हां मैं पुरुष हूं …
संजय कुमार नेमा
भोपाल (मध्य प्रदेश)
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हां मैं पुरुष हूं ।।
विधाता की रचना हूं।
मैंब्रह्मा हूं, विष्णु हूं, महेश हूं।
मै एक पुरुष हूं।।
नारी का अभिमान हूं,
नारी का सौभाग्य हूं।
हां में एक पुरुष हूं।।
मन की बात मन में रखकर
ऊपर से हरदम,
खुशमिजाज दिखने वाला
परिवार की जिम्मेदारी
निभाने वाला।
हां मैं पुरुष हूं।।
पिता का
स्वाभिमान हूं,
मां के आंचल का
अभिमान हूं।
बचपन से घर की
जिम्मेदारी लेने वाला
पिता के सपनों को
साकार करने वाला।
हां मैं एक पुरुष हूं मैं।।
जीवन में आतेही,
आपेक्षाओं से
लगता है यह जीवन।
बहन की शादी के
सपनों का आधार हूं।
हां मैं एक पुरुष हूं।।
थक कर कभी हारा नहीं,
निरंतर मुझको
चलना है हरदम।।
आशाओं की मीनार हूं।
परिवार का आधार स्तंभ हूं।।
हां मैं एक पुरुष हूं।।
रो में सकता नहीं,
डर अपना
बतला सकता नहीं।
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