ख़्वाहिशें जगने लगी
ऋषभ गुप्ता
तिबड़ी रोड गुरदासपुर (पंजाब)
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बूंदे बरसने लगी
ख़्वाहिशें जगने लगी
ठहरी-ठहरी सी ये जिंदगी
फिर से चलने लगी,
मौसम भी सुहाना हो गया
आसमान का दीवाना
ये राही हो गया
पहाड़ों की चोटियों पर
जब ठण्डी-ठण्डी
हवाएं चलने लगी
ठहरी-ठहरी सी ये जिंदगी
फिर से गुनगुनाने लगी,
ख्वाहिशों की मोमबत्तियां
कैसे बुझ जाती
एक हवा के झोंकें से
ठहरे हुए समंदर में भी
कश्ती चलने लगी,
बेड़ियों में बंधा ये परिंदा
आज़ाद हो गया
राहों पर खड़ी ख़्वाहिशें जब
ज़ोर से पुकारने लगी,
नया दौर नई दास्तां
आँखों में आशाएँ लिये
वही पुरानी ख्वाहिशों को
कलम की जुबानी ये
नज़्म सुनाने लगी
ठहरी-ठहरी सी ये ज़िंदगी
फिर से कदम बढ़ाने लगी
परिचय :- ऋषभ गुप्ता
निवासी : तिबड़ी रोड गुरदासपुर (पंजाबप्रदेश)
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित ...




















