जान पाओगे
संजय जैन
मुंबई (महाराष्ट्र)
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नदी किनारे बैठकर
देख रहा पानी को।
उछल कूद करते हुए
बहता जा रहा वो।
देख दृश्य यह मानव
समझ नहीं पा रहा।
फिर भी अपने मन को
क्यों विचला रहा।।
आया जो भी यहाँ
जाना उसे पड़ेगा।
विधाता के चक्रव्यहू से
उसे गुजरना पड़ेगा।
भेद सके इसे तो
खुशियाँ बहुत पाओगें।
और उलझ गये इसमें
तो बहुत दुख पाओगें।।
खुद को जिंदा रखने
कुछ तो तुम करोगें।
फिर अपनी करनी का
खुद फल पाओगें।
और मानव मूल्यों को
तुम समझ पाओगें।
और अपने जन्म को
स्वयं जान पाओगें।।
परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच (hindirakshak.com) सहित बहुत सारे अखबारों-पत्...






















