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पद्य

दीप जलाएं बैठा हूं
स्तुति

दीप जलाएं बैठा हूं

आकाश सेमवाल ऋषिकेश (उत्तराखंड) ******************** चकाचौंध की रौनक न मां, दीप जलाएं बैठा हूं। संगीत-गीत न तंत्र-मंत्र न, जय माता दी कहता हूं।। स्वर्ण कलश न स्वर्ण मूर्ति न, न स्वर्णजड़ित सिंघासन है। काष्ठ आड में रखा है तुझको, जर्जर वस्त्र का आसन है। नैवेद्य नहीं फल-फूल नहीं मां, मैं गुड चढ़ाएं बैठा हूं।। चकाचौंध की रौनक न मां, दीप जलाएं बैठा हूं। कर्पूर नहीं मां धूप नहीं, न कर पाऊं श्रृंगार तेरा। नूपुर नहीं, करधनी नहीं, ना भोगने योग्य आहार तेरा। इत्र नहीं, सिन्दूर नही मां, सर झुकाए बैठा हूं।। चकाचौंध की रौनक न मां, दीप जलाएं बैठा हूं। परिचय :- आकाश सेमवाल पिता : नत्थीलाल सेमवाल माता : हर्षपति देवी निवास : ऋषिकेश (उत्तराखंड) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
गरीबी अमीरी से जब
कविता

गरीबी अमीरी से जब

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई गरीबी हुई खामोश तो अमीरी खुदा हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। दुआएं बिकने लगी अब बाजारों में गरीबों को तो दुआ भी अब बद्दुआ हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। आग और पानी का कोई मेल नहीं लेकिन आमिर के आगे वह भी मरहवा हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। अमीरी की हवा ही चली कुछ इस तरह गरीबी की हवा खुद हवा हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। गुनाहगार बचते रहे सजाओ से और बेगुनाहों को सजा पर सजा हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। गरीबी भी याद आने लगी उनको जब अमीरी जब उनसे खफा हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। "अरविंद" कहे ना कर तू घमंड अपनी अमीरी पर इतना वक्त के आगे वह भी फना हो गई। गरीबी अमीरी से जब जुदा हो गई।। परिचय :...
मांँ बचाओ अब नरसंहार
स्तुति

मांँ बचाओ अब नरसंहार

राम रतन श्रीवास बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** जीव जगत रण चंडिका, करते नमन विश्व जगदंबिका। कष्ट हरो भव पार लगाओ, नाकाम करो कोरोना को हराओ।। मांँ बचाओ अब नरसंहार.... त्राहि मची है जंग छिड़ी है, शत्रु अदृश्य आन पड़ी है। विनाश लिए लक्ष्य खड़ी है, जगत में विपदा आन पड़ीं है।। मांँ बचाओ अब नरसंहार.... हे त्रिपुरसुंदरी ,अष्ट भवानी, हे काल रात्रि , जगत कल्यानी । तुझमें शक्ति तुझमें भक्ति, तू ही बलिदान, आत्म सम्मान।। मांँ बचाओ अब नरसंहार.... मांँ की आंचल पुत्र सुरक्षा, ब्याधी हटाओ कर दो रक्षा। आरत वाणी तुम्हें पुकारे, राम तुम्हारी जय जय कार करें।। मांँ बचाओ अब नरसंहार.... परिचय :-  राम रतन श्रीवास निवासी : बिलासपुर (छत्तीसगढ़) साहित्य क्षेत्र : कन्नौजिया श्रीवास समाज साहित्यिक मंच छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष सम्मान : कोरबा मितान सम्मान २०२१ (समाजिक चेतना एवं सद...
प्यासा प्यासा
कविता

प्यासा प्यासा

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहीं कोई मिलता है बिछड़ जाने के लिए क्यों हुक सी उठती है फिर मिलने के लिए तमाम शब खोया रहा खयाल में उसके ज्यू खो जाता है चांद घटाओं में ना जाने कब तक रोती रही आंखें बेदर्द हाल मेरा देखकर दीवारें भी शिकवे करने लगी उस के कहीं कोई मिलता है बिछड़ जाने के लिए बीता लम्हा बीता अरसा सावन बीता भादो विता चंचल किरणों में पूनम विधि अंधियारी बीती रिति हर कोई था यहां सबका अपना अपना नदी किनारे मै ही था प्यासा प्यासा कहीं कोई मिलता है बिछड़ जाने के लिए परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा स...
मैया तेरे स्वागत में
कविता

मैया तेरे स्वागत में

आशीष कुमार मीणा जोधपुर (राजस्थान) ******************** मैया तेरे स्वागत में रहें देव सारे। दैत्यों ने छीन लिए जब राजपाट सारे सबको बचाया आके आये जब द्वारे मैया तेरे स्वागत.... मैया के क्रोध का कोई पार नहीं पावे महिषासुर वध किया,शुम्भ निशुम्भ मारे मैया तेरे स्वागत .... मैया आओ वास करो आँगन द्वारे दूर हों संकट रिद्धि- सिद्धि पधारे मैया तेरे स्वागत.... धरती आकाश काँपे जब काली रूप धारे महागौरी बनकर खुशियों के खोल दे भंडारे मैया तेरे स्वागत................. फिर से पधारों माँ, जग को संवारो छाए हैं संकट कितने पाप अंधियारे मैया तेरे स्वागत.... परिचय :- आशीष कुमार मीणा निवासी : जोधपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छाय...
लाडली
कविता

लाडली

आस्था दीक्षित  कानपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** आनंद मेरा बन के मुझको, कैसे सजा रही घुटनों घुटनों चल रही है, पास फिर बुला रही लाड लाड लाडली, ये लाडली, ये लाडली लाडली ये मेरी, लाड-लाड-लाड-लाडली... झुनझुने की ताल से, दासों दिशा है झूमती हँस के वो जो देखती है, खुशियां जैसे चूमती खुश हूं इतनी कि मैं सारी दौलते हूं पा रही लाडली ये मेरी, धीरे-धीरे मुस्कुरा रही.... लाडली ये मेरी, लाड-लाड-लाड-लाडली... सोम सी है आंखे, मसूड़ों से अब चबा रही हाथों में है कंगन, और तालिया बजा रही किलकारियों से मेरे घर को ये खिला रही लाडली ये मेरी, घर को गुलजार कर रही... लाडली ये मेरी, लाड-लाड-लाड-लाडली... चल रही है घुटनों घुटनों, नन्हे हाथ खींच कर हाथ में जो आ गया, वो फेंके आंखे मींच कर जाने कौन-कौन से वो गाने गुनगुना रही लाडली ये मेरी, शैतानियां भी कर रही... ला...
स्याही
कविता

स्याही

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** रंग है तेरा स्याह, पर अद्भुत है तेरी सुंदरता खुद को खुद से सजाती हुई कभी हंसती, कभी रुलाती कभी गुदगुदाती भी है।। हर पल हर काल की साक्षी बनी है तू वर्णित किया है दुनिया का इतिहास, दिया वेद पुराण, महाग्रंथो का ज्ञान।। राम रहीम गुरुनानक ईसा, हर रूप का परिचय कराती कालांतर से तुम।। वीरों की गाथा, रचनाकार की रचना को जीवित किया है, पन्नों पर तुमने।। लोरियां कहानियां, गीत-गजल, को सुंदरता से उकेरती सी, जीवन के नौ रूप नौ रंगों को कारीगरी से उभरती हो तुम।। हर पोथी हर ग्रंथ को दिया है अकल्पनीय रूप तुमने।। ना हो सके अनुभूति जिन भावनाओं की, उनसे भी साक्षात्कार करती हो तुम।। ना मिटा सके कोई अस्तित्व तेरा, "इतना सुंदर अविष्कार हो तुम"!! परिचय :- श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी प...
अपनी राहों पर
कविता

अपनी राहों पर

प्रमोद गुप्त जहांगीराबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** बारूदों की, मस्तिष्कों में- देखो फसलें उगा रहे हैं, स्वार्थ सिद्ध करने के हेतु रोबोटों को जगा रहे हैं । युद्ध क्षेत्र या राजनीति है- राजमहल के अन्दर झाँको, कौन शत्रु व कौन मित्र है- तुम हर दल के अन्दर झाँको, पता नहीं जब तुमको भैया- फिर क्यों बुद्धि खपा रहे हैं । जैसे तुम ही बस राजा हो- यह अहसास कराया तुमको, कर्तव्यों को दूर हटाकर- अधिकार, समझाया तुमको, लौट आओ अपनी राहों पर- फंस जालों में, फंसा रहे हैं । परिचय :- प्रमोद गुप्त निवासी : जहांगीराबाद, बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) प्रकाशन : नवम्बर १९८७ में प्रथम बार हिन्दी साहित्य की सर्वश्रेठ मासिक पत्रिका-"कादम्बिनी" में चार कविताएं- संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाशित हुईं, उसके बाद -वीर अर्जुन, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, युग धर्म, विश्व मानव,...
लक्ष्य पाने के सूत्र
कविता

लक्ष्य पाने के सूत्र

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** अगर पैरो में हो चोट साथ में हो छोटी सोच। तो इंसान जिंदगी में आगे नहीं बढ़ सकेगा। इसलिए दोनों का इलाज इंसान के लिए जरूरी है। ये डाक्टर के इलाज से और खुदके आत्ममंथन ठीक होगा।। काम से पहीचान होती है इंसान की इसलिए कर्म करना जरूरी है। महंगे कपड़े तो दूकान के पुतले भी पहनाकर रखते है। इसलिए अपने जीवन को शो की चीज न बनाये। और खुदके कार्यो से अपनी एक पहचान बनाये।। कमाया गया परिग्रह को कुछ दानधर्म और परोपकार में लगाए। तो आपके परिणामों को स्वंय ही शांति मिल जायेगी। और स्वंय के स्वाध्याय से आपको आत्मबोध होगा। आत्मबोध से समाधि मिलेगी। इसलिए नियमित स्वाध्याय करे। और मोक्ष मार्ग को प्राप्त करे।। जो कार्य तपस्या से भी जिंदगी में नहीं हो सकता। वह भावना से हो जाता है। इसलिए भावों को शुध्द बनाये। और अच्छी भावनाएं आत्मा के...
शिक्षक का आदर्श भाव
कविता

शिक्षक का आदर्श भाव

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** विश्व के इतिहास में शिक्षक सदैव अमर ही रहेगा। जब तक साँस है शिक्षा का अलख जगाते ही रहेगा।। अंधकार भगाकर उजियारा में रहना सिखाता है दीपक बनकर दीप प्रज्वलित कराना सिखाता है। अपनी आभा बिखेरकर प्रतिभा को उकेरते ही रहेगा ... माता प्रथम गुरू जो अंगुली पकड़कर चलना सिखाती है, ममता वात्सल्य लुटाकर सदा आगे बढ़ना ही सिखाती है। मुश्किलों से लड़कर जीवन को धन्य बनाते ही रहेगा ... पिता द्वितीय गुरू जो पढ़ा लिखाकर गुणवान बनाता है, सद्गति कर्मो से ही पैरों में खड़ा होना ही सिखाता है। शुद्ध भाव से बच्चे माँ-बाप का फर्ज निभाते ही रहेगा ... सत्मार्ग दिखाकर एक अच्छा इंसान ही बनाता है, अपने बल बुद्घि और विद्या से हीरा ही तराशता है। जिंदगी को सँवारकर जीवनभर हुनर सिखाते ही रहेगा ... शिक्षक ही अध्यापक है जो स्वाध्...
हिंदी मेरा अभिमान है
कविता

हिंदी मेरा अभिमान है

कीर्ति मेहता "कोमल" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हिंदी मेरी आन है, हिंदी मेरी शान है सरस्वती का दिया हुआ, अद्भुत ये वरदान है हिन्द की गौरवगाथा है, ये कवियों के प्राण हैं माँ की ममता सी प्यारी, ये भारत की जान है हिंदी मेरा अभिमान है अनेकता में एकता की, परंपरा का ज्ञान है प्रांतों को जोड़े रखती सबकी यह मुस्कान है जिसके बिना हिन्द रुक जाए, ऐसा गौरवगान है हर काल को जिसने जीत लिया ऐसा सुगम उत्थान है हिंदी मेरा अभिमान है इसमें पंत की कोमलता है, जयशंकर का प्रसाद है दिनकर का इसमें ओज है शामिल, जायसी की तान है महादेवी का दर्द भरा, सुभद्रा की शक्ति का भान है मीरा की इसमें भक्ति बसी, तुलसी की ये प्राण है हिंदी मेरा अभिमान है हिंदी से ही हिन्द बना है हिंदी से हिंदुस्तान है आओ इससे प्रेम करें हम यही हमारी शान है हिंदी मेरा अभिमान है परिचय :- कीर्ति ...
दीवाने देश के ….
कविता

दीवाने देश के ….

राजेन्द्र कुमार पाण्डेय 'राज' बागबाहरा (छत्तीसगढ़) ******************** गर जमाने में मिलते हैं कई दीवाने मगर भगतसिंह जैसा कोई नही होगा भोग विलास में डूब मरे कई शासक तिरंगे को कफ़न बनाने वाला वीर था भगतसिंह सिंह जैसे अदम्य साहस से भरे हुए रोम रोम से भारत माता का जय गान गूंजे अंतिम सांस तक देश का गुणगान किये जिंदगी से मोक्ष की कभी लालसा नहीं थी बस तिरंगे से लिपट कर जाने का अरमान था सिर्फ और सिर्फ वतन के लिए सोचता था वो भारत माता के कदम चूमता रहा जिंदगी में देशभक्ति रस में रसमय दीवाना था वो जीता था देश के लिए मर गए वतन के लिए अंजाम की कभी फिक्र नही दीवाने को बस आगाज की बातें करता था जिन्दगी भर वतन परस्ती के मिसाल बनकर इंकलाब लाया बसंती चोला पहनकर विदा हुआ वो मस्ताना था ना तन की चिंता ना धन का परवाह लहू का एक एक कतरा वतन के लिए दिया जिंदगी में बहुत कुछ कर गया वतन ...
शाला परिदृष्य
कविता

शाला परिदृष्य

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** निर्जीव पड़ी इस शाला में, फिर जीवन का संचार हुआ। बच्चों की कोलाहल से फिर, शाला प्रांगण गुलजार हुआ।। मैदान खेल के थे वही, वही मीठी गोली का बाजार हुआ। स्कूल में आकर पढ़ने का, फिर से सपना साकार हुआ।। एक अंतराल के बाद मिले, आपस में खूब प्यार हुआ। फिर शुरु हुई कट्टी बट्टी, फिर जमकर के तकरार हुआ।। अच्छे खासे हम पढ़ते थे, फिर कोरोना का संचार हुआ। स्कूल खुलते फिर बंद होते, एक बार नहीं कई बार हुआ।। मुँह पर थी पट्टी लेकिन, आंखों से ही प्रतिकार हुआ। सही गलत की थी पहचान, प्रभावित बच्चों का व्यवहार हुआ।। खुली टिफ़िन तो एक रोटी का, हिस्सा फिर से चार हुआ। छीना-झपटी पकड़म-पकड़ी, जो जीता वो सरदार हुआ।। थी मोबाइल पर पाबंदी, इस सूचना का प्रसार हुआ। ऑनलाइन की इस अवधि में, मोबाइल ही तारणहार हुआ।। कापी पुस्तक और...
कलयुग का विनाश
कविता

कलयुग का विनाश

मनीष कुमार सिहारे बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** घोर दयनीय दशा देख, मन में उठा सवाल है। ये तांडवम महादेव का, या कलयुग का विनाश है।। बढ़ती महामारी है साथ, काबुल के जंगलों में आग है। अच्छे खासे फसल यहां, गजदलों का प्रहार है।। एक राष्ट्र अफगानिस्तान, आज तालिबानों का गुलाम है। ये कर्मफल है अपना, या ईश्वर की मायाजाल है। है दो देशों का झगड़ा, या तृतीय विश्व युद्ध का कगार है।। घोर दयनीय दशा देख, मन में उठा सवाल है। ये तांडवम महादेव का, या कलयुग का विनाश है।। सतयुग त्रेता द्वापर गए, बचा वो बस इतिहास है। पशु पक्षी अदृश्य हुए, संकट में कलयुग आज है।। बदल रहे ये प्रकृति भी , मौसम में भी बदलाव है। सावन में सुखा खार, और भादो में दरिया बाढ़ है।। लाखों लोग मारे गए, क्या और कब्र तैयार है। कर वाकिफ मुझे ऐ खुदा, क्यों इतना तू नाराज़ हैं।। प्रेम बंधन तूझसे है, ...
गांधी व शास्त्री
कविता

गांधी व शास्त्री

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** भारत में जन्म लिये, तम को प्रकाश किये, कर्म श्रेष्ठ बड़े नेक, फिर दोनों आओ ना। बापू सत्य के पुजारी, अहिँसा थी बड़ी प्यारी, सबको आजाद किये, करो मरो गाओ ना। पग में खड़ाऊं सोहे, धोती में ही तन मोहे, हस्त लाठी लेके चले, वो अगुवा बनाओ ना। भारत के लाल रहे, बहादुर ढाल रहे, एकता के थे पुजारी, सबको बताओ ना। नारा है जय जवान, बढ़ता रहे किसान, सादगी थी बड़ी न्यारी, वो कर्म सीखाओ ना। खुश्बू राम राज की हो, उन्नति आकाश सी हो, दोनों देने एक दिन, अवतार लाओ ना। परिचय :- अशोक शर्मा निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने प...
सफर बापू का ….
कविता

सफर बापू का ….

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** करम चंद और पुतली बाई के यहाँ जन्मा बालक वो मोहन गांधी था.... शुरू से ही देशभक्ति भरपूर भरी थी, विदेश गए बेरिस्टर बन लौटे हिंदुस्तान से प्यार था..... देश को एकजुट किया, नमक कानून तोड़ दिया.... सत्य अहिंसा के बूते आजाद हिंदुस्तान किया, फिरंगी के जुल्मो का उनने व्रत से जवाब दिया.... सबको लेके चलते थे वो, तभी तो बापू नाम मिला.... ऐनक छड़ी और खादी जिनकी पहचान हुई, अपना कार्य स्वयं करो बापू ने सिखलाया है.... भारत की आजादी की अब में असल कहानी बताता हूँ बापू के अहिंसा से और क्रांतिकारियो की ताकत की वो जुगलबंदी काम आई गोरो भारत छोड़ो सुनकर ही गुलामी जाती दी दिखलाई दी..... परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रकाशन : मेरी रचनाएँ गहोई दर...
जयदयालजी गोयन्दका
कविता

जयदयालजी गोयन्दका

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप' तिनसुकिया (असम) ******************** देवपुरुष जीवन गाथा से, प्रेरित जग को करना है, संतों की अमृत वाणी को, अंतर्मन में भरना है। है सौभाग्य मेरा कुछ लिखकर, कार्य करूँ जन हितकारी, शत-शत नमन आपको मेरा, राह दिखायी सुखकारी।१। संत सनातन पूज्य सेठजी, जयदयालजी गोयन्दका, मानव जीवन के हितकारी, एक अलौकिक सा मनका। रूप चतुर्भुज प्रभु विष्णु का, राम आचरण अपनाये, उपदेशों को श्री माधव के, जन-जन तक वो पहुँचाये।२। संवत शत उन्नीस बयालिस, ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी पावन, चूरू राजस्थान प्रान्त में, जन्मे ये भू सरसावन।। माता जिनकी श्यो बाई थी, पिता खूबचँद गोयन्दका, संत अवतरण सुख की बेला, धरती पर दिन खुशियों का।३। दिव्य रूप बालक का सुंदर, मुखमण्डल तेजस्वी था, पाँव दिखे पलना में सुत के, लगता वो ओजस्वी था।। आध्यात्मिक भावों का बालक, दया,प्रेम,सद्भाव लिये, जयदया...
चिंता
कविता

चिंता

राजकमल चतुर्वेदी "पागल पंडित" भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** क्यूं व्यर्थ में चिंता करता है ऐ पंडित पल का भरोसा नही ओर कल की बात करता है। है मिथ्या स्वप्नों का ये जगत ऐ पंडित तू अपने को इसका स्वामी समझता है।। मत बन मूर्ख इस माया के चक्कर मे ऐ पंडित ये माया है तुझे भी छल लेगी, इसने सबको छला है।।। बस फर्क इतना है, एक बंद आँखों का सपना है, और एक खुली आँखों का सपना है। परिचय :-  राजकमल चतुर्वेदी "पागल पंडित" निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, ...
बापूजी
गीतिका

बापूजी

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** बदल लिया है चोला सब ने, बदल गए ढब बापूजी। दिखा रहे दल झूठे सारे, अपने करतब बापूजी।।१ बुरा न बोलो, सुनो, न देखो, बदली सबकी परिभाषा, इन राहों पर चलता कोई, दिखा नहीं अब बापूजी।।२ सत्य अहिंसा दया प्रेम के, अर्थ हुए सब बेमानी, स्वार्थ साधना में रम जाना, सबका मतलब बापूजी।।३ सम्मानों के ओढ़ दुशालें, कलमें भूली बल अपना, शर्मिंदा है नजरें उनकी, बंद पड़े लब बापूजी।।४ चाहा तुमने यहाँ रोपना, भाईचारे के उपवन, भेदभाव के उग आए पर, सारे मजहब बापूजी।।५ टाँग खींचना और गिराना, फिर चढ़ना है ऊपर को, ताड़ रही नजरें सबकी, ऊँचे मनसब बापूजी।।६ आड़ तुम्हारे तस्वीरों की, कब तक इन्हें बचाएगी। तुम्हें बनाने लगे हुए जो, अपना ही रब बापूजी।।७ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणि...
दो अक्टूबर दो पुष्प
कविता

दो अक्टूबर दो पुष्प

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** भारत-भू पर दो अक्टूबर। दो पुष्प अवतरित हो। भारत उपवन में खिले। पहले लाल बहादुर शास्त्री। दूजे महात्मा गांधी। दोनों पावन आत्माएं। भारत-भू पर श्रेष्ठ कर्म। करने आई,दोनों महान। विभूतियां दोनों का व्यक्तित्व। अद्भुत गुणों की खान। लाल बहादुर शास्त्री। विनम्र स्वभाव धनी। गुदड़ी के लाल। जय जवान जय किसान। नारा लगा दोनों का सम्मान। सदा किया। गांधीजी चले सत्य। अहिंसा मार्ग बापू कहलाए। करो या मरो नारा अपना। मौन रह सत्याग्रह कर। भारत स्वतंत्र करावाएं। अंग्रेजों की गुलामी से। अंग्रेजों को भारत से बाहर। खदेड़ भारत बापू बन गए। परिचय :- श्रीमती संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया निवासी : भोपाल (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कव...
भाग्य विधाता
कविता

भाग्य विधाता

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** बापू मेरे भारत भाग्य विधाता। थे वे सत्य अहिंसा पथ प्रदाता। पुतलीबाई कबा गांधी के प्यारे, साबरमती के संत स्वराज दाता। बने पहचान शांति दूत सत्याग्रही, राष्ट्रपिता इन्हें जन-जन पुकारता। हमें मिला आजादी का उजियारा, चलके बापू का चरखा सूत काता। यह गाते रघुपति राघव राजा राम, जोड़े जन हित अफ्रीका से नाता। जो खेड़ा चम्पारण से शुरू किया, बन गये हर आंदोलन के प्रणेता। अंग्रेजों भारत छोड़ो उद्घोष हुआ, किये गर्जना भारत के जन नेता। घर- घर बिगुल बजा आजादी का, परदेशी का यूं छूट पसीना जाता। मचा ब्रिटिश रानी के घर हड़कंप, अंतिम गौरों ने छोड़ी भारत माता। परिचय :- डॉ. भगवान सहाय मीना (वरिष्ठ अध्यापक राजस्थान सरकार) निवासी : बाड़ा पदम पुरा, जयपुर, राजस्थान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिक...
कृष्ण
कविता

कृष्ण

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** कृष्ण सदा सब गुण निपुण दें सबको आशीष, राग-द्वेष से मुक्त हों उन्नत हरदम शीश कर्म पुरोधा कृष्ण का अद्भुत है व्यक्तित्व सुमिरन से संशय मिट जाते अनुकरणीय कृतित्व निज हित से ऊपर रहे सदा राष्ट्र का मान विकसित होते देश से है अपनी पहचान अहं न सिर में पालिए घटता है सम्मान कौरव कुल का हो गया खंड-खंड अभिमान। नीति-नियंता कृष्ण सा हुआ न जग में कोय करें कर्म निष्काम सब आनंदित सब सोय सत्य घिरा हो धुंध मे आता सीना फार झूठ सबल दिखता भले पर जाता है हार माधव बनकर सारथी करिए फिर उपकार हारें सभी शत्रु भारत के हों उनका संहार परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्रदेश सम्प्रति : मनोविज्ञान विभाग काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, उत्तर प्रदेश रुचि : पुस्तक लेखन, ...
श्री लालबहादुर शास्त्री
कविता

श्री लालबहादुर शास्त्री

सुरेश चन्द्र जोशी विनोद नगर (दिल्ली) ******************** शिक्षक शारदा प्रसाद गृहस्थी में, राम दुलारी के पति हुए। घर उनके दो अक्टूबर तिथि को, लालबहादुर एक सपूत दुलारी के हुए।। अति स्नेह से कुटुम्ब ने, नन्हे जो अभिधान दिया। अठारह मासावस्था में विधि ने, नन्हे के पिता को निधन दिया।। प्राथमिक शिक्षा ननिहाल हुई, प्राप्तोपाधि काशी विद्यापीठ से हुई। किया दूर स्व-पैतृक उपाधि को, जोड़ी उपाधि शास्त्री पाई हुई।। "अंग्रेजो भारत छोड़ो" को किसी ने, "करो या मरो" में बदल दिया। देशभक्त लाल बहादुर शास्त्री ने भी, "मरो नहीं मारो" में बदल दिया।। बने संसदीय सचिव पंत शासन में, पुलिस, परिवहन मंत्रालय, भार दिया। फिर शासक ने स्वार्थ के लिए, दल का महासचिव बना दिया।। स्वच्छ सुंदर व्यक्तित्व ने उनको, द्वितीय प्रधानमंत्री भारत का बना दिया। नौ जून उन्नीस सौ चौसठ को, राष्ट्र ने पदभार ग्रहण कर...
गांधीगिरी
कविता

गांधीगिरी

बिपिन कुमार चौधरी कटिहार, (बिहार) ******************** सत्य अहिंसा का देकर नारा, जीवन भर वह अटल रहे, देश परदेश में सहा सितम, कब कहां वो विकल रहे, दुर्बल तन और निर्मल मन, संघर्षपथ पर सदा अविरल रहे, यातनाएं सही, पीड़ाएं झेला, चरखा चला, मचाते हलचल रहे, फिरंगियों के नाक में करके दम, देश आजाद कराने में सफल रहे, किया नहीं कभी पद की चाह, जीवनभर वह सरल रहे, सत्ता के हवसी लेकर उनका नाम, दुर्भाग्य, हर पल जनता को छल रहे, पूछता है, यह दुःसाहसी बिपिन, सही में गांधीगिरी पर कौन चल रहे... परिचय :- बिपिन बिपिन कुमार चौधरी (शिक्षक) निवासी : कटिहार, बिहार घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय ...
कैसे लम्हा-पल निकलेगा
ग़ज़ल

कैसे लम्हा-पल निकलेगा

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** सुनकर जिससे हल निकलेगा। फ़िकरा वो ही चल निकलेगा। जब भीतर की गाँठ खुलेगी, तब बाहर का सल निकलेगा। आज बिताया हमनें जैसा, वैसा अपना कल निकलेगा। टकसालें जो सूरत देगी, सिक्का वैसा ढल निकलेगा। खून-पसीना ,काम के ज़रिए, अक़्सर मीठा फ़ल निकलेगा। रस्सी आख़िर जल जाएगी, फिर भी उसमें बल निकलेगा। भूली-बिसरी यादों के संग, कैसे लम्हा-पल निकलेगा। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहान...