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पता है …

शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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मन में कई बार
कितना गुबार
भरा होता है शब्दों का
मगर होंठ
ऐसे जमे होते हैं
मानो सिल गए हों।

आंखे इतनी
बोझिल होती हैं
आंसुओं के बोझ से
कि सब धुंधला धुंधला सा
नज़र आने लगता है
लेकिन फिर भी
एक बूंद भी
मजाल क्या जो
आंखों से कतरा बनकर
बह जाए।

कितनी कठोरता
होती है
उस तकलीफ में
जिसे बस मौन रहकर
सह लिया जाता है
जिसमें मन को चीखें
बस मन के अंदर ही
किसी कोने में दबकर
रह जाती हैं।

जीवन में पीड़ाओं
का होना
आम बात है किंतु
कुछ पीड़ाएं गहरे
घाव के साथ
हृदय को असहाय
बना देती हैं
कहते हैं कि
व्यक्त करने से पीड़ा
का बोझ कम
हो जाता है
मगर कुछ पीड़ाएं है
जो बार बार दोहराने से
हृदय को छलनी करती हैं
आत्मा पर एक
नया बोझ बन जाती हैं।

परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक)
पिता : देवदत डोंगरे
जन्म : २० फरवरी
निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा “समाजसेवी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान २०२४” से सम्मानित
घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है।


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