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पद्य

छोड़ बुराई नेक बन
छंद, दोहा

छोड़ बुराई नेक बन

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा छंद) छोड़ बुराई नेक बन, पाप करे शैतान। स्वर्ग नर्क सब कर्म से, तेरे है इंसान।। ************* समझ समझ समझा नहीं, समझ नहीं थी यार। वो तो मेरे पास है, ढूॅंढ रहा बेकार।। ************* नेता बन मंत्री बनो, डिग्री का क्या काम।। पढ़े लिखे बेकार सब, घूम रहे गुमनाम।। ************* ख़त्म सफ़र कब मौत से, आगे भी है और। सोच जहाॅं की छोड़ दे, वहाॅं बना ले ठौर।। ************* सबको जाना एक दिन, भला बुरा क्या संत। रहा सदा कोई नहीं, सबका होगा अंत।। ************* चल मुसाफिर समय हुआ, रुकना है बेकार। हुआ आजाद कैद से, टूट गई दीवार।। ************* हुआ नहीं है कल कभी, मत ले कल का नाम। जो कुछ है वो आज है, कल का कल क्या काम।। ************* झूठ झूठ है सच नहीं, सच से जिंदा झूठ। मिटे झूठ जब सच हटे, जैसे जल कर...
पेंसिल से लिखा अतीत
कविता

पेंसिल से लिखा अतीत

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जब पेंसिल बचपन में हाथों में पकड़ी जब मुझे मालूम नहीं था। पेंसिल से लिखा क्या था अतीत मेरा। कागज़ पर थोड़ा धुंधला-धुंधला सा। कुछ नाम थे जो घिस गए लिखते-लिखते, कुछ वादे थे जो हल्के पड़ गए। कुछ हँसी के निशान रह गए कोने में, कुछ आँसू थे जो कागज़ में धँस गए। जैसे बचपन की वो अधूरी लकीरें, मन आज भी वहीं रह जाता। पेंसिल का अतीत यही सिखाता, हर चीज़ पक्की नहीं होती। कुछ यादें धुंधली ही अच्छी लगती। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपन...
स्वयंभू भगवानों से सवाल
कविता

स्वयंभू भगवानों से सवाल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** थोड़ा देकर ज्यादा छीन लेते हो, कम रहता है उसे बहुत गिन देते हो, संवैधानिक हक़ को अहसान बताते हो, गाहे-बगाहे इसे हर मंच से सुनाते हो, हे तथाकथित स्वयंभू भगवानों, नागरिकों को बेवकूफ न जानो, जो खून-पसीना बहाकर टैक्स चुकाता है, वो दो वक़्त की रोटी को तरसाया जाता है, तुम देकर चंद टुकड़े मुफ़्त की खैरात के, दावा करते हो जैसे पाल रहे हो कायनात के, अपनी ही जेब से हम लुटते आ रहे हैं, और तुम हर चौराहे पर ढोल बजा रहे हो, हक़ मांगें तो लाठियां और जेल मिलती है, तुम्हारी चौसर की बिसात पर ज़िंदगी ढलती है, अब आँखों से ये भरम का पर्दा हटेगा, तुम्हारी झूठी रहमतों का ये खेल मिटेगा, ये देश किसी की बपौती या जागीर नहीं, जनता ही लिखेगी अब अपनी तक़दीर नई, उतर जाओ कुर्सी के झूठे गुमान से, बात करो अब अदब और संविधान से, वक़्त बद...
बधाई
कविता

बधाई

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** यमुना की लहरों से पूछा मैंने तुम इतनी क्यों उछल रही हो? लहरों से आवाज है आई, कृष्ण जन्म की देवु बधाई, मेरे द्वार पर कान्हा आए, मेरे प्राण मेरे है स्वामी क्यों ना आज में चरण पखारू, इस अवसर को धन्य कर जाऊ, इस कारण में उछल रही हूं। उछल-उछलकर यमुना है बहती, कान्हा से वह यूं है कहती! एक बार प्रभु चरण धुलवाओ, मेरा जीवन धन्य कर जाओ। कान्हा ने है चरण बढाये, यमुना जल तक प्रभु ले जाए, धन्य हुई यमुना महारानी , चरण पखारे देखो रानी, शांत हुई देखो पटरानी। कान्हा ले वसुदेव है आये, नन्द भवन मै बँटे बधाई, आज गोकुल मे बजे शहनाई। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्र...
भारत की आन बान शान है हिंदी
कविता

भारत की आन बान शान है हिंदी

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** सजे नारी के शीश ज्यों बिंदी, विराजे भारत के शीर्ष यूं हिंदी। ऋषि मुनियों और विद्वानों के, लेखन का श्रृंगार है भाषा हिंदी। जन मानस की बोल चाल में, सहज सरल औ आम है हिंदी। संप्रेषण और जनसंचार का, सबसे सशक्त माध्यम है हिंदी। वीणा के तारों से झंकृत करती, महाग्रंथों में अलंकृत है हिंदी, कवि और लेखकों के सृजन को, कृत कृत्य करती है भाषा हिंदी। कोकिल कंठ सी लगे कर्णप्रिय, मिश्री की डली सी लगती हिंदी, सभी भाषाओं की सिरमौर बनी, हमारी मातृभाषा कहलाती हिंदी। विश्वबंधुत्व औ एकता का भाव, जन-जन में नित जगाती हिंदी। नदी की पावन धारा सी निर्मल, झरने सी शीतल है भाषा हिंदी। प्रगति के नए सोपान है रचती, भारत का मान है बढ़ाती हिंदी, जन जन के मन में है बिराजती, देश की आन बान शान है हिंदी। परिचय :- ...
बेटी
कविता

बेटी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बाबुल के नयनों की प्यारी आज चढी है बलिवेदी पर लालची मानव, तू, धिक्कार मन में संजोए पी का प्यार। मजबुरी है नाम जिसका वो बेटी कहलातीं है सह-सह कर अनेक ताने कोसी जाती बार बार। बाबुल का घर आंगन छोड अंग, अंग धानी चुनरिया ओढ मुड़, मुड़ कर देखती घर, गली का अंतिम छोर। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्म...
हम हिंदुस्तान के वीर
कविता

हम हिंदुस्तान के वीर

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** चाहे फांसी पर लटका दो चाहे बिजली का झटका दो चाहे चौराहे पर लटका दो हम देश हित शीष कटाने वाले हम देश हित शीष चढ़ाने वाले हम वीर, पर्वतों से टकराने वाले हम वीर, गंगा के मैदान वाले हम वीर, हिंदुस्तान वाले हम वीर, नहीं डरने वाले हम वीर, भारत के लिए मरने वाले हम वीर, मर कर अमर रहने वाले हमारे नस-नस में बहता स्वाभिमान है हमारे रोम-रोम में बसता हिंदुस्तान है हमारे रोम-रोम में बसता आन बान है हमारे रोम-रोम में बसता हिंदुस्तानी शान है क्रांतिकारी हम, शांति के पुजारी हम जीत कर रहेंगे हम, है हममें इतना दम एक हाथ में तलवार, एक हाथ में संविधान है हमारे हृदय में बसता गीता, पुराण, कुरान है स्वदेश हित दे देते हम बड़े बलिदान हैं परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निव...
शिक्षक
कविता

शिक्षक

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** ओजस्वी दीपक युग दृष्टा होते है शिक्षक। नव चेतना ज्ञान वैभव के धारक होते है शिक्षक। वर्ण विधान भाषा अलंकरण होते है शिक्षक। आत्म निर्भर स्वाध्याय के संबल होते है शिक्षक। ज्ञान उद्दीपक अंत प्रेरणा के विश्लेषक होते है शिक्षक। हर युग के नायक अद्भुत चित्रकार होते है शिक्षक। कर्तव्य निष्ठा सृजनशीलता के वाहक होते शिक्षक। कच्ची मिट्टी से महलों के सृजक होते है शिक्षक। खाद और बीज विषय सम्प्रेषक होते है शिक्षक। अमूर्त भावी पीढ़ी के मूर्तिकार होते है शिक्षक। ज्ञान के आलोक से अज्ञान विनाशक होते है शिक्षक। वाष्प कणों से मेघों के शिल्पकार होते है शिक्षक। मां का वात्सल्य पिता का आशीर्वाद होते है शिक्षक। नेह का अहसास बहन का आलिंगन होते है शिक्षक। भव्य व्यक्तिव संस्कार की परिभाषा होते है शिक्षक। वशिष्ठ विश्वामित्र चाणक...
वंदे मातरम्
कविता

वंदे मातरम्

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** आज कह दो शान से है जान वंदे मातरम् देश के हर लक्ष्य का संधान वंदे मातरम् देश की मिट्टी है चंदन शीश तुम धारो इसे हमसे जो करवा दे सब बलिदान वंदे मातरम चीर दो दुश्मन को और ग़द्दार को तुम दो सज़ा आज कर दो जंग का ऐलान वंदे मातरम् बाल गंगाधर तिलक का स्वप्न है साकार अब अब हमारे देश का अभिमान वंदे मातरम् याद कर लो तुम शहीदों ने किया उत्सर्ग जो अपनी आज़ादी की है पहचान वंदे मातरम् पर्व है गणतंत्र लहराता तिरंगा नभ में है आओ सब मिल कर करें जयगान वन्दे मातरम् विश्व नतमस्तक हुआ सम्मुख हमारे देश के आओ बच्चों हम करें गुणगान वंदे मातरम् परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट ...
इतिहास बना है शिलालेख
कविता

इतिहास बना है शिलालेख

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** इतिहास बना है शिलालेख कब, किसने इससे सीखा है परमार्थ किया तभी तक जब तक उसमें स्वार्थ दिखा है दिन के घोर उजाले में तुम सदाचार समझाते हो धवल वस्त्रों तले छिपी रक्त-पिपासा कब दिखलाते हो शोषण की सीढ़ी पर चढ कर सुख के स्वप्न दिखाते हो रजनी के स्याह अंधेरों में संहारक तेवर अपनाते हो षड्यंत्रों का भोजपत्र मानव रक्त से लिखा है कहर तुम्हारा भुजंग बन मासूम यौवन को डसता हैं संस्कारों की चून्नर तले दरिया दर्द का रिसता है दुराचार के दावानल में अक्षत यौवन कुंभल रहा दो वक्त की रोटी खातर हुआ पतित कब संभल रहा रक्षक भक्षक बन बैठा समय वक्त पर चीखा है श्रम साध्य श्रमिक ने जीवन मंदाग्नि में झोंक दिया सूखी रोटी के दो कोरो पर स्वाभिमान को छोड़ दिया साधन के संधानो खातिर स्वर सतत मिमियाते रहे आकुल न...
नव निर्माण
कविता

नव निर्माण

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** ये मजबूत मेरी भुजाएं जैसे पर्वत की शिलाएं यह चौड़ी मेरी छाती है जो भारत मां की थाती यह मेरा दमकता उन्नत भाल युद्ध भूमि में करता कमाल मैं बागी बलिया से मैं त्यागी बलिया से मैं बागी बैरिया से मैं हूं हिंद का जवान मैं चाहता हूं करना कुछ महान जिससे विकसित हो हिंदुस्तान करके नव निर्माण चला के कर्म का वाण बना दूं शक्ति शाली हिंदुस्तान उतार लाऊं आसमान बनाऊं धरा को स्वर्ग समान। परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏...
अब इंकलाब बनने दो
कविता

अब इंकलाब बनने दो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मैं हूं ही इंकलाब तो इंकलाब बनने दे, देख लेना मेरे दिल के दाग कभी और, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो, ये खोखली परंपराएं, ये पाखंड की दीवारें, कब तक सहेंगी भूखे पेट की हुंकारें? तुम पूजते हो पत्थर, इंसानों को दुत्कारते, जात-पात के नाम पर बस्तियां उजाड़ते, अब तोड़ दो ये बेड़ियां, ये भरम सब ढहने दो, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो, अस्पृश्यता का यह कलंक, समाज का ये रोग है, तुम्हारी नजरों में अछूत, क्या वो नहीं लोग हैं? लहू का रंग एक है, एक जैसी प्यास है, फिर क्यों धरा पर फैला ये नफरत का इतिहास है? इस ऊंच-नीच के भेद को अब राख में मिलने दो, देखो अगन उदर की अभी उसे भरने दो। तिलक, तराजू, ढोंग से अब पेट नहीं भरता, मजदूर अपनी मेहनत से भाग्य खुद लिखता, छल-कपट के इस तंत्र को अब तार-तार हो ...
यमराज मित्र के दोहे
दोहा

यमराज मित्र के दोहे

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** दूर्वा श्री गणेश को, माँ दुर्गा श्रृंगार। भोग लगाओ प्रेम, होगा जन उद्धार।। सभी निभाते भूमिका, जैसा बुद्धि विवेक। सबके अपने रंग हैं, भले विवेक अनेक।। सबकी अपनी भूमिका, सबका अपना सार। कम लोगों को ही मिले, सार्थकता विस्तार।। कुछ लोगों की भूमिका, देती है दुख घोर। सबसे ज्यादा नाचते,बने हुए जो मोर।। अपना कोई अब नहीं, देने वाला भाव। बिना दाम के जेब का, टीस रहा है घाव।। बेगाने ही बन रहे, बगलगीर तो आज। दुनिया के दस्तूर का, उल्टा दिखे समाज।। अपने भारत वर्ष का, बढ़ा विश्व में मान। उनको मिर्ची लग रही, जो जनमे नादान।। आजादी के पर्व का, बना रहे उत्साह। बिना किसी मतभेद के,सबको हो परवाह।। आज तिरंगा विश्व को, देता है विश्वास। हम सबको भी गर्व है, बढ़ती दिखती आस।। हम सबका कर्तव्य है, हो शहीद का मान। क...
विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण
आंचलिक बोली, कविता

विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) ओदे आवत हे कन्हैया, बजावत बंसी। झूम-झूम के नाचत हें, जम्मों यदुवंशी।। पहिरे हे मोर मुकुट अउ बैजयंती माला। संग म हवंय सुबल, बलराम, मधु ग्वाला।। गोकुल के बन म, चरावत हे गाय-गरुवा। कदम्ब रुख बइठे हे, मुरलीधर दुलरुवा।। कान्हा के रूप ल देखके, राधा मोहागे हे। मया के जादू म, तोला खोजत आगे हे।। गोपी मन घलो रंग गेहें, पिरीत के रंग म। रासलीला के बेड़ा म, थिरकत हें संग म।। ब्रज म माखन अउ मिसरी के हवय भंडार। चोरी करे बर आवत हे, जग के पालनहार।। जमुना नदिया के तीर, खेलत हे मन-मगन। नाग नथैया के पाँव छुए, कालिया के फन।। बरसे जब करिया बादर, घपटे जब अंधियार। गोबरधन परबत उठाके, करे तँय ह उजियार।। कुरुक्षेत्र म गियान देके, देखाए रुप बिराट। विश्वगुरु तोला कहिथें, जय हो! दीनानाथ।। तँय तो अंतरयामी अस...
चारपाई की अदालत में
कविता

चारपाई की अदालत में

डॉ. अवधेश कुमार "अवध" भानगढ़, गुवाहाटी, (असम) ******************** सुना है कि कर्मों का हिसाब-किताब रखते हैं चित्रगुप्त ईश्वर परिणाम घोषित करते हैं और यमराज लागू न जाने ये कितना सच है, कितना झूठ! किंतु एक ठोस सच हम सब देखे हैं देख रहे हैं और आगे भी देखेंगे हमारी साढ़े तीन हाथ की देह घर के बाहरी कोने में पौने चार हाथ की चारपाई पर हो जाती है निढाल जब करवट बदलने में बेहाल जब लाचार असहाय और बदहाल जब तब...... तब उस देह के कर्मों का हिसाब चित्रगुप्त नहीं, ईश्वर नहीं यमराज भी नहीं संतानें लगाती हैं साथी सहमते हैं, भाई झल्लाते हैं मक्खियां भिनभिनाती हैं बिस्तर पर हुई लीपा पोती वारिस चींख चींखकर बताते हैं परिजन धड़ल्ले से परिणाम सुनाते हैं "बूढ़ा रात-दिन खांस खांसकर जीना मुश्किल कर दिया है न जाने कब जाएगा हम चैन से कब जी सकेंगे......" चारपाई पर ...
पत्नी और वाय-फॉय
हास्य

पत्नी और वाय-फॉय

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** घर में आते ही ऐसा जाल बिछाती है, अच्छे-भले जीवन का डेटा खा जाती है। मुफ़्त का हॉटस्पॉट समझकर पास आए थे, उम्र भर "अनलिमिटेड प्लान” का बिल चुकाते हैं। रेंज में रहो तो पूछताछ सुबह-शाम होती है, रेंज से बाहर जाओ तो इमरजेंसी एलान होती है। चैट दोस्तों से करो, तो इसके पास तुरंत 'OTP' जाता है, आधी रात को भी पति का 'बायोमेट्रिक अंगूठा' लग जाता है। सोचा था 'Incognito Mode' में जाकर ज़रा चैन से जिएँगे, ये वो डेंजरस हैकर है जो डिलीटेड चैट भी स्क्रीनशॉट बनाकर लाता है! हर कॉल, हर मैसेज का ऑडिट हो जाता है, घर का ड्रॉइंग रूम ही जाँच आयोग बन जाता है। इसकी मेमोरी ऐसी कि दुनिया दंग रह जाए, दस साल पुरानी गलती भी तारीख़ सहित याद आ जाए। मोबाइल पर मुस्कुराओ तो केस नया बन जाता है, “इतनी खुशी किस बात की?” प्र...
अंतिम मित्र
कविता

अंतिम मित्र

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** आखिरी दोस्त आखिरी उम्मीद हो तुम। जीवन के अंतिम अध्याय की अंतिम कड़ी हो तुम। मोह का पाश नहीं स्नेह का अंतिम चरण हो तुम। मेरे अंतिम जीवन की अंतिम स्पष्ट किरण हो तुम। मेरे अधूरे जीवन की अंतिम मुस्कुराहट हो तुम। सब कुछ खो जाने के बाद भी मेरे अंतिम जीवन का मधुर एहसास हो तुम। थक सा गया था मैं युगों के इंतजार के बाद मेरे अंतिम जीवन के अंतिम समय का मोक्ष का आधार हो तुम। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख ह...
अब और क्या चाहती है तू?
कविता

अब और क्या चाहती है तू?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** अब बता भी दे जरा, और क्या चाहती है तू मुझसे, तंग आ चुका हूं तुझसे, विवाहोपरांत मेरी पत्नी, क्लोज नहीं हो पायी उतनी, उतना दखलंदाजी कर रही है मेरे मन मंदर में, किनारे पाने के लिए मार रहा हूं हाथ पांव डूबता जा रहा हूं तुझ जैसे समंदर में, क्या जादूगरनी है तू, क्या मेरे पल-पल की विवरणी है तू, रील्स की आभासी दुनिया में, कैसा यह जाल बिछाया है, बैठे हैं सब एक ही छत के नीचे, पर हर शख्स यहां पर पराया है, बच्चे की किलकारी छूटी, रिश्तों की वो गर्माहट टूटी, तेरी नीली रोशनी के चक्कर में, अपनों की हर शिकायत रूठी, तूने फुसफुसाकर कानों में, अपनों की आवाज को छीन लिया, नोटिफिकेशन के इस दलदल ने, मेरा चैन, मेरा हर दिन लिया, अब बस भी कर ऐ काली स्क्रीन, मुझे मेरी दुनिया वापस दे, जहाँ स्क्रीन नहीं, बस चेहरे ह...
ठहराव
कविता

ठहराव

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक पड़ाव सा आ गया एक ठहराव सा आगया। खोजती नजरों में भटकाव सा आ गया जिन्दगी की राह में बहाव सा आ गया। आ गया कोई मन द्वार के अन्दर दिल के कोने को कोई भा गया छू गया कोई चंचल मन को धानी आंचल जो लहराया। दृगों के दर्पण में मन प्राण को देखकर आ गया कोई, छा गया कोई अरे, वो तो नीर भरा बादल हैं जो मेरे आंगन में बरस गया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्...
शिव बसे हैं मेरे दिल में
कविता

शिव बसे हैं मेरे दिल में

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव करे हैं सुमंगल किस्मत जगी।। चेतना, कामना, भावना पल्लवित। जिन्दगी को नया मोड़ किस्मत जगी।। शिव की नगरी, बनी मेरी कुटिया अभी। बनके मंदिर सुसज्जित बहुत है सजी।। शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव बने हैं मेरे नाथ किस्मत जगी।। अब नहीं पीर, मातम, निराशा बची। जिन्दगी को नवल एक भाषा मिली।। माह सावन का है शिवजी करते दया। इक नये राग से अब तो सरगम सजी।। गीत, गजलों, भजन की हैं स्वरलहरियाँ। मांगलिक-शुभ की गुंजित सुखद ध्वनियाँ।। शिव बसे हैं मेरे दिल में किस्मत जगी। शिव बने हैं परमधाम, किस्मत जगी।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति ...
चाँद
गीत

चाँद

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** माता मुझको चाँद दिलाओ। तोड़ गगन से इसको लाओ।। मुझको लगता है यह प्यारा। अपनी माँ का बहुत दुलारा।‌ उसको मीठी खीर खिलाओ। रौशन करता है जग सारा। सबकी आँखों का है तारा।। उसके गुण बस गाते जाओ। साथ चले यह बनकर छाया। मनमोहक है सबको भाया।। उसे गोद में मातु सुलाओ। कभी घटे बढ़ मोटा होता। और कभी वह छोटा होता।। दावत पर घर उसे बुलाओ। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन। प्रकाशित पुस्तक : पंचतंत्र में नारी, ...
रक्षा बंधन
कविता

रक्षा बंधन

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** धागे का बंधन पक्का है, भाई उसमें बंध जाता है। जब बहना की साड़ी खिंचती, साड़ी में वो समा जाता है। धागे का ... बहने सावन भर भोले को, जल अर्पित कर शक्ति पाती। भाई कर पर बांध के राखी, बहने उसका भाग्य जगाती। भाई इस पवित्र बंधन पर, समय पड़े तो लुट जाता है। धागे का ... जो सक्षम हैं बहनों को वे, ये पुनीत अवसर देते हैं। मोदी, योगी इस पुनीत दिन, बहनों का आशीष लेते हैं। सैनिक भी राखी बंधवाकर, रक्षा हेतु खड़ा रहता है। धागे का ... इस पवित्र त्यौहार को हिंदू, पूरी निष्ठा से हैं मनाते। बनते हैं पकवान अनेकों, बहिन और भाई मिलकर खाते। बहन ने राखी बांधी जिसको, वो रक्षक बनकर रहता है। धागे का... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचि...
राखी की महत्ता
दोहा

राखी की महत्ता

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** राखी में तो लाज है, जिसमें शामिल फर्ज। नहीं मानना है बुरा, निश्चित ही है हर्ज़।। नेह भरा रिश्ता फले, बन जाता उपहार। राखी बँधती है जहाँ, वहाँ पले उजियार।। ख़ूब कलाई धन्य है, हर्षित भ्राता-माथ। अक्षत करता वंदना, देता युग-युग साथ।। बहना ने भेजी दुआ, भाई है परदेश। शुभ-मंगल के भाव ने, हर डाला सब क्लेश।। कितना पावन लग रहा, सज्जित राखी थाल। आशीषों से हो रहा, व्यापक आज कमाल।। बचपन है अब तो जवाँ, गुंजित नेहिल गीत। निश्छलता मुखरित हुई,हर पल में है जीत।। उमड़ रहा दोनों तरफ, भावों का आवेग। आज निष्कपट पर्व ने, दिया हर्ष का नेग।। दूरी भौतिक है मगर, डाक निभाती साथ। मीलों चलकर राखियाँ, बँध जाती हैं हाथ।। भले हैं बहुत दूरियाँ, नहीं घटे पर प्यार। बचपन से ही दिव्य है,राखी का त्योहार।। बढ़ता ही बढ़ता रहे,...
गोहरावत हे हसदेव
आंचलिक बोली, कविता

गोहरावत हे हसदेव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिचियावत डोलत हांसत हे, मन ल देख वो थरथर कांपत हे, कइसे बचावंव तन, डारा अउ पाना ल, छिटका कुरिया म लावंव कइसे दाना ल, बता बघवा बेटा अब कइसे गुंर्राबे रे, हाथी बेटा कोन पत्ता ल तैं खाबे रे, हुंआ हुंआ कइसे अब कहिबे कोलिहा, झोल डारत हे मोला परदेशी झोलहा, मोर कोरा म आही कइसे मिट्ठा पानी, धन फेंका जाही मोर कर्मठ कहानी, कोन लकरी छवाही कुंदरा के छानी, का किस्सा सुनाही अब नाना अउ नानी, बुटूर-बुटूर घर के मुखिया देखत हे, खीसा भर डारे अउ आंखी सेंकत हे, सुध हवा पानी अब कहां ले लाबे, मोर हिरदे के पीरा कहां गोहराबे, इंखर आंखी के पीरा ल कइसे कसबे, अब तो पर गे तोला सूरी अउ फांसी, कहां जावय बता ए भई, गोहरावत हे हसदेव, हसदेव... कइसे बचाहीं अपन जंगल ल, कइसे बचाहीं अपन पानी, कइसे बचाहीं चिरई-चुरग...
पुष्प वाटिका
कविता

पुष्प वाटिका

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** अंखियों से अखियां जब है मिले फूलों की ओट में जानकी के। तिरछी नैनो से जब है मिले राम के नैना जानकी से। फूल बगिया में प्रकृति बिखर गई जब राम जानकी मिलन हुआ। देखते ही नैना चार हुए जब राम सिया का मिलन हुआ। मन ही मन पति रूप स्वीकार किया गौरा से पति वर मांग लिया। श्री राम प्रभु की सुंदर छवि को सीता ने मन में बसाय लिया। सीता ने जब वर मांग लीया, मूर्ति मुस्काई वर है दिया। सुंदर सुशील मनमोहक है, हे राम सिया की जोड़ी है, एक आदर्श दंपति का मिलन हुआ, सीता ने पाया राम को है किरण कर वंदन प्रभु चरणों में तुलसी के राम अमर है सदा। जय हो जय हो सीताराम के स्वर, जब गुंज उठा मिथिला मे है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉ...