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पद्य

मुस्कान
कविता

मुस्कान

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** प्रिये ! मधुर मधु-सी तुम्हारी मुस्कान सजाने लगी आकर अधरन बंधनवार स्मृति विथियों से ध्वनित तुम्हारी पदचाप हृदय बसी छवि ले आई यादों का मधुमास जूही-सी सुकुमार कली चंपे सी सुवास तन-मन महका गई महकी-सी हर सांस हिय हिलोर नित-नित निहारन की आस सांझ सवेरे रहती हरदम दिल के पास मैं तितलि अजान-सी तुम भ्रमर बन गाते गान फूल-फूल मंडराते हम दिखलाते अपना मान सुमन रस पगी तुम्हारी कोमल सुरभित गात उपवन खिल उठता था मानो पाकर हमारा साथ तरु-तरु शाख-शाख थी झूमती-सी डोलती अल्हड़ समीर मस्ती में मस्त सी हर्षित हो बरसाती थी अपने झर-झर पात प्रिये!! तुम संग मधुर मिलन फिर आया याद परिचय :-  निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना,...
गर्भ में बेटी की पुकार
कविता

गर्भ में बेटी की पुकार

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** गर्भ में बेटी करे पुकार मेरी मैया मुझे न मार। दिल में मेरे है अरमान मैं भी देखूं जग-संसार पाऊं मैं सब का प्यार मेरी मैया मुझे न मार। पाकर तुम्हारा स्नेह-दुलार मैं भी भरूंगी ऊंची उड़ान छू कर मैं अनंत आकाश सपने सभी करूंगी साकार सुन ले तू मेरी मनुहार मेरी मैया मुझे न मार। ऊंचा करूंगी कुल का नाम पूरा करूंगी सबका अरमान जीने का दो तुम अधिकार मेरी मैया मुझे न मार। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
माँ
कविता

माँ

डॉ. मोहन लाल अरोड़ा ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) ******************** जिसने मुझे लिखा उसके लिए मै क्या लिख दुँ कोई पुछे मुझ से रब का तो मै बस माँ ही लिख दुँ वतन के लिए जिन्होंने कुर्बान किए अपने बेटे सबसे पहले उन्ही माताओ का नाम लिख दुँ जिन की आँखो से देखी मैने दुनिया वो नाम बस माँ लिख दुँ कही झोपड़ी तो कही सड़क पर रो रही थी माताऐ मोहन कैसे मै लिख दुँ मेरी माँ खुश थी जिस ने मुझे लिखा उसके लिए मै क्या लिख दुँ...। परिचय :- डॉ. मोहन लाल अरोड़ा कवि लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता निवासी : ऐलनाबाद सिरसा (हरियाणा) प्रकाशन : ३ उपन्यास, ७२ कविता, ७ लघु कथा १२ सांझा काव्य संग्रह प्रकाशित, काव्याअंकुर मे ३७ रचना प्रकाशित उपलब्धियां : मुलतानी साहित्य मे प्रसंशा पत्र, हिंदी रचनाओ मे बहुत प्रसंशा पत्र घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एव...
आओं तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ।
कविता

आओं तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ।

नरपत परिहार 'विद्रोही' उसरवास (राजस्थान) ******************** आओं तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ। विज्ञान धरती और पोकरण दिखाता हूँ। शाश्वत समाधि रामा पीर दिखाता हूँ। आओ तुम्हें खनिजों का भण्डार दिखाता हूँ। इन रेतीले धोरों में मृगतृष्णा का संसार दिखाता हूँ। भेड़-बकरी, ऊँट और गोडावन का घर दिखाता हूँ। आओ तुम्हें केर-काचरी, कुमट-सांगरी का साग खिलाता हूँ। जबरौ जैसलमेर अर जवानों की देवी तमाम दिखाता हूँ।। ख्वाइशें हैं मन के भीतर, तुम्हें पुरा राजस्थान दिखाता हूँ। आओ तुम्हें राजस्थान दिखाता हूँ। गढ़ चिंतामणि चिडि़याटूँक दिखाता हूँ। परि-देवताओं से निर्मित मेहरानगढ़ दिखाता हूँ। आओ तुम्हें बलिदानी रखिया राजाराम दिखाता हूँ। मण्डोर, ओसिया अर जसवन्त थडा़ तमाम दिखाता हूँ। भली धरती जोधाणे री, आओ तुम्हें सूर्यनगरी और घंटाघर दिखाता हूँ। सुवर्णनगरी में काहन्ड़देव का शौर्य ...
करते है चिकित्सक का सम्मान
कविता

करते है चिकित्सक का सम्मान

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** पढ़ लिखकर जो पाए ज्ञान, सेवा करें जो जीव कल्याण। मरीजों की जो बचाएँ जान, बनता वही चिकित्सक महान। करते हैं चिकित्सक का सम्मान। सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। कोई मन की इलाज करते हैं, कोई रोगियों की सेवा करते हैं। कोई मीठी बोली ही बोलते हैं , कोई धैर्य का पालन करते हैं। स्वस्थ हो जाते हैं आखिर इंसान। सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। मरीजों से करते हैं जो प्यार, मिट जाते हैं सब मनो विकार। अस्वच्छता से होते हैं बीमार, जांच परख से करते हैं उपचार। तंदुरुस्त कर देते हैं जीवन महान। सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। योद्धा बनकर सेवा करते, रात दिन मेहनत वो करते। शल्यक्रिया समय देख करते, संयम नियम का पालन करते। श्रवण करते हैं चिकित्सक का मान सचमुच में हैं वे धरती के भगवान।। परिचय :...
प्रेम और स्पर्श
कविता

प्रेम और स्पर्श

श्वेता अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** किसी के साथ की जरूरत होती है जब हम पूरी तरह टूट जाते है, चाहते है किसी ऐसे पवित्र स्पर्श को जो हमे अहसास दिलाए कि टूटे दिल भी जुड जाते है! तपती धूप मे थोडी सी सहानुभूति भी जरूरी है, सच्चे प्रेम और स्पर्श की अनुभूति भी जरूरी है! कभी-कभी तो अनजान भी अपनो से ज्यादा गहरा रिश्ता निभाते है, दिलासा के दो बोल मरहम का काम करते है, जब दिल पर गहरे घाव आते है! जब हो भीड मे हम अकेले, तो प्यार भरा स्पर्श पाकर आनंदित हम हो जाते है, नीर भरे नैना भी समंदर बन जाते है, जब हम सच्चा प्रेम और स्पर्श किसी का पाते है! परिचय :-  श्‍वेता अरोड़ा निवासी : शाहदरा दिल्ली घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्...
नूर गुलाबी ओढ़कर
कविता

नूर गुलाबी ओढ़कर

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** नूर गुलाबी ओढ़कर, प्रभु करे निवास, मनोकामना पूर्ण हो, आये सबको रास, उसकी कृपा से ही, आये जन को सांस, उसके ही आधीन, बनकर उनका दास। नूर गुलाबी ओढ़कर, करता है इंसाफ, दोषी को सजा मिले, निर्दोष हो माफ, उसके ही प्रताप से, करते सभी जाप, पापी कितने ही हो, कर देता है साफ। नूर गुलाबी ओढ़कर, जन को देता बल, गरीब इंसान सदा, बन जाता है सबल, हर समस्या का वो, करता पल में हल, हर जगह मिलता है, वायु हो या जल। नूर गुलाबी ओढ़कर, दिखलाता है रूप, इज्जत मान बढ़ जाये, बेशक हो कुरूप, पूजा सभी हैं करते, लेकर हाथ में धूप, उसके ही आधीन है, रंक हो या भूप। नूर गुलाबी ओढ़कर, भर दे मन में जोश, उसकी लाठी जब पड़े, खो देता है होश, जिसने नाम ना जपा, उसे है अफसोस, अंतिम सत्य रूप में, ले लेता आगोश। नूर गुलाबी ओढ़कर, बूझा देता है प्य...
श्री गोवर्धन चालीसा
दोहा

श्री गोवर्धन चालीसा

डाॅ. दशरथ मसानिया आगर  मालवा म.प्र. ******************* गोवर्धन गौआ चरण, घांस पात भंडार। कणकण में राधारमण, कहे मसान विचार।। जय जय गोवर्धन महराजा। ग्वालबाल के तुम ही राजा।।१ छप्पन भोग तुम्हें लगाऊं। नित उठ पूजा कर गुण गाऊं।।२ गौ माता के पालन हारा । घांस पात के तुम भंडारा।।३ पर्यावरण के हो तुम रूपा। छाया फल दे संत स्वरूपा।।४ जीव जन्तु के तुम रखवारे। पंछी करते कलरव सारे।।५ सात कोस की करे चलाई। कोई चलते दंडवत जाई।।६ लाल लंगुरों की चपलाई। फल फूलों को लेत छुडाई।।७ लाला ने जब तुम्हे उठाये। तब से गिरधारी कहलाये।।८ जय गिरधर जय पर्वत राजा। माथमुकुट भौ तिलक विराजा।।९ जतीपुरा अरु मानस गंगा। दान घाटी से धरम प्रसंगा।।१० नंगे पैर अरु हाथन माला। मुख में नाम भजें गोपाला।।११ हर पाथर है सालग रामा। तेरी रज मे बसती श्यामा।।१२ सात दिनों की बरसा भारी। हा हा...
जब तुम आये थे
मुक्तक

जब तुम आये थे

सुखप्रीत सिंह "सुखी" शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** तूफ़ान थमने लगे थे, जब तुम आये थे अरमान जगने लगे थे, जब तुम आये थे रुह भी जिस्म से निकलने को बेचैन थी हाथ सज़दे में उठने लगे थे, जब तुम आये थे परिचय :-  सुखप्रीत सिंह "सुखी" निवासी : शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 आपको ...
आओ फिर लौट चले बचपन की ओर
कविता

आओ फिर लौट चले बचपन की ओर

कीर्ति सिंह गौड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जब लड़ते थे झगड़ते थे, बात बात पर यारों से अकड़ते थे। सहेली की गुड़ियों की शादी में, जब सज-धज कर जाते थे और दावत भी उड़ाते थे। तब माँ का ये कहना कुछ रास नहीं आता था, कि जल्दी आना। अभी तो घर से निकले ही कहाँ थे, कि माँ का ये फ़रमान सुनाना। शाम के वक़्त का इन्तज़ार, जब मिलेंगे यार और खेलेंगे बेशुमार। बड़ों की दुनियाँ से दूर, अपनी ही मस्ती में चूर। खेलने का वक़्त ख़त्म होने पर, माँ का बुलावा आना और कहना। अगर वक़्त का ख़याल नहीं तो, घर मत आना अपने दोस्त के घर ही सो जाना। नज़दीक आता इम्तिहान का वक़्त और बढ़ती बेचैनी, किसी का पास तो किसी का फेल हो जाना। होली के रंगों की ख़रीदारी लिए, साथ में बाज़ार जाना। छत पर संक्रांति की पतंग साथ उड़ाना। जन्मदिन पर मावे का केक, और ढेर सारी भेंट और न जाने क्या ...
बदरा घिर आये
कविता

बदरा घिर आये

मनोरमा जोशी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गगन घन घिरे, पवन फिर उड़े, घटा बन छायों रे, सावन आयो रे। उगेगीं अब नयी कोपलें, लहरायेगी बैले, अठखेली कर रही रशमियां, हरियाली खेले, घरती ने श्रृंगार किया है, रुप अनोखा पायो रे। सावन आयो रे। गुन-गुन कर रहीं चिरैयां, नया संदेशा लाये, भंवरें की गुंजन सुनके, कलियां भी मुस्काये, फूलों से सज गया बगीचा राग मल्हार सुनाये रे सावन आयो रे। चैती की गर्मी से उबरे, जीवन नया मिला है, दुखः के बौने पाँव हुऐ है, सूरज मुखी खिला है, धरती से अंबर तक किसने धानी रंग बगरायो रे, सावन आयो रे। परिचय :-  श्रीमती मनोरमा जोशी का निवास मध्यप्रदेश के इंदौर में है। आपका साहित्यिक उपनाम ‘मनु’ है। आपकी जन्मतिथि १९ दिसम्बर १९५३ और जन्मस्थान नरसिंहगढ़ है। शिक्षा - स्नातकोत्तर और संगीत है। कार्यक्षेत्र - सामाजिक क्षेत्र-इन्दौर शहर ही है। ले...
ये देखो कैसा आया जमाना है।
कविता

ये देखो कैसा आया जमाना है।

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** घराती को पानी खरीद कर लाना है, ये देखो कैसा अब आया जमाना है। बारात में यदि खाना हमें खाना है, तो खाना खड़े होकर ही खाना है। रसोई में खाना खड़े-खड़े बनाना है, ये कैसा देखो अब आया जमाना है। खुद थाली व खाना लेकर आना है, खड़े-खड़े सबको खाने को खाना है। ये देखो कैसा अब आया जमाना है, प्लेट कूड़ेदान के ठिकाने लगाना है। पानी स्वयं निकाल कर ही पीना है, चाहे शादी का कोई भी महीना है। खड़े खाना व खड़े ही पानी पीना है, भला व्यक्ति का जीना कोई जीना है। अब बारात नौटंकी नाच के बिना है, बारात में अब केवल नाच नगीना है। ये देखो कैसा अब आया जमाना है, खड़े-खड़े ही सबको खाना खाना है। परिचय :- विरेन्द्र कुमार यादव निवासी : गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक ह...
पनघट पे नीर भरेगा कौन
कविता

पनघट पे नीर भरेगा कौन

हंसराज गुप्ता जयपुर (राजस्थान) ******************** भक्ति दान नेह धर्म कर्म, जन्मों तक साथ निभाते हैं, परिपाटी, घर देह चौपाटी, माटी में मिल जाते हैं, पूरी आहुति सांसों से, खुद को ही देनी होती है, अवशेष धर्म की बागडोर, सबको मिल लेनी होती है, गंभीर समय की सीमा में, अधीर हो, पीर हरेगा कौन, अभीष्ट ईष्ट के स्वागत को, पनघट पे नीर भरेगा कौन, रैन सुखचैन, दे सेन लुभाने, छुप छुप नयनन में उतरे, अमर प्यार की ज्योति जगाने, बनके बाती घृतधार जरे, थके हंस की हार मिटाने, निश दिन पांवों में विचरे, प्रेम कहानी, मीठी वाणी, हियभर अधरों से उचरे, गहरे घावों पर भावों से, धीरे मधुचीर धरेगा कौन, अवशेष समर, सरसाने को, पनघट पे नीर भरेगा कौन ।। शरदरात्रि को अक्षय पात्र में, चँदा से अमृत लाते थे, व्रत घृत मधु करवा घरवा, दीपों की थाल सजाते थे, होली मंगल कर जल झलका, रंग चंग त्योहार मना...
अभिलाषा
कविता

अभिलाषा

ओंकार नाथ सिंह गोशंदेपुर (गाजीपुर) ******************** सृजन तो दिल की उद्गार है। दिनों दिन बढ़े, सब लिखे सब पढ़े, आदान-प्रदान होता रहे यही जगत व्यवहार है।। कौन हारा कौन जीता, अभी सभी है रीता रीता, सीखने को ही तो सभी तलब गार है। नर्सरी के ही सब सही, उच्च शिक्षा में सब नहीं, सरस्वती की याचना में ही सबका उद्धार है।। ना तेरा है ना मेरा है दिल से हो सृजन कह रहा ओंकार है। परिचय :-  ओंकार नाथ सिंह निवासी : गोशंदेपुर (गाजीपुर) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं...
सुख के क्षण
कविता

सुख के क्षण

दीपानिता डे दिल्ली यूनिवर्सिटी (दिल्ली) ******************** जीवन में समस्या कितनी हैं सुख में दिन बीत रहे हो तो सब साथ है दुख में दिन बीत रहे हो तो अपना ना कोई सुख में दिन इतनी जल्दी बीते प्रतीत हुआ क्षण भर दुख के क्षण भी ऐसे गुजरे जैसे वर्ष समान सुख में इतने खो जाए कि कोई याद ना आए दुख में ईश्वर स्मरण पहले आए सुख में बिन बुलाए महमान घर आए दुख में सब साथ छोड़ जाए सुख में अहम भाव आ जाए दुख में अवसाद घेर जाए मनुष्य मौन हो जाए अपना भी उसे कोई ना भाए सुख के क्षण मानव जल्द भूल जाए परंतु दुख के क्षण सर्वत्र याद आये परिचय :- दीपानिता डे निवासी : दिल्ली यूनिवर्सिटी (दिल्ली)  घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, र...
पिता की छांव
कविता

पिता की छांव

अभिजीत आनंद बक्सर, (बिहार) ******************** ग़र कर सकूँ समर्पित कुछ बंद उस त्याग की प्रतिमूर्ति को, जो ग़र परिभाषित कर सकूँ उतरदायित्व की उस कृति को, मेरी लेखनी आज धन्य हो जाए पितृत्व रचना से अलंकृत होकर... हर कदम पर अपने संतान के रहनुमा होते हैं पिता, परिवार की बगिया के बागबान होते हैं पिता.. संपूर्ण जीवन की धरी पूंजी संतान पर न्यौछावर कर देते हैं पिता कर्ज का आवरण ओढ़े भी बिटिया को विदा कर देते हैं पिता... विपदा में सतत संघर्ष की आँधियों में हौसलों की दीवार हैं पिता, पूरे परिवार की अटूट विश्वास, उम्मीद, और आस हैं पिता.. जिंदगी की धूप में बरगद की गहरी छांव होते हैं पिता, बेटे के लिए राजा तो बेटी के सर का ताज होते हैं पिता.. खुद के अरमानों को परे रख हर फर्ज निभाते हैं पिता, संस्कार और अनुशासन की बीज संतान में पनपाते हैं पिता... मेरी शोहरत,...
नारी तुम बदल न पाओगी….
कविता

नारी तुम बदल न पाओगी….

डॉ. संगीता आवचार परभणी (महाराष्ट्र) ******************** नारी तुम बदल न पाओगी! सबकुछ सौंप जीवनसाथी को, तुम जोगीनी बन जाओगी, नारी तुम बदल न पाओगी! फूल सी नाजुक काया को, नारी तुम सम्भाल न पाओगी! पुरुष पर जान लुटाने मे ही, तुम अपना सुकून पाओगी! नारी तुम दुनिया के बदलाव को! ग़र अपनाना भी चाहोगी, तो पुरुष के खयाल मात्र से ही, तुम भ्रमित सी हो जाओगी! नारी तुम अपने सुख चैन को, पुरुष पे न्यौछावर कर जाओगी! सूद बुध अपनी खो बैठोगी, खुद को देख ही न पाओगी! पाकर अनमोल जीवन को! नारी तुम जी न पाओगी, दूसरों के लिए जीने मे ही, अपना अस्तित्व लुटाओगी! दुनिया के छल कपट को! नारी तुम समझ ही न पाओगी, सीधी राह चलते हुए भी, समझौतों पर उतर आओगी! इस पत्थरदिल दुनिया को, नारी तुम पहचान न पाओगी! मोम सी पिघल ही जाओगी, हसते ज़ख्म सहती जाओगी! पहचानकर लोगों के स्वार्थ को, ना...
बिछड़ रहे हैं हम
कविता

बिछड़ रहे हैं हम

आदर्श उपाध्याय अंबेडकर नगर उत्तर प्रदेश ******************** बिछड़ रहे हो तुम बिछड़ रहे हैं हम, फिर भी दिल से दिल मिला रहे हैं हम। ये जुदाई भी नस़ीब वालों को ही मुकम्मल होती है, तभी तो आँखों में समन्दर होठों पर मुस्कान लिए हैं हम। हमारी उल्फ़तों ने इक ऐसे मुकाम पर हमें खड़ा कर दिया, की सबकुछ याद करके भी भूल रहे हैं हम। मोहब्बत के इस शज़र पर कभी कोयल गाया करती थी, आज कौवे कि कर्कश ध्वनि सुन रहे हैं हम। तुमको फिर से मोहब्बत से ज्यादा मोहब्बत मिले, यही "वर" महादेव से माँग रहे हैं हम। नज़ाकत तुम्हारी हमेशा यूँ ही बनी रहे, इसीलिए तो तुमसे जुदा हो रहे हैं हम। कभी तुम्हारी आवाज से ही हमारी सुबह-शाम होती थी, आज उसी को याद करके जी रहें हैं हम। पिया घर जाओगी आँगन महकाओगी, यही हर रोज अब सोच रहे हैं हम। अब बाहों में तुम्हारी न हमारा हक होगा, बस ...
दर्द की दास्तां
कविता

दर्द की दास्तां

डॉ. तेजसिंह किराड़ 'तेज' नागपुर (महाराष्ट्र) ******************** दुनिया के गमों में बंटी ये जिंदगी अपनों से पटी ये बेरूखी बंदगी दर्द की दास्तां हैं हर घर की कहानी किसको बयां करें ये अपनी जुबानी हालात के मारे हैं हम बेबस हैं जिंदगी रब से गिला नहीं बस पाक रहे जिंदगी तन का बोझ भी अब संभलता नहीं मन की बातें दिल से कोई कहता नहीं जिंदगी के टूटें अरमानों को आंखों में सहेजकर रखा हैं। मुसीबतों के दर्द को चेहरें की मुस्कराहट में छिपाएं रखा हैं। मैं कोसो दूर से एक उम्मीद लिए इस शहर में आकर बसा हूं। कहना मुश्किल हैं यहां पर पता नहीं कब पहले खुलकर हंसा हूं। एक दर्द हैं जो दिखाई नहीं देता हैं रोज की जिंदगी में तन्हा हूं मैं। दोस्त की तलाश का इंतजार हैं मुझें कहीं फिर से यहां भटक ना जाऊ मैं। ये कमबख्त उम्र भी कुछ ऐसी हैं अब गिला करू तो किससे करू मैं। मुझें समझ सकें...
मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत
ग़ज़ल

मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत

अब्दुल हमीद इदरीसी मीरपुर, कैण्ट, (कानपुर) ******************** मुझे तुमसे इतनी फ़क़त है शिकायत। न भरपूर मुझको मिली तुमसे उल्फ़त। है बाक़ी अभी देखना हमको हमदम, कहाँ जा रुकेगी ये नाक़िस सियासत। वो करते रहे हैं वो करते रहेंगे, है हासिल उन्हें बस इसी में महारत। नहीं बाल बाँका कोई कर सकेगा, रहेगी जो यकजा बड़ी इक जमाअत। लड़ा दुश्मनों से हमीद उस घड़ी तक, रही जब तलक तन बदन में हरारत। परिचय :- अब्दुल हमीद इदरीसी  निवास - मीरपुर, कैण्ट, (कानपुर) साहित्यिक नाम : हमीद कानपुरी घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने छायाचित्रएवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हि...
धरती की पुकार
कविता

धरती की पुकार

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** गरमी बढ़़ रही जैवमंडल में, मच रही है हाहाकार। अपने खातिर मुझे बचालो, कर रही धरती यही पुकार।.... देख तपिश ऐसा लगता, मानों बरस रही है आग। ग्लोबल वार्मिग के कारण, जीवमात्र के हुए बुरे हाल। समय रहते कर प्रायश्चित, रे मनुज शीघ्र करलें चेत। कुछ न बचेगा मुझ पर जब, चिड़ियाँ चुग जायेगी खेत। पौधारोपण से लो संवार, गरमी बढ़ रही............। बदलती जीवन शैली बढ़ता औद्योगिकीकरण, विलासिता पूर्ण अनियंत्रित नगरीकरण। वर्षों से बोझ निरंतर बढ़ रहा, मानवीय भूलों का दंश सहा, बदइंतजामी आलम भर रहा हुंकार, गरमी बढ़ रही.........। भावी पीढ़ी के बेहतर भविष्य की ठाने, भूल विलासिता पूर्ण आदतों की माने। संरक्षण के प्रति समझे अपनी जिम्मेदारी, सोचे उसकी जो है अपनी महतारी। प्रति पल बढ़ रहा जो अत्याचार, गरमी बढ़ रही.........
विदाई
कविता

विदाई

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** रीति ये कैसी जग ने बनाई है कल तक थी जो अपनी आज हुई वो पराई है दिल के टुकड़े की आज कर रहे विदाई है। खुशी की है बेला मगर आंख सबकी भर आई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। किसी से मिलन है किसी से जुदाई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। छुप-छुप कर रोए भैया मां सुध-बुध बिसराई है बाबुल की भी आंखें डबडबाई हैं घड़ी विदाई की आई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। कलेजे पर रख पत्थर लाडली की कर रहे विदाई है रीति ये कैसी जग ने बनाई है। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित कर...
जनक वंदना
कुण्डलियाँ, छंद

जनक वंदना

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** जनक वंदना करीये, जनक महेश समान। हमेशा सलाह लिजिये, करनी हो आसान। करनी हो आसान, कभी नाहीं दुख होवे। जो रोजे संतान, जनक चरणा में सोवे। जग में नितिन पाये, आशीषा देता चमक। देव वंदन गाये, होते जी ऐसे जनक।। परिचय :- नितिन राघव जन्म तिथि : ०१/०४/२००१ जन्म स्थान : गाँव-सलगवां, जिला- बुलन्दशहर पिता : श्री कैलाश राघव माता : श्रीमती मीना देवी शिक्षा : बी एस सी (बायो), आई०पी०पीजी० कॉलेज बुलन्दशहर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से, कम्प्यूटर ओपरेटर एंड प्रोग्रामिंग असिस्टेंट डिप्लोमा, सागर ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट बुलन्दशहर से कार्य : अध्यापन और साहित्य लेखन पता : गाँव- सलगवां, तहसील- अनूपशहर जिला- बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश)। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
सच्चे अच्छे है
कविता

सच्चे अच्छे है

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** दिलके आंगन में कुछ तो बातें है। जिसमें कभी खुशी तो कभी गम है। इन गमो को दूर करने दोस्त होते है। जो स्नेह प्यार से दुखदर्द हर लेते है।। कुछ तो है तुम्हारी बेचैनी का राज। जो तुम्हारे चेहरे पर झलक रहा है। हम से कहो तुम अपने दिल की बात। ताकि तुम्हारे चेहरे की उदासी को मिटा सके।। अपने दिल पर तुम परते मत जमाओं। दिल की बात दिल वालो को बताओं। दिल वाले तो रेत पर आशियाना बना लेते है। और खुद को मीरा और कान्हा मान लेते है।। जो भी है बात खुलकर कह दीजिये। और अपने दिल को हल्का कर लीजिये। हम है वो शिल्पकार जो तुम्हें तराश देंगे। और निर्जीव मूर्ति को बोलता हुआ बना देंगे।। हम उन्हें ढूँढ़ते है जो सच्चे और अच्छे है। भले ही हमने उन्हें कभी देखा नहीं। पर रिश्तों में वो बहुत सच्चे होते है।। परिचय :- ब...
इंसानियत भूला इंसान
कविता

इंसानियत भूला इंसान

राजीव रंजन पांडेय राजधनवार गिरिडीह (झारखंड) ******************** इंसानियत भूला इंसान चौराहों पे बिका ईमान भाईचारे की अब बात नहीं प्रेम विश्वास अब बचा नहीं घृणा द्वेस अब भरा पड़ा है स्वार्थों में मन डूबा हुआ है पल में बदलते स्वभाव यहां पल में बिकते विश्वास यहां इंसानों का अब मोल नहीं झूठ फरेब का अब तोल नहीं इंसान कहीं जब घायल होता इंसान ही मजे से वीडियो बनाता इंसान यहां कोष भंडारण हेतु तत्पर रहते हैं एक दूसरे को लूटने को हमेशा तैयार रहते हैं परिचय :-  झारखण्ड प्रदेश के गिरिडीह मंडलान्तर्गत राजधनवार क्षेत्र में रहने वाले राजीव रंजन पाण्डेय पिता संजय कुमार पाण्डेय की शैक्षिक योग्यता संस्कृत से स्नातकोत्तर और बी.एड है जो कि बिनोवा भावे विश्वविद्यालय हजारीबाग से पूर्ण हुई है। आप लगभग दो साल तक राज्य सरकार द्वारा अनुदानित एक विद्यालय में संस्कृत शिक्षक के रूप में सेव...