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आंचलिक बोली

विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण
आंचलिक बोली, कविता

विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) ओदे आवत हे कन्हैया, बजावत बंसी। झूम-झूम के नाचत हें, जम्मों यदुवंशी।। पहिरे हे मोर मुकुट अउ बैजयंती माला। संग म हवंय सुबल, बलराम, मधु ग्वाला।। गोकुल के बन म, चरावत हे गाय-गरुवा। कदम्ब रुख बइठे हे, मुरलीधर दुलरुवा।। कान्हा के रूप ल देखके, राधा मोहागे हे। मया के जादू म, तोला खोजत आगे हे।। गोपी मन घलो रंग गेहें, पिरीत के रंग म। रासलीला के बेड़ा म, थिरकत हें संग म।। ब्रज म माखन अउ मिसरी के हवय भंडार। चोरी करे बर आवत हे, जग के पालनहार।। जमुना नदिया के तीर, खेलत हे मन-मगन। नाग नथैया के पाँव छुए, कालिया के फन।। बरसे जब करिया बादर, घपटे जब अंधियार। गोबरधन परबत उठाके, करे तँय ह उजियार।। कुरुक्षेत्र म गियान देके, देखाए रुप बिराट। विश्वगुरु तोला कहिथें, जय हो! दीनानाथ।। तँय तो अंतरयामी अस...
गोहरावत हे हसदेव
आंचलिक बोली, कविता

गोहरावत हे हसदेव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिचियावत डोलत हांसत हे, मन ल देख वो थरथर कांपत हे, कइसे बचावंव तन, डारा अउ पाना ल, छिटका कुरिया म लावंव कइसे दाना ल, बता बघवा बेटा अब कइसे गुंर्राबे रे, हाथी बेटा कोन पत्ता ल तैं खाबे रे, हुंआ हुंआ कइसे अब कहिबे कोलिहा, झोल डारत हे मोला परदेशी झोलहा, मोर कोरा म आही कइसे मिट्ठा पानी, धन फेंका जाही मोर कर्मठ कहानी, कोन लकरी छवाही कुंदरा के छानी, का किस्सा सुनाही अब नाना अउ नानी, बुटूर-बुटूर घर के मुखिया देखत हे, खीसा भर डारे अउ आंखी सेंकत हे, सुध हवा पानी अब कहां ले लाबे, मोर हिरदे के पीरा कहां गोहराबे, इंखर आंखी के पीरा ल कइसे कसबे, अब तो पर गे तोला सूरी अउ फांसी, कहां जावय बता ए भई, गोहरावत हे हसदेव, हसदेव... कइसे बचाहीं अपन जंगल ल, कइसे बचाहीं अपन पानी, कइसे बचाहीं चिरई-चुरग...
सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ
आंचलिक बोली, कविता

सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सिधवा आदमी अउ सोझ गोठ, फांक मिलय चाहे कड़कड़ नोट, छल-कपट के रस्ता ला छोड़, सच्चाई से सदा रखथें जोड़, मन के भीतर कोनो कसर नइ, बाहर तौने, भीतर घलो वोइ, नइ जानय वो चलाकी के खेल, सबो संग रखथे मया के मेल, अमृत बरोबर ओकर बानी, सरल सुभाव ह ओकर निसानी, दुनिया भले कहय ओला भोला, परम संतोख के ओढ़े हे चोला, मेहनत के ओ खाय कमाय, कुटिल मन ओला कभू नइ भाय, बांटय मया अउ बांटय हांस, ओकर रहनी-कहनी म बिस्वास, झूठ के कोठार ले वो दूर, अपन धरम म रहिथे चूर, पर पीरा ला अपन वो जानय, सबो ला अपन संगी मानय, लइका मन असन निस्छल हांस, चंदन कस महके ओकर सांस, दुनिया म अइसन मनखे हे अनमोल, कोनो नइ लगा सकय ओकर मोल, सिधवा रहि के जियत हे जीवन, ओकरे दुआरे खुश हे भुवन। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी नि...
नेता जी के टारच
आंचलिक बोली, कविता

नेता जी के टारच

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) नेताजी अड़ गे, कहिथे हमर सरकार आय ले प्रदेश हर किलोमीटर भर आघु बढ़ गे, मय अकचका गंय, त फेर हमन काबर अपन जगेच म हवन, खिसकीच नहीं काबर हमर कुंदरा वाला भवन, कथे तैं नइ समझे जोजवा, तोर आंखी हेवय नवा खोजवा, हमर सरकार हर घर-घर गइच हवय, जेला जउन चीज के जरूरत रहिच वो हर चीज ल बांटिच हवय, फेर मय कहेंव तुंहर किलोमीटर भर वाला टारच कति कति बारे हवा, कति के अंधियार ल संघारे हवा? भाषण के उजियार ह नेताजी, सिरिफ पोस्टर म चकाचक दिखथे, हमर गाँव के नरवा-गरवा म, आज घलो अंधियारी रेंगथे, तुंहर बिकास ल कोन गरुवा हुदेनथे, कका,भतीजा,नोनी,बाबू, जम्मो झन अइसने बेहाल हवन, तुंहर आघु बढ़े के गोठ सुनके, हमन अपन जगे म थिरक आय हवन, बतावा त अइसन बिकास कति पाय हवन? परिचय :-  राजे...
मनखे हो के मनखे बर
आंचलिक बोली, कविता

मनखे हो के मनखे बर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मनखे हो के मनखे बर, तँय काबर मरत हस बिन तेल अउ बाती के, तँय काबर जरत हस हाँसत गावत बिता ले, तँय अपन जिंनगी ला पर के जिनगी मा, झोझा काबर परत हस !! कुछु खाय चाहे कुछु पहिरे, तोला का करना हे झूठ लबारी चारी चुगली, तोला दूरिहा रहना हे सुवारथ के चक्कर मा, तँय काबर फाँसत हस काकरो दुख दरद ल देख, काबर हाँसत हस !! मनखे जनम पाय हस, सुग्घर करम करना हे चार दिन के जिनगी, तहन सबो ला मरना हे दूसर के महल अटारी देख, काबर मरत हस मेहिनत बिना, फर के आस, काबर करत हस !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर र...
बहिनी
आंचलिक बोली, कविता

बहिनी

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सगा बरोबर दु दिन बर, मोर अंगना मा पाँव मड़ाथस।। दुख पीरा ल बिसरा के अपन, मया के गोठ गोठियाथस।। तोर आये ले घर दुवार हा, होरी, देवारी कस लागथे।। जइसे बसंत के आये ले, चिरई-चुरगुन मन चहकथे।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …...
जिनगी के रद्दा
आंचलिक बोली

जिनगी के रद्दा

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी - गीत)12 वो दिन बढ़ सुघ्घर हो जाथे, दाई के भुवना म जोत जंवारा लहराथे, चैत के महीना खुशहाली के नवा बिहान लाथे, फेर नवा बछर के अंजोर बगराही कोन? मोर जिनगी के रद्दा बताही कोन? महिना बैसाख के हमाथे। अक्ति के भंवर लइका मन पुतरी पुतरा के परवाथे, ऐसो के लगिन म मोरो लग जातिस, दाई अपन मन के बात बताते, कैसे समझावव मैं तोला वो दाई, बिना रोजगार मोला, अपन बेटी के हाथ धराही कोन? मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन? मुंधेरहा के घाम मंझनिया कस जनाथे, सुरुज नारायण तरवा म चढ़ जाथे, जब महिना जेठ के आते, जरत भोंभरा तीपत हे छानी, बूंद-बूंद पानी बर तरसत परानी, जल बिन सुन्ना हमर जिगानी, फेर जल संरक्षण में महत्तम ला बताही कोन ? मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन? पियासे भुंईया के जी जुड़ाथे जब महीना आषाढ़ संग बरखा आते, ...
चिरई
आंचलिक बोली, कविता

चिरई

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिरई चुरगुन के चिंव-चिंव बोली अउ फुँदक-फुँदक के रेंगना हर घाते सुग्घर लागथे। प्राकृतिक सौंदर्य हर चिरई चुरगुन ले हवय। चिरई चुरगुन बिना जंगल झाड़ी अउ महल अटारी ह सुन्ना लागथे। फेर गरमी दिन म नदियाँ नरवा, तरिया, डबरी सबो ह सुखा जाथे त चिरई चुरगुन मन बूँद-बूँद पानी बर तरसत रहि जाथे। कतकोंन चिरई मन तो दाना-पानी बिना अपन परान ल तियाग देथे। ऐसना समय म चिरई चुरगुन के जीव ल बचाय बर उदिम कर सकथन अपन घर के छत छानी मा, बारी बखरी मा अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राख के चिरई चुरगुन के पियास ल बुझा स सकथन। जेकर ले लहकत घाम म उड़त परकी परेवना अउ जम्मों चिरई चुरगुन मन अपन पियास ला बुझा सके। आज कल तो सहर तो बहुत दूरिहा के बात आय गांव म घलोक आघु कस चिरई चुरगुन देखे बर नइ मिलय। दिनों दिन चिरई चु...
नउकरी के बंधना
आंचलिक बोली, कविता

नउकरी के बंधना

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) घुम-घुम, किन्दर-किन्दर अपन रचना ल सुनावव जी, कभु रइपुर, कभु कोरबा अउ कभु रइगढ़ म अंजोर बगरावव जी, बंधाय हे हमर अंग-अंग बंधना म, रचना पढ़े के फुरसत नइ हे अपन दुवारी अउ घर अंगना म, राती-राती भर गोष्ठी करव दिन म ऊंघे के बेरा हावय, गेरवा ले गर बंधाय हे हमर आउ चारो कोती घेरा हावय, तुंहर घुमइ फिरइ देख के लालच हमरो बाढ़त हावय, दंउरी कस बइला फंदाय हवन छाती म पथरा माढ़त हावय, दु पइसा कमाए के चक्कर म हाल डोल नइ पावत हावन, फाग, ददरिया चाहे भजन दय मालिक ह नाच-नाच के सब गावत हावन, पुरुस्कार ल तुंहर देख के संगी हिरदे हमर गदगद झुमत हावय, तुमन ल रचना सुनावत देखके मन हमरो छत्तीसगढ़ भर घुमत हावय। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमा...
जड़कला
आंचलिक बोली, कविता

जड़कला

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) किसान मन के सोनहा धान लुआँ मिंजा के घर आगे मेहिनत के फल मिलगे कोठी डोली म धान धरा गे।। अग्घन, पूस के महीना म संगी लद-लद जाड़ जनाए कथरी, कमरा, अउ साल ओढ़े गोरसी म आगी सुलगाए।। कतको कपड़ा पुर नई आवय जड़कला हर जब आथे ताते कपड़ा अउ ताते जिनिस सबों के मन ल भाथे।। नोनी, बाबू अउ, लइका सियान जाड़ म ठिठुरत काँपय संझा बिहनिया जम्मो जुरमिल भुर्री बार के तापय।। कुहरा निकलय मुहुँ डहर ले, नहाय बर मन ढेरियाय उठत बिहनियाँ सुरुज के अगोरा घाम ह बने सुहाय।। तिवरा भाजी, राहेर के बटकर सबो के मन ल भाय चिरपोटी पताल के चटनी संग अंगाकर गजब मिठाय।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित क...
सुरता करन वीर जवान ल
आंचलिक बोली

सुरता करन वीर जवान ल

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) आजादी के खातिर जेन, दे दीस अपन पऱान ल.! आवव संगी सुरता करन, ऐसन वीर जवान ल..!! घर दुवार ला छोड़, भारत भुइयाँ के गुन गाथे..! सरदी, गरमी, बरसा सहिके, दुसमन ल मार भगाथे..!! भारत भुइयाँ के माटी म, आँच नइ आंवन देवय! गोली खाथे छाती म, तिरंगा ल झुकन नइ देवय!! दाई ददा के इकलौता बेटा, देस के काम आइस हे.! आजादी बर लड़िस लड़ाई, अपन लहूँ बोहाइस हे!! लहूँ देके जेन हर अपन, भुइयाँ के मान बढ़ाइस हे! अंग्रेज मन ल धुररा चटाके, देस आजाद कराइस हे! आजादी के लड़ाई म संगी, कतको मुढ़ी कटाइस हे तभे जाके भारत भुइयां, आजाद भारत कहलाइस हे परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है क...
नौकरिहा दामाद
आंचलिक बोली, कहानी

नौकरिहा दामाद

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कहिनी) गाँव के गउटियाँ कहत लागें दुकलहा करा कोनो जिनिस के कमी नइ रिहिस। खेत, खार, धन दउलत, रुपिया, पइसा सबों जिनिस रिहिस। सादा जीवन उच बिचार के रद्दा म चलत दुकलहा अउ दुकलहिन मजा म जिनगी बितावत रहय। फेर संसो के बात ए रिहिस कि उँकर एके छिन बेटी चँदा जेकर बर नौकरिहा सगा देखत-देखत चार बछर होगे रिहिस। चँदा के उमर चालीसा लगे बर दु बछर कम रिहिस। सगा मन ठिकाना नइ परत रिहिस। ऐसना बेरा म पचास एकड़ खेत के जोतनदार बने रोठहाँ सगा धर के सुकलहा हर अपन मितान दुकलहा करा आनिस। फेर दुकलहा हर ये कहिके सगा मन ल मुँहाटी ले लहुँटा दिस के लइका के कुछु नौकरी चाकरी नइ हे कहिके। मोर बेटी ह अतेक पढ़े लिखे हे त नौकरिहा दामाद होना चाही। पाछु सुकलहा हर कहिस घलोक देख मितान खेती किसानी का नौकरी ले कम आय ! मनखे के चाल चलन अउ चरित ह ...
छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे
आंचलिक बोली, कविता

छत्तीसगढ़िया दिलवाला होथे

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) हम वो करम करबो जउन इंसानियत अउ मानवता बर जरूरी हे, बाकी हर हमेशा हम देखत हन हमर घेंच म हर बेरा लटके छुरी हे, ए सब करे बर न कोनो देबी चाही न कोनो देवता, हमर अपन छत्तीसगढ़िया परब आय छेरता, जिहां अपन उपज के खुशी म सगरो मिलजुलके मनाथन तिहार, एही म हमर जीत अउ एही म हमर हार, जीत एखर बर के हम दिलवाला हन, हार एकर बर नइ दिखय चढ़ाय जालापन, एमा काखरो कोनो योगदान नइ हे, सब दान करत हन अइसना हमर हिरदई हे, मुठी भर अन्न अउ पेट भर खाना, सदा दिन ले करत आत हे छत्तीसगढ़िया दीवाना, जतको कमाएन पायेन, जादा रहय चाहे कम अपन बर हाथ बढ़ायेन, छेरछेरा कोनो धार्मिक तिहार हे न कोनो सामाजिक, हमर हिरदे ले जुरे तिहार हे वास्तविक, त आवव तिहार खुलके मनावव, छत्तीसगढ़िया मन दिलवाला होथे सबो ल बतावव। ...
छेर-छेरा मांगे बर जाबोन
आंचलिक बोली, कविता

छेर-छेरा मांगे बर जाबोन

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी - गीत) छेर-छेरा मांगे बर जाबोन छेरीक छेरा छेर बारकननीन लोकगीत गीत ल संग म गुन-गुनाबोन रे भाई... डफरा गुदुम संग मोहरी बजाके ताल से ताल मिलाबोन रे भाई... अऊ चल न संगी चलना साथी सुघ्घर संस्कृति परब के मान बढाबो छेर-छेरा मांगे बर जाबोन... सोनहा धान म कोठी डोली सबो भरागे नवा बछर म पहिली तिहार हर आगे सुपा म धान भरके डोकरी दाई आंगना म आगोरत हावे पसर-पसर भर धान पाबोन रे भाई... सुघ्घर संस्कृति परब ल मनाबो छेर-छेरा मांगे बर जाबोन.. पुस-पुन्नी अंजोरी पाख हर आगे मड़ई मेला धुमे बर टेटकू बैसाखू आगवागे मोर छत्तीसगढ़ महतारी के हवय छत्तीस चिन्हारी, सबला धीरे-धीरे बतलाबो रे भाई ... सुघ्घर संस्कृति परब ल मनाबो छेर-छेरा मांगे बर जाबोन... परिचय :- खुमान सिंह भाट पिता : श्री पुनित राम भाट निवासी :...
डाम
आंचलिक बोली, कविता

डाम

सौ. निशा बुधे झा "निशामन" जयपुर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी बोली) बचपन मै म्हे खेल खेलता रह्या पछाड़ी, देता डाम। पिदतां पिदतां होठ सूखता नरच्यूं न करता आराम। मायड़ कहती खाणो खा ले देख ऊपरां ढळगी शाम। दोस्त बोलता कोनी आसी बिना दियां यो अपणो डाम। आ जातो जद नयो खिलाड़ी म्हारो पिण्ड छुड़ाता राम। सगळा बींकै लूम'र कहता नयी छै घोड़ी नयो नयो डाम। परिचय :- सौ. निशा बुधे झा "निशामन" पति : श्री अमन झा पिता : श्री मधुकर दी बुधे जन्म स्थान : इंदौर जन्म तिथि : १३ मार्च १९७७ निवासी : जयपुर (राजस्थान) शिक्षा : बी. ए. इंदौर/बी. जे. मास कम्यूनिकेशन, भोपाल व्यवसाय : एनलाइन सेलर असेंबली /फ़िलिप कार्ड /अन्य प्रकाशित पुस्तक : स्वयं की मराठी संकलन लघुकथा (मधुआशा 2024) एवं विभिन्न पटल पर पुरस्कार एवं समाचारपत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित स्वरचित कविता/कहा...
छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार
आंचलिक बोली, आलेख

छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** जब हम गरीब मनखे ला इंसाफ अउ अधिकार दिलाय के बात करथन त सबले पहिली हमर मन म एकेच नाव आथे। वो नाव हरे वीर नारायण सिंह बिंझवार के जेन हर गरीब मनखे के जान बचाय बर अपन जान के बलिदान कर दिस। जमीदार होय के बाद भी साहूकार मन ले गरीब मनखे के भूख मिटाय बर आंदोलन करिस। १८५७ के स्वतंत्रता समर म छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी आय। वीर नारायण सिंह के जनम छत्तीसगढ के सोनखान गांव म बछर १७९५ म जमीदार परिवार म होइस। पिता के नाव रामसाय रिहिस। कहे जाथे कि पुरखा के सियान मन कर ३०० गांव के जमींदारी रिहिस। वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति के रिहिस। पिता के परलोक सिधारे के बाद ३५ बछर म अपन पिता के जगह म बइठ के जमींदार बन गे। पर दुख ल अपन दुख जान के गांव के गरीब मनखे मन बर अब्बड़ दया धरम करय। बछर १८५६ म बिकट आकाल परिस। लोगन मन कर खाय प...
जाड़ के दिन आगे
आंचलिक बोली

जाड़ के दिन आगे

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कविता) कथरी कमरा साल ओढे लदलद जाड़ जनावय जी सरसर सरसर हवा धुकत हे जाड़ के दिन आगे जी अघन पुश के जाड़ म संगी दांत हर कटकटाथे जी मुहु डहर ले कुहरा निकले गरम जिनिस सुहाथे जी सांझा बिहिनिया सित बरसे घाम तापे बर जिवरा तरसे चारो कोती कुहरा छागे जाड़ मा सब मनखे जडा़गे बार के अंगेठा अउ भुर्रि ला मनखेमन आगी तापे जी सेटर मफलर साल ओढ़े गोरसी मा आगी तापे जी जेन घाम हर गरमी म सबो ला टोरस लागय जी आज जाड़ म उही घाम हर सबो ला घाते सुहावय जी परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।...
जय गंगान
आंचलिक बोली, गीत

जय गंगान

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी - बसदेवा गीत) मोर अन्नपूर्णा महतारी ये घर म नरवा घुरवा अऊ बारी हे ईहे हमर चिन्हारी हे जय गंगान... सेवा जेन तोर करें किसान अऊ तैय बनाय ओला सुजान छत्तीसगढ़ के मै करव बखान बिना गुरु नई पावय ज्ञान जय गंगान... भारत माता के गोड़ के पहिरे छाटी अव अऊ ईहे के धुर्रा माटी हव लईका मन के खेले गुल्ली-भंवरा बांटी अव जय गंगान... चंदखुरी छत्तीसगढ़ के बढाथे मान कौशल्या माता जनम भूमि ये हर आय प्रभु राम इहां के भांचा कहाय जय गंगान... धन्य हे राजिम दाई मोर 'भाट' हाथ जोड़ करें बिनय ये तोर माघ पुन्नी परब म मेला भराय साधु संत नहाय बर आय सब मनखे मन दुःख बिसराय छत्तीसगढ़ प्रयागराज तैय ह कहाय जय गंगान... छत्तीसगढ़ के मै करव बखान मिरजूर के रईथे लईका अऊ सियान मुड़ म पागा बांधे किसान अर्रे भटके ल पहुना ...
भइया की सारी- भदावरी बोली में एक श्रृंगार गीत
आंचलिक बोली

भइया की सारी- भदावरी बोली में एक श्रृंगार गीत

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** ( भदावरी बोली में एक श्रृंगार गीत ) (एक भाभी अपने देवर के साथ अपनी छोटी बहन की शादी कराना चाहती है। वह अपनी दीदी की ससुराल में आई हुई है। उसका सौन्दर्य और अदाएँ देखकर बूढ़े लोग भी विचलित हो उठे हैं। उसकी बहन को भी अपनी दीदी का देवर अच्छा लगता है और देवर को भी भाभी की बहन बहुत अच्छी लग रही है। भाभी अपनी बहन को सीधी गाय और देवर को मजाक में लपका कहती है। देवर भाभी का चुटकी भरा काव्य संवाद भदावरी बोली में पढ़िए।) भइया की सारी का आई सूखी नस हरियाई। फटि सी परी उजिरिया मानो अँधियारे में भाई।। बिना चोंच मारी तोतन की सपड़ी सी पकि आई। बूढ़न तक के होश मचलि गए , देखि अदा अँगड़ाई।। देउर के लखि हाल लालसौं पूछि उठी भौजाई। खुलि कें कहौ लालजी मेरे, मंशा कहा तुमाई।। तुम मेरे इकलौते देउर, चिन्ता हमें तुमाई।। तुम तै...
करिया अउ वोखर रूख
आंचलिक बोली, कविता

करिया अउ वोखर रूख

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) करिया ल बनेच रिस आगे, ओखर तत घलो छरियागे, मोर लगाय रूख ल काट के कोन लेगे, मोर हिरदे ल बड़ दुख देगे, मोर कइ पीड़ही बर छैंहा बनाय रहेंव, सुखी रही संहंस लिही तेखर जोगाड़ जमाय रहेंव, लइका ह इसकुल ले घर आके बताइस, के गुरूजी कहे हे एक ठन रूख अपन दाई के नांव म लगाबे, पानी पलो के वोला बड़का बनाबे, करिया अकचका गे, सुन के झंवुहागे, खटिया म बइठे रहिस त नइ गिरीस, पानी ठोंके म संहंस हर फिरिस, अब आन संग अपन आप ल कइसे समझावां, अपन पीरा ल काला बतावां, जब पइसा वाला मन दोगलाई म उतर जाथें, त हमर अस गरीब के जंगल ल कटवाथें, हमर पुरखा मन अपन महतारी भुंइया के हरियर रूख ल कभु नइ काटिन, ए जंगल ह हमर दुख दरद ल बांटिन, फेर कथनी करनी के फेर ल देखव तमनार अउ हसदेव जइसन जंगल के हजारों लाखों पे...
ददा के कदर कर लव
आंचलिक बोली, कविता

ददा के कदर कर लव

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी रचना) जइसे मैं हर थोरकुन रिसहा गोठ कहेंव मोर लइका फुस ले रिसागे, ओखर अक्कल के कोनो तिर घिसागे, दिन भर घर म आबे नइ करय, घर के चुरे भात साग खाबे नइ करय, दिन भर ऐती ओती छुछवावय, मोला देख मुंह अंइठ रिस देखावय, मैं अड़बड़ परेसान, का होही सोच सोच हलकान, के ए हर कब तक बइठ के खाही, अपन जिनगी चलाय बर कब कमाही, अभी के संगी संगवारी ल देखत हे, आघु चल के का होही नइ सरेखत हे, ओखर कइ झन संगी मन घर चलात हे, बिहान होत बुता म लग जात हे, रात दिन के पइसा उड़ाइ ओ दिन सटक गे, जब दु सौ रूपिया कमाय खातिर दिन भर के मेहनत म संहस अटक गे, एके दिन के बुता म कुछु समझ नइ आही, पइसा बचाय अउ उड़ाय के फरक चार महीना कमाय के बाद जान पाही, ददा के जिंयत ले सगरो सुख संसार हे, बाप के सीख ल मान लौ बेटा होव...
दुर्गा दाई
आंचलिक बोली, कविता

दुर्गा दाई

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** सगा बरोबर तँय ह दाई आथस चइत कुंवार म चउँक पुरा के दियना जलाएँव गली खोर दुवार म !! नव दिन बर तँय आथस दाई करके बघवा सवारी संझा बिहिनिया तोर सेवा गावंय जम्मों नर-नारी !! कुंवार महीना बड़ मन भावन पाख़ हवय अंजोरी जग-मग जग-मग जोत जलत हे दाई तोर दुवारी !! नाक म सुग्घर नथली सोहे अउ पऊरी पैजनिया माथ म चमकत तोर टिकली, कनिहा म करधनिया !! तँय दुर्गा तँय काली कहावस तही हर खप्पर धारी दानव मन के नास करइया जय हो दुर्गा महतारी !! हाथ जोर के बिनती करत हँव सुन ले मोर महमाई भगतन मन के भाग जगादेय झोली ल भर दे दाई !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
गजानंद स्वामी
आंचलिक बोली, भजन

गजानंद स्वामी

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी रिद्धी सिद्धि के तै स्वामी, तोरेच गुन ल गावत हँव ! सजे सिहासन आके बइठो,पँवरी म माथ नवावंत हँव !! हे गणपति, गणनायक स्वामी, महिमा तोर बड़ भारी हे ! माथ म मोर मुकुट सजत हे, मुसवा तोर सवारी हे !! साँझा बिहिनिया करँव आरती, लडवन भोग लगावंत हँव ! सजे सिहासन आके बइठो, पँवरी म माथ नवावंत हँव !! माता हवय तोर पारबती अउ पिता हवय बम भोला ! दिन दुखियन के लाज रखौ, बिनती करत हँव तोला !! पान-फूल अउ नरियर भेला, मै हर तोला चघावंत हँव ! सजे सिहासन आके बइठो, पँवरी म माथ नवावंत हँव !! अंधरा ल अखीयन देथस अउ बाँझन ल पुत देवइयाँ बल,बुद्धी के तै हर दाता, सबके बिगड़े काम बनइयाँ !! हे गणराज, गजानंद स्वामी मै हर तोला मनावंत हव ! सजे सिहासन आके बइठो, पँवरी म माथ नवावंत हँव !! परिचय :- प्रीतम कुमार साह...
तीजा के तिहार
आंचलिक बोली, कविता

तीजा के तिहार

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) आवत होहीं गियाँ ओ, मोर भाई, ददा मन लेवाए ल। पोरा अउ तीजा के तिहार म, मइके जाहूँ मनाए ल।। मने-मन कुलकत हँव, फुरफुंदी बनके उड़ावत हँव। कपड़ा ल जोर डारेंव, बिहनिया ले सोरियावत हँव।। घेरी-बेरी निकल के देखत हँव, गली-खोर, अँगना म। बारह महीना के परब ए, बंधागेंव मया के बंधना म।। दाई के मँय ह दुलौरिन बेटी, ददा के सोनपरी आँव। भाई के मँय ह मयारु बहिनी, परुवार के जुड़ छाँव।। डेहरी म खड़े हे मोर बाबू, ए दे आगे मोला लेगे बर। जावत हँव लइका मन ल धरके, ए जी संसो झन कर‌।। भात रांध के तंय खाबे, हरिबे घर-कुरिया म अकेल्ला। कहूँ मोर सुरता आही त, ससुरार भागत आबे पल्ला।। बड़े किसान के तंय बेटा, बइला मन ल सुग्घर सजाबे। बइला दउँड़ खेल म जीतके, बइला के आरती उतारबे।। दीदी अउ बहिनी मन संग, सुख-दुख के गोठ गोठियाहूँ। माथा ...
तिहार तीजा पोरा
आंचलिक बोली, कविता

तिहार तीजा पोरा

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** छत्तीसगढ़ी कविता भादों महीना के तिहार तीजा पोरा! दाई, बहिनी मन ल रहिथे अगोरा! बछर म आथे बेटी माइ के तिहार, मइके जाए के करत रहिथे जोरा!! बरसत पानी करिया बादर छाय हे! भाई ह बहिनी ल तीजा ले आए हे! दाई के मया अउ ददा के दुलार ल, ठेठरी, खुरमी संग म धर के लाए हे!! भाई ल देख के बहिनी मुसकावत हे! मने मन म मइके ल सोरियावत हे! ले अब सुरु होगे तीजा के तियारी हे, गुलगुला भजिया, अइरसा बनावत हे!! मइके आके सुख दुख गोठियावत हे! जम्मों तिजहारिन करू भात खावत हे! नीरजला उपास रहे जम्मों उपासनिन, भोला शंकर कना माथ ल नवावत हे!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...