हृदयहीनता की कामना
डॉ. उपासना दीक्षित
गाजियाबाद उ.प्र.
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काश! मैं
हृदयहीन हो जाऊँ ।
क्यों न मैं
हृदयहीन हो जाऊँ ।।
न हो मुझे किसी की
निष्ठुरता का अहसास
और न हो मुझे किसी की
आत्मीयता का आभास
किसी की मार्मिक
तकलीफों में
न हो शामिल
मेरा चेहरा
न देखूँ चिंता
ग्रस्त माथे की
लकीरों का डेरा
न सुनूँ किसी की
व्यथा का सफर
न हो द्रवित देख
टूटती बिजलियों
का कहर
मैं हर हलचल के प्रति
उदासीन हो जाऊँ
काश! मैं
हृदयहीन हो जाऊँ ।
क्यों न मैं
हृदयहीन हो जाऊँ ।।
संवेदना से परे
हो मुझमें
कठोरता का डेरा
मेरी प्रवृत्ति में बस जाए
गिरगिट का चेहरा
चुप रहूँ, न बोलूँ
देख मानवता पर चोट
जार-जार रोए कोई
सोचूँ, होगी आंसुओं में खोट
अनाचार की पराकाष्ठा पर
मूंद लूँ अपनी आँखें
प्रश्न न करूं चाहे घुट जाएं
किसी की साँसें
मैं अपने दायित्व के
प्रति भावशून्य हो जाऊँ
काश! मै...

























