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छंद

राम नाम की मधुशाला (भाग- २)
छंद, भजन

राम नाम की मधुशाला (भाग- २)

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** तुम अनन्य सेवक हो राम के, स्वांस स्वांस तेरी माला। तुलसी से लिखवा कर महिमा, "तुलसीदास" बना डाला। पीनेवाला ही तो नाम की, महिमा बतला सकता है। तुम बतलाते जाओ महिमा, लिख दूँ अमृत मधुशाला। नाम नशे में रहते हो तुम, क्यों बस यही बखान करो। सबके अन्तर करो प्रेरणा, राम नाम का पान करो। हनुमत इस अमृत मदिरा का, पकड़ा दो हर कर प्याला। हर घर मे हो साकी प्रभु का, वसुंधरा हो मधुशाला। मदिरालय की मदिरा चढ़ती, तो विवेक हर लेती है। राम नाम की मदिरा सबको, भक्ति का फल देती है। लग जाता पूरी श्रद्धा से, जो होकर के मतवाला। उसकी दृष्टि झूमा देती है, वो बन जाता मधुशाला। उस मदिरा का नशा चढ़े तो, नष्ट सभी कुछ होता है। नाम नशा जितना चढ़ता, मन उतना पावन होता है। नाम नशे में डूबके मीरा ने, विष अमृत कर डाला। नाम नशा सबपर चढ़ ...
राम नाम की मधुशाला (भाग- १)
छंद, भजन

राम नाम की मधुशाला (भाग- १)

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** हनुमत तुमने ही पकड़ाई, राम नाम अमृत माला। अंतर में प्रेरणा जगाई, लिखूं नाम की मधुशाला। तुमसे बड़ा 'नाम' का साकी, नहीं कोई इस धरती पर । अमृत जाम बनाते जाना, पूरी हो ये मधुशाला। बहुत विघ्न आएंगे पथ में, तुम रक्षक बनकर रहना। विघ्नों पर तुम गदा चलाना, मेरे कर में दे माला। राम नाम हर स्वांस में तेरी, तुम हो सदा भरा प्याला। बतलाते जाना तुम महिमा, में तो बस लिखने वाला। हर घर मे अब राम नाम की, मदिरा को पहुंचाना है। हर जिव्हा को स्वाद चखाकर, मुक्ति मार्ग ले जाना है। जब हर कर में आजायेगा, राम नाम मधु का प्याला । तो हर आंगन बन जायेगा, राम नाम की मधुशाला। तुलसी ने बतलाया कलयुग में, बस नाम सहारा है। सभी संत बतलाते केवल, नाम ही तारण हारा है। इतना नाम पिलादो मुझको, हो जाऊं मैं मतवाला। मेरे रोम रोम से निक...
प्रथम पूज्य हैं गणपति देवा
चौपाई, छंद

प्रथम पूज्य हैं गणपति देवा

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** प्रथम पूज्य हैं गणपति देवा। सर्वप्रथम हो उनकी सेवा।। संकट टालो अतिशय भारी। हनुमत आई शरण तिहारी।। सबका मंगल करने वाले। मुझको अपने चरण बिठा ले।। तुलसी कृत मानस है भाती भक्ति-सुभाव हृदय में लाती।। मानस में वर्णित चौपाई। उर में श्रद्धा बहु उपजाई।। मातु पिता की महिमा गाई। गुरु के चरण बहुत सुखदाई।। प्रेम करें सब भाई-भाई। सकल विश्व पूजित रघुराई।। कैकेई ने प्रभु को माना। राह सुगम की वन को जाना।। तज महलों को सीता माता। संग पिया का अति मन भाता।। उर्मिल सहती थी दुख भारी। रहें कर्म-पथ लखन सुखारी।। निज इच्छा से प्रभु की सेवा। राम सकल जग के हैं देवा।। सीख भरत से यह हम लेते। प्रभु के चरण परम सुख देते।। प्रातः वेला अति मनभायी। पुण्य प्रताप मधुर रसदायी।। राम नाम अति मंगलकारी। प्रमुदित हो लेते नर-नारी।। धन्य-ध...
रंगमंच सी है ये दुनिया
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रंगमंच सी है ये दुनिया

अर्चना तिवारी "अभिलाषा" रामबाग, (कानपुर) ******************** सरसी छंद :- रंगमंच सी है ये दुनिया, हम सब हैं किरदार। जाना सबको इस दुनिया से, खाली हाथ पसार।। फिर काहे की उलझन भइया, काहे की तकरार। हँसी खुशी से मिल लो सबसे, मिले दिवस हैं चार।। परिचय :-  अर्चना तिवारी "अभिलाषा" पिता : स्वर्गीय जगन्नाथ प्रसाद बाजपेई माता : श्रीमती रानी बाजपेयी पति : श्री धर्मेंद्र तिवारी जन्मतिथि : ४ जनवरी शिक्षा : एम ए (राजनीति शास्त्र) बी लिब- राजर्षि टंडन ओपेन यूनिवर्सिटी-प्रयागराज निवासी : रामबाग, (कानपुर) अभिरुचि : आध्यात्मिक व साहित्यिक पुस्तकों का अध्ययन व लेखन साहित्यिक उपलब्धियाँ : साहित्य संगम संस्थान द्वारा प्रकाशित एकल पुस्तक-काव्यमेध, साझा संग्रहों में रचनाएं प्रकाशित, मासिक ई पत्रिका में श्रेष्ठ सृजन हेतु कविताएं व आलेख प्रकाशित। सम्मान : अम्रता प्रीतम कवियित्री सम्मान, नार...
योग छंद “विजयादशमी”
छंद

योग छंद “विजयादशमी”

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप' तिनसुकिया (असम) ******************** अच्छाई जब जीती, हरा बुराई। जग ने विजया दशमी, तभी मनाई।। जयकारा गूँजा था, राम लला का। हुआ अंत धरती से, दुष्ट बला का।। शक्ति उपासक रावण, महाबली था। ग्रसित दम्भ से लेकिन, बहुत छली था। कूटनीति अपनाकर, सिया चुराई। हर कृत्यों में उसके, छिपी बुराई।। नहीं धराशायी हो, कभी सुपंथी। सर्व नाश को पाये, सदा कुपंथी। चरम फूट पापों का, सदा रहेगा। कब तक जग रावण के, कलुष सहेगा।। मानवता की खातिर, शक्ति दिखाएँ। जग को सत्कर्मों की, भक्ति सिखाएँ।। राम चरित से जीवन, सफल बनाएँ। धूम धाम से हम सब, पर्व मनाएँ।। योग छंद विधान- योग छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद २० मात्रा रहती हैं। पद १२ और ८ मात्रा के दो यति खंडों में विभाजित रहता है। १२ मात्रिक प्रथम चरण में चौकल अठकल का कोई भी संभावित क्रम लिया जा सकता है। इसक...
नरहरि छंद  “जय माँ दुर्गा”
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नरहरि छंद “जय माँ दुर्गा”

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप' तिनसुकिया (असम) ******************** जय जग जननी जगदंबा, जय जया। नव दिन दरबार सजेगा, नित नया।। शुभ बेला नवरातों की, महकती। आ पहुँची मैया दर पर, चहकती।। झन-झन झालर झिलमिल झन, झनकती। चूड़ी माता की लगती, खनकती।। माँ सौलह श्रृंगारों से, सज गयी। घर-घर में शहनाई सी, बज गयी।। शुचि सकल सरस सुख सागर, सरसते। घृत, धूप, दीप, फल, मेवा, बरसते।। चहुँ ओर कृपा दुर्गा की, बढ़ रही। है शक्ति, भक्ति, श्रद्धा से, तर मही।। माता मन का तम सारा, तुम हरो। दुख से उबार जीवन में, सुख भरो।। मैं मूढ़ न समझी पूजा, विधि कभी। स्वीकार करो भावों को, तुम सभी।। नरहरि छंद विधान- नरहरि छंद एक सम पद मात्रिक छंद है, जिसमें प्रति पद १९ मात्रा रहती हैं। १४, ५ मात्रा पर यति का विधान है। दो-दो या चारों पद समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- १४ मात्रिक चरण की प्रथम दो मा...
कविता ऐसे जन्मी है
कविता, छंद

कविता ऐसे जन्मी है

शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप' तिनसुकिया (असम) ******************** प्रदोष छंद कविता प्रदोष छंद विधान :- यह १३ मात्राओं का सम मात्रिक छंद है। दो-दो चरण या चारों चरण समतुकांत होते हैं। इसका मात्रा विन्यास निम्न है- अठकल+त्रिकल+द्विकल =१३ मात्रायें अठकल यानी ८ में दो चौकल (४+४) या ३-३-२ हो सकते हैं। (चौकल और अठकल के नियम अनुपालनीय हैं।) त्रिकल २१, १२, १११ हो सकता है तथा द्विकल २ या ११ हो सकता है। मन एकाग्रित कर लिया। चयन विषय का फिर किया।। समिधा भावों की जली। तब ऐसे कविता पली।। नौ रस की धारा बहे। अनुभव अपना सब कहे।। लेकिन जो हिय छू रहा। कविमन उस रस में बहा।। सुमधुर सरगम ताल पर। समुचित लय मन ठान कर।। शब्द सजाये परख के। गा-गा देखा हरख के।। अलंकार श्रृंगार से। काव्य तत्व की धार से।। पा नव जीवन खिल गयी। पूर्ण हुई कविता नयी।। परिचय :- शुचिता अग्रवाल 'शुचिसंदीप' ...
मन में खटके बात
कविता, छंद

मन में खटके बात

गाज़ी आचार्य 'गाज़ी' मेरठ (उत्तर प्रदेश) ******************** रीत यहाँ की देख के, मन में खटके बात | मनुज विवेकी कौन थे, जिसने बाँटी जात || [१] पीड़ा जग की देख के, मन में खटके बात | कौन कर्म है आपके, व्यथा भोग दिन-रात || [२] गुड से मीठे बोल है , थाम चले है हाथ | पग - पग मेरे साथ है, देत गैर का साथ || [३] बेमतलब है ये हँसी, मन में खटके बात | पर्तें मुख पर लाख है, दिखते है जज़्बात || [४] ऊँचे उसके बोल है, वार्ता करे अकाथ | आन शीश विपदा खड़ी, जोड़ फिरे जग हाथ || [५] माथे पर है सिलवटें, मन में खटके बात | डोल रहे करते भ्रमण, साँझ न देख प्रभात || [६] परिचय :- गाज़ी आचार्य 'गाज़ी' निवासी : मेरठ (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय ए...
फौजी सरहद पै खड़ा
छंद

फौजी सरहद पै खड़ा

आचार्य राहुल शर्मा फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश) ******************** कुंडली छंद... फौजी सरहद पै खड़ा, लेकर के बंदूक। जान हथेली पै रखे, चलता ले संदूक।। चलता ले संदूक, देश हित फौजी भाई। लदी हुयी बंदूक, कयामत रिपु पै आई।। कह राहुल कविराय, अकेली रहती भौजी। त्याग प्रेम समझाय, देश के प्रति बस फौजी।। परिचय :-  आचार्य राहुल शर्मा निवासी : फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने...
वार
छंद

वार

अशोक शर्मा कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) ******************** धार छन्द (चार वर्ण-सात मात्रा-२२२१) सीमा पार। बैरी चार। अत्याचार। हाहाकार। चारो ओर। मानो खोर। नाता तोड़। माथा फोड़। भागे लोग। बिना जोग। ऐसी होड़। खाना छोड़। ना है आस। कोई पास। काया खास। सत्यानाश । छूटे कूछ। नाही पूछ। काटे पेट। देवी भेंट। पानी आज। खोयी लाज। धोती ढाल। खोती लाल। खोटे लोग। का है योग। ना है रोध। कोई बोध। नाही नेह। कोई गेह। तेरा क्षेम। कैसा प्रेम। मानो खार। सीमा पार। रोको यार। ऐसी धार। परिचय :- अशोक शर्मा निवासी : लक्ष्मीगंज, कुशीनगर, (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प...
जनक वंदना
कुण्डलियाँ, छंद

जनक वंदना

नितिन राघव बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) ******************** जनक वंदना करीये, जनक महेश समान। हमेशा सलाह लिजिये, करनी हो आसान। करनी हो आसान, कभी नाहीं दुख होवे। जो रोजे संतान, जनक चरणा में सोवे। जग में नितिन पाये, आशीषा देता चमक। देव वंदन गाये, होते जी ऐसे जनक।। परिचय :- नितिन राघव जन्म तिथि : ०१/०४/२००१ जन्म स्थान : गाँव-सलगवां, जिला- बुलन्दशहर पिता : श्री कैलाश राघव माता : श्रीमती मीना देवी शिक्षा : बी एस सी (बायो), आई०पी०पीजी० कॉलेज बुलन्दशहर, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से, कम्प्यूटर ओपरेटर एंड प्रोग्रामिंग असिस्टेंट डिप्लोमा, सागर ट्रेनिंग इन्स्टिट्यूट बुलन्दशहर से कार्य : अध्यापन और साहित्य लेखन पता : गाँव- सलगवां, तहसील- अनूपशहर जिला- बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश)। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
त्राहिमाम
चौपाई, छंद

त्राहिमाम

अजय गुप्ता "अजेय" जलेसर (एटा) (उत्तर प्रदेश) ******************** तुम हो जग के पालनहारे, ब्रहां, विष्णु, महेश हमारे। हे आपदा प्रबंध प्यारे, सबहु तेरी कृपा सहारे।। सूनी सड़क गली चौबारे, जैसे नभ से ओझल तारे। घर-घर में नर-नारी सारे, बिन प्राणवायु जीवन हारे।।१ भौतिक सुख इच्छा ने भुलाये, पर्यावरण क्षति हमें रुलाये। जगह जगह हम पेड़ लगायें, अब नहीं वन-कटान करायें।। त्राहिमाम! हम शीश नभायें, माथे पग रज तिलक लगायें। प्राणवायु जग भर फैलाये, फिर से धरा सकल महकायें।।२ हमने किये पाप हैं भारी, भूले थे हम तुम अधिकारी। म़ाफ करो हम रचना त्यारी, त्राहिमाम! देवधि उपकारी।। हम तेरे बालक मनुहारी, त्राहिमाम! हे जग गिरधारी।। प्रभु सुन लीजिए अरज हमारी, करो दया जग लीलाधारी।।३ परिचय :- अजय गुप्ता "अजेय" निवासी : जलेसर (एटा) (उत्तर प्रदेश) शिक्षा : स्नातक ऑफ लॉ एंड कॉमर्स, आगरा वि...
कुंडल छंद “ताँडव नृत्य”
छंद

कुंडल छंद “ताँडव नृत्य”

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' तिनसुकिया (असम) ******************** कुंडल छंद विधान यह २२ मात्रा का सम पद मात्रिक छंद है जिसमें १२,१० मात्रा पर यति है। अंत में दो गुरु आवश्यक; यति से पहले त्रिकल आवश्यक। मात्रा बाँट :- ६+३+३, ६+SS चार चरण का छंद। दो दो चरण समतुकांत या चारों चरण समतुकांत। नर्तत त्रिपुरारि नाथ, रौद्र रूप धारे। डगमग कैलाश आज, काँप रहे सारे।। बाघम्बर को लपेट, प्रलय-नेत्र खोले। डमरू का कर निनाद, शिव शंकर डोले।। लपटों सी लपक रहीं, ज्वाल सम जटाएँ। वक्र व्याल कंठ हार, जीभ लपलपाएँ।। ठाडे हैं हाथ जोड़, कार्तिकेय नंदी। काँपे गौरा गणेश, गण सब ज्यों बंदी।। दिग्गज चिंघाड़ रहें, सागर उफनाये। नदियाँ सब मंद पड़ीं, पर्वत थर्राये।। चंद्र भानु क्षीण हुये, प्रखर प्रभा छोड़े। उच्छृंखल प्रकृति हुई, मर्यादा तोड़े।। सुर मुनि सब हाथ जोड़, शीश को झुकाएँ। शिव-शिव वे बोल रहें,...
पद्मावत छंद
छंद

पद्मावत छंद

बलबीर सिंह वर्मा "वागीश" सिरसा (हरियाणा) ******************** पद्मावती छ्न्द १०, ८, १४ की यति से ३२ मात्रा का सम मात्रिक छ्न्द, अंत में दो गुरु मात्रा अनिवार्य, जगण नहीं आना चाहिए। दो-दो चरण तुकान्त। (१) कंचन सी काया, मन भरमाया, बिखरी मुख पर ज्यों लाली। हैं अधर गुलाबी, बनी नवाबी, लगती कितनी मतवाली। ये नैन नशीले, लगें सजीले, सूरत नारी की प्यारी। ईश्वर की माया, पार न पाया, सम्मोहित दुनिया सारी। (२) नारी थी अबला, अब है सबला, जग पालक है यह नारी। आँगन की छाया, घर की माया, फिर भी रहती दुखियारी। नारी की पूजा, ईश्वर दूजा, सबने महिमा है गाई। दुर्गा ये काली, ममता वाली, है यही भवानी माई। (३) हे नंद दुलारे, यशुमति प्यारे, राधिका पुकारे आओ। करो नहीं देरी, सुन लो मेरी, मुरली की तान सुनाओ। दर्शन की प्यासी, कान्हा दासी, आकर अब गले लगाओ। छोड़ों मनमानी, शाम सुह...
बंधक तन में टहल रही है
गीत, छंद

बंधक तन में टहल रही है

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** आधार छंद- विष्णुपद बंधक तन में टहल रही है, श्वासें बन उलझन। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।। डाल दिया आ खुशियों के घर, राहू ने डेरा। दुख की संगीनों ने तनकर, उजला दिन घेरा।। जगी आस का कर देता है, चाँद रोज खंडन।। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।।१ अस्पताल के विक्षत तन में, श्वासों का टोटा। गरियाता पर अटल प्रबंधन, बिल देकर मोटा।। दैत्य वेंटिलेटर नित तोड़े, भव का अनुशासन। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।।२ एंबुलेंस की चीखें भरती, बेचैनी मन में। भूल गयी अब लाशें काँधे, चलती वाहन में।। बदल दिया है इस मौसम ने, मानस का चिंतन। घर के बाहर पग रखने में, डरती है धड़कन।।३ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी ...
आल्हा/ वीर छंद
छंद

आल्हा/ वीर छंद

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** वीर छंद दो पदों के चार चरणों में रचा जाता है जिसमें यति १६-१५ मात्रा पर नियत होती है, छंद में विषम चरण का अंत गुरु (ऽ) या लघुलघु (।।) या लघु लघु गुरु (।।ऽ) या गुरु लघु लघु (ऽ ।।) से तथा सम चरण का अंत गुरु लघु (ऽ।) से होना अनिवार्य है, इसे आल्हा छंद या मात्रिक सवैया भी कहते हैं, कथ्य प्रायः ओज भरे होते हैं। सादर समीक्षार्थ प्रस्तुत है आल्हा छंद सर्जन में मेरा प्रयास :- भारत में व्यापार करेंगे, अंग्रेजों की थी यह चाह। सन सोलह सौ आठ रहा जब, पहुँचे सूरत बंदरगाह।। कूटनीति का लिया सहारा, भेद- भाव का बोया बीज। राजाओं के राज्य छीनकर, भूले अपनी सभी तमीज।। जुल्मों की आँधी बरपाई, करते रहते अत्याचार। अट्ठारह सौ सन सत्तावन, गूँजी भारत में ललकार।। खदेड़ना है फिरंगियों को, जन-जन की थी यही पुकार। आंदोलन को तेज करेंगे, किया देश ने तुरत विचार।। कफन ब...
बाल काव्य के अंतर्गत प्रस्तुत हैं कुण्डलियाँ छंद सर्जन
छंद, बाल कविताएं

बाल काव्य के अंतर्गत प्रस्तुत हैं कुण्डलियाँ छंद सर्जन

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** उठ कर देखो लाडले! आसमान की ओर। पक्षी कलरव कर रहे, खिली सुहानी भोर।। खिली सुहानी भोर, लालिमा नभ में छाई। अरुण रश्मियाँ साथ, उषा है लेकर आई।। अब तो रख दो पाँव, सहारे से वसुधा पर। रजनी बीती तात, लाडले देखो उठ कर।। होती है हर हाल में, मस्ती खूब धमाल। बाबा घोडा़ बन गए, चुन्नू करे कमाल।। चुन्नू करे कमाल, फटाफट चले सवारी। टिक-टिक की आवाज, कभी है चाबुक मारी।। मात- पिता को छोड़, खेलते दादा-पोती। दादी भी खुशहाल, देखकर उनको होती।। खाते हलुवा खीर जब, बचपन में हम साथ। रहे खुशी से झूमते, लिए हाथ में हाथ।। लिए हाथ में हाथ, दुलारें माता हमको। भर-भर कर आशीष, सदा देतीं वह सबको।। नाचें कूदें और, पिता से पैसे पाते। जाते फिर बाजार, वहाँ पर लड्डू खाते।। खाते हैं चुन्नू सदा, पूड़ी और पनीर। नहीं मिले उनको अगर, खो देते हैं धीर।। खो देते हैं धीर, धरा पर लोटे ज...
अब तो चेतो…
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अब तो चेतो…

भारत भूषण पाठक धौनी (झारखंड) ******************** लावणी छंद- १६-१४ की मात्रा पर यति, चार चरण, दो-दो चरण समतुकांत तथा चरणांत गुरु अनिवार्य अब तो चेतो भारतवासी, अपनों को वो मार रहा। क्या पैसों का होगा बोलो? जब संबल ही हार रहा।। अजी नौकरी बहुत हुई अब, श्रम स्वदेश को दान दो। कुछ कौड़ी वो देकर तुमको, खाए मलाई जान लो।। नहीं मित्र वो कभी हुआ था, वैरी था, वो वैरी है। लौटो, देखो हाल हमारा, कैसी अब जी देरी है।। परिचय :  भारत भूषण पाठक लेखनी नाम : तुच्छ कवि 'भारत ' निवासी : ग्राम पो०-धौनी (शुम्भेश्वर नाथ) जिला दुमका(झारखंड) कार्यक्षेत्र : आई.एस.डी., सरैयाहाट में कार्यरत शिक्षक योग्यता : बीकाॅम (प्रतिष्ठा) साथ ही डी.एल.एड.सम्पूर्ण होने वाला है। काव्यक्षेत्र में तुच्छ प्रयास : साहित्यपीडिया पर मेरी एक रचना माँ तू ममता की विशाल व्योम को स्थान मिल चुकी है काव्य प्रतियोगिता में। सम्मान : र...
राम महिमा
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राम महिमा

बासुदेव अग्रवाल 'नमन' तिनसुकिया (असम) ******************** सोरठा छंद मंजुल मुद आनंद, राम-चरित कलि अघ हरण। भव अधिताप निकंद, मोह निशा रवि सम दलन।। हरें जगत-संताप, नमो भक्त-वत्सल प्रभो। भव-वारिध के आप, मंदर सम नगराज हैं।। शिला और पाषाण, राम नाम से तैरते। जग से हो कल्याण, जपे नाम रघुनाथ का।। जग में है अनमोल, विमल कीर्ति प्रभु राम की। इसका कछु नहिं तोल, सुमिरन कर नर तुम सदा।। हृदय बसाऊँ राम, चरण कमल सिर नाय के। सभी बनाओ काम, तुम बिन दूजा कौन है।। गले लगा वनवास, बनना चाहो राम तो। मत हो कभी उदास, धीर वीर बन के रहो।। रखो राम पे आस, हो अधीर मन जब कभी। प्राणी तेरे पास, कष्ट कभी फटके नहीं।। सुध लेवो रघुबीर, दर्शन के प्यासे नयन। कबसे हृदय अधीर, अब तो प्यास मिटाइये।। सोरठा "विधान" दोहा की तरह सोरठा भी अर्ध सम मात्रिक छंद है। इसमें भी चार चरण होते हैं। प्रथम व तृतीय चरण विषम तथा द्वितीय...
सनातन के प्रणाम
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सनातन के प्रणाम

गोपाल पांडेय "आजाद" औरैया (उत्तर प्रदेश) ******************** ।।सनातन के प्रणाम।। शीश गंग धार और कण्ठ में भुजंग माल भूत प्रेत धारी के सुधाम को प्रणाम है। असुरों का किया वध पावन किया अवध सूर्यवंश अंश श्री राम को प्रणाम है। द्रुपद सुता की चीरबृद्धि से हरी थी पीर ऐसे बलराम भ्रात श्याम को प्रणाम है। पित्र का चुकाया ऋण पुत्र का निभाया धर्म रौद्ध के स्वरूप परशुराम को प्रणाम है। ।। हमारे प्रतीक।। सनातनी संस्कृति, सभ्यता समाज सब संस्कार शौर्य स्वाभिमान के प्रतीक है। वीरगाथा काल वाले, शब्दभेदी वाण वाले पूर्वज हमारे अभिमान के प्रतीक है। झुकने न दिया भाल वैरी हेतु बने काल महाकाल के पुजारी शान के प्रतीक है। भारती की आरती में शीश जो चढ़ाते नित भारत के वीर बलिदान के प्रतीक है। परिचय :- गोपाल पांडेय "आजाद" निवासी : औरैया (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार...
दिव्य जोत
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दिव्य जोत

रेखा कापसे "होशंगाबादी" होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) ******************** शुद्ध गीता छंद मापनी- २१२२ २१२२, २१२२ २१२१ चैत मासे शुक्ल प्रतिपद, साथ जलती दिव्य जोत। प्रथम चंद्र दिवस कहे है, साल का नववर्ष होत ।। उस विधाता ने रची थी, काल चक्री सृष्टि आज । विष्णु अवतारी हुए थे, मिलन प्रकृति दृष्टि साज ।। आज है नव वर्ष देखो, दे सदा ही आन बान। कामना मेरी यही हैं, आप पाओ आसमान।। दुःख का साया नहीं हो, सुख बसा हो आस पास। नित्य जीवन आपका हो, प्रेम खुशियाँ भार खास।। पेड़ पाते फूल कलियाँ, मंजरी इस काल चक्र। लौट कर आती बहारे, साल में हर बार वक्र।। दौर ये मधुमास प्यारा, घोलता है प्रेम प्रीत। शुद्ध होती है धरा भी, पूजती गणगौर रीत।। कूक कोयल आम खुशबू, कर रहे सब चित्त चोर। नव फसल का गान करती, मोर बोले बाग जोर।। मस्त मद आनंद आभा, नभ खिली हैं आज भोर। गीत गाते हैं सुहाने, नाचते सब जोर शोर।। परिचय :- रेखा का...
पनघट
छंद

पनघट

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया (गुजरात) ******************** विष्णुपद छंद दृश्य सुहाना पनघट पर का, चहल-पहल सारी, चली नीर भरने पनिहारी, ले गगरी न्यारी, पायल को छनकाती चलती, कटि को लचकाती, तिरछी नैनों से दिख के वो, हिय में शरमाती । पायल की झनकार जगाती, प्रीत युवा दिल में, मधुकर मँडराते हैं मानो, पुष्पों के दल में , बीच घोर घन कुंतल दिखती, चंद्र-मुखी प्यारी, घायल सबको करती चलती, मधु मुस्का न्यारी। छोटी-सी ठोकर से छलके, निर्मल जल घट का, मानो नीलांबर है बरसे, खोल स्नेह पट का , बूँद मोतियों-सी सिर पर से, अधरों पर ठहरी, ओस पंखुडी पर  मोती-सी, शोभित है गहरी। परिचय :- डॉ. भावना नानजीभाई सावलिया माता : वनिता बहन नानजीभाई सावलिया पिता : नानजीभाई टपुभाई सावलिया जन्म तिथि : ३ अप्रैल १९७३ निवास : हरमडिया, राजकोट सौराष्ट्र (गुजरात) शिक्षा : एम्.ए, एम्.फील, पीएच. डी, जीएसईटी स...
हरिभक्ति
गीतिका, छंद

हरिभक्ति

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, म.प्र. ******************** अँधियार चारों ओर बिखरा, सूझता कुछ भी नहीं। उजियार तरसा राह को अब, बूझता कुछ भी नहीं।। उत्थान लगता है पतन सा, काल कैसा आ गया। जीवन लगे अब बोझ हे प्रभु, यह अमंगल खा गया।। हे नाथ, दीनानाथ भगवन, पार अब कर दीजिए। जीवन बने सुंदर, मधुरतम, शान से नव कीजिए ।। भटकी बहुत ये ज़िन्दगी तो, नेह से वंचित रहा। प्रभुआप बिन मैं था अभागा, रोज़ कुछ तो कुछ सहा।। प्रभुनाम की माया अनोखी, शान लगती है भली सियराम की गाथा सुपावन, भा रही मंदिर-गली जीवन बने अभिराम सबका, आज हम सब खुश रहें। उत्साह से पूजन-भजनकर, भाव भरकर सब सहें। हरिगान में मंगल भरा है, बात यह सच जानिए। गुरुदेव ने हमसे कहा जो, आचरण में ठानिए।। आलोक जीवन में मिलेगा, सत्य को जो थाम लो। परमात्मा सबसे प्रबल है, आज उसका नाम लो।। भगवान का वंदन करूँ मैं, है यही बस कामना। प्र...
कुण्डलियाँ छंद
कुण्डलियाँ, छंद

कुण्डलियाँ छंद

रजनी गुप्ता "पूनम" लखनऊ ******************** कुण्डलियाँ/दिठौना १ लगा दिठौना माँ मुझे, ले जातीं बाजार। और दिलातीं हैं वहाँ, चुनरी गोटेदार।। चुनरी गोटेदार, खिलातीं रबड़ी हलुवा। ललचाते हैं देख, मुरारी मोटू कलुवा।। बोलीं वह पुचकार, खरीदो एक खिलौना। माता का यह लाड़, सहेजूँ लगा दिठौना।। २ लगा दिठौना देख कर, करते सब उपहास। बोल रहे हैं सब मुझे, मत आना तुम पास।। मत आना तुम पास, न कोई रंगत गोरी। मोटा- सा है गात, सभी करते बरजोरी।। सुन कर मेरी बात, उतारें माँ धड़कौना। लिया बलैयाँ खूब, दुबारा लगा दिठौना।। कुण्डलियाँ/पैसा ३ पैसे दो अम्मा मुझे, जाऊँगी बाजार। लेने गुड़िया के लिये, लहँगा गोटेदार।। लहँगा गोटेदार, सितारे सलमा वाला। चुनरी होगी लाल, गले की लूँगी माला।। गजरा लाऊँ श्वेत, सजेगी चोटी ऐसे। जैसे चंदा रात, मुझे दो अम्मा पैसे।। ४ पैसे के बल पर बसे, बेटी का संसार। आँखों में सपने लिये, बाप खड़ा लाचार।। बा...
राधा
छंद, धनाक्षरी

राधा

नीलम तोलानी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अखियाँ ये द्रोह करे, अब न किसी को देखें, कृष्ण की ही माला जपे, छवि मन भायी है। राधा मैं शरीर नहीं, प्राण में हूँ तेरे बसी, श्वास श्वास आस रहे, प्रेम ऋतु आयी है। नित दौड़ी दौड़ी आऊँ, बस में न चित रहा, मुरली की धुन कान्हा, बड़ी सुखदायी है। छुप छुप रास करें, झूमे यमुना के तीर, चैन मेरा सब गया, तू ही हरजायी है। परिचय :- नीलम तोलानी निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजि...