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पद्य

अनकहा इश्क़
कविता

अनकहा इश्क़

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं जानती हूं तुम सब जानते हो फिर ये भ्रम की माया क्यों नहीं पहचानते हो ? जानते हो तुम मेरी मुस्कुराहट की वजह फिर मुस्कुरा औरो से मेरे सीने को क्यों छली करते हो। मैं जानती हूं तुम मेरी फिक्र बहुत करते हो छू न जाए हवा भी मुझे इस बात से भी डरते हो। सुना है तुम जीत लेते हो सब का हृदय फिर मेरी एक मुस्कुराहट के आगे क्यों ख़ुद को हारे हुए बैठे हो ? लिखते हो तुम अपनी गजलों में मेरे बारे में फिर मेरा नाम सरेआम लेने से क्यों डरते हो। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
आओ सिर्फ भारतीय बनें
कविता

आओ सिर्फ भारतीय बनें

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हर तरफ नजर आ रही व्यवस्था चौबंद चाक, अपने ही शहीदों के बलिदान रहे हैं क्यों नाप, बताओ जरा क्या उन सबने दी थी कुर्बानी अपनी जाति, धर्म या सम्प्रदाय के उत्थान खातिर, फिर क्यों बन रहे इन सबके नाम पर शातिर, आत्मबलिदान था केवल अपने देश के लिए, संस्कार, संस्कृति, सभ्यता और परिवेश के लिए, विदेशों में जा क्या देते हो परिचय अपनी जाति का, अपने मशहूर खानदान और ख्याति का, नहीं वहां कहना पड़ता है खुद को भारतीय, समता,समानता होता है जहां न पूजा न आरती, सम होने के प्रतीक बन हाथ मिलाते हो, रंग रूप को भूलकर सबको गले लगाते हो, फिर लौटकर अपने ही वतन में, भूल वही सभ्यता क्यों आग लगाते हैं चमन में, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, ले विश्वबंधुत्व का मूलमंत्र, कहते हैं कि चलना है केवल शांति की राह, आंतरिक सा...
दृष्टि-दंश
कविता

दृष्टि-दंश

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** प्रश्न कौन करे..? प्रश्नवाचक तो होती हैं इंसानी दृष्टियां किसमें साहस है सत्य सुनने का और... कौन धुरंधर है जो मिथ्या भाषण कर न सके मित्रों..., कुछ तो होते हैं जन्म से दृष्टिहीन संभव है न देख पाते हों वे बाहरी दुनिया मगर... सजग होता है अंतर्मन पूरी समझ होती है अपने निजी स्वार्थ की जैसे थी ऐतिहासिक किरदार धृतराष्ट्र को ... कुछ होते हैं दृष्टिहीन आँखों के होते हुये भी जैस होते हैं वर्तमान में नेता ... पर... प्रलयंकारी होती है वेदनापूर्ण और मर्मांतक आम आदमी के लिए जिसके पास होती है कहने को दृष्टि मगर मूकदृष्टि केवल क्योंकि मुखर होता है अन्याय को सहना हनन होता है नीतियों का चयन होता है अयोग्य का चाहे बहाना कुछ भी हो आरक्षण या फिर सिफारिश ... संस्कार, परंपरा, अनुशासन पथ-प्रदर्...
हरिगीतिका छंद
गीतिका, छंद

हरिगीतिका छंद

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** हरिगीतिका छंद गीतिका छंद मापनी - २२१२ २२१२, २२१२ २२१२ ब्रह्मा सुता मॉं शारदे मम, स्वर सुवासित कीजिए। हिय भाव -पंकज हों सदा मन, प्राण भाषित कीजिए।। संचार आशा का करो हो, दूर पीड़ा अंक से। शुचि शिष्टता ही शीर्ष पर हों, दुष्ट दुर्जन रंक से।। शब्दावली हो भाव भूषित, लेखनी में बास हो। रचती रहूॅं नित छंद नूतन, मातु उर आवास हो। द्युतिमान दे संज्ञान दे हम, मान के पालक बनें। आए शरण में मॉं भवानी, ज्ञान के याचक बनें।। पुष्पित सुमन अलि डोलते हैं, सुभग पीले रंग में। आई धरा मॉं शारदे शुचि, भारती की गंग में।। विनती करूँ कर जोड़ कर माँ, शब्द का शृंगार दे। तेजस्विनी आभामयी मॉं, नित प्रभा संसार दे।। पावन हृदय कमलासिनी मन, भाव निर्मल कीजिए। आनंद हिय बरसे सदा मॉं, वेदना हर लीजिए।। तेजस्विनी, राजेश्वरी माँ,...
वंदे मातरम्
गीत

वंदे मातरम्

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वंदे मातरम् आज कह दो शान से है जान वंदे मातरम् देश के हर लक्ष्य का संधान वंदे मातरम् देश की मिट्टी है चंदन शीश तुम धारो इसे हमसे जो करवा दे सब बलिदान वंदे मातरम चीर दो दुश्मन को और ग़द्दार को तुम दो सज़ा आज कर दो जंग का ऐलान वंदे मातरम् बाल गंगाधर तिलक का स्वप्न है साकार सब अब हमारे देश का अभिमान वंदेमातरम् याद कर लो तुम शहीदों ने किया उत्सर्ग जो अपनी आज़ादी की है पहचान वंदे मातरम् आप फहराएँ तिरंगा पर्व में गणतंत्र के आइए मिल कर करें जयगान वन्देमातरम् विश्व नतमस्तक हुआ सम्मुख हमारे देश के दे रहा है शक्ति हमको गान वंदेमातरम् परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भ...
बसंत पंचमी
कविता

बसंत पंचमी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** पीताम्बर ओढ़े धरा आज मुस्काई है, आँगन-आँगन में बसंत की छवि छाई है। कोपलों की हँसी, पत्तों की हरियाली, ऋतुओं की रानी बन आई खुशहाली। वीणा की झंकार में सरस्वती आईं, ज्ञान, कला, वाणी को संग लाईं। अक्षर-अक्षर में दीपक सा उजियारा, अज्ञान तमस से जग को उबारा। सरसों के खेतों में सोना लहराए, भौंरे, तितलियाँ राग नए गुनगुनाएँ। मंद पवन की चंचल-सी तान, जीवन में भर दे नव आशा, नव प्राण। मन के आकाश में रंग घुले पीले, स्वप्न नए हों, संकल्प हों नुकीले। सृजन की धारा बहे अविराम, हर हृदय गाए बसंत का गान। बसंत पंचमी, नव आरंभ की बेला, श्रद्धा, सौंदर्य का मधुर मेला। ज्ञान-पथ पर बढ़ें, लेकर उजास, जीवन बने सुरभित, सार्थक, उल्लास। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य...
जय हिन्द जय भारत
कविता

जय हिन्द जय भारत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** उमंग की बौछार हो, उत्साह की बयार हो, आनन्द की बरसात हो, और प्यार की बहार हो, जीवन अब खुशहाल हो, मन मे अनुराग हो, बस दिल मे एक भाव हो, स्वस्थता की बात हो, रोग मुक्त जहान हो, निर्मल आकाश हो, स्वस्थता का वास हो, प्रकृति मै बहार हो, विपदा सब दूर हो, जीवन मे रंग हो, मन मे उमंग हो, एकता का गान हो, देश भक्ति का भाव हो, प्रार्थना और वंदना हो, देश खुशहाल हो, सूर्य मे प्रकाश है, अन्धकार का नाश है, देश खुशहाल हो परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिं...
मुझे मेरा गाँव याद आता है
कविता

मुझे मेरा गाँव याद आता है

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** मुझे मेरा गाँव याद आता है वह बचपन याद आता है, जब तितलियों से उड़ते फिरते थे, वह मौसम याद आता है।। ना कोई रोक थी ना कोई टोक थी, हर लम्हा हम खुद मे जिया करते थे, याद आता है वो बचपन जब हम गाँव मे रहते थे।। ना किसी कदम पर कोई खतरा था ना माँ की आँखों का पहरा था, ना बाबा परछाई से घुमा करते थे ना कलाई पर भाई की पकड़ थी याद आता है वह बचपन...।। याद आती हैं वो गलियां जिनमे बचपन फूलों सा खिलता था हर नजर मे हमारा एक अपना सा रिश्ता हुआ करता था, कोई हमे बहन तो कोई बिटिया कहा करता था।। याद आता है वो...।। बदल गया मेरा गाँव अब तो लोग भी बेगाने लगते है, कोई दो कदम साथ भी चले तो हम घबराने से लगते है।। कोई अगर पूकार भी ले हमे तो हम घबराने लगते है।। याद आता है मेरा गाँव...।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : ...
प्रेम की आधुनिकता
कविता

प्रेम की आधुनिकता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** 'लव', 'रोमांस', मस्ती और ताजा ताजा "लिव-इन-रिलेशनशिप" अंग बन चुके हैं इन्सानी जीवन के... सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आ रही संस्कारों और परंपराओं से तकरार जीवन में... भारतीय संस्कृति में सदा महत्व रहा है सामाजिक बंधंनों और मर्यादाओं का ताना बाना मगर कहाँ मानती है आज की पीढ़ी राग अलापती है स्वेचछाचारिता और स्वच्छंदता निजी जीवन में... जुनूनी फितरत है प्यार में पागल होना पर क्या अच्छा है अँधा होना भूल जाता है सारे संबंध अपनत्व और रस्मोरिवाज जीवन में... कहाँ कुछ सोचता है उन्माद... आवेग... घुल जाता रक्त संग आवेश रम जाता है सिर्फ प्यार में बदल जाता है व्यवहार वासना कहाँ रह जाती वासना लगता सच्चा प्यार जीवन में... बदलते परिवेश में गलत हो जाते हैं सभी शुभचिंतक, यहाँ तक कि ...
जाड़े की धूप
कविता

जाड़े की धूप

सुरभि शुक्ला इन्दौर (मध्य प्रदेश) ******************** जाड़े की गुनगुनी धूप में छत पर बैठना एक सुकून भरा वो एहसास देता है जैसे कोई माथे पर प्यार भरा हाथ फेर देता है कुछ देर के लिए सारे गम भुला देता है। ना किसी से कुछ कहना ना किसी से कुछ सुनना, अपने मन के भीतर एकांत में महसूस करना। और चाय की चुस्कियां लेते हुए साथ में एक किताब को लेकर पढ़ना उसके भावों और शब्दों में खो जाना देर तक धूप को निहारते-निहारते उसकी गोदी में लेटकर और उसकी पीले नारंगी साड़ी के पल्लू से अपना चेहरा ढककर सारे काम छोड़कर एक बहुत गहरी नींद में सो जाना। परिचय :-   सुरभि शुक्ला शिक्षा : एम.ए चित्रकला बी.लाइ. (पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान) निवासी : इन्दौर (मध्य प्रदेश) जन्म स्थान : कानपुर (उत्तर प्रदेश) रूचि : लेखन, गायन, चित्रकला सम्प्रति : निजी विद्यालय में पुस्तकालयाध्यक्ष घोषणा पत्र : म...
बेरहम वक़्त
कविता

बेरहम वक़्त

प्रभजोत कौर मोहाली (पंजाब) ******************** बेरहम वक़्त, मंज़िल अभी दूर थी नन्ही सी जान मेरी कितनी मजबूर थी अपनों ने जो सितम ढाया था वही तो मुझे कंटीले राहों पें लाया था इन राहों पे चलते मैं मगरूर हो गई खुदगर्जी में सबसे में फिर दूर हो गई वक्त को अपना मीत बना लिया उस ने एक नया राह भी दिखा दिया हमने सुलझा के हर उलझन को राहों में दीप जला लिए जो बोये थे लोगों ने कांटे राहों में हमने मेहनत से वहीं पर फूल भी सजा लिए माना हर राह बड़ी कठिन थी हर पहर नयी एक उलझन थी मैं और वक्त दोनों साथ-साथ हो लिए ज़ुल्म करने वाले आखिर में रो दिए परिचय :- प्रभजोत कौर निवासी : मोहाली (पंजाब) अध्यक्ष : समता विचार मंच प्रयागराज इकाई चंडीगढ़ ट्राई सिटी सम्प्रति : लेखिका, जीवनीकार, अनुवादक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित म...
साधक परम कबीर
दोहा

साधक परम कबीर

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** साधक परम कबीर ने, किया ईश का ध्यान। भक्ति काल के सार में, उनका सृजन महान।। पंचमेल भाषा लिखी,देकर शुद्ध विचार। पृथक अंधविश्वास से,सदगुण सुध आधार।। नदी बहा दी ज्ञान की, करते प्रेम प्रसार। आडंबर से चिर पृथक, उत्तम भाव विचार।। गुरुवर रामानंद से, दीक्षा मिली अपार। साखी रचते प्रेम की, गाता है संसार।। निराकार निर्गुण रहे, पाखंडों से दूर। सच्चाई की सीख दी, गहन ज्ञान भरपूर।। शब्द-तीर लेकर चले, जग में सतत कबीर। भेद-भाव को रोकते, संग भाव गम्भीर।। अनपढ़ थे ज्ञानी बड़े, अद्भुत सर्जक संत। तत्व ज्ञान मर्मज्ञ थे, दास कबीर अनंत।। हृदय भी गम्भीर हुआ, पाकर भाव सुधीर। रचना दास कबीर की, व्यक्त करे जग पीर।। लोक सुधारक थे बड़े,करते थे उद्धार। दुर्लभ नैतिक ज्ञान दे,किया सहज उपकार।। अनुपम थे सारे सृजन,वा...
करें नमन
कविता

करें नमन

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** आओ मिलकर उन्हें करें नमन ! जिनके लिए सब कुछ है वतन..!! देश की रक्षा के लिए जिन्होंने.! निछावर कर दी तन और मन…!! घर से दूर वतन के लिए लड़ते.! मुश्किलों से लड़कर आगे बढ़ते..!! देकर दुश्मनों को जंग में मात.! भारत माँ की हिफाजत करते..!! आओ मिलकर उन्हें करें नमन.! जिनके लिए सब कुछ है वतन..!! सरहद में दुश्मन से टक्कर लेते.! तिरंगे को कभी झुकने न देते..!! ठंडी,गर्मी और बरसात को सहते.! ईट का ज़वाब, पत्थर से देते ..!! दुश्मनों की गोली सीने में खाकर.! अपने वतन को महफूज रखते.है.!! आओ मिलकर उन्हें करें नमन.! जो देश के लिए कुछ करते है..!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है ...
यादों का ज़हर
कविता

यादों का ज़हर

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। मौत आएगी मुझे इक सुकून बनकर, मिट जाएँगे सब शिकवे खाक में मिलकर। पर तुम्हें तो कतरा-कतरा, पल-पल मरना होगा, जिंदा रहकर ही यादों का ज़हर पीना होगा। वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। न कोई मज़ार होगी मेरी, न कोई निशान होगा, मिटा दूँगा खुद को ऐसा, कि बस धुआँ-धुआँ होगा। जहाँ कभी हम मिले थे, वो हरसूँ वीरान होगा, बस मेरी तन्हाइयों का ही एक जहान होगा। वफ़ा की दुनिया में… मिला बस यही इनाम, आँखों में आँसू… और होठों पर तेरा नाम। हम तो आज़ाद हो जाएँगे राख होकर हवाओं में, खो जाएँगे खामोशी में, टूटे से ख़्वाबों में। पर तुम उम्र भर कैद रहोगे यादों के खौफ में, हर सांस सज़ा बनेगी, टूटे हर एक ख्वाब...
नया सृजन
भजन

नया सृजन

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** राम जी कृपा से मिला है ये तन, नाम सुमिरन में इसको लगा दीजिए। जग के कार्यों के संग नाम जपते हुए, अपनी आत्मा को निर्मल बना लीजिए। राम जी की ... प्रभु ने दी श्रेष्ठ योनी है मुक्ति के मित, तू भी करले जतन, इसमें ही तेरा हित। प्रभु की किरपा को सार्थक बनाने के मित, नाम सुमिरन में मन को रमा लीजिए। राम जी की... तेरे पूर्व सत्कर्मों का फल है ये तन, इसका उद्देश्य पूर्ति का साधन तू बन। नहीं मालूम फिर अवसर मिले ना मिले, राम सांसों में अपनी बसा लीजिए। राम जी कृपा... तेरे सत्कर्म पितरों को भी भाएंगे, तुझको अन्तर का आशीष दे जाएंगे। तुझको पितरों के ऋण से मुक्ति पाना तो, नाम सुमिरन और लेखन में रम जाइए। राम जी की कृपा... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ...
शाश्वत प्रेम
कविता

शाश्वत प्रेम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** तुम वो फूल हो जिसको मैं बिना स्पर्श के खिलता हुआ और महकता हुआ देखना चाहता हूं। तुम मेरी वो अधूरी ख्वाहिश हो जिसके पूरे होने का इंतजार मैंने कई युगों तक किया है। तुम मेरे जीवन का वो अंतिम अध्याय हो जिसके पूरा होने पर शाश्वत आनंद मुझे स्पर्श कर जाएगा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।...
मंजिलों तक का सफर
कविता

मंजिलों तक का सफर

साक्षी लोधी नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) ******************** लम्हे गमों के अकेले बिताने पड़ते हैं कदम एक एक कर जमाने पडते हैं सीधे सीधे कुछ नहीं मिलता जमाने मैं काटों में भी रास्ते बनाने पडते हैं मिलते मिलते रह जाती हैं मंजिले मौके कई ऐसे भी गवाने पड़ते हैं रात दिन एक हुए किसने देखे सबूत कामयाबी के दिखाने पडते हैं मिली हैं मंजिलें जिनको पूछो जरा उनसे कितने जोखिम डर डर के उठाने पड़ते हैं ऐसे ही नहीं मिलता मुठ्ठी भर आसमां जमीं के ऐसे कई हिस्से गबाने पड़ते हैं हारने वाले तन्हा लड़ते रहते हैं खुद से जीतने बालों के साथ जमाने लड़ते हैं किनारों पे मोती मिलते नहीं अक्सर गहराइयों में गोते लगाने पड़ते हैं एक खुआब मुकम्मल करने के वास्ते शोक अपने सारे दफनानें पड़ते हैं परिचय :-  साक्षी लोधी निवासी : नरसिंहपुर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती ...
है दम तो करो दावा
कविता

है दम तो करो दावा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जमीन के चंद टुकड़ों पर कब्जा करके समझ रहे हो खुद को मालिक इस जहां का, लटके पड़े हैं बड़े बड़े गोले आसमानों में क्या बन सकते हो मालिक वहां का, अपनी सोच से आगे भी सोचने की कोशिश करो, सिमट के बैठे हो पुरानी तुच्छ मान्यता ले चांद से चंद चांदनी अमावस में एक बार दो बार बार-बार नोचने की कोशिश करो, अपने ग्रंथों पर ही अटके हो जाते क्यों नहीं आगे, इंसान इंसान क्यों नहीं लगता या लपेटने की क्षमता नहीं रखते तुम्हारे कच्चे धागे, यूं ही कहते फिरते हो कि सभी बंध जाते हैं बांधे गए बंधन में, या सिर्फ लाभ देख लिपटने की हुनर है जैसे लिपटा हुआ भुजंग है चंदन में, प्रकृति को भी मजबूर कर चुके हो रोने के लिए, क्या चार गज जमीं काफी नहीं तुझे सोने के लिए, प्राणदायी वायु खो रहे हो बचा नहीं पा रहे पानी मुंह धोने...
सीता-लव-कुश- वार्ता
कविता

सीता-लव-कुश- वार्ता

विजय वर्धन भागलपुर (बिहार) ******************** एक दिवस लवकुश ने माता सीता से यह प्रश्न किया, कौन हैं मेरे पिता हे माता किस कुल मैंने जन्म लिया, मैया बोली यथा समय मैं ये सब तुझे बताउंगी, तेरी जिज्ञासा को एक दिन तुझको मैं समझाऊंगी, कुछ ही दिनों के बाद विपिन में लक्ष्मण का आगमन हुआ, सेना भी थी साथ अस्त्र से दिशा-दिशा झंझनन हुआ, जब आश्रम के पास वे पहुंचे लव कुश से सामना हुआ, चचा भतीजे में जमकरके बाणों से आघात हुआ, घायल होकर जब लक्ष्मण पहुंचे निज कौशल धाम में, व्यथित हो गए राम देखकर अनुज लड़े संग्राम में, बोले अनुज कहो किसने तुम्हें ऐसा रक्त रंजित है किया, जिसने मेघनाद को मारा कैसे वह अब विजित हुआ, लक्ष्मण बोले भैया वन में दो बालक हैं ऐसे वीर, जिनने मुझको घायल करके बना दिया अत्यंत गंभीर, क्रोध से प्रभु के आंख हो गए लाल भुजायें फड़क उठीं, रथ पर चढ़ कर चले विपिन को ...
विराम कायरता नहीं
कविता

विराम कायरता नहीं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* कुछ लोग संवाद नहीं करते वे रणनीति खेलते हैं। वे जानबूझकर ऐसे शब्द चुनते हैं जो आपके तर्क पर नहीं, आपकी नसों पर वार करें। उनका उद्देश्य समाधान नहीं होता, बल्कि आपको भावनात्मक रूप से असंतुलित करना होता है। ताकि आप मुद्दे से हटें, और वे आपकी प्रतिक्रिया को आपकी हार बना सकें। ऐसे लोग बहस के बीच अचानक से आपके चरित्र पर प्रश्न उठाएंगे, आपकी किसी पुरानी भूल को उछालेंगे, या आपकी आवाज़, भाषा, लहजे पर टिप्पणी करेंगे। असल विषय वहीं पड़ा रह जाता है और संवाद एक निजी युद्ध में बदल दिया जाता है। क्रोध की अवस्था में तर्क धुंधला पड़ जाता है। शब्द तेज़ हो जाते हैं, पर अर्थ कमजोर हो जाता है। और ठीक यही वह क्षण होता है जहां चालाक व्यक्ति जीत का भ्रम रच लेता है। इसलिए जब भी ऐसे किस...
हिन्दी का स्वर
गीतिका

हिन्दी का स्वर

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना हिन्दी का स्वर कोकिल कोमल। हो गुंजित जग में यह अविरल।। बन जाये जनगण की भाषा, रहे प्रवाहित ज्यों गंगाजल।। हिन्दी का रसपान हृदय में। भर देता साहस नव संबल।। विस्तारित हो हिन्दी भू पर। बढ़ा रही नित अपना आँचल।। भारत भू पर ध्वज हिन्दी का। फहरेगा युग-युग तक निश्छल।। अखिल विश्व में हिन्दी का अब। आने वाला है मंगल कल।। 'जीवन' के उर को अब भाया। हिन्दी का शीतल स्वर चंचल।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।...
राष्ट्र की धरोहर
कविता

राष्ट्र की धरोहर

अमित कुमार शर्मा "आनंद" प्रयागराज (उत्तरप्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना राष्ट्र की धरोहर संस्कृति की पहचान है कविता आसमान में लहराते तिरंगे की शान है कविता आज़ाद के बंदूक से निकली जो आखिरी गोली भगत सिंह के देश भक्ति की सम्मान है कविता। कश्मीर घाटी,हल्दी घाटी की आवाज है कविता झेलम के जल में चलते नाव की साज है कविता राणा प्रताप ने जब खाई थी घास की बनी रोटियां दुश्मनों पर टूट पड़े ऐसे चेतक की ताज है कविता। हिमालय से निकली गंगा की कल कल है कविता पवित्र करती तन मन जो शीलत जल है कविता शंकर की जटाओं में भी बंधकर जो बहती निरंतर भागीरथी के निरंतर तप का पुण्य फल है कविता। वर्षा ऋतु में किसान के चेहरे की चमक है कविता बसंत ऋतु में गाते हुए पंछियों की चहक है कविता चद्दर ओढ़कर ठंडी रातों से कांपती हुई ...
सबसे श्रेष्ठ न्यारी हिन्दी
हाइकू

सबसे श्रेष्ठ न्यारी हिन्दी

संजय डागा हातोद- इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना भाषा हिन्दी सबसे श्रेष्ठ न्यारी सबको भाती।। सुंदर लेखिनी खजाना हिन्दी भाषा है सिरमोर।। बहुत लिखा साहित्य का लेखन हिन्दी भाषा में।। छोड़ो अंग्रेजी हिन्दी को अपनाओं भाषा मधुर।। माथे की बिंदी समान हिन्दी है सबसे शीर्ष।। परिचय :- संजय डागा निवासी : हातोद जिला इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप...
भारतीयों की शान हैं हिंदी
कविता

भारतीयों की शान हैं हिंदी

प्रिया पाण्डेय हूघली (पश्चिम बंगाल) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना भारत का सार हैं हिंदी, हिमालय की मस्तक पर विराजमान हैं हिंदी, कण-कण में बसते हैं जिसके, हम भारतीयों की शान हैं हिंदी, लड़ी, खड़ी और जग में नाम किया, उस भाषा का नाम हैं हिंदी, मीरा के पद में, कबीर के दोहे में, प्रेमचंद की कहानियों में छुपी हैं हिंदी, जशंकर प्रसाद के "आंसू"बन बही हिंदी, तो नागार्जुन की "अकाल और उसके बाद की व्यथा सुनाती हिंदी," शोषित हुई पर खड़ी रही, अंग्रेजी ने कितना दबाया, पर उड़ती रही आसमानों में, तुलसीदास का रामचरित मानस हैं हिंदी। परिचय :- प्रिया पाण्डेय जन्मतिथि- २२/१०/१९९९ शिक्षा- बी.ए तृतीय वर्ष (राजनीती शास्त्र ) स्थान- ९२, चरकतल्ला, पोस्ट -माखला, जिला- हूघली (पश्चिम बंगाल ) कार्य- शिक्षिका साहित्य...
हिंदी हिंद की शान रे
गीत

हिंदी हिंद की शान रे

विवेक नीमा देवास (मध्य प्रदेश) ******************** विश्व हिंदी दिवस १० जनवरी २०२६ पर आयोजित कविता लिखो प्रतियोगिता में सम्मिलित रचना हिंदी हिंद की शान रे।। मुझ में हिंदी, तुझ में हिंदी हिंदी हिंद की शान रे … भारत के जन-जन में हिंदी टैगोर के जन गण में हिंदी मीरा के भजनों में हिंदी कबीरा के दोहों में हिंदी मुझ में हिंदी, तुझ में हिंदी हिंदी हिंद की शान रे … पूरब से पश्चिम तक हिंदी उत्तर से दक्षिण तक हिंदी गीत में हिंदी प्रीत में हिंदी रिश्तो के संगीत में हिंदी मुझ में हिंदी, तुझ में हिंदी हिंदी हिंद की शान रे … मंदिर के भजनों में हिंदी वेद और पुराण में हिंदी भगवत गीता के ज्ञान में हिंदी कला और विज्ञान में हिंदी मुझ में हिंदी, तुझ में हिंदी हिंदी हिंद की शान रे … फिर क्यों रहे पराई हिंदी? क्यों दी हमने बुलाई हिंदी क्या प्रश्न नहीं ये अडिग खड़ा है ? ...