद हो पीजी सेट हो या हो नेट हमें देना पड़ता है इम्तिहान वकई जिंदगी भरी है इम्तिहानों से। जीवन में आगे बढ़ते रहने के लिए हमें पार करनी पड़ता है हर एक इम्तिहान सच के लिए तो कभी सच सामने लाने के लिए हमें गुजरना पड़ता है इम्तिहानों से वाकई जिंदगी भरी हुई है इम्तिहानों से। परिचय :- बबीता कुमारी निवासी : आसनसोल (पश्चिम बंगाल) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिया...
रिश्ते कारोबारों से…
कविता

रिश्ते कारोबारों से…

आकाश सेमवाल ऋषिकेश (उत्तराखंड) ******************** हुनर नहीं, नहीं चरित्र नहीं। नहीं भावना विचारों से। अब रिश्ते होते देखें हैं, मैंने, कारोबारों से । कितना है? क्या ओहदा है ? सबका लेखा-जोखा है। छानबीन कर बात करेंगे, घर-घर में ये सौदा है । लगते हैं दामों पर दाम, जैसे, वस्तु खरीदें बजारों से, अब रिश्ते होते देखें हैं, मैंने, कारोबारों से । इल्म नहीं, गठबंधन क्या है ? कीकर क्या चन्दन क्या है ? अब तो है बस, शानो-शौकत, आखिर, रिश्तों का मंथन क्या ? किसको वक्त है? समझौते का, कौन लड रहा मझधारों से? अब रिश्ते होते देखें हैं, मैंने, कारोबारों से ।। परिचय :- आकाश सेमवाल पिता : नत्थीलाल सेमवाल माता : हर्षपति देवी निवास : ऋषिकेश (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
दोस्त
कविता

दोस्त

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** कुछ दोस्त उसके। उसे मौत के मुंह तक ले गए। घर की चोखट पर आ के उसके। जिंदगी से दूर सबसे दूर ले गए।। कुछ दोस्त उसके। फरेबी चेहरों को वो जान ना पाया। मतलबी इरादों को भी भाप ना पाया। जिसने किसी ने भी चेहरा दिखाया। सच दोस्तों का उसे कभी ना नज़र आया। कुछ दोस्त उसके। उसे मौत के मुंह तक ले गए। घर की चोखट पर आ के उसके। जिंदगी से दूर सबसे दूर ले गए।। बार-बार धोखों को नजरअंदाज करता रहा। सबको अपने जैसा समझ माफ करता रहा। सोचता था .... रब सब देखता है। फिर क्यों अच्छे लोगों की जिंदगी में बुरों को भेजता है। जिंदगी के सुख-चैन से इस तरह से आराम से खेलता है। कुछ दोस्त उसके। उसे मौत के मुंह तक ले गए। घर की चोखट पर आ के उसके। जिंदगी से दूर सबसे दूर ले गए।। काश!!!!! वक्त रहते समझ जाता। झूठे चेहरों पे विश...
काव्य व्यथा
कविता

काव्य व्यथा

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** कविता की पंक्ति एक, कवि कोई लिखता है रख जेब में पेंट की, कवि भूल जाता है। धोबी घाट गया पेंट, कविता पंक्ति पाता है वो कविता की लाइन, आगे लिख जाता है। कवि अपने पेंट को, हाथ डालता जेब में भूली पर्ची पंक्ति अब, आगे लिखा पाता है। अज्ञात कवि जिक्र को, मित्र को सुनाए कवि बढ़ी पंक्ति लिखा कौन, याद नहीं आता है। कविता तो बढ़े आगे, लेखक ही अज्ञात है रचना नई पंक्ति की, फिक्र करे कवि सदा परेशान तो मित्र भी, पंक्ति रचनाकार को जाने कब याद आए, शीघ्र बताता नहीं। पहली दूसरी पंक्ति तो, कवि पहचान लाए एक शब्द भाव पूरा, बता ऐसे जाती है। कवि नाम प्यास देखी, मित्र इंतजार करे कविता चिंता फिक्र तो, कवि को सताती है। परिचय :- विजय कुमार गुप्ता जन्म : १२ मई १९५६ निवासी : दुर्ग छत्तीसगढ़ उद्योगपति : १९७८ से विजय इंडस्ट्रीज दुर्ग साह...
रहने दो
कविता

रहने दो

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** कुछ ख्वाब कुछ यादें मुझ में रहने दो न मिल सको तो न मिलो खुद को मुझ में ही रहने दो। बीता हुआ वक्त और बीती हुई बातें कभी लौट कर नहीं आती, मगर फिर भी उन यादों को मुझ में सिमटे रहने दो। जो भूल चुका है उसे भूलाने दो फिर भी तुम अतीत में बिखरी हुई भूली हुई यादों को मुझ ही में रहने दो। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
अंधेरा अच्छा नहीं साहब
कविता

अंधेरा अच्छा नहीं साहब

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ ******************** सदियों से अंधेरे में रहे हैं, पल पल तकलीफें सहे हैं, कभी किसी से कुछ नहीं कहे हैं, हमने कभी किसी का रक्त नहीं बहाया पर पग-पग हमारे रक्त बहे हैं, हम कोई रात्रिचर जंतु जानवर तो नहीं कि अंधेरा हमें पसंद हो, हमने कभी नहीं चाहा कि किसी के साथ हमारा द्वंद्व हो, अपने हिसाब से रहने की, अपने हिसाब से चलने की, इतराने की, मचलने की, हमारी भी इच्छा रही है, पर तब हम पर जबरन अंधेरा थोपा गया था, काले विधानों के जरिए हमारे पीठ में छुरा घोंपा गया था, अंग्रेजों से आजादी आप लोग पा गये, लेकिन हम तो वहीं के वहीं रह गये, आपका छप्पन भोग जारी है अपने हिस्से अभी भी अंधियारी है, इसके लिए आपकी वहीं पुरातन सोच जिम्मेदार है, आपके सोच बता रहे हैं कि अभी भी आप मानसिक बीमार हैं, चार दिनों तक इस थोपे गये अंधेरे में रहकर देखिये, तब आप ...
मेरे दादा (पिताजी)
कविता

मेरे दादा (पिताजी)

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दादा मेरे थे, मेरी जान से प्यारे, दुनिया से निराले, सपनों में कभी आते नहीं दूर एक गाँव में उनका निवास था खलिहान खेत रोज़ जाना उन्हें भाता मजदूरों से भी प्यार जताना उन्हें आता भूखा न किसी को कभी रखते मेरे दादा ऐसे थे मेरे दादा.... सपनों में सूरज से पहले उठना अच्छा उन्हें लगता रंभाती हुई गायों को दुहते थे सुबह शाम सहलाते हुए लाड़ जताते बहुत ही थे छोनों को खूब दूध पिलाते मेरे दादा ऐसे थे मेरे दादा.... सपनों में थाली में गरम दाल व ज्वार की रोटी हर चीज़ बड़े शौक से खाते सभी जगह ऊपर से उन्हें नमक नहीं चाहिए कभी नखरे नहीं खाने में दिखाते मेरे दादा ऐसे थे मेरे दादा.... सपनों में दुख दर्द दास्ताँ लिए सब लोग आते थे काँधे पे हाथ रखकर समझाते सभी को कचहरी भी रोज़ लगा करके बैठते कुछ चाय नाश्ता भी कराते मेरे दादा ऐसे थे मे...
द्वार-द्वार दीप जला लो
कविता

द्वार-द्वार दीप जला लो

देवप्रसाद पात्रे मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** द्वार-द्वार में दीप जला लो। आगोश में आई खुशहाली।। घर-आंगन को महका लो। मिल के मना लो दीवाली।। हर सीने में प्रेम का साज लिए। हंसी खुशी का मन में राग लिए।। हर गली की दुकानें हैं सजने लगे। जगमगाते नए रंग में दिखने लगे।। टिमटिमाते बिजलियाँ फूल मालाएं, शोभा बढ़ गई है बाजारों की। आसमां से उतर आई हो जैसे, बारात चाँद-सितारों की।। चौमास कड़ी मेहनत खेतों में। आज खुशी से झूम रहे किसान।। बारहमास पेट की भूख मिटाने। धन-धान्य से भर रहे खलिहान।। अलबेलों की आतिशबाजियां, आकाश में गुंजायमान है। सर्वधर्म समभाव समाया, देखो मेरा भारत महान है।। परिचय :  देवप्रसाद पात्रे निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी ...