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जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार
देवास (मध्य प्रदेश)
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क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग हमें यह सिखाता है कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो स्वयं के हितों से ऊपर उठकर समाज और कर्तव्य को प्राथमिकता देता है। आज, जब नेतृत्व के अर्थ बदलते हुए दिखाई देते हैं, तब श्रीराम का जीवन एक आदर्श मानक प्रस्तुत करता है।

श्रीराम का वनवास केवल एक पारिवारिक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि यह त्याग,धैर्य और मर्यादा का सर्वोच्च उदाहरण है। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने १४ वर्षों का वनवास बिना किसी विरोध के स्वीकार किया। यह प्रसंग आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जब अधिकारों की मांग तो प्रबल है, किंतु कर्तव्यों के प्रति निष्ठा कम होती जा रही है। श्रीराम हमें यह सिखाते हैं कि जीवन में संतुलन तभी संभव है, जब अधिकार और कर्तव्य दोनों का समान रूप से सम्मान किया जाए। समाज में बढ़ती असमानताओं और विभाजनों के बीच श्रीराम का जीवन समरसता का संदेश देता है। वनवास के दौरान उन्होंने समाज के हर वर्ग को अपनाया और उनके साथ समान व्यवहार किया। शबरी के जूठे बेर स्वीकार करना केवल भक्ति का प्रसंग नहीं, बल्कि सामाजिक समानता का गहन संदेश है। यह घटना दर्शाती है कि सच्चा धर्म मनुष्यता में निहित है, न कि सामाजिक भेदभाव में। आज,जब समाज जाति, वर्ग और आर्थिक असमानताओं के कारण विभाजित होता जा रहा है, तब यह संदेश और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। ‘रामराज्य’ की अवधारणा भारतीय समाज में आदर्श शासन व्यवस्था का प्रतीक रही है।

कहा जाता है कि श्रीराम के शासनकाल में प्रजा सुखी, सुरक्षित और संतुष्ट थी। न्याय, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व उस शासन के मूल स्तंभ थे। आज के लोकतांत्रिक युग में भी ‘रामराज्य’ एक प्रेरणा के रूप में देखा जा सकता है। यदि शासन व्यवस्था में ईमानदारी,सेवा और जनकल्याण को प्राथमिकता दी जाए, तो आधुनिक समाज भी उस आदर्श के निकट पहुँच सकता है। यह केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि एक लक्ष्य है, जिसे सही नीतियों और नैतिकता के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। परिवार, जो समाज की नींव होता है, आज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। रिश्तों में स्वार्थ, अहंकार और असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में माता सीता और श्रीराम का संबंध हमें पारस्परिक सम्मान, विश्वास और त्याग का महत्व समझाता है। वहीं, भरत का उदाहरण यह दर्शाता है कि सच्चे संबंध सत्ता और स्वार्थ से ऊपर होते हैं। भरत ने सिंहासन को अस्वीकार कर अपने भाई के प्रति निष्ठा को सर्वोपरि रखा- यह त्याग आज के समाज में दुर्लभ होता जा रहा है। अहंकार, जो व्यक्ति के पतन का सबसे बड़ा कारण बनता है, आज के समाज में तेजी से बढ़ रहा है। रावण इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वह अत्यंत विद्वान और शक्तिशाली था, किंतु उसका अहंकार ही उसके विनाश का कारण बना। इसके विपरीत, श्रीराम ने अपने सामर्थ्य और ज्ञान के बावजूद सदैव विनम्रता को अपनाया। यह हमें यह सिखाता है कि सच्ची महानता विनम्रता में ही निहित होती है, न कि अहंकार में। आज का युवा वर्ग जीवन की जटिलताओं और प्रतिस्पर्धा के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। करियर का दबाव, सामाजिक अपेक्षाएँ और व्यक्तिगत संघर्ष उन्हें निरंतर चुनौती देते हैं। ऐसे समय में श्रीराम का जीवन एक मार्गदर्शक के रूप में सामने आता है। उनका धैर्य, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा यह सिखाते हैं कि कठिनाइयों से भागने के बजाय उनका सामना करना ही सच्ची सफलता की पहचान है।

नारी सशक्तिकरण के संदर्भ में भी रामायण की प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है। माता सीता केवल त्याग की प्रतीक नहीं, बल्कि साहस,
आत्मसम्मान और धैर्य का भी उदाहरण हैं। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आत्मबल को बनाए रखा और यह सिद्ध किया कि नारी केवल सहनशीलता की प्रतिमा नहीं, बल्कि शक्ति का स्वरूप भी है। आज, जब महिलाएँ समाज के हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, तब उनका यह आदर्श और भी प्रेरणादायक हो जाता है। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि श्रीराम का जीवन कितना महान था, बल्कि यह है कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में कितना अपनाते हैं। राम नवमी का यह पावन अवसर हमें केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं, आत्मचिंतन के लिए भी प्रेरित करता है। यदि हम अपने व्यवहार में सत्य, अपने निर्णयों में न्याय और अपने संबंधों में प्रेम को स्थान दें, तो एक आदर्श समाज की स्थापना संभव है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम श्रीराम को केवल पूजा तक सीमित न रखें,बल्कि उनके आदर्शों को अपने आचरण में उतारें। क्योंकि जब समाज बिखरता है, तब उसे जोड़ने के लिए केवल आदर्श ही पर्याप्त होते हैं- और उन आदर्शों का सबसे उज्ज्वल उदाहरण हैं श्रीराम।

परिचय :-  अमित राव पवार
निवासी : देवास (मध्य प्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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