श्रीरामजी पर रोला
प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला, (मध्य प्रदेश)
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(१)
महाशक्ति है दिव्य, रामजी जो कहलाते।
हर पल ही जो भव्य, भक्त जिनको हैं भाते।।
प्रभुवर रखते ताप, सभी के दुख हैं हरते।
महिमा का विस्तार, पुष्प गरिमा के झरते।।
(२)
महाशक्ति है दिव्य, रामजी की है माया।
करना प्रभु उद्धार, बोझ यह नश्वर काया।।
तुम तो दीनानाथ, तुम्हीं हो सबके स्वामी।
मैं तो नित्य अबोध, दुर्गुणी, अति खल, कामी।।
(३)
महाशक्ति है दिव्य, हृदय में सबके रहते।
बनकर के उपहार, भक्ति में नित ही बहते।।
यह जीवन अभिशाप, दुखों ने डाला डेरा।
हे मेरे प्रभु राम !, मुझे पापों ने घेरा।।
(४)
महाशक्ति है दिव्य, उसी ने जगत बनाया।
कहीं रची है धूप, कहीं पर शीतल छाया।।
बाँटा है उजियार, रचा है मानवता को।
लेकर के अवतार, मारते दानवता को।।
(५)
महाशक्ति है दिव्य, जिन्हें हम रघुवर कहते।
बनकर जो शुभभाव, हमारे सँग नित रहत...

