मनखे हो के मनखे बर
प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी'
लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़)
********************
(छत्तीसगढ़ी बोली)
मनखे हो के मनखे बर,
तँय काबर मरत हस
बिन तेल अउ बाती के,
तँय काबर जरत हस
हाँसत गावत बिता ले,
तँय अपन जिंनगी ला
पर के जिनगी मा,
झोझा काबर परत हस !!
कुछु खाय चाहे कुछु पहिरे,
तोला का करना हे
झूठ लबारी चारी चुगली,
तोला दूरिहा रहना हे
सुवारथ के चक्कर मा,
तँय काबर फाँसत हस
काकरो दुख दरद ल देख,
काबर हाँसत हस !!
मनखे जनम पाय हस,
सुग्घर करम करना हे
चार दिन के जिनगी,
तहन सबो ला मरना हे
दूसर के महल अटारी देख,
काबर मरत हस
मेहिनत बिना, फर के आस,
काबर करत हस !!
परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक)
निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)।
घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
कृपया लिंक को टच कर र...

















