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पद्य

महीना सावन का
कविता

महीना सावन का

गीता देवी औरैया (उत्तर प्रदेश) ************* भरे दिखे हैं ताल-तलैया, मनभावन वाले सावन में। बोले मोर और पपीहा, अब हर घर केआंगन में।। लिए खड़ी हल्दी- कुमकुम- थाल, राह देख रही बहन कलाई की। भई हम जाएंगे पीहर अपने, याद आई हमें अब भाई की।। टर्र-टर्र करते मेंढक भी, बोले सुहाने सावन में। चले नाव कागज की, बच्चों की प्यारे सावन में।। सावन में याद सताती है, जिनके गए परदेस पिया। कोयल गाये गान मीठा जब, अब धड़के विरह में जिया।। हरे-भरे चहुँ दिशि देखे, बाग- बगीचे और खलियान। अनजान नहीं है कोई यहां, धान रोपने चले किसान।। हम सब झूला झूले, बच्चे बूढ़े और जवान। शिव को पूजे इसी महीने, जो देते मनचाहा वरदान।। परिचय :- गीता देवी पिता : श्री धीरज सिंह निवासी : याकूबपुर औरैया (उत्तर प्रदेश) रुचि : कविता लेखन, चित्रकला करना शैक्षणिक योग्यता : एम.ए. संस्कृत बीटीसी, सम्प्रत...
जनसंख्या बढ़ती जाती है
गीत

जनसंख्या बढ़ती जाती है

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** जनसंख्या बढ़ती जाती है, कौन नियंत्रण कर पाएगा। संसाधन सीमित हैं भाई, कब ये सत्य समझ आएगा।। ***** सोच समझकर काम करें हम, खुशहाली घर आंगन लाएं। मनमाने आचरण हमेशा, हमें गर्त में लेकर जाएं।। शोलों पे चलने वाला क्या, गीत मल्हार कभी गाएगा। संसाधन सीमित हैं भाई, कब ये सत्य समझ आएगा।। ****** धरती जितनी है उतनी ही, रहने वाली है ना भूलें। सत्य यही है याद रखें हम, कोरे भ्रम में कभी न झूलें।। क्या कोई घर बना हवा में, मालिक घर का कहलाएगा। संसाधन सीमित हैं भाई, कब ये सत्य समझ आएगा।। ****** भार बढ़ाया धरती पर तो, टुकड़े टुकड़े हो जाएगी। इसकी या उसकी होगी तब, काम कहां सबके आएगी।। पैर काट जो बना अपाहिज , खुद पे कहर फकत ढ़ाएगा। संसाधन सीमित हैं भाई, कब ये सत्य समझ आएगा।। ******** कितनी मारा मारी ज...
दोहे
दोहा

दोहे

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** सच राम आज भी राम, ना हुए प्राचीन। बोलने से राम राम, रंक भी नामचीन।। घायल कि सब चोटों पर, तुरन्त कर दो लेप। नहीं सोचो अच्छा है, या बुरा हस्तक्षेप।। उठता बादल देखकर, मोर करते नाचे। पक्षी बनाते घोसलें, लकडियाँ है जांचे।। परिचय :- नितिन राघव जन्म तिथि : ०१/०४/२००१ जन्म स्थान : गाँव-सलगवां, जिला- बुलन्दशहर पिता : श्री कैलाश राघव माता : श्रीमती मीना देवी शिक्षा : बी एस सी (बायो), आई०पी०पीजी० कॉलेज बुलन्दशहर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से, कम्प्यूटर ओपरेटर एंड प्रोग्रामिंग असिस्टेंट डिप्लोमा, सागर ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट बुलन्दशहर से कार्य : अध्यापन और साहित्य लेखन पता : गाँव- सलगवां, तहसील- अनूपशहर जिला- बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश)। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एव...
जन-मन का राजा
कविता

जन-मन का राजा

सपना दिल्ली ************* सौभाग्य है देवभूमि का जिसने राजा वीरभद्र सिंह सा नेता पाया... समझ जनता को जो अपनी ही संतान प्रेम, स्नेह उन पर लुटाते अदम्य साहस पूर्ण व्यक्तित्व जिया जीवन स्वाभिमान से मन में न था उनके कोई वैर जिससे मिलते उसे अपना बना लेते न झुके न दिया झुकने औरों को जिसने सबको प्रेमभाव से गले लगाया.... राजनीति के थे सच्चे सिपाही देश प्रेम रहा सदा जिनके पहले बाकी सब बाद में इनके नेतृत्व में हर क्षेत्र में, हिमाचल ने शिखर छुएं कई-कई.... गाँव- गाँव का किया विकास दीन-दुखियो की सेवा में समर्पित रहे हमेशा एक ऐसा नेता जो जनता की समस्याओं को सुनने खुद जाते उनके बीच सुन उनकी यूँ समस्याएँ कोशिश सदा रहती उनकी निर्वहन हो हर समस्या का.. देखो कैसा सन्नाटा आज यहाँ छाया क्या विपक्षी, क्या प्रतिद्वंद्वी शोक मना रहा आज समस्त हिमाचल अपने प्रिय नेता को खोकर विशाल ...
भीष्म पितामह
कविता

भीष्म पितामह

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** भीष्म सरीखा योद्धा कोई हुआ कभी न होगा धीर वीर निष्णात युद्ध में दूजा नहीं सुना होगा गंगा पुत्र भीष्म सम्मुख़ नतमस्तक रहे नरेश सभी दृढ़ प्रतिज्ञ आसक्ति मुक्त न घेरा वैभव मोह कभी इच्छा मृत्यु वरदान प्राप्त हर योद्धा से वे श्रेष्ठ रहे हर विद्या में थे प्रवीण पर जाने कितने क्लेश सहे दिया वचन रक्षार्थ हस्तिनापुर सिंहासन का पर भूल गए अभिप्राय निभाये साथ कौरवों का चीर हरण कर रहा दुर्योधन रहे पितामह मूक व्यर्थ प्रतिज्ञा में उलझे थे कर गए भारी चूक चक्रव्यूह में घेर लिए जब अभिमन्यु को अन्यायी बहुत दिखे लाचार पितामह फिर भी बुद्धि न आयी भूल गए थे राज धर्म वह वरना युद्ध न होता लाल न होता कुरुक्षेत्र औ न विनाश ही होता भीष्म प्रतिज्ञा से मिलती है अति उत्तम एक सीख चुप रहना अपराध है यदि मची कह...
हिन्दी
कविता

हिन्दी

महेन्द्र सिंह कटारिया 'विजेता' सीकर, (राजस्थान) ******************** आओं मिल राष्ट्र का मान बढ़ाएं, हर क्षेत्र में भाषा हिन्दी अपनाएं। जनचेतना का आधार है हिन्दी, वालिदैन के वात्सल्य सी है हिन्दी।..... हिंदोस्तां की ज़ुबां है हिन्दी, वतन की आन बान शान है हिन्दी। हमारी असली पहचान है हिन्दी, भारतवंशी का अभिमान है हिन्दी। जनचेतना का आधार है हिन्दी।.... हिन्द राष्ट्र की आशा हिन्दी, जन जन की मातृभाषा हिन्दी। जात-पात के बंधन को तोड़ती हिन्दी, एकता सूत्र में सब को जोड़ती हिन्दी। जनचेतना का आधार है हिन्दी।..... गणराज्य की आधिकारिक भाषा है हिन्दी, हमारी संस्कृति-समृद्धता का प्रतीक है हिन्दी। राष्ट्रभक्ति भावना को प्रेरित करती हिन्दी, धाराप्रवाह से बोलने वाली मातृभाषा हिन्दी। जनचेतना का आधार है हिन्दी।..... दुनिया में सम्मान व स्वाभिमान दिलाती हिन्दी, हमारे प्रांतों की क्षे...
विश्वास
कविता

विश्वास

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ रूद्रप्रयाग (उत्तराखंड) ******************** हमें यकीन इतना है, कि तुम हमारी आत्मा की आवाज़ हो। घरौन्दा कहीं भी रहे ये धडकनें उड़ती तुम्हारे लिए ही हैं, कभी इस डाली पे कभी उस डाली पे बसेरा मेरा मगर ये साँसों की उड़ान तुम्हारे दर पे ही हो।। आस्था से भरी ये आहें खुशबू की तरह बिखरती रहे, पर श्रद्धा के सुमन तुम्हारे चरणों में ही हों। यादों के शिलशिले घनघोर सावन की घटाएँ कहीं भी बरसे, मगर निष्ठा की बूँदों का अहसास तुम ही हो।। ये मेरा समर्पण मेरी साधना तुम्हें महसूस करती हैं, मगर मेरी साधना के साधक तुम ही तो हो। हृदय की डोर लहरों से गुज़र रही है, इतना यकीन है! कि मेरी डगमगाती कश्ती की बागडोर तुम ही तो हो।। मन की श्रद्धा तन की निष्ठा समय की धारा इस धरा पे विश्वास का वो तिनका तुम ही तो हो।। लड़खड़ा जायें ये पग कभी सहारा तुम्हारी पग डंडी ...
लिखने आऊंगा
कविता

लिखने आऊंगा

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** जो मोहब्बत को दूर से देखता है। उसे ये बहुत अच्छी लगती है। और जो मोहब्बत करता है उसे ये जन्नत लगती है।। जिंदगी का सफर यूँ ही कट जायेगा। जीवन का उतार चढ़ाव भी पुरुषार्थ से निकल जायेगा। पढ़ना है यदि खुदको तो दर्पण के समाने खड़े होना। और स्वयं की मंजिल को अपने अंदर बार बार देखना।। आज के दौर में सबको राम श्याम चाहिए। पर खुद सीता राधा और मीरा बनने को तैयार नहीं। वाह री दुनियां और इसे लोग कुर्बानी सामने वाले से चाहिए। और यश आराम खुद को बिना परिश्रम के चाहिए।। मेरी दिलकी पीड़ा को कभी पढ़कर देखो। दिलकी गहाराइयों में तुम उतरकर देखो। तुम्हें प्यार की जन्नत और बिछी हुई चांदनी। हरेभरे बाग में खिले हुये गुलाब नजर आयेंगे।। किसी दिल वाले से दिल लगाकर देखो। अपनी भावनाओं को उसे बताकर तुम देखो। वो प्यार के सागर में ...
बारिश की बूँदें
कविता

बारिश की बूँदें

श्रीमती विभा पांडेय पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** अक्सर कोई न कोई कहानी लेकर बरसती हैं। कभी आँखों में आँसू बन कभी भावनाओं के तूफान ले कभी तिरस्कार पाकर कभी क्रोध की अधिकता से आँखों से घुमड़-घुमड़ बरसती हैं। बारिश की ये बूँदें जब भी बरसती हैं कई जख़्म हरे कर जाती हैं। और कई बार आँखों के कोरों को भीगा कर आँसूओं का सैलाब लेकर पुराने मन के मैल को भी धो जाती हैं। बारिश की बूंदें हमेशा कोई न कोई कहानी लेकर ही बरसती हैं। परिचय :- श्रीमती विभा पांडेय शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी एवं अंग्रेजी), एम.एड. जन्म : २३ सितम्बर १९६८, वाराणसी निवासी : पुणे, (महाराष्ट्र) विशेष : डी.ए.वी. में अध्यापन के साथ साथ साहित्यिक रचनाधर्मिता में संलग्न हैं । घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
बरखा रानी
कविता

बरखा रानी

रामकेश यादव काजूपाड़ा, मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** अमृत-सा जल लाकर बादल, पहले नभ में छाते हैं। उमड़-घुमड़कर करते बारिश, नदियों से प्रलय मचाते हैं। हरी-भरी धरती हो जाती, वो फूला नहीं समाते हैं। सज जाती खेतों में फसलें, ऐसा रंग चढ़ाते हैं। पड़ जाते डालों पे झूले, दादुर शोर मचाते हैं। पानी की लहरों पे बच्चे, कागज की नाव चलाते हैं। कभी-कभी बादल भी नभ में, खुद पक्षी बन जाते हैं। हिरन, बाघ, हाथी बनकर, बच्चों का मन वो लुभाते हैं। वन-उपवन के होंठों पे तब, हँसी की रेखा खिंचती है। कुदरत की बाँहों में देखो, दुनिया कितनी खिलती है। पत्थर, पहाड़, पठार सभी, पानी की संतानें हैं। पानी देखो! कहीं न बनता, हम कितने अनजाने हैं। सब ऋतुओं की रानी बरखा, जीवन नया ये बोती है। जन-जन की धड़कन है यही, ना समझो तो भी मोती है। जल संरक्षण करके ही हम, जल स्तर को बढ़ायेंगे...
कान्हा से उलाहना
भजन

कान्हा से उलाहना

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** कान्हा गोकुल में माखन खिलाया नही, कैसे मानूँ की माखन खिलाते हो तुम। किसी छीके पे माखन टंगा ही नहीं, कैसे मानूँ की माखन चुराते हो तुम। कान्हा गोकुल... तेरी किरपा से आया हूँ ब्रजधाम में, वो ही आता है जिसको बुलाते हो तुम, आस्था तेरे चरणों मे जिसकी घटी, उससे तत्काल ही रुठ जाते हो तुम। कैसे मानूँ कि... सब हैं राधा को तेरी नमन कर रहे, इसलिए सबमें ही नज़र आते हो तुम, जो भी तेरे लिए है तड़पता यहां, उसके अंतर में शीघ्र समाते हो तुम। कैसे मानूँ.... गायें गोकुल की तो कहीं जाती नहीं, दूध माखन कहाँ चला जाता है फिर। तुमको सब ज्ञात है, दृष्टि व्यापक तेरी, देखना है कि कब रोक पाते हो तुम। कैसे मानूँ की ... तेरे गोकुल का प्रसाद माखन नहीं, इसलिए तुमसे शिकवा किया "प्रेम" ने, तुमने ग्वालों को माखन खिलाया बहुत, देखना ...
मनमीत
कविता

मनमीत

रुचिता नीमा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हर पल साथ हो तुम, हमेशा मेरे पास हो, कैसे कहू कि तुम एक खूबसूरत अहसास हो। अतृप्त से मन को तुम प्रेम का पावन दरिया जो पास हो, डूबकर भी जो न बुझे, वो अधूरी सी प्यास हो।। तिमिर को जो दूर करे, वो मन का रोशन चिराग हो।। कह नही सकती क्या हो तुम मेरे लिये, मगर सबसे खास हो।। मनमीत कहु या प्रीतम तुम्हें, हर बन्धन तुमसे आबाद हो।। जन्मों जन्मों का मेरे, तुम पुण्यों का उजास हो।। इस दिल की तमन्नाओं का तुम ही आखिरी पड़ाव हो। पाकर तुम्हें मुक़म्मल हुए हम, इस जिंदगी का अलौकिक प्रकाश हो।। कहने को तो मनमीत हो, पर ईश्वर का दिया खूबसूरत उपहार हो।। यही दुआ है दिल से, हमेशा मेरे हाथों में बस तुम्हारा हाथ हो।। परिचय :-  रुचिता नीमा जन्म २ जुलाई १९८२ आप एक कुशल ग्रहणी हैं, कविता लेखन व सोशल वर्क में आपकी गहरी रूचि है ...
मां का बटवारा
कविता

मां का बटवारा

डॉ. तेजसिंह किराड़ 'तेज' नागपुर (महाराष्ट्र) ******************** ये जिंदगी ना तेरी हैं ना मेरी हैं वक्त के इन कांटों में उलझी सी कभी हंसाती कभी रूलाती सुख दुखों में बंटी ये जिदंगी अंधेरों उजालों से लड़ती ये काया जीते जी अब तुम ही बताओं मां से मिला तो कैसे मां को ठुकराएं। बचपन की तस्वीरें सब बदल चुकी कोमल मन की यादें निकल चुकी दुलार कम आक्रोश से लड़ने लगा मां की ममता को पुत्र मोह खलने लगा सयानी औलादों से मां को डर लगने लगा कहीं टूट ना जाए मिट्टी का ये घरोंदा मां का दिल ये सोचकर रोज रोने लगा वक्त बड़ा बलवान है ये समझना चाहिए पुराने इतिहास से सबको सींखना चाहिए मां व जमीं को ही अबतक बाटा गया हैं मोह और लालच में रक्त को ही काटा गया हैं देती थी दुहाई मां सब पुत्र साथ रहेगें जब नजर लगी जमाने की तो क्या कहेगें भाई ही भाई के खून का प्यासा हो गये बटवारें को लेकर देखों सब अं...
बारिश
कविता

बारिश

मंजू लोढ़ा परेल मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** सभी के अपनी-अपनी, पसंद के मौसम होते हैं, किसी को गर्मी तो किसी को सर्दी भाती है, लेकिन बारिश का मौसम हर दिल, अजीज होता है। इंसान-धरती-नदियां-आकाश सभी इस, रुत की प्रतिक्षा दामन फैलाए करते हैं। घुमड़-घुमड़ कर जब बादल गरजते हैं, दामिनी चमकती हैं, बिजली कड़कती हैं, घनघोर घटाएं छा जाती हैं, बरस-बरस कर धरती के हृदय को, तृप्त करती है, मोर नाच उठते हैं, पपीहे की पिहू-पिहू की पुकार से, वातावरण गूंज उठता हैं। पग-पग हरियाली बिछने लगती हैं, घर आंगन ताल-तलैया-सम्पूर्ण प्रकृति, बूंदो की थाप पर, मानो नृत्य करने लगती है। पहली बारिश की बूंदो से, माटी की सोंधी-सोंधी खुश्बू से, मन आंगन गुलजार होने लगते है, खुली बांहे आसमान की ओर मुंह उठाए, हम स्वागत करते हैं, ऋतुओं की रानी बरखा का, आओ आषाढ़, आओ बरखा तुम्हारा अभिनंदन है़। धरा के ...
पावन गंगा
कविता

पावन गंगा

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** देव नदी सारी दुनिया में, भारत की पहचान। सारे नर-नारी करते हैं, गंगा का सम्मान। गंगा पावन नदी हिन्द की, गंगा तो है प्राण। जिसने देखा धन्य हुआ वह,पाता अनुपम त्राण। ग्रंथों में भी तो मिलता है, गंगा का गुणगान। गंगा है सारी दुनिया में, भारत की पहचान। स्वच्छकारिणी पापहारिणी, करती हर्ष प्रदान। धरती पर है नहीं कहीं भी, सरिता गंग समान। गंगा तट पर चलते रहते, नित्य नए अभियान। गंगा है सारी दुनिया में, भारत की पहचान। गंगा में जो जल मिलता है, बढ़ता उसका मान। सुरसरिता वह भी कहलाता, होता गंग समान। गर्वित है गंगा-गरिमा पर, सारा हिन्दुस्तान। गंगा है सारी दुनिया में, भारत की पहचान। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी...
सूनापन
कविता

सूनापन

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनदर्पण सुना है हिलते पत्ते की नोक सा शून्य आकाश सा सूनापनखलता है संध्या का सावन का बिन कौधी बिजली का रितेचक्षुओमेें प्रतिक्षा सा सूनापन खलताा है द्वार देहरी का क्योंकि देहरी पर पायल की झंकार नहीं सुना पनखलताहैै वृक्षों का पतझड़ में जब उसके साथी साथ छोड़ते हैं लहरें भी सुनापन लिए उदास है क्यों क्योंकि बयार ही नही बहती सूनापन खलताा है जब श्रृंग पर वृक्ष नहीं होते ऊंचेश्रृग सूने लगते है नीर भरी कारी बदरी को सूनापन लगता है जब ठंडी बयार नहीं बहती रवि शशि भी मौन होते हैं सुनें होते हैं जब उन्हें ग्रहण लगता है परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं ...
हिन्दी की रक्षा करता हिन्दी रक्षक मंच
कविता

हिन्दी की रक्षा करता हिन्दी रक्षक मंच

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** हिन्दी की रक्षा करता हिन्दी रक्षक मंच। हम सबको अवसर देता हिन्दी रक्षक मंच।। हिन्दी भाषी के लिए सेतु बनता हिन्दी रक्षक मंच। हिन्दी को मातृभाषा बनाता हिन्दी रक्षक मंच।। हिन्दी को हिंदुस्तान से जोड़ता हिन्दी रक्षक मंच।। हिन्दी को विश्वव्यापी बनाता हिन्दी रक्षक मंच।। युवाओं को साहित्य से जोड़ता हिंदी रक्षक मंच। राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय बनता हिन्दी रक्षक मंच।। "अरविंद" को हिन्दी रक्षक बनाता हिंदी रक्षक मंच।। परिचय :- अरविन्द सिंह गौर जन्म तिथि : १७ सितम्बर १९७९ निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) लेखन विधा : कविता, शायरी व समसामयिक सम्प्रति : वाणिज्य कर इंदौर संभाग सहायक ग्रेड तीन के पद में कार्यरत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
आओ बच्चों नया सिखाए
कविता

आओ बच्चों नया सिखाए

माधुरी व्यास "नवपमा" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आओ बच्चों नया सिखाए, जीवन की नई नीत रे। अनदेखी इस महाबला की कैसी है तासीर रे। कोरोना के संग जीवन को जीने की तरकीब रे। आओ बच्चों नया सिखाए, जीवन की नई नीत रे। दूर-दूर रहकर भी सीखो, रहना तुम नजदीक रे। एक-दूजे को देते रहना, मन से मन की प्रीत रे। आओ बच्चों नया सिखाए, जीवन की नई नीत रे। साथ-साथ पढ़ते-बढ़ते, देना सदा तदबीर रे। महामारी को मात देते, लिखना तुम तकदीर रे। आओ बच्चों नया सिखाए, जीवन की नई नीत रे। हौसले की लकीरों से, बनाना नई तस्वीर रे। मुस्तेदी से करते जाना, सबको तुम ताकीद रे। आओ बच्चों नया सिखाए, जीवन की नई नीत रे। धीरे से अब लेते जाना, तालीम की ये रीत रे। महफ़ूज रहकर लेना तुम मुसीबतों को जीत रे। आओ बच्चों नया सिखाए, जीवन की नई नीत रे। परिचय :- माधुरी व्यास "नवपमा" निवासी - इंदौर मध्य प्रदेश सम...
दगा न देना…
कविता

दगा न देना…

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** बरखा का आना दिलको बहलाना जिंदगी होती रंगीन। दिलकी उमंगो से दिलकी तरंगो से महक जाता है यौवन। हो..बरखा का आना...........।। रुख जिंदगी ने मोड़ लिया कैसा। हमे सोचा नहीं था कभी ऐसा। होता नहीं यकीन खुद पर ये क्या हो गया। किस तरह से ये दिल बेबफा हो गया। इंसाफ कर दो मुझे माफ कर दो। इतना तो कर दो मुझे पर तुम रेहम।। हो...बरखा का आना....।। अवरागी में पड़कर बन गया दिवाना। मैंने क्यों तेरे भावनाओं को न जाना। चाहत क्या होती ये तूने मुझे दिखलाया। प्यार में जीना मरना तूने ही सिखलाया। चैंन मेरा ले लो खुशीयाँ मेरी ले लो और दे दो अपने गम।। हो.. बरखा का आना.....।। मेरे अश्क कह रहे मेरी कहानी। इन्हें अब तुम न समझो पानी। रो रो के आंसूओ से मेरे दाग धूल गये है। अब इनमें बफा के रंग भरने लगे है। खुशियाँ मैं दूंगा तुमको हर...
तेरी खूबी
कविता

तेरी खूबी

संध्या नेमा बालाघाट (मध्य प्रदेश) ******************** निज की लेखनी से कहती है, अपने दिल की एक एक बात। मन में तेरे भय न किसी का, करती सदा है हक़ की बात।। डरती नहीं अंधेरों से भी, न करती डरने की बात। सच्चा पथ अपनाकर कहती, दिन को दिन व रात को रात।। मेरे साथ तू हर पल रहती, हमराही सा मिलता साथ। मेरे मष्तिष्क में है बसती, अपनों संग रहती है साथ।। दोस्तों पर यदि आता संकट, सदा तू बांटे उनका हाथ। अपना खास समझती सबको, हर पल देती सबका साथ।। तेरे मन में केवल रहती, हरदम अपनों की परवाह। तू ही सदा निकाला करती, उत्तम पथ चलने की राह।। तू पी जाती है दुख अपने, खुशियां बांटे सबके संग। तू प्रभु का वरदान है लगती, खुद व सबको भरे उमंग।। तेरे सब विचार अलबेले, चिंता मुक्त हो जाते अपने। तू हरदम करती प्रयास है, सब अपनों के सच हों सपने।। नन्हे परिंदों की खातिर ही, तेरे मन...
सहेजना
कविता

सहेजना

अर्चना तिवारी वड़ोदरा (गुजरात) ******************** हम औरतें सहेजने का हुनर खुद ब खुद सीख जाती है बचपन की यादों को सहेज मायके से विदा होती हैं जिंदगी के सुखद पलों को दोस्तों के संग बिताए किस्सों को सहेजती किसी खजाने की तह में नहीं होती है ऊब कभी उन्हें पुरानी यादों में डूबने पर घंटों खुद से खुद ही बातें करती हैं खुद की तलाश में विचरती हैं सहेज न पाती है वह अपनों से मिली उपेक्षा को बेवजह के दिए उनके पीड़ा को उस दर्द को असह्य हो निकल पड़ती जब सैलाब आ जाता अश्कों का तरती उबरती रहती उसमें सहेज न पाती बिखरती सागर की लहरों को दिखा न पाती अपने नासूर को परिचय :- अर्चना तिवारी निवासी : वड़ोदरा (गुजरात) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय ...
दायित्व
कविता

दायित्व

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** बकरी चराने गई बिटियाँ को जरा सी देरी हो जाने पर पढने जाने की फिक्र को लिए माँ पुकार रही बिटियाँ को। आवाज पहाड़ों से टकराकर गुंजायमान हो रही नदी भी ऐसे लग रही मानो वो भी बिटियाँ को ढूंढ़ने में बहते हुए अपना दायित्व निभा रही हो। शिक्षा से ही बिटियाँ ने पा लिया एक दिन बड़ा ओहदा माँ की याद आने पर आज बिटियाँ ने पहाड़ों पर से पुकारा जब अपनी माँ को। तब पहाड़ हो चुके थे मोन नदी भी हो चुकी थी सूखी बकरियां भी हो गई गुम। सूना लगने लगा घर। क्योकि इस दुनिया में नहीं है माँ बिटियाँ को शिक्षा का दायित्व देते हुए देखा था इसलिए ये सभी मोन होकर दे रहे माँ को श्रद्धांजलि। परिचय :- संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता :- श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि :- २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा :- आय टी आय व्यवसाय :- ड़ी एम (जल संसाधन विभ...
अभिलाषा
कविता

अभिलाषा

मधु अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** अभिलाषा है मेरी प्रभुवर, श्वास श्वास में तेरा नाम रहे। सांसो की माला हो मेरी, राम नाम में ध्यान रहे। जपती रहूं तेरे नाम की माला। जैसे सरोवर का हंस जपत, जलधर जपत मोर को जैसे, हम तुमको जपे जैसे चंद्र चकोर, अभिलाषा है मेरी प्रभुवर, श्वास श्वास में तेरा नाम रहे। कोई ना रहे दुखारी, हर जीव हो सुखारी। संकट सबके ही टल जाए, जब हो कृपा तुम्हारी। देश पर संकट आया अति भारी, संभालो तुम गिरधारी। अपनी कृपा की बारिश कर दो, अभिलाषा है मेरी, उर में सबके शांति भर दो। लड़ाई झगड़े सबके हर दो, सतयुग की स्थापना कर दो। अभिलाषा है मेरी प्रभु वर। श्वास श्वास में तेरा नाम रहे परिचय :- मधु अरोड़ा पति : स्वर्गीय पंकज अरोड़ा निवासी : शाहदरा (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौल...
जन्मदिन पर विशेष बधाई
कविता

जन्मदिन पर विशेष बधाई

महेन्द्र सिंह राज मैढी़ चन्दौली (उत्तर प्रदेश) ******************** सुधीर श्रीवास्तव नाम है जिनका, बरसैनियां है जिनका सुख धाम। थाना-मनकापुर जनपद गोण्डा, साहित्य साधना जिनका काम।। श्री ज्ञान प्रकाश पिता है जिनके, माता हैं स्वर्गीय श्री.विमला देवी। बहुत सरल स्वभाव था जिनका, परम धर्मणी,निज संस्कार सेवी।। एक जुलाई उन्नीस सौ उनहत्तर, जनम लिए विमला के कोख। बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के, देते थे सब न उनका परितोख।। बचपन बीता खेल कूद में, पठन-पाठन के ही रंग में। कुछ बड़े हुए तो कूद पडे़, संघर्ष युक्त जीवन रण में।। पन्द्रह फर. दो हजार एक में, शादी हुई अंजू के साथ। दो बच्चों के पिता बन गए, सर पर था बस माँ का हाथ।। बचपन से थी रुचि लेखन में, जो जीवन संघर्ष में पीछे छूटी। दो हजार बीस में पक्षघात लगा, निज स्वास्थ्य की बगिया लूटी।। पर पक्षघात ने साहित्य प्रेम को, उन...
तिरंगे की अभिलाषा
कविता

तिरंगे की अभिलाषा

डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या" जयपुर, (राजस्थान) ******************** चाह नहीं मैं फरेबी नेता के हाथों में इठलाऊँ। चाह नहीं मैं झूठे लोकतंत्र के मंदिर पर फहराया जाऊँ। चाह नहीं मैं भगवा और हरे में बंट जाऊँ। चाह नहीं मैं किसी वीआईपी की गाड़ी की शोभा बन पाऊँ। चाह नहीं मैं विरोध स्वरूप लालकिले पर चढ़ जाऊँ। चाह नहीं मैं किसी लालची नेता के तन पर लपेटा जाऊँ। चाह नहीं मैं किसी खेल की शोभा बन पाऊँ। चाह नहीं मैं किसी धर्म-ध्वज के साथ लहराया जाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी भारत माता की शान बढाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी केसरिया से शौर्य को दिखलाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी हरे रंग से विकास को दर्शाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी सफ़ेद से शांति का पाठ पढ़ाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी चक्र से मानव धर्म को सिखलाऊँ। है अभिलाषा यही मेरी मैं सबके मन मंदिर में बस जाऊँ। बाहर भले ही न फहराओ सब के अन्तर्...