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पद्य

कभी नदियों में
कविता

कभी नदियों में

मुस्कान कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** कभी नदियों में छलछलाहट थी चिडियो की चहचहाट थी चुड़िओ में खनखानाहट थी पेड़ो में सनसनाहट थी आज सब शांत दिख रहा क्योंकि मनुष्य खुद के बारे में सोचकर खुद का ही नाश कर रहा। कभी रास्तों पे भीड़ थी अपनो से मिलना था नई संस्कृति का चलन था कॉरोना ने सब सिखला दिया पुरानी संस्कृति को याद दिला दिया। परिंदे आज आजाद हुए इंसान घरों में कैद हुए देश पूरा शमशान हुआ ऑक्सीजन की किल्लत हुई तो पेड़ पौधों को लगाए और बचाए पहले से नहीं थी चिंता अब जल रही है चिता। गलती हुई इंसानों से निकल रहा उसका परिणाम अब गलती को सुधार भी लो एक पेड़ अब भी जरूर लगाओ प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं। समस्या बड़ी है गलती भी बड़ी ही हुई है लेकिन ये भी एक वक्त है गुजर ही जायेगा जब खुशी के पल न ठहरे तो ये भी धीरे-धीरे निकल ही जायेगा। घर में रहे, स्वस्थ रहे। परिचय :- मुस्कान कुमारी ...
मज़दूर
कविता

मज़दूर

राम प्यारा गौड़ वडा, नण्ड सोलन (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर सृजन से भरपूर होता है मज़दूर, सुख चैन मजे से दूर होता है मज़दूर मानवीय कल्पनाओं को मूर्त रूप देता है मज़दूर। सर्दी मे ठिठुरता. गर्मी में तपता ...... बरसात में भीगे तन काम में लगा रहता है मज़दूर धूल मिट्टी से हर वक्त सना रहता सिर पर साफा बांधे, टोकरी उठाए, मन ही मन गुनगुनाता है मज़दूर। रुखी सूखी रोटी खाकर सपनो का तानाबाना बुनता है मज़दूर बीबी बच्चों को सब कुछ दे पाऊँ दो जून की रोटी के जुगाड़ में सब कुछ सहता है मज़दूर। हर तरक्की हर उन्नति हर विकास में सहयोगी है मज़दूर नवनिर्माण का प्रतीक है मज़दूर आखिर क्यों? कदम कदम पर शोषित होता है मज़दूर। ईश्वर करे, मज़दूर कभी न हो मज़बूर मज़दूर कभी न हो मजबूर।। परिचय :-  राम प्यारा गौड़ निवासी : गांव वडा, नण्ड तह. रामशहर जिला सोलन (सोलन हिमाचल प्रदेश) आप भी अपनी ...
गुरु तेग बहादुर
कविता

गुरु तेग बहादुर

रश्मि लता मिश्रा बिलासपुर (छत्तीसगढ़) ******************** सिक्खों के नवें गुरु, तेगबहादुर नाम। वैरागी त्याग की मूर्ति थे। साधना उनका काम। बाबा बकाला में करी तपस्या सालों साल, प्रयाग,बनारस, पटना असम,किया अध्यात्म प्रचार। शीश गंज, रकाब गंज दिलाते स्मरण आज। आदर्शो की रक्षा हेतु किये जन्म भर काज। धर्म के सम्मान में झुकने दिया न शीश कटा दिया सिर आपना हो गए रे शहीद। धर्म के नाम पे मर मिटे याद करें जब नाम। तेग बहादुर का भी लें कर इज्जत सम्मान। हिन्द दी चादर गुरु त्यागमल था नाम शहादत दिवस पर शान से ले लो उनका नाम। परिचय :- रश्मि लता मिश्रा निवासी : बिलासपुर (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट...
स्त्री
कविता

स्त्री

मधु अरोड़ा शाहदरा (दिल्ली) ******************** हां मैं स्त्री हूं, युगों-युगों से तुम्हारी सहचरी हूं, सृष्टि की निर्माता मैं, लालन-पालन करती हूं। अपने शरीर से, नव शरीर की संरचना करती। मुझे नाज है अपने पर मैं शक्ति स्वरूपा दुर्गा भी नर हो तुम तो नारायणी में, मेरे बिन जीवन तुम्हारा अपूर्ण। हां मैं स्त्री हूं, धरा बन जग को जीवन देती, पालित, पुष्पित भी करती, मेरी गोद में पलते सब पुष्पित, पल्लवित होते सब। हां मैं स्त्री हूं जीवनदायिनी में गंगा कल-कल-कल-कल करके बहती, प्यास बुझाती अमृत बन में शीतलता से मन को भर देती मैं ज्ञानदायिनी, न्याय कारिणी, शारदा बन बुद्धि का विकास करती। अग्नि बन दुखों को हरती सहनशीलता गुण है मेरा, हर किसी का सम्मान हूं करती। मुझको ना सताओ तरसाओ तुम, ना काली बनने पर मजबूर करो संस्कारों में बंधी हूं, मैं एक नाजुक सी डोर हूं मैं, कंधे से कंधा मिलाकर चलती हूं, हरदम मेहनत मै...
मजदूर हूं मैं
कविता

मजदूर हूं मैं

अमिता मराठे इंदौर (म.प्र.) ******************** मजदूर हूं मैं, मजबूर नहीं हूं। मेहनत ही मेरी पूंजी है। धरती ही मेरी माँ है। उसकी गोद में खेलता हूं, प्यार से माटी सहलाता हूं, हीरे मोती उगाता हूं। मज़दूर हूं मैं, मजबूर नहीं हूं। हाथों में गेती फावड़ा, दृढ़ता से कदम उठाता हूं। कड़ी धूप में भी शीतलता, महसूस कर चलता हूं। जब माटी में मिलता पसीना, नवीनता के दर्शन करता हूं। मजदूर हूं मैं, मजबूर नहीं हूं मैं। ऊंची अट्टालिकायें यें, जन मन को दिलासा देती हैं। मैं सबका साथ निभाता हूं, बस व्यर्थ न जायें मेरा श्रमफल। दिन रात मेहनत करता हूं, परिवार की रोजी-रोटी पाता हूं। मजदूर हूं मैं, मजबूर नहीं हूं। विघ्नों के तूफान जब आते हैं, पहले श्रमिक ही भुगतता हैं। सहना तो है सह लेता हूं, जन की इच्छा पूर्ति करता हूं। खुशियां देना मेरा काम है, बदले में अल्पधन पा लेता हूं। संतुष्टता मेरा मूल गुण है, उसके ही बल ...
सब पा लिया
गीत

सब पा लिया

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** (तर्ज: मैं कही कवि न बन जाऊ..) तेरा प्यार पा के हमने सब कुछ पा लिया है। तेरे दर पर आके हमने सिर को झुका लिया है।। तेरा प्यार पा के हमने सब कुछ पा लिया है।। आवागमन की गालियाँ न हत बुला रही थी..२। जीवन मरण का झूला हमको झूला रही थी। अज्ञानता की निद्रा हमको सुला रही थी। नजरे नरम हुई है तेरा आसरा लिया जब।। तेरा प्यार पा के हमने सब कुछ पा लिया है..।। तेरे प्यार वाले बादल जिस दिनसे घिर गये है.. २। दूरगुण के निसंक के पर्वत उस दिन से गिर गये है। रहमत हुई है तेरी मेरे दिन फिर गये है। तेरी रोशनी ने सदगुरु रास्ता दिखा दिया है।। तेरा प्यार पा के हमने सब कुछ पा लिया है..।। संजय का ये गीत गुरु प्रभु को हैं समर्पित..२। अपनी कृपा हे गुरुवर मुझ पर बनाये रखना। अपने चरणो में मुझको थोड़ी जगह जरूर देना। अज्ञानी हुई मैं गुरुवर मुझे ज्ञान आप देना।। तेरा प्यार ...
हसंते-हसंते
कविता

हसंते-हसंते

अक्षय भंडारी राजगढ़ जिला धार(म.प्र.) ******************** जिंदगी थम गई खुशियों वाली गम बदल जाए, खुशियां मिल जाए कितने वायरस बदलते रहे दुनिया फिर कोरोना मुक्त हो जाए। चेहरे पर हो मुस्कान जब ये दुनिया मुस्कराती रहे आएगे अच्छे दिन ओर खुशियों गीत गाया करे। करे हम सकरात्मक बात जान से जान आती रहे। हर पल हर दिन फिर से अच्छे आए फिर सब त्योहार बने ईश्वर सबका भला करे फिर से हमे सकंट से मुक्ति मिल जाए हसंते-हसंते लॉकडाउन कट जाए। परिचय :- अक्षय भंडारी निवासी : राजगढ़ जिला धार शिक्षा : बीजेएमसी सम्प्रति : पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
होती नही पुरानी कविता
कविता

होती नही पुरानी कविता

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच (मध्य प्रदेश) ******************** कड़वाहट जीवन की जीकर, आंसू बन बहती है कविता। पीड़ाएं पी पीकर अनगिन, जख्म बड़े सहती है कविता।। कितने गम के सैलाबों से, टकराती रहती है कविता। चेतनता की वाहक बनकर, सत्य मगर कहती है कविता।। दंश प्यार का पाकर देखा, मजनू बनी दीवानी कविता। कालजयी किरदार लिए पर, होती नहीं पुरानी कविता।। अंतर रोता तो कविता का, शब्द-शब्द जीभर रोता है। अर्थों में पीड़ा बहती तो, सैलाबी मंजर होता है।। घनीभूत पीडाओं से ही, कोई सुध अपनी खोता है। क्रांति हुआ करती है तब ही, जब कोई आंसू बोता है।। आहत अपमानों से होकर, बनकर तनी भवानी कविता। कालजयी किरदार लिए पर, होती नहीं पुरानी कविता।। भक्तिभवन में जाकर कविता, गंगा जल बन जाती लोगों। पार लगाती भव सागर से, दुःखसे मुक्ति दिलाती लोगों।। वात्सल्य में डुबा बदन को, सूरज बन चमकाती लोगों। फंसे भंवर में जो-जो तम क...
बेटी का घर टूटा है
कविता

बेटी का घर टूटा है

प्रियंका पाराशर भीलवाडा (राजस्थान) ******************** माना कि घर छूटा है पर रिश्ता नहीं टूटा है माँ से बेटी का घर टूटा है ये सरासर झूठा है हर बार उसकी बेटी से कोई रूठा है इस बात पर एक माँ का दिल कचोटा है फिर भी माँ का उस रूठे पर, उमड़ा आशीष अनूठा है बेटी के दर्द से माँ का मन घुटा है तो चलो मान लिया कि बेटी का घर तोड़ने की माँ के मन मे कुंठा है पर फिर घर टूटा तब वहाँ समक्ष खड़े सब लोगों की समझदारी को किसने लूटा है ? चिंगारी को आग में बदलने के लिए तो कितनों का कदम उठा है समझदारी के ठेकेदार मार रहे बस एक ही बात का जूता है कि बेटी की माँ से बेटी का घर टूटा है पर सोचो, जो लोग समझदार है वो बचाने के बजाय क्यों दिखा रहे अँगूठा है ? प्रत्यक्ष है कि घर तोड़ने में कौन-कौन जुटा है पर स्वदोष छुपाने के लिए उड़ा रहे बस झूठा है बेटी की माँ से बेटी का घर टूटा है ये सरासर झूठा है, ये सरासर झूठा है ...
राम रस
भजन

राम रस

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** "राम" रस में डूबकर देखो, तुम्हें भक्ति मिलेगी। होंगे खुश हनुमान जी, उनसे तुझे शक्ति मिलेगी। राम रस में डूबकर......... "राम" प्रिय लगने लगा तो, काम खुद घटने लगेगा। डूब पाया "राम" में तो, जग से मन हटने लगेगा। माया जब घेरेगी तो, हनुमान से युक्ति मिलेगी। "राम" रस में डूबकर.......... प्रभु ने मानव तन दिया, उपकार उसका मान प्राणी। श्रेष्ठ योनि में है जन्मा, मधुर करले अपनी वाणी। शारदे माँ रीझ जाएंगी तो, अभिव्यक्ति मिलेगी। "राम" रस में डूबकर........ सूर, मीरा और कबीरा डूबे, प्रभु महिमा को गाया। भक्ति गंगा में नहाने, के लिए भक्तों ने गाया। "राम" सेवा में लगा तनमन को, तो मुक्ति मिलेगी। "राम" रस में डूबकर............. परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं ...
हाँ मै मजदूर हूँ…
कविता

हाँ मै मजदूर हूँ…

रीमा ठाकुर झाबुआ (मध्यप्रदेश) ******************** मै मजदूर हूँ, हाँ मै मजदूर हूँ' लडता हूँ खुद से डटां रहता हूँ, भरी दुपहरी मे, कोई भी मौसम हो, सह लेता हूँ खुद पर, क्योंकि मै मजदूर हूँ! तोड देती है, मुझे सत्ता की लड़ाई, टूट जाता हूँ, जब इस्तेमाल होता हूँ, मै बेबस, मजबूर हूँ, जी हाँ मै मजदूर हूँ! झेल लेता हूँ सिकन, पसीने की बूदें, सिर पर भारी जबाबदारी की गठरी. बदलती है, सत्ता की शर्तें, पर मै बदलता नहीं, मै मजदूर हूँ हां मै मजदूर हूँ! खुश होता हूँ, जब कमाता हूँ चंद सिक्के, रोटियाँ नजर आती है उन सिक्को मे, बच्चे तकते है रास्ता मेरा, उनके लिए भरपूर हूँ, जी हाँ मै मजदूर हूँ! हाथ कंगन को अरसी क्या, खूबियो मे बेमिसाल हूँ, मै. बोझ ढोता हूँ जमाने के, पर खुद के लिए लाचार हूँ मै, रोज बनाता हूँ सपनो के पूल 'जिस पर गुजरता हूँ हर शाम हूँ मै, कैसे बताऊँ अबिराम हूँ बस खुद का जी लेता हूँ, खुद मै थोड...
श्याम बाँसुरी
कविता

श्याम बाँसुरी

मंजू लोढ़ा परेल मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** मुझे बाँसुरी बहुत पसंद है, यह मेरे श्याम का मनपसंद वाद्य है, जब भी बाँसुरी सुनती हूँ ब्रजधाम पहुँच जाती हूँ, ऐसा लगता है श्रीकृष्ण कहीं आसपास है, कानों में उनकी बासुंरी की मीठी-मधुर तान सुनाई देने लगती है, श्याम सलोने से एक अदभूत मुलाकात हो जाती है। आँखो के समक्ष उनका दैदीप्यमान-सुंदर-सलोना मुखडा़ दिखाई देने लगता है, कंदब के पेड़ तले पीताम्बर धारे, मोर पंख सजाये, वैजयंती को गले से लगाये, होठों पर बाँसुरी साथ में श्री राधारानी, चारों तरफ गोप गोपियाँ, ज्यों ही बाँसुरी बजने लगती, उसकी तान में खोकर, सभी सुध बुध बिखराकर झुमने लगते हैं, यमुना का पानी हिलोंरे लेने लगता हैं, पशु-पक्षी भी नृत्य करने लगते हैं, फुल-हवाएं सारा संसार स्तंभित हो जाता हैं, यह दृश्य आंखों के समक्ष साकार देखकर, मन अंदर से प्रफुल्लित हो उठता है, एक अजीब से स्वर्गगिक आन...
ज़िन्दगी दे मौका
कविता

ज़िन्दगी दे मौका

सपना आनंद शर्मा इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ऐ ज़िन्दगी दे मौका फिर से जीना चाहते हैं। वही माँ की गोद पिता का कंधा चाहते हैं। भाई का हाथ, बहन का उम्र भर साथ चाहते हैं। ऐ ज़िन्दगी दे मौका फिर से जीना चाहते हैं। वहीं मस्त हवाओ का झोंका, पेड़ो की टहनीयों पर बंधे झूले फिर खुली हवा में बहना चाहते हैं। ऐ ज़िन्दगी दे मौका फिर से जीना चाहते हैं। फिर वहीं मस्त हो दोस्तों के साथ पल बिताना चाहते हैं, भूल हर ग़म ज़िन्दगी के खिलखिलाकर ठहाके लगाना चाहते है। ऐ ज़िन्दगी दे मौका फिर से जीना चाहते हैं। परिचय :- सपना आनंद शर्मा निवासी - इंदौर मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक ...
उम्मीदों की भोर …
गीत

उम्मीदों की भोर …

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** कष्टों की काली रजनी का, आया अंतिम छोर। दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।। घूम रही है हवा विषैली, बन कर काला नाग। खुशियों के घर जला रही है, श्मशानों की आग।। कानों में घोला है दुख ने, त्राहि माम का शोर। दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।१ डोल गया है बुरे वक्त में, लालच का ईमान। श्वासों का सौदा करते हैं, पग-पग पर शैतान।। काट रहे हैं चाँदी निर्मम, भूखे आदमखोर। दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।२ एड़ी ऊँची कर पूरब में, झाँक रही सब बाम। कोई सूरज आकर बाँचे, खुशियों के पैगाम।। विरह वेदना की खबरें तो, बिखरी हैं चहुँओर। दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।३ हाथों थामे रखना 'जीवन', धीरज की पतवार। स्वागत करने बैठे तट पर, करुणा के उद्गार।। सरक रहा है धीरे-धीरे, अपने ओर अँजोर। दो गज की दूरी पर बैठी, उम्मीदों की भोर।।...
पड़ाव
कविता

पड़ाव

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उठ गए पड़ाव छीन गई छाया जैन से ना कोई आया ना कोई गया धूप, धूप पड़ती है हरदम पड़ती रहे धो कन्नी चलती है चलती रहे हरदम गरम मौसम गर्म रेत गरम गाड़ियों के द्वार आया कोई चला गया कोई उठ गया किसी पड़ाव में जिंदगी का पडाव छोड़ गए माटी कोई जन परिजन की आ गया लेकर कोई खुशी न येजीवन की हर पलाश हर दूब का तिनका परिचित है इनके शौर्य श्वेद रिस गया इनका कण-कण माटी में रिसे रिसे पसीने ने फिरकी गुहार बिछ गए पड़ावछनक गई चूडियां झनक उठी झांझरे मुकुल भी महक उठा हर कोई थिरक रहा मालव की माटी पर परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेव...
कोई मुझ पर झुकाव कब देगा
ग़ज़ल

कोई मुझ पर झुकाव कब देगा

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** कोई मुझ पर झुकाव कब देगा। उम्र भर का लगाव कब देगा। अब रहूँ दूर या पास में उसके, इश्क़ इसका चुनाव कब देगा। आ गया हूँ मैं फिर यहाँ बिकने, वो मुझे भाव-ताव कब देगा। इस जमीं के लिए घटाओं को, ये समन्दर बहाव कब देगा। रब मुझे मेरी हर इबादत पर, चैन का रख-रखाव कब देगा। रोग पसरा है इन हवाओं में, वक़्त इससे बचाव कब देगा। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने ...
वात्सल्य सुख
कविता

वात्सल्य सुख

अन्नपूर्णा गुप्ता  "सरगम" मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** गंगा घाट की सीढ़ियों पे बैठ पैरों को पानी मे लटका कर उगते सूरज को देखना। काफी लम्बे समय की प्रतीक्षा का परिणाम था ये। हृदय हर्षाया सा एक टक निहार रहा था उस सिंदूरी सूरज को। जिसकी किरणें मचल रही थी माँ गंगा के आँचल पर मानो कोई छोटा बच्चा धूल मिट्टी से खेल लौटा हो। और अपनी माँ से लिपट-लिपट उसे वात्सल्य सुख दे रहा हो। साथ ही उसके शरीर से चिपकी धूल मिट्टी माँ के आँचल से लग कर साफ हो रही हो। मैंने देखा सूरज की तरफ वो भी धीरे-धीरे अपने देह से लिपटे सिंदूरी रंग को गंगा माँ के आँचल में पोंछ अपने सुनहरे स्वरूप में प्रकट होता जा रहा था। पानी में होती हलचल देख मैं समझ गयी माँ मुस्कुराती हुयी अपने आँचल को सहज झाड़ कर साफ कर रही है सिंदूरी रंग।। परिचय :- श्रीमती अन्नपूर्णा गुप्ता  "सरगम" जन्म : ०७/०७/१९८४ निवासी : मुंबई (महाराष्ट्र) शिक्ष...
सुन मेरे छंद मेरे गीत
ग़ज़ल

सुन मेरे छंद मेरे गीत

अखिलेश राव इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सुन मेरे छंद मेरे गीत सुन लो मेरी ग़ज़ल हर पल साथ रहें खिले जीवन में कमल। कभी डूबें कभी तैरें झील से नयनों में तेरे खुशनुमा माहौल जिंदगी आये ऐसा पल। में तेरा फरियाद मजनू तेरा शाहजहां मेरी सीरी मेरी लैला मेरी मुमताज महल। तुझ पे कुर्बान छोटी सी कायनात मेरी तेरी हर राह पे डाले हैं फूल चुन कर। अखिल कहता सारी फिजां तुझी से है नहीं जो तू तो जहां बेजान और गुल। सुन मेरे छंद मेरे गीत सुन लो मेरी ग़ज़ल हर पल साथ रहें खिले जीवन में कमल। परिचय :- अखिलेश राव सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक हिंदी साहित्य देवी अहिल्या कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय इंदौर निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परि...
प्यार के उत्सव की नई नूतन आशा
कविता

प्यार के उत्सव की नई नूतन आशा

राजकुमार अरोड़ा 'गाइड' बहादुरगढ़ (हरियाणा) ******************** दुआयें देने के लिए, उठती थीं, सदा ही जिनकी हथेलियाँ, आज वही नम हो, भरे दिल से, अब दे रहे हैं श्रद्धांजलियां, आज कलम लिखने को उठती ही नहीं, कैसे करू आगाज़ सच लिखूं, कैसा भी, सच में, सत्ता वाले हो जाएंगे नाराज़। बरसों से बसी बस्ती की, यूँ ये हालत, अब देखी नहीं जाती, अनगिनत जलती लाशों के बीच में, मैं कितना करूँ विलाप, उनको कहो, आकर देखें, क्या इसीलिये सम्भाली थी बागडोर, नारों से भले महका लो बगिया, आओगे फिर भी हमारी ओर। तुम खास, मैं आम, अब आम जनता की क्या बची है औकात, चैन की साँस कहाँ, अब तो साँस बचाने में ही साँसे फूल रहीं, तुम कहते सब ठीक, ये तो हुई वही बात, कि राजा ने कहा रात, मंत्री संतरी भी कह उठे रात, पर थी तो ये, सुबह-सुबह की बात। दर्द में डूबे दिल को दे दिलासा, समझनी है नम आंखों की भाषा, सब सहम कर बैठ जायेंगे, कौन रखेगा म...
‘दम्भ अपार’- पहेली बूझो तो जानें
कविता

‘दम्भ अपार’- पहेली बूझो तो जानें

अर्चना अनुपम जबलपुर मध्यप्रदेश ******************** पहेली का उत्तर आप नीचे दिए गए प्रतिक्रया कॉलम (कमेंट्स बॉक्स) में अवश्य दें ...🙏🏻 अनगढ़-मनबढ़ एक चलत गजराज करत हुड़दंग, दंभ से चूर उलीचत धूर मूढ़ बिरझात चिंघाड़त। शक्ति सम्पन्न देह नहीं धीर भरे घरमण्ड, कहत निज काज राज कै ख़ातिर क्रोध प्रचंड। उजाड़त बाग छांव जस बाँस-साँस भ्रम पाल, बनो महीपाल खींच जयमाल स्वयं मय स्वयं उघारत। समुझत पालनहार जिला कै धीश झुकावत शीश, डरे सब लोग बियाहत जोड़-तोड़ मण्डप से भागत। मूरख करत बखान है 'अनुपम' ज्ञान राज विपदा ना आवत, जे विवेक के हीन बौद्धि जिम बाज मीन से शान बतावत। लीलत पग झषराज खींच मुख फाड़ नक्र जस नाच नचावत, उतरत गर्व अपार क्षमा पुनि माँग हृदय तब नाथ पुकारत। गजराज-हाँथी.. झषराज, नक्र- मगर.. परिचय :- अर्चना पाण्डेय गौतम साहित्यिक उपनाम - अर्चना अनुपम "क्रान्ति" मूल निव...
हाय रे ये कोरोना
कविता

हाय रे ये कोरोना

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** कोई कहे ऐसा करोना, कोई कहे वैसा करो ना। कोई कहे यहाँ आओ ना, कोई कहे वहाँ जाओ ना। कोई कहे ये अब खाओ ना, कोई कहे ये आप पीओ ना। कवि कहे प्रकृति पर करे विश्वास, सभी लगाये प्रकृति से सम्पूर्ण आस। ये प्रकृतिक पेड़-पौधे है हमारी साँस, पेड़-पौधों पर आप सभी करे विश्वास। प्रकृति ही है सम्पूर्ण जीवन की आस, पीपल, अशोक, तुलसी से मिले साँस। पेड़-पौधे दे सबको आंक्सीजन मुफ्त, ये सम्पूर्ण शिष्टि के लिए होते उपयुक्त। ये जीवन यदि हम सभी को है बचना, हर एक को मात्र एक पौधा है लगाना। पेड़-पौधे को लगाने की ले जिम्मेदारी, तब जाकर जीवन बच पायेगी हमारी। चाहे कोई नर हो या कोई हो वो नारी, सभी ले मात्र एक पौधे की जिम्मेदरी। जिन्दगी को सभी करने चले बेहतर, पेड़-पौधे को काट बनाये अपना घर। अब सता रहा सबको जीवन का डर, चाहे वो गाँव हो या हो वो कोई शहर। चारों तरफ...
खरी खरी
कविता

खरी खरी

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कमी नही सफिनो की कमी नही कमीनो की लाशो पे कर रहे सौदे ऐसे शफाखानो की उखड़ती साँसे है नफा कमालो खूब इस दफा जिस्मो में पड़ेंगे कीड़े ऊपरवाला होगा खफा नेता तेरा भी उड़ेगा तोता आदमी नही रहेगा सोता ऊंची नीची देना बंद कर सभी को छोड़ा तूने रोता किस पर रखू भरोसा प्रभु तू ही भला भलासा दुर्जन कर रहे है तांडव कर मर्दन दे हमे दिलासा इंसान इंसान के काम आ समय समय पे काम आ आ मेरे रब अब तो आ बन रहीम आ बन राम आ परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान में पुलिस निरीक्षक के पद पर पीटीसी इंदौर में पदस्थ। सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर hindirakshak.com द्वारा हिंदी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित कर...
मोहब्बत ने सीखा दिया
कविता

मोहब्बत ने सीखा दिया

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** तेरी मोहब्बत ने मुझे, लिखना सीखा दिया। लोगों के मन को, पढ़ना सीखा दिया। बहुत कम होंगे जो मुझे, पढ़ने की कोशिश करते है। क्योंकि जमाने वालो ने तो, मुझे पागल बना दिया था। न धोका हमने खाया है, न धोका उसने दिया है। बस जिंदगी ने ही एक, नया खेल खेला है। जो न कह सकते है, और न सह सकते है। बस बची हुई जिंदगी को, जीने की कोशिश कर रहे है। और लोगों को मोहब्बत की परिभाषा समझा रहा हूँ।। चिराग जलाया करते थे, अंधेरों में रोशनी के लिए। तभी तो जिंदगी ने अब, अंधेरा कर दिया। देखकर रोशनी को, अब हम डर जाते है। की कही अंधेरों से भी, अब नाता न छूट जाये।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत श्री जैन शौक से लेखन में सक्रिय हैं और इनकी रचनाएं र...
अगर दिल में मेरे
कविता

अगर दिल में मेरे

प्रो. आर.एन. सिंह ‘साहिल’ जौनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** अगर दिल में मेरे चाहत का पारावार न होता मिलन का आप से सपना कभी साकार न होता हमें एक सूत्र में चुन चुन पिरोती भावनायें हैं वरन् उल्लास से पूरित कभी संसार न होता अभी भी जाति भाषा में उलझ जाती है ये दुनिया मज़हबी आग में रह रह धधक जाती है ये दुनिया अगर अनुचित उचित में फ़र्क़ हम सीखे हुए होते कोई शातिर हमारे शहर का सरदार न होता ज़माने को चराने की कभी जुर्रत नहीं करना छकाने के लिए उसको कोई हिकमत नही करना तुम्हें ये रौब रुतबा सम्पदा मुमकिन नहीं होती दुवाओं का तुम्हारे पास यदि भण्डार न होता अगर तुम आदमी हो आदमी सा काम भी करना किसी का दर्द बाँटों इस तरह का काम भी करना हमारे मन में भी पशुता पल्लवित हो गई होती अगर माता पिता सा साथ पहरेदार न होता तनिक परहित सदाशयता से रिश्ता जोड़ना सीखो ख़ुशी की राह मजलूमों के ख़ातिर खोलना ...
पेड़ लगाये… भविष्य संवारे
कविता

पेड़ लगाये… भविष्य संवारे

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** इंसान को कितना कौन समझाये समझकर भी अनजान बनता है । यदि प्रकृति को समझ जाये तो वह इंसान भगवान बनता है ।। बुद्धिमान होकर भी आदमी नासमझ और बेईमान बनता है । सभी प्राणियों में ही सिरमौर है वह मानव का आज पहचान बनता है ।। यदि प्रकृति को समझ ........ ..... कहते है वृक्ष आस है वृक्ष सांस है वृक्ष से कई औषधि बनता है । पेड़ लगाओ भविष्य संवारो वृक्ष से ही तो ऑक्सीजन बनता है।। यदि प्रकृति को समझ ......... ..... आओ मिलकर कर आज ही शपथ ले पर्यावरण संरक्षण का समझ बनता है। प्रकृति के तत्वों को आज जान ले पर्यावरण प्रेमी श्रवण बनता है ।। यदि प्रकृति को समझ ......... ..... परिचय :- धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू निवासी : भानपुरी, वि.खं. - गुरूर, पोस्ट- धनेली, जिला- बालोद छत्तीसगढ़ कार्यक्षेत्र : शिक्षक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हू...