शब्दांजलि
संजय कुमार नेमा
भोपाल (मध्य प्रदेश)
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मां तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा तस्वीर में ही रहा।
तस्वीर में छलकते चेहरे को निहारता।।
अब अपने मन को समझाता।
तस्वीर की झूलती माला को असहाय से देखता ।।
भूली बिसरी यादों को अपनी यादों से जोड़ता।
मां के आशीषों एवं आंचल को खोजता।।
यादों में खोकर बीते कल को खोजता।
अब तुम्हारी यादों में आंसुओं को बहाता।।
अपनी नई-नई बातों को तुमसे जोड़ता।
बीते कल को तुमसे जोड़ता।।
अब तुम्हारे बिना अपनी ख्वाहिश किसको बताऊं।
अपनी मुश्किलों और दुख किसको सुनवाऊं।।
मां तुम्हारे बिना अपना वजूद बचा ना सका।
अब अपनी जिद्द किसी से पूरी करवा न सका।।
अपने नए नए सपने, खुशियां किसी को बतला ना सका।।
अब मुझे घर में गले से लगाने वाला ना रहा।
मेरी आवाज को सुनने वाला कोई ना रहा।।
अपनी सफलता का जश्न मनाने वाला, कोई ना रहा।
अब तुम्हारा मुस्क...




















