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पद्य

शिव की महिमा
भजन

शिव की महिमा

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** आज मानव भी अपना तीसरा नेत्र तो खोलें, अंतरघट में बसे अंतर्यामी साक्षी से तो बोलें, वही त्रिलोचन तो ज्ञान चक्षुधारी शिव कहलाते हैं। समाज में फैले कुरीतियों को स्व-विवेक से भगायें, हर रोज नित नये आयाम लेकर सहजता से अपनायें। वही हर-हर महादेव शिव सिद्धीश्वर कहलाते हैं .... भौतिक जीवन को त्यागकर सत्य की अनुभूति करायें, भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों के रहस्य बतायें। वही हितकारी शिवशंभु त्रिकालदर्शी कहलाते हैं .... बारह मासों में एक बार सावन जरूर आते हैं, कल्याणकारी भोलेनाथ भी तो ससुराल आते हैं। वही पूजा-पाठ घर मंदिर ही शिवालय कहलाते हैं ..... रिमझिम फुहार ही तो विवेक वैराग्य जगाते हैं, झूठी मिथ्या कल्पनाओं को तो दूर भगाते हैं। वही जो जटा से ज्ञान की गंगा जटाशंकर बहाते हैं ...... रजो, तमो, सतो ...
लोक अदालत और गांधी दर्शन
कविता

लोक अदालत और गांधी दर्शन

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** सभी सुखी खुशहाल रहे सब, गांधी जी का ये सपना था। भले कोई कितना दुश्मन हो, वो भी तो उनका अपना था।। गांधी के सपनों का भारत, ये था इसको याद रखें हम। उनके पदचिह्नों पे चलकर, भारत को आबाद रखे हम।। सत्य अहिंसा की ताकत से, कब तक कतराएगी दुनिया। है विश्वास यकीनन एक दिन, इस पथ पर आएगी दुनिया।। जिसकी लाठी भैंस उसी की, क्या ये सोच बनी फलदाई। झगड़े से झगड़ा बढ़ता है, क्या दिल से आवाज न आई।। सदा युद्ध के परिणामों में, जीता एक, एक हारा है। पर क्या हार जीत ने बोलो, समाधान को स्वीकारा है।। समाधान की दिशा अहिंसा, इसमें कोई हार नहीं है। जश्न जीत का दोनों ही मिल, मना सकें त्यौहार यही है।। नही फैसले, समाधान की, ओर बढ़ें तो सुख पाएंगे। लोक अदालत गांधी दर्शन, है ये सब को समझाएंगे।। ****** जड़...
वीर सिपाही
कविता

वीर सिपाही

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जाने वाले वीर सिपाही, लौट के वापस आना तू। वादा जो किया है माता से, उसको भुल न जाना तू। जब याद तुम्हारी आयेगी, आंखो से पानी आयेगा। राखी लेकर रोए बहना, कौन उसे समझाएगा । मिलन की तमन्ना बच्चों की, उसको न भूल जाना तू। जाने वाले वीर सिपाही, लौट के वापस आना तू। आना पापा लौटकर, बेटी के आँसू कहते है। छोड़ कर जब से आप गये, टूटे टुटे से रहते हैं। लेकर तिरंगा हाथों मे, आगे बढ़ते जाना तू। जाने वाले वीर सिपाही, लौट के वापस आना तू। जाते जाते कह गये थे बच्चों से, खिलौना लाने को। खिलौना चाहे मत लाना, पर कह दो जल्दी आने को। जाने वाले वीर सिपाही, लौट के वापस आना तू। वादा जो किया है माता से, उसको भुल न जाना तू। पत्नी से भी कहा था होली पर आने को । रंग बिरंगी चूडियां चाहे न लाना, पर कह दोसजने सजाने को, ...
मैं मज़दूर
कविता

मैं मज़दूर

विष्णु दत्त भट्ट नई दिल्ली ******************** मैं मज़दूर घर से बहुत दूर लालसा में दाल, भात, नून की रोटी दो जून की, मुन्ने को, मुनिया को अपनी प्यारी सी दुनिया को ममता की छाँव को छोड़कर गाँव को नदी को नहर को आ पहुँचा शहर को। खाली बैठना बेमतलब ऐंठना काम से जी चुराना नहीं था गँवारा मेहनत से अपनी शहर को सँवारा। कैसी करते हैं बात लगा रहा दिन रात आँधी, बारिश, सर्दी, गर्मी हालात चाहे जो हों मैं कभी नहीं डरा और पूरी ईमानदारी से शहर की तिजोरियों को भरा। सूखी रोटी संग पीकर जल सजाए हमने जिनके महल जुटाए जिनके लिए ऐश्वर्य के साधन, कितना संकुचित निकला उनका मन सोच कर देखिए भाई जब कोरोना ने मुसीबत ढाई तो बिना देर किए मदद करने की बजाय कैसे मुँह फेर लिए मानो जानते न हों पहचानते न हों, ये धन्ना सेठ धन के नशे में इतने चूर हैं कोरोना से ज्यादा तो ये महलों वाले क्रूर हैं।...
जिंदगी एक अनबुझ कहानी तो है
कविता

जिंदगी एक अनबुझ कहानी तो है

रूपेश कुमार चैनपुर, सीवान (बिहार) ******************** जिंदगी एक अनबुझ कहानी तो है, कोई समझे या ना नही समझे तो, जन्म और मृत्यु की ये कहानी तो है, कोई पागल यही नही समझे तो, प्यार की ये अनबुझ कहानी तो है, कोई मानें या ना नही मानें तो, बचपन, जवानी, बुढ़ापे तो है, कोई जाने या ना नही जाने तो, खेल, पढ़ाई और जॉब की रवानी तो है, कोई निभाये या ना निभाये तो है, प्यार और धोखा की ये रुबानी तो है, कोई विश्वास करे या ना नही करे तो, गाँव, शहर और नगरों का ये अंतर नही, अपनी जीवनशैली बदलने से क्या फायदा, गीत, गजल और कविता मे वो बात नही, जो अध्यात्मिक भजनों मे मिलती हमें, मनुष्य, जीव-जंतु और पेड़-पौधे एक ही है, फिर सबको मसलने से क्या फायदा, जाति धर्म, रंग-भेद और खान-पान से मतलब नही, फिर सबसे दुश्मनी करने से क्या फायदा, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबका खून ए...
जनसंख्या विस्फोट
कविता

जनसंख्या विस्फोट

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** देख रहे हैं कातिल मंजर जनसंख्या विस्फोट संसाधन पर करता रहता है यह भारी चोट भूखे नंग़े लोग भागते रोटी की ख़ातिर पर नेता जी गिनते रहते मेरे किरने वोट पैदा करते हैं हम यारों एक कंगारू देश यहाँ भी हम देखेंगे एक दिन सोमाली परिवेश कुदरत के मत्थे मत मढ़िए अपनी कुत्सित सोच मुखिया हो तो देना होगा इल्म भरा संदेश हर मसले को नहीं जोड़िए धर्म से आप सुजान कर्म से ही बस पूरे होंगे अपने सब अरमान तर्कहीन तकरीरों का अब बंद करो ये खेल नई सोच से रिश्ता जोड़ो मिट जाए अज्ञान बोझिल धरा बेचारी सोचो कैसा होगा काम दो बच्चे में ख़ुश हो जाएँ पंडित और इमाम बनिए साहिल मातृभूमि का यही वक़्त की माँग बेहतर होगाल पालन - पोषण ऊँचा होगा नाम परिचय :- प्रोफ़ेसर आर.एन. सिंह ‘साहिल’ निवासी : जौनपुर उत्तर प्...
महंगाई
कविता

महंगाई

रामकेश यादव काजूपाड़ा, मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** महंगाई से लोग परेशान हैं, खुश न तो खेत न ही वो खलिहान हैं। पाई - पाई के लिए लोग मोहताज़, कुछ का तो पैसा ही भगवान है। लगी है आग रोज डीजल- पेट्रोल में, कीमत उसकी सातवें आसमान है। पसारी ली है ऐसा पांव बेरोजगारी, लगता आदमी जैसे बेजान है। मंहगाई का असर सीधे जेब पर, अच्छे बाणों से खाली कमान है। कैसे हो ऐसे रिश्तों की तुरपाई, हर एक घर की अपनी दास्तान है। वोटों की फसल तक सीमित जनता, घड़ी- घड़ी वोटरों का इम्तिहान है। धूप पर जैसे निर्धन का हक़ नहीं, मुट्ठीभर लोगों का ये आसमान है। गुजरती है जिंदगी घुटने बटोर कर, अंदर से छाती लहूलुहान है। मजे में वो जिसकी ऊपरी कमाई, बाकी जनता बेचारी परेशान है। बेचकर चेहरा कुछ बीता रहे दिन, ऐसे यौवन का क्या सम्मान है। मीठी-मीठी बात से पेट नहीं भरता, सबसे ज्यादा किसान परेशान है। कागज ...
मैं भी बोलूं जय साईं राम
भजन

मैं भी बोलूं जय साईं राम

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** दुनिया में कितने साईं भक्त हैं। मेरी भक्ति कितनी कम है। साईं सेवा करते वो हर दम है। मेरी सेवा कितनी कम है। में ही साई सेवक हूं मेरा अहम दूर हुआ। साईं भक्तों मेरा भरम दूर हुआ। साईं ने दूर किया अभिमान साईं बाबा करते कल्याण। "अरविंद" साईं भक्तों को करें प्रणाम। साईं में बसते सब के प्राण। साईं देते सबको ज्ञान। श्रद्धा सबूरी रख इंसान। साईं सच्चरित्र का करो नित्य पाठ। "श्री साईं बाबा प्रचार केंद्र इंदौर" का यह दिव्य अभियान। मैं भी बोलूं जय साईं राम। सब कोई बोलो जय साईं राम। परिचय :-  अरविन्द सिंह गौर जन्म तिथि : १७ सितम्बर १९७९ निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) लेखन विधा : कविता, शायरी व समसामयिक सम्प्रति : वाणिज्य कर इंदौर संभाग सहायक ग्रेड तीन के पद में कार्यरत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित क...
औरत
कविता

औरत

योगेश पंथी भोपाल (भोजपाल) मध्यप्रदेश ******************** ईश्वर की अदभुत रचना हे जो कई रुपों में ढलती हैं। हर एक अवस्था में औरत अपना स्वरूप बदलती हे॥ हर नए रिश्ते में औरत अपनी रीत निभाती हैं । कभी तो बनती हैं बेटी कहीं बेहन बन जाति हे॥ कहीं तो हे दादी नानी कहीं तो माँ केहेलाती । कहीं पे बनती राधा प्यारी कहीं अर्धांगि बन जाती हैं ॥ सबसे बड़ा रिश्ता हैं माँ का बच्चो की नीव जो भर्ती है। धूप पढ़े जब बच्चो पर तो शीतल साया करती हैं॥ बेहन बने तो मर्यादा की होती हे इक पावन रेखा । घर को जगमग करे रोशन कोई मित्र नही एन्सा ॥ होती हे जब राधा प्यारी तन्हाई में मन बेहेलाती हे । दिल के वीराने उपवन में यादों के फूल खिलाती हे॥ और बने जब जीवनसाथी घर को वो स्वर्ग बनाती हे। अपना घरबार बसाने को अपना अस्तित्व लुटाती हे॥ पुरुष की खातिर खोती अपना तनमन सुं...
अनदेखे अनसुने
कविता

अनदेखे अनसुने

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** कुछ बातें अनकही हैं कुछ जज्बात अनसुने है कुछ चेहरे अनदेखे हैं कुछ ख्वाब अनसुने है कुछ रिश्ते अनदेखे हैं कुछ हसरतें अनकही है कुछ पहलू अनसुने है कुछ कहानियां अनदेखी है कुछ अंदाज अनसुने है कुछ लोग अनदेखे हैं कुछ गीत अनसुने है कुछ रास्ते अनदेखे हैं परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी क...
भारत की बेटी
कविता

भारत की बेटी

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** मैं भारत की बेटी हूँ, मत करो मुझपर अत्याचार। सदा ही वीरो के नाम से लोगो ने भारत को जाना है। घिनोनी हरकतों से कलंक मत लगाओ भारत को। लक्ष्मी बाई जैसी नारी हुई, जान देश पर वार दी। मैं भारत की बेटी हूँ, मत करो मुझ पर अत्याचार। मातृभूमि को जब सर आँखों पर रखते हो तो, एक बेटी पर क्यो पाप करते हो। मैं भारत की बेटी हूँ, मत करो मुझपर अत्याचार। जिस भारत की अहिंसा पहचान थी, यहां क्यो मोमबतियां लोगो ने थामी है। मैं भारत की बेटी हूँ, मत करो मुझपर अत्याचार। बागी भी हुए यहां पर, लेकिन उन्होंने बेटी, बहू को इज्जत दी, तुम ना बनो हैवान। मैं भारत की बेटी हूँ, मत करो मुझपर अत्याचार। बेटी यहां की बर्दी पहन, रहती है,सदा तैयार देश पर कब हो जाऊँ क़ुर्बान। मैं भारत की बेटी हूं, मत करो मुझपर अत्याचार। विश्व मे...
जहां में ख़ुदा
हिन्दी शायरी

जहां में ख़ुदा

सुखप्रीत सिंह "सुखी" शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** जहां में ख़ुदा - ऐ - बंदगी अजीब देखी गरीबी में संस्कारों की संजीदगी अजीब देखी और साया क्या फटा गरीबी में किसी गरीब का यहां लोगों की आंखों में गन्दगी अजीब देखी परिचय :-  सुखप्रीत सिंह "सुखी" निवासी : शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 ...
खुशी प्रदायिनी
कविता

खुशी प्रदायिनी

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** कविता खुशी प्रदायिनी, दर्द का उचित प्रमाण है जनमानस के हित में जब, कलम बनती प्राण है। बहुधा कविता का साथी, अलमारी का कोना है पुस्तक क्रय बात अलग,मिली भेंट क्या खोना है शिवशक्ति संगम जैसा, लेखन संदेश भी त्राण है कविता खुशी प्रदायिनी, दर्द का उचित प्रमाण है जनमानस के हित में जब, कलम बनती प्राण है। रुचिकर भोजन स्वभाव, पसंद का भवन लेता यारी परिवार संबंध हेतु, नाविक नैया खुद खेता पसंद नापसंद से सर्वस्व, करता मनुज निर्माण है कविता खुशी प्रदायिनी, दर्द का उचित प्रमाण है जनमानस के हित में जब, कलम बनती प्राण है। स्मृति पटल पे बने रहना, स्वभावों की हद बनती कविता संदर्भों की चर्चा, प्रभाव का कद गढ़ती कब कैसे कितना कथन, मानव हक परिमाण है कविता खुशी प्रदायिनी, दर्द का उचित प्रमाण है जनमानस के हित में जब, कलम बनती प्राण ...
रिश्तों की दीवार…
कविता

रिश्तों की दीवार…

सुभाष बालकृष्ण सप्रे भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** संभाल न सके जो रिश्तों की दीवार, बेदर्दी से अपनों को कर दिया, किनार, देखते-देखते ये साल भी बीता जा रहा, उनकी यादों से सजा रखा, मैने घर द्वार, तस्वीर से तेरी नज़रें कभी हटा नहीं पाते, जन्म दिवस पर, आपको कैसे देंगे पुष्प हार, हम लोग वक्त, फिज़ूल कभी, जाया न करते, सपने, हमने भी देखें थे, भविष्य के, बेशुमार, कभी-कभी सालता है ये तनहाई का आलम, चंद सांसों का जीवन भी न मिल सका, उधार परिचय :- सुभाष बालकृष्ण सप्रे शिक्षा :- एम॰कॉम, सी.ए.आई.आई.बी, पार्ट वन प्रकाशित कृतियां :- लघु कथायें, कहानियां, मुक्तक, कविता, व्यंग लेख, आदि हिन्दी एवं, मराठी दोनों भाषा की पत्रीकाओं में, तथा, फेस बूक के अन्य हिन्दी ग्रूप्स में प्रकाशित, दोहे, मुक्तक लोक की, तन दोहा, मन मुक्तिका (दोहा-मुक्तक संकलन) में प्रकाशित, ३ गीत॰ मुक्तक लो...
ए जिंदगी
कविता

ए जिंदगी

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** ए जिंदगी में कितना खुश नसीब हूं मन की आहट सांसों का निरंतर चलना, सुबह का खिलना एक मधूर मुस्कान के साथ स्वागत, अभिनन्दन, अभिनन्दन शुभ प्रभात नई ऊर्जा के साथ है ईश्वर तेरा अभिवादन करता हूं नतमस्तक हूं प्रथम कुसुम खिलें उषा की किरणों के साथ एक प्यारी सी मिठी सी मुस्कान लिए समर्पित हूं ईश्वर अभिनन्दन, अभिनन्दन में सर झुका कर करता हूं। शशि चंद्र धुमिल हुए, प्रखर लालिमा लिए प्रकट समय-चक्र सूर्य नारायणन गतिशीलता लिए एक नई दिशा जिंदगी को देने अपनी ऊर्जा से पथ प्रदर्शक, मार्गदर्शन करने जागो नई उमंग लिए मिठी सी मुस्कान के साथ है ईश्वर शुभ प्रभात की नई किरणों के साथ अभिनन्दन अभिनन्दन करता हूं। सरिता की पावन जल लहरें, जल प्रपातों से करती अटखेलियों निखार रही परिंदों कलाबाजियां शिखर पर हैं प्रातः उषा काल में दि...
स्वदेशी मेरा गाँव
कविता

स्वदेशी मेरा गाँव

डॉ. रश्मि शुक्ला प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** स्वदेशी मेरा गाँव, यहाँ आकर ठंडी-ठंडी मिलती छाँव, झींगुर बोले जैसे नई बहुरिया चले छम-छम बोले पाँव। मेरे आँगन के देखती प्यारी जिसमे अमराई बौराए, कुहू-कुहू के कोमल स्वर में कोयल तान सुन्दर सुनाए। दौड़ गली की ओर बढ़ रही ननुवा की तेज गाईया, रामू काका काधे पर डंडी बन बैठे मल्हार गवईया। हृदय हुए ज्यों हरे-हरे पर्वत अथवा हरे-भरे उपवन, मोर नाच रहे जैसे ताल पर मोरनी का बन नव जीवन। बिना जतन बिना यत्न के मेरे गाँव हरियाली हरियाए, और प्रकृति भी हमें प्यार से सुत समान दुलराए। आँगन में आँवला, नीम, वट,पीपल दिख जाए, गौ संग बछड़े को शीतलता बाँटें उनकी मृदु छायाएँ। हर पंछी को मिलता बसेरा, पशु को दाना-पानी, मौसम भी सुहाना जब पवन चले अपनी मनमानी। द्वारा-द्वार पर सबके तुलसी बिरवे पावनता फैलाएं, पुष्प व...
मुक्त
कविता

मुक्त

रीमा ठाकुर झाबुआ (मध्यप्रदेश) ******************** मुक्त हूँ उन्मुक्त हूँ, मुक्तता पहचान है! लाज से परिपूर्ण हूँ, जो धैर्य का प्रतिमान हूँ!! धानी रंग मे अवतरित हूँ, जो श्रमिक का अस्तित्व है! सबके तन की भूख हूँ, वेदना से विषक्त हूँ!! न समझो मै निरीह हूँ, मेरा मनोबल शिखर पर है! ममत्व मे मै,अबला सी हूँ, मै सबला से धैर्यवान हूँ!! मै कोमलता अपनो मे हूँ, सृष्टि के लिए जो सृजन है! मै पुरुष की भोग्या हूँ, मै सृष्टि का अभिमान हूँ!! परिचय :- रीमा महेंद्र सिंह ठाकुर निवासी : झाबुआ (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर ...
क्यूँ न गीत खुशी के गायें
गीत

क्यूँ न गीत खुशी के गायें

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** जब स्वच्छंद अम्बर तले, लहर रही हो हरियाली, जब उपवन के पुष्प देख, हर्षित हो रहा हो वन माली, तब क्यूँ न गीत खुशी के गायें! जब जग में जगी हो मानवता, मानव में ना हो विषमता, सेवा में समर्पण हो तन मन, पूजा जाए जब अपना वतन, तब क्यूँ ना गीत खुशी के गायें! जहाँ महिला जग में न्यारी हो, महके भाईचारा की क्यारी हो, जब राग द्वेष आडम्बर परे, दिखते नारी नर खरे खरे, तब क्यूँ ना गीत खुशी के गायें ! जहाँ शिक्षा की ही पूजा हो, सब हो अपना ना दूजा हो, भूखे को भोजन देने पानी, बड़ी लंबी पंक्ति में हो दानी। तब क्यूँ ना गीत खुशी के गायें! परिचय :- अशोक शर्मा निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी...
नया नबेला है
कविता

नया नबेला है

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** कभी दिल की सुनकर देखो। उसकी धड़कनो को पहचानो। फिर संजय के दिलको सुनो। शायद तुम्हारा दिल पिघल जाये। और दिल में मोहब्बत जग जाये।। दिल को दिल में देखो। सोये प्यार को जगा के देखो। चाँद तारों के बीच में दिल चमकता दिखेगा। तब तुम्हें मोहब्बत होने का पता चलेगा।। मोहब्बत वो होती है जो लबों से निकलकर। दिल दिमाग में बैठ जाती है सांसें बनकर दिल धड़कती है। और अंदर ही अंदर मोहब्बत होने का एहसास करवाती है। और प्रेमीयों को बुला के मिलने का साहस देती है।। तुम अब तक मोहब्बत को खेल समझ रही थी। और दिल की भवानाओं से खेल रही थी। जब मोहब्बत का काँटा स्वयं के दिल को चुभा। तो कांटे से ज्यादा तुम खुद रो रही थी।। जो मेहबूब का इंतजार करते है दिल से उसे प्यार करते है। लाख कांटे बिछे हो मेहबूब की राह में। फिर भी उन पर चलकर मेह...
एक सैनिक कि वतन से मौहब्बत
कविता

एक सैनिक कि वतन से मौहब्बत

कु. आरती सिरसाट बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) ******************** वतन के लिए जीते हैं वतन पर ही वो मरते हैं...! बेइंतेहा, बेमिसाल, बेपनाह मौहब्बत वो वतन से ही करते हैं..!! देखकर उनकी वर्दी कि चमक को दुश्मन भी कोसों दूर भागते हैं...! एक हाथ में तलवार तो दूसरे हाथ में वो अपने परिवार को रखते हैं..!! आने ना पाएं कोई भी आँच राष्ट्र पर, मातृभूमि की कसम रोज वो खाते हैं...! नहीं कोई हवाओं और वर्षा का डर वो तो तूफानों का भी रूख मोड़ देते हैं..!! ना दिन कि कोई परवाह, ना ही रातों का चैन वो जानते हैं...! भगवान भी ना कर सकें इतनी रक्षा वो तो ईश्वर की तरह पूजें जाते हैं..!! परिचय :- कु. आरती सुधाकर सिरसाट निवासी : ग्राम गुलई, बुरहानपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां,...
खुशी
कविता

खुशी

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** दिनों बाद दरवाजे पर दस्तक हुई किसी के आने की, देखा दरवाजे पर खुशी खड़ी है, एक कोना पकड़े हुए, पूछा बड़े दिन बाद आना हुआ, क्या शहर बदल दिया या कहीं दूर निकल गईं मुस्कुरा कर बोली, आती हूं पर शायद मकान का नंबर बदल गया बोला उस से बड़ी मगरूर रहती हो, कुछ तो सीखो अपनी बहन से, वो तो यूं ही चली आती है, परेशानी बनकर रहती भी है, रुकती भी है, साथ रहने का वादा भी करती है जवाब मिला, आती तो हूं मैं भी, रुकती हूं थोड़ा ठिठकती हूं, आहट पर कोई सुनता भी नही, दूर निकल जाती हूं, ये सोचते हुए, शायद तुम्हे मेरी जरूरत नहीं मैं तो रुकती हूं बच्चों की किलकारियों में उनके गीतों में, कभी रुकती हूं दोस्तों की मुस्कुराहटों में कभी बारिश की रिमझिम में, सरसराती ठंडी हवाओं में बांटती हूं खुद को छोटे-छोटे पलों और एहसा...
माँ भारती को
कविता

माँ भारती को

बबिता चौबे शक्ति माँगज दमोह ******************** अब गांधी चाहिए और नेहरू चाहिए मां भारती को भगत ओ आजाद चाहिए हर नवयुवा के दिल में राष्ट भक्ति भर सके।। वो भगत अटल गुरु सी बुनियाद चाहिये।। हर द्वंद वतन में जो चल रहे मिटा सकें । जन जन के ह्रदय में वही संवाद चाहिए।। जिसकी दहाड़ से हिलें पर्वत की चोटियाँ।। नव क्रांति भर सके वो शंखनाद चाहिए।। अंतः की गुलामी से छुड़ादे दे जो देश को।। हौसलों से भरा फिर कोई उन्माद चाहिए जो बैर रखते हिंदी से रहकरके वतन में करने को उनसे कोई वाविवाद चाहिये। परिचय :-  श्रीमती  बबिता चौबे शक्ति पिता : श्री कृष्ण कुमार चौबे पता : माँगज दमोह जन्म तिथि : १ जुलाई १९७६ जन्म स्थान : दमोह शिक्षा : बी. ए.  एम ए. नर्सिंग व्यवसाय : स्टाफ नर्स जिला चिकित्सालय प्रकाशित रचनाओं की संख्या :  ४०० काव्य सँग्रह : गोरैया तेरे रंग हजार  अयन प्रकाशन दिल्ली, मुझे...
ईश्वर फिर भी एक है
कविता

ईश्वर फिर भी एक है

अंकित कुमार पाँचाल जयपुर (राजस्थान) ******************** मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और गिरिजाघर एक है। नाम चाहे अलग-अलग ईश्वर फिर भी एक है।। जात-धर्म में बंटा है जो वो इंसां भी तो एक है। जात-धर्म बांटा था हमने उसका बनाया इंसां एक है।। दो आंखे, दो कान, एक मुँह, एक नाक, दो हाथ, दो पैर वाला प्राणी हर एक है। जिसको बनाने में भूल हुई वो दिव्यांग जन भी नेक है।। कोई करे प्रे, कोई करे अरदास कोई करे प्रार्थना तो कोई करे दुआ पर इन सबको सुनने वाला वो ऊपरवाला भी एक है। कण-कण में है जो समा हुआ वो सबका मालिक एक है।। अलख निरंजन है जो वो उसके रूप अनेक है। नाम चाहे अलग-अलग ईश्वर फिर भी एक है।। परिचय :-  अंकित कुमार पाँचाल निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी ...
कैसे गाएं गीत मल्हार
कविता

कैसे गाएं गीत मल्हार

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** घनघोर घटाओं में विपदा की कौंध अपार, सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।..... मच रहा चहुंओर हाहाकार, कोरोना महामारी से हुआ जीवन बड़ा दुश्वार। फैली है बेकारी ठप हुए सारे कारोबार, न कहीं मंगलाचार, न लगे कहीं कोई त्यौहार। बाग-बगीचों में ना कोई मधुर बहार। सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।..... विरहा की बदरी से हो रही फुहार, मानों प्रकृति ने किया न कोई श्रृंगार। कही विपदा की घनी बौछार, सब जन अच्छे दिनों की राह रहे निहार। भय की उत्कंठा से पार न करते देहरी द्वार। सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।..... दुश्वारी चुनौतियां खड़ी सामने मुँहवार। आंतक का अत्याचार, युवा है बेरोजगार। भ्रष्टों ने फैला रखा भ्रष्टाचार। रूका न अभी कहीं व्यभिचार। लाचार सी खड़ी है सारी सरकार। सखी कैसे गाएं गीत मल्हार।..... सपनों में अभी है सुखद ...
प्रेम का एहसास
कविता

प्रेम का एहसास

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** मिला तू मुझे उस पल जब मुझे प्रेम के अक्षर का ज्ञान ही नहीं था सिखा दिया तूने मुझे प्यार करना जिसे मैंने कभी महसूस तक नहीं किया जताना तो तू मुझे बहुत कुछ चाहता था पर जताना सका छोड़ दिया तूने मुझे क्योंकि मुझे से प्रेम करना तो तेरी सबसे बड़ी गलती थी मुझे प्रेम का मोल ही नहीं था छोड़ चला गया तू मुझे तेरे जीवन में कोई गम नहीं था तूने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया तेरे से होगी थी मोहब्बत मुझे फिर भी मैं इस प्रेम को नहीं कर पाई स्वीकार परिचय : संध्या नेमा निवासी : बालाघाट (मध्य प्रदेश) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी ...