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इतिहास बना है शिलालेख

12आनंद विहार (दिल्ली)
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इतिहास बना है शिलालेख
कब, किसने इससे सीखा है
परमार्थ किया तभी तक
जब तक उसमें स्वार्थ दिखा है

दिन के घोर उजाले में
तुम सदाचार समझाते हो
धवल वस्त्रों तले छिपी
रक्त-पिपासा कब दिखलाते हो
शोषण की सीढ़ी पर चढ कर
सुख के स्वप्न दिखाते हो
रजनी के स्याह अंधेरों में
संहारक तेवर अपनाते हो
षड्यंत्रों का भोजपत्र
मानव रक्त से लिखा है

कहर तुम्हारा भुजंग बन
मासूम यौवन को डसता हैं
संस्कारों की चून्नर तले
दरिया दर्द का रिसता है
दुराचार के दावानल में
अक्षत यौवन कुंभल रहा
दो वक्त की रोटी खातर
हुआ पतित कब संभल रहा
रक्षक भक्षक बन बैठा
समय वक्त पर चीखा है

श्रम साध्य श्रमिक ने जीवन
मंदाग्नि में झोंक दिया
सूखी रोटी के दो कोरो पर
स्वाभिमान को छोड़ दिया
साधन के संधानो खातिर
स्वर सतत मिमियाते रहे
आकुल नादान नन्हे मुन्नों को
आश्वासनों से रिझाते रहे
साजिश के शिकार रहे मौन
कब अतीत से सीखा है

उग्रवाद की पराकाष्ठा कब होती
महत्वाकांक्षा जीवित रहता है
लाशों पर लाशों के ढेर रक्त
चमक भरने की आदत रहती है
आकांक्षा आपूर्ति हेतु आतंकी
निचली सीढी तक जाते हैं
निदान रोग का कब होता है
प्रभाव पीढी दर पीढी पाते हैं
विध्वंस, विक्षोभ, वितृष्णा मात्र
वैभव जीवन में कब दिखा है

पाकर अर्थ हम हों समर्थ
ये स्वप्न जाल वे बुनते हैं
योवन आया, कब खत्म हुआ
हाथ वो केवल मलते हैं
शिष्टाचार की चादर ओढे
एक अंतर्ज्वाला में जलते है
अवतार की झूठी आस लिए
अति का इंतजार करते हैं
भगवान मगर सब भला करेंगे
यही सोचना तो सीखा है

परिचय :- छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
निवासी : आनंद विहार, दिल्ली
विशेष रूचि : व्यंग्य लेखन, हिन्दी व राजस्थानी में पद्य व गद्य दोनों विधा में लेखन, अब तक पंद्रह पुस्तकों का प्रकाशन, पांच अनुवाद हिंदी से राजस्थानी में प्रकाशित, राजस्थान साहित्य अकादमी (राजस्थान सरकार) द्वारा, पत्र पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में नियमित प्रकाशन, राजस्थानी लोक गीतों के लिए प्रसिद्ध कंपनी “वीणा कैसेटस” के दो एलबमों में सात गीत संगीतबद्ध हुये हैं।
सम्मान : “राजस्थानी आगीवान” सम्मान से सम्मानित
श्री गंगानगर के सृजन साहित्य संस्थान का सृजन साहित्य सम्मान व
सरदारशहर गौरव (साहित्य) सम्मान व अनेक अन्य सम्मानरा
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।


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