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पद्य

हां मैं बेटी हूं
कविता

हां मैं बेटी हूं

मुस्कान कुमारी गोपालगंज (बिहार) ******************** हां मैं बेटी हूं जिससे ये दुनिया चलती है मुझसे है सभी को नफरत जिससे उनकी पीढ़ी चलती है। जब छोटी थी तो हर ख्वाब दिखाया गया थोड़ी सी बड़ी हुई तो हर ख्वाब अधूरा सा रह गया जब जिद्द की पूरा करने की तो घर में मुझे बिठाया गया अभी उलझने बहुत है किसी तरह जिंदगी चलती है हां मैं बेटी हूं जिससे ये दुनिया चलती है। पापा कहते समाज को देखकर चलना है मैंने कहा हमे ही तो समाज को बदलना है पापा ने कहा समाज को तुम नहीं समाज को देखकर तुम्हे बदलना है। मैंने कहा पापा मुझे कुछ करने दो पढ़ लिख कर कुछ बनने दो पापा ने कहा तुम बेटी हो रहने दो मैंने कहा पापा अभी रहने दो मुझे अभी रहना है सबकी निगाहों में पापा ने फिर वही कहा, तुम बेटी हो तुम्हे जाना है ससुराल में फिर मैं इस घर को छोड़ दूसरे घर को चलती हूं वहां प...
मां और पत्नी
कविता

मां और पत्नी

सुखप्रीत सिंह "सुखी" शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** ना कभी लिखा ना कभी लिख पाया है ना कभी लिखा ना कभी लिख पाया है तुम्हें मां से ज्यादा तो नहीं पर मां से कम भी नहीं पाया है ये बात सच है कि मां ने मेरी जिंदगी सवारी थी पर यह भी सच है कि तूने मेरी दुनिया सवारी है मुझे मां भी प्यारी थी मुझे तू भी प्यारी है हां मां ने मुझे चलना सिखाया था हां मां ने मुझे चलना सिखाया था और तूने साथ चलना सिखाया है सर पे मेरे तब मां का साया था अब साथ मेरे तेरा साया है ना कभी लिखा ना कभी पाया है मां मेरे खाने, पीने, पहनने का ख्याल रखती थी और तू भी मेरे खाने पीने और सोने जागने का ख्याल रखती है मां भी मेरी देर रात तक राह तकती थी तू भी मेरी देर रात तक राह तकती है मां ने मेरा परिचय मेरे पिता से करवाया था तूने मुझे पिता होने का गर्व कराया है औ...
मेरी महफिल में फिर आप…
ग़ज़ल

मेरी महफिल में फिर आप…

निरूपमा त्रिवेदी इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मेरी महफिल में फिर आप आ जाइए दर्द का गीत कोई सुना जाइये इस मुकद्दर का कुछ भी भरोसा नहीं आप खुद ही इसे आजमा जाइए इश्क मेरा समंदर की लहरों सा है डूब कर इसमें मुझको डूबा जाइये जब तलक आप मुझसे मिलोगे नहीं कुछ तसल्ली तो मुझको दिला जाइए मैं मोहब्बत का मारा मुसाफिर हूं अब रास्ता कुछ नया तो बता जाइए मुस्कुरा कर मुझे देखिए आप फिर आप मुझको गले से लगा जाइए प्यार के रास्ते तो कठिन है मगर सिलसिला ऐसा कुछ तो चला आ जाइए परिचय :-  निरूपमा त्रिवेदी निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित ...
मानवता केवल मानवता
कविता

मानवता केवल मानवता

डॉ. सत्यनारायण चौधरी "सत्या" जयपुर, (राजस्थान) ******************** जाति धर्म के क्यों पीछे है पड़ता इसमे केवल नेता ही जमता उसी को शोभित है दानवता मेरे लिए तो एक ही धर्म है... मानवता...केवल मानवता। अंत समय आता है तब नही रह पाती पशुता चाहे कहे लोग भला बुरा मुझे मुझको जो जचता वो मैं करता जिसके कर्मों में हो खोट वही किसी से है डरता मेरे लिए तो एक ही कर्म है मानवता...केवल मानवता। बहुत हुए ऋषि मुनि ज्ञाता लेकिन आज तक समझ न आया ये इन्सान कहाँ से आता और कहाँ है जाता ना मैं सोचूँ, ना मैं जानू, मेरे लिए तो एक ही मर्म है मानवता...केवल मानवता। अपना लो जो तुम सभी मानवता खत्म हो जाएगी दुनिया से दानवता कहते हैं हर घट-घट में है ईश्वर बसता मिट जाए सारे द्वंद फसाद जो अपना लें सभी मानवता। जो अपना लें सभी मानवता। मानवता...केवल मानवता।। परिचय :- डॉ....
मुझे अफसोस है
कविता

मुझे अफसोस है

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** अब ना जवानी ना जोश है, राक्षसों के प्रति नहीं रोष है, सच कहना खुद में दोष है, देख देख बड़ा अफसोस है। देशभक्त अनेकों मिलते थे, अब ना वो नेताजी बोस है, देशद्रोही जगत में अब बढ़े, इसका अधिक अफसोस है। अब नहीं रहे देश में बच्चे, मात, पिता, गुरु से डरते है, दर्द दे रहे दिन रात अब तो, इस पर अफसोस करते है। चरित्रवान मिलते थे बहुत, अब मिलता चरित्र दोष है, अत्याचार बढ़ा गली गली, मुझे इस पर अफसोस है। मेहनत एक नारा होता था, अब मेहनत ही एक दोष है, निठल्ले मिले हर गली गली, मुझको इस पर अफसोस है। मुफ्तखोर जगत में बढ़ गये, बढ़ता ही जाये यही दोष है, सुर बदल जाते हैं पलभर में, इसका तो मुझे अफसोस है। अत्याचार बढ़े महिला पर, समाज आज भी खामोश है, सदियां बीती कष्ट सहती है, इसका मुझको अफसोस है। पुस्तकों से र...
इंदौर लगाएगा स्वच्छता में पंच
कविता

इंदौर लगाएगा स्वच्छता में पंच

अरविन्द सिंह गौर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। स्वच्छ रहना अब तो एक इबादत हो गई है।। इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। स्वच्छता में पंच लगाने की शुरुआत हो गई है।। सब ने निभाई अपनी भूमिका अपना इंदौर हुआ स्वच्छ पूरे विश्व को यह कहने की आदत हो गई है।। इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। अरविंद कहे मैं भी हूं इंदौरी स्वच्छता में अब हमारी महारत हो गई है।। इंदौरीयो को स्वच्छता की आदत हो गई है।। परिचय :- अरविन्द सिंह गौर जन्म तिथि : १७ सितम्बर १९७९ निवासी : इंदौर (मध्यप्रदेश) लेखन विधा : कविता, शायरी व समसामयिक सम्प्रति : वाणिज्य कर इंदौर संभाग सहायक ग्रेड तीन के पद में कार्यरत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी ...
चिरैया की प्यास
कविता

चिरैया की प्यास

संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया भोपाल (मध्यप्रदेश) ******************** कैसो कलयुग आयो। मानव दुष्कर्म सजा। आज पक्षी भुगत रहा। नदी,ताल,तलैया,पोखर। धरातल पर हुए नष्ट। चिरैया स्व प्यास बुझाने। भटके दर-दर सूखे कंठ संग। अति प्यास से व्याकुल हो। नल की बंद टोंटी में इक। जल बूँद स्व मुख ले कंठ। तर करने की आस लिए। जुगत लगाने जुट कर। बारम्बार श्रम कर सोचे। कब मेरे मुख जल बूँद टपके। मेरो सूखो कंठ कब तर हो जाए। परिचय :- श्रीमती संगीता सूर्यप्रकाश मुरसेनिया निवासी : भोपाल (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेत...
मैं बहती नदी हूं
कविता

मैं बहती नदी हूं

अर्चना तिवारी वड़ोदरा (गुजरात) ******************** मैं बहती नदी हूं मुझे बहने दो न..... अपूर्णता ही मेरी पहचान है पहाड़ों से जल भर सागर तक मुझे बहने दो न..... पूर्ण होते ही रुक जाऊंगी कईयों की निर्भरता है मुझ पर उनकी तृष्णा बुझाने दो न .... पूर्ण होते ही सिमट जाऊंगी मुझे अपनी अपूर्णता पर मिलती खुशियां है..... हां कुछ कमियां है मुझ में पर यह कमियां मेरी पहचान बने ..... ये खुशियां बरकरार रहने दो न मैं बहती नदी हूं मुझे बहने दो न.... परिचय :- अर्चना तिवारी निवासी : वड़ोदरा (गुजरात) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवान...
बढ़ती आबादी
कविता

बढ़ती आबादी

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** बढ़ती आबादी देखकर धरा ये थर-थर कांप रही देखो-देखो आबादी ये तेज कितना भाग रही। सोच रही है धरा ये बात दुनिया क्यों न मान रही तेजी से बढ़ती आबादी को दुनिया क्यों न थाम रही। सोचो-सोचो कुछ तो सोचों तेजी से बढ़ती आबादी का कुछ तो हल खोजो। दिन ब दिन ऐसे ही आबादी जो बढ़ती जाएगी पेट भरने को दुनिया अन्न कहां उगाएगी जीवित रहने को ये प्राणवायु कहां से लाएगी। चेतो-चेतो अब तो चेतो नहीं देर बहुत हो जाएगी यही हाल रहा जो बढ़ती आबादी का स्वर्ग से सुंदर धरा ये मिट जाएगी। परिचय :- सुनील कुमार निवासी : ग्राम फुटहा कुआं, बहराइच,उत्तर-प्रदेश घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपन...
ईश्वर तेरे नाम पर
कविता

ईश्वर तेरे नाम पर

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** ईश्वर तेरे नाम पर, कितना व्यापार चलता है। सुख की आस में, हर इंसान दुःख के मझधार में पलता है। ईश्वर तेरे नाम पर, कितना व्यापार चलता है। कौन ......सुखी हैं? इस प्रश्न का उत्तर ही नहीं मिलता है। यह कौन-से कर्मों का फल है। जिसका लेखा-जोखा फलता है। ईश्वर तेरे नाम पर, कितना व्यापार चलता है। दुनिया भी तूने बनाई। इंसान भी तेरे सभी। फिर कहां से बुरे कर्मों की, पहेलियाँ तुमने घड़ी। हर इंसान जिंदगी भर नर्क की आग में जलता है। कहाँ..... कौन सा स्वर्ग है। जो दुख-दर्द मिटाने के लिए, सुख की झूठी आस पर चलचित्र -सा चलता है। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अप...
जनसंख्या नियंत्रण
कविता

जनसंख्या नियंत्रण

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** सुनो सुनाता हूँ देश की कहानी। जिस में सबसे बड़ी समस्या है जनसंख्या बृध्दि। जिसके कारण देश की व्यवस्था लड़ खड़ा जाती है। बचानी है अर्थ व्यवस्था तो जनसंख्या पर नियंत्रण करना पड़ेगा।। करो पालन परिवार नियोजन के तरीको का। और पहला बच्चा लोगो जल्दी नहीं। और दूसरे में अंतर रखो तीन साल का। इस मंत्रको अपनाओगें तो जनसंख्या पर नियंत्रण पाओगें।। जिस तरह से हुआ देश का विकास। रुक गई अकाल मृत्युएं इसे कहते है देश की प्रगति। पर इसके कारण ही बड़ गई देश की जनसंख्या बृध्दि। तो परिवार नियोजन को जीवन में अपनाना पड़ेगा।। साथ एक और सुझाव जनसंख्या नियंत्रण का है। करो निर्माण देश में एक शिक्षित समाज का। जो देश की प्रगति में भी अपनी भूमिका निभायेगा। और शिक्षित होने के कारण स्वयं इस पर नियंत्रण हो जायेगा।। परिचय...
आज के युवा और आज के वृद्ध
कविता

आज के युवा और आज के वृद्ध

डॉ. कोशी सिन्हा अलीगंज (लखनऊ) ******************** युवा सुबह में भी सोये हैं चादर तान पार्क में, वृद्धों की स्फूर्ति देख हूँ हैरान ।।१।। सुबह जागते जल्दी, लगाते दण्ड व बैठक ऊर्जा ओज दिखाते और लगाते ध्यान।।२।। जाग कर जगाते सबको, ललक दिखाते सारे कर्म झट करते, इनकी पुलक महान।।३।। सोकर आँख मलते, उठते घिसटाते बढते ब्रश मंजन करते ये, युवा हैं बड़े खिसियान।।४।। आलस में डूबे, उनींदे देख युवा को लगता युवा हो गये हैं बूढ़े और बूढ़े हुये हैं जवान।।५।। परिचय :- डॉ. कोशी सिन्हा पूरा नाम : डॉ. कौशलेश कुमारी सिन्हा निवासी : अलीगंज लखनऊ शिक्षा : एम.ए.,पी एच डी, बी.एड., स्नातक कक्षा और उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं में अध्यापन साहित्य सेवा : दूरदर्शन एवं आकाशवाणी में काव्य पाठ, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में गद्य, पद्य विधा में लेखन, प्रकाशित पुस्तक : "अस्माकं संस्कृति," (संस्कृत भा...
एक चिकित्सक की कहानी उनकी जुबानी
कविता

एक चिकित्सक की कहानी उनकी जुबानी

माधवी तारे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक मामूली सा डॉक्टर हूं बेशक कोई भगवान नही डॉक्टर का डॉक्टर होना मगर इतना भी आसान नहीं इस दर्जे की खातिर मैने बचपन खोया हैं मैं वो हूं जो एक एक मार्क्स को रोया हूं सुकून की जिंदगी को कुर्बान करता हैं डॉक्टर कभी किताब तो कभी, इमरजेंसी टेबल पे सोया है जाने कब होली बीती, जाने कब दिवाली गई जाने कितने रक्षाबंधन, मेरी कलाई खाली गई परीक्षाओं की लड़ी ने, नही छोड़ा साथ अब तक मेरे हजारों दिन खा गई उतनी ही राते काली गई फिर भी तुम्हे हर वक्त जो खुश दिखे परेशान नहीं उस डॉक्टर का डॉक्टर होना इतना भी आसान नहीं मैंने क्रिकेट का बैट छोड़ा, टीवी का रिमोट छोड़ा सफेद एप्रन की खातिर मैंने जैकेट कोट छोड़ा स्कूल का टॉपर मेडिकल में आने पर फेल होने से डरा हैं जब भी कोई शॉर्ट नोट छोड़ा मेरी कोई संडे नही छुट्टी की गुजारिश ...
कोहिनूर सी चमक है मेरी बेटी में।
कविता

कोहिनूर सी चमक है मेरी बेटी में।

गगन खरे क्षितिज कोदरिया मंहू (मध्य प्रदेश) ******************** कोहिनूर सी चमक है मेरी बेटी में की दर्पण भी देख आश्चर्य चकित हो जाता हैं। मन मेरा उसे देख व दिल मेरा ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो जाता हैं। मधुबन की बेला भी शर्मा जाती हैं। मौसम भी सुहाना होकर उसका अभिनन्दन करता है। प्रभाकर अपनी प्रभात किरणों से कोहिनूर सी अभा देकर उसे देख मुस्कुराती शबनम भी पीघल जाती हैं। अठखेलियां खेलती हवाओं और कोयल, मोर, पपीह भी झुमने लगते हैं। खुशहाली मन की मेरी नूरे नज़र कोहिनूर सी चमक मेरी बेटी हैं। दर्पण भी दैख आश्चर्य चकित हो जाता हैं तोहफा है, मेरे लिए वह कोहिनूर सा, दिल मेरा ख़ुशी से बाग़ बाग़ हो जाता हैं। परिचय :- गगन खरे क्षितिज निवासी : कोदरिया मंहू इन्दौर मध्य प्रदेश उम्र : ६६वर्ष शिक्षा : हायर सेकंडरी मध्य प्रदेश आर्ट से सम्प्रति : नर्मदा घाटी ...
सजल
कविता

सजल

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** वसुन्धरा के हर कोने में होता इसका मान है। कहीं नहीं दुनिया में अपने जैसा हिन्दुस्तान है। अखिल विश्व में भारत की महिलाओं का सम्मान है। महा पुरुष भी जो जन्मे होता उनका गुणगान है। नहीं युद्ध हो अब धरती पर सब मानव यह ठान लें सकल जगत में भारत ही ने छेड़ा यह अभियान है। सभी युगों में हमने अविरल रचा नया इतिहास शुभ जहाँ कहीं भी जाएँ अपने भारत की पहचान है। महा शक्तियों ने भी माना भारत के अवदान को गर्व हमारे अंतर में है अधरों पर मुस्कान है। बहुत हुई है अपनी भू पर गतिविधियाँ विज्ञान की, नहीं शत्रुओं को भारत की क्षमता का अनुमान है। 'रशीद' ऐसे यत्न करें हम देश अधिक बलवान हो, धरा हमारी प्रतिक्षण अपनी आन बान है शान है। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ...
तन्हाइयों देखकर
कविता

तन्हाइयों देखकर

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** तन्हाइयों देखकर जी ने वाले क्यों गिला करते हैं अपनों से मासूम तबस्सुम से आपके राजे दिल बयां होता है जुनून में बसे हुए का कोई इंतिहान भी लेता है क्या सोच लिया दिल ने खुदा इन्तिहाईहै कसमें वादेू से इंतिहान नहीं होते इंतिहान होते हैं दिलों जान से जुनून में बसी तस्वीर गर बदल दे तक़दीर तो मैं खुदा को भी दे दूं जा अपनी वक्त होता समा होता ना छोड़ते दामन बांध लेते साथ तकदीर कुछ न कुछ तजबिर कर परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के स...
बेखौफ परिंदा
कविता

बेखौफ परिंदा

अभिजीत आनंद बक्सर, (बिहार) ******************** मैं उन्मुक्त गगन का बेखौफ परिंदा हूँ, हौसलों, अरमानों, जज्बातों का पुलिंदा हूँ... कर्म को साक्षी मानकर कर लिया है प्रण, जीवन के संघर्षों से अनवरत रहेगा रण... स्वच्छंद उड़ान के सहारे आसमाँ तक जाना है, विपरित हवा के उड़कर मंजिल हमें पाना है... संघर्षों के महासमर में खड़े हुए हैं सब कुछ हारे, समाहित हैं कई उम्मीदें और शेष हैं सपने सारे... माना समीर तीव्र है फिर भी क्यूँ लौट जाऊँ मैं, समयचक्र की परिधि में उलझे सपने यूं ना छोड़ जाऊँ मैं... आपदा में अवसर तराशने को जिंदा हूँ, मैं उन्मुक्त गगन का बेखौफ परिंदा हूँ... परिचय :- अभिजीत आनंद आयु : २५ वर्ष निवासी : बक्सर, (बिहार) शिक्षा : स्नातक (आईटी)  घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय...
चाय पर चर्चा
कविता

चाय पर चर्चा

शैलेष कुमार कुचया कटनी (मध्य प्रदेश) ******************** शुरू चाय से बात करे, आओ सब आज बात करे। मित्र सारे चौराहे पर ठहरे, चाय के नाम से समय निकालें। गिले शिकवे मिटा देगी, अपनो से मिला देगी। चाय पर बुलाकर देखो, मित्र ढेरो बना देगी। ऑफिस की थकान सारी, एक कप चाय मिटा देगी। गर्मी, जाड़े, बरसात में, सदाबहार कहलाती चाय। रिश्ते की शुरुवात भी, एक कप चाय से होगी। कितने पेय बाजार में आये, चाय से टक्कर नही ले पाए। सुबह-सुबह आती है,याद, मन को बहुत भाती है,चाय। घूंट-घूंट का मजा लीजिये, दोस्तो के साथ पीकर देखिये। परिचय :-  शैलेष कुमार कुचया मूलनिवासी : कटनी (म,प्र) वर्तमान निवास : अम्बाह (मुरैना) प्रकाशन : मेरी रचनाएँ गहोई दर्पण ई पेपर ग्वालियर से प्रकाशित हो चुकी है। पद : टी,ए विधुत विभाग अम्बाह में पदस्थ शिक्षा : स्नातक भाषा : हिंदी, बुंदेली विशेष : स्व...
कितना खोखला हो जाता है इंसान
कविता

कितना खोखला हो जाता है इंसान

रिंकी कनोड़िया सदर बाजार दिल्ली ******************** कितना खोखला हो जाता है इंसान मुँह पर कुछ पीठ पीछे कुछ हो जाता है इंसान, कभी नफरत भरी याद तो कभी सुहाना पल हो जाता है इंसान, उम्मीदों से जुड़ा खिलौना बन जाता है तो कभी हार कर किस्मत से, रो कर सो जाता है इंसान कभी किसी शख्सियत को अपना वजूद बना लेता है... तो कभी सबका साथ छोड़ अकेला रह लेता है इंसान आखिर कितना बदलता रहता है इंसान? कभी संतुष्ट है निज सुख में कभी टटोलता रहता है हर सुख, दिल को भारी कर लेता है छोटी-छोटी बातों से सोच को बना लेता है निरंतर एक तूफान तो कभी भगा कौन है, क्या है और सब उलझा लेता है इंसान, आखिर कितना खोखला होता है इंसान? कभी इंसान ही इंसान का दुश्मन बन जाता है तो कभी दोस्ती में जान भी गवा देता है इंसान, हर पल बदलते भावों से लड़ता है तो कभी यादों को संजो चलता है इंसान, कभी सुख की चाह में अंतर...
श्री ईशावास्योपनिषद्
कविता

श्री ईशावास्योपनिषद्

निरुपमा मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** श्री ईशावास्योपनिषद् सरल काव्य प्रस्तुति ॐ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते. पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते... प्रणव पूर्ण है, सम्पूर्ण है, उनसे उत्पन्न जगत पूर्ण है। उद्भूत इकाई लेने पर भी, ईश्वर रहता परिपूर्ण है।। ..१.. ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्. तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विध्दनम् सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का जड़ चेतन, सब सम्पदा प्रभु आपकी। मानव भोगे जो हो नियति में, त्याग करे जो नहीं है उसकी।। ..२.. कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः. एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे निज कर्म हो उन्नत इस संसार में, शत वर्ष जीने की यही हो साधना। यदि देहधारी का पथ ईश हो, फिर नहीं बांधेगी फल की कामना।। ..३.. असूर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः. तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्...
नदी
कविता

नदी

प्रभा लोढ़ा मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** कल-कल ध्वनि की गूंज झर रही है मेरु पर्वत से श्वेत जलधारा । अरुणोदय की लालिमा ने रंग भर दिये उसमें। बलखाती लहराती ना जाने कहाँ जा रही है तेज वेग से चल कर आ मिली है धरा से।। हुई कई नामों से सुशोभित गंगा जमुना सरस्वती अपनी ही मौज में चली जा रही है कंकरीले पत्थरों को भी साथ ले उन्हें तराशती हुई तेज वेग से बह रही है एक ध्येय एक लक्ष्य राह की हर कठिनाई को पार करते हुए जा मिलने समुद्र से।। जीवन भी तो एक नदी है निरन्तर चलता रहता है अपने ही वेग से आँधी हो तुफान हो अच्छाई बुराई को साथ ले प्रभु मिलन की आस में चलता रहता है।। परिचय :- प्रभा लोढ़ा निवासी : मुंबई (महाराष्ट्र) आपके बारे में : आपको गद्य काव्य लेखन और पठन में रुचि बचपन से थी। आपने दिल्ली से बी.ए. मुम्बई से जैन फ़िलोसफी की परीक्षा पास की। आ...
दिल की गहराई
कविता

दिल की गहराई

राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** दिल की गहराइयों में तुम्हें छुपा रखा, अपने चेहरे की मुस्कराहट में तुमको जमा रखा है। सोचता हूं तुमको भूल जाऊं, मगर प्रकृति के कण-कण में फैली खुशबू में तुमको समा रखा है। सोचता हूं तुमको छोड़ दूं, मगर अंतर्मन की बिखरी सिमटी गहरी यादों में तुमको छुपा रखा है। सोचता हूं मैं काफ़िर हो जाऊं, मगर तेरी यादों की गहराई ने आज भी मुझे आशिक बनाए रखा। परिचय :- राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा स...
नेता बनाम नेतृत्व
कविता

नेता बनाम नेतृत्व

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** जैसे विद्या और विद्यार्थी का सहज सरल है रास्ता, विकास कदम ही व्यक्ति और व्यक्तित्व का वास्ता। शिक्षा संस्कार का प्रारंभिक दौर भ्रामकता दूर करे कथनी करनी का अंतर प्रयासों से ही पूर्ण करे वर्ष-दर-वर्ष व्यक्ति अपना व्यक्तित्व ही पालता। विकास कदम ही व्यक्ति और व्यक्तित्व का वास्ता। कर्म जगत में मानव अपना करम ही तो करता है निज कृतत्वों से समाज, संस्था चिन्हित करता है कृतत्व निहित नेतृत्व कला को समाज पहचानता विकास कदम ही व्यक्ति और व्यक्तित्व का वास्ता। संगठन और विधान परिभाषा बहुधा ही गुमनाम है नेतृत्व क्षमतावान और नेता कभी नहीं सह- नाव हैं नेता बनके इर्द-गिर्द बस चमचों को ही पालता, विकास कदम ही व्यक्ति और व्यक्तित्व का वास्ता। नेतृत्व गुण सिखलाये समान भाव नीतिगत निर्णय चाटुकार फ़ौज के दम से नेता निष्क्रिय और निर्भय...
आधुनिक जीवन में विज्ञान
कविता

आधुनिक जीवन में विज्ञान

सुनील कुमार बहराइच (उत्तर-प्रदेश) ******************** आधुनिक जीवन में विज्ञान कर रहा है बड़ा कमाल रोटी-कपड़ा या हो मकान हर जगह पहुंच गया विज्ञान। बना मोटरगाड़ी-रेल-विमान आवागमन कर दिया आसान शिक्षा-चिकित्सा और सुरक्षा सबमें है इसका योगदान आधुनिक जीवन में विज्ञान कर रहा है बड़ा कमाल। उन्नत कृषि उपकरणों ने कृषि कार्य किया आसान बड़े-बड़े कामों को भी पल भर में दे रहा अंजाम आधुनिक जीवन में विज्ञान कर रहा है बड़ा कमाल। विद्युतबल्ब-ट्यूबलाइट से रौशन हुआ जग- संसार रेडियो-टीवी और मोबाइल कराते हैं मनोरंजन अपार आधुनिक जीवन में विज्ञान कर रहा है बड़ा कमाल। टेलीफोन-मोबाइल ने बात-चीत किया आसान कंप्यूटर-लैपटॉप से निपटा रहा है अब काम आधुनिक जीवन में विज्ञान कर रहा है बड़ा कमाल। संदेश भेजना हुआ आसान फैला जब से अंतराजाल विज्ञान ने खोले उन्नति के द्वार चांद पर जा पहुंचा इं...
याद मेरी उसने जब
मुक्तक

याद मेरी उसने जब

सुखप्रीत सिंह "सुखी" शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** १) याद मेरी उसने जब भी दिल में पिरोई होगी दिन की तो बात ही नहीं रातों में न सोई होगी वो लिहाफ भी गवाह होगा उसकी बेबसी का जब दबा कर चेहरा अपना तकिये से रोई होगी २) जितना खूबसूरत तेरा इंतज़ार है उतना ही खूबसूरत मेरा प्यार है बहारें तो है हर तरफ फिज़ाओं में बहारों से भी खूबसूरत मेरा यार है ३) मेरे दिल में प्यार का पैगाम रहने दो उसके ख्यालों की हंसी शाम रहने दो दवा जिंदगी की मुझे और मत दो यारों मेरे हाथों में छलकता जा़म रहने दो ४) जिंदगी फिर क्यों अजीब सी लगती है किसी अजनबी के करीब सी लगती है अमीर तो बहुत हूं दिल-ऐ-दरबार से मैं फिर क्यों तेरे बिना गरीब सी लगती है परिचय :-  सुखप्रीत सिंह "सुखी" निवासी : शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, ...