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पद्य

कतरा-कतरा सागर का
कविता

कतरा-कतरा सागर का

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कतरा-कतरा सागर बनता, बूँद-बूँद में शक्ति समाई, छोटे-छोटे शुभ प्रयासों से जीवन ने मंज़िल पाई। हर अनुभव एक मोती बनकर मन की माला में जुड़ जाता, संघर्षों की हर छोटी लहर साहस का दीपक बन जाता। प्रेम, दया, करुणा के कतरे जब मानव-हृदय में खिलते हैं, सूखी धरती जैसे सावन पाकर हरियाली से मिलते हैं। ज्ञान की हर छोटी किरण अज्ञान का तम हर लेती है, सत्कर्मों की हर बूँद मिलकर जीवन-गंगा भर देती है। आओ हम भी कतरा-कतरा मानवता का सागर भर जाएँ, अपने शुभ कर्मों की लहरों से जग में प्रेम-सुगंध फैलाएँ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथ...
अन्नदाता
छंद

अन्नदाता

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** (विष्णुपद छ्न्द) जीवनांत तक अवनी पर का, श्रेष्ठ अन्नदाता । कठिन परिश्रम करते सबके, हो जीवन दाता। लहराता यह खेत तुम्हारा, जीवन दर्पण है। फसल खुशी से जो समाज को, की येअर्पण है।। सहचर आठों पहर प्रकृति का, बनकर रहते हो। तुम आँधी तूफ़ान झेलकर, संकट हरते हो।। परहित जीवन मंत्र तुम्हारा, सुख बरसाते हो। ठंड-धूप बारिश को सहकर, अन्न उगाते हो।। माथे पर की धूल कृषक की, पावन चंदन सी। धूल-स्वेद से सनी महकती, काया कंचन-सी। निर्मल मन से‌ भक्ति-भाव है, ईश्वर को अर्पित। कर्म किया निस्वार्थ भाव का, करते आप समर्पित।। सुख का कर बलिदान किया जगती का पालन है। कर्म तुम्हारा संन्यासी से ,बढ़कर पावन है।। भूमिपुत्र का साधु-तपस्वी से उत्तम तप है। करते आठों पहर कर्म हैं, जो प्रभु का जप है।। जियो और जीने दो का है, संस्कार ...
थोथे सारे वादे निकले …
गीत

थोथे सारे वादे निकले …

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** थोथे सारे वादे निकले, सच्चाई के लाले। आँखों बँधी लोभ की पट्टी, होते नित घोटाले।। उबड़-खाबड़ सड़क कोसती, व्यस्त सभी चौराहे। डामरीकरण का नाटक बस, होता जब जी चाहे।। मन में क्षोभ हज़ारों लेकिन, ख़ुद ही दुश्मन पाले। टौल-टैक्स भारी ले-लेकर भरते रोज़ ख़ज़ाने। सड़क सुधरती कागज़ पर ही, काम सभी मनमाने।। सच्चाई पर मौन भीष्म बन, काम करें सब काले। दुर्घटनाएँ होतीं प्रतिदिन, रोतीं हैं माताएँ। थोड़े दिन आन्दोलन होते, चक्रव्यूह रचनाएँ।। अन्धी नगरी चौपट राजा, बुनता रहता जाले। औरँगज़ेबी आदेशों से, दिल पर चले कुल्हाड़ी। गहरी चोट कुशासन देता, उलट-पुलट हर गाड़ी।। बस नीलामी आदर्शों की करते टोपी वाले। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सु...
आत्म-मंथन
कविता

आत्म-मंथन

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं-मैं में नहीं, मुझसे हूँ। हिम्मत नहीं है मुझमें फिर भी कहूँगी। समझ नहीं है मुझमें फिर भी लिखूँगी। अक्सर लोग निकाल देते हैं मेरे विचार को दिमाग से क्योंकि मैं-मैं में नहीं मुझसे हूँ। चाहती तो हूँ दुनिया से दूर रहना फिर सोचती हूँ मैं ही क्यों? क्यों कोई और नहीं? बस ऐसी ही बेतुकी-भरी ख़्वाहिशों में उलझी रहती हूँ। फिर मायूस होकर, गुमसुम-सी, मैं ख़ुद को ही अपने में समेट लेती हूँ। परिचय :- आरुषि शिक्षा : १२वीं कक्षा की छात्रा राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को ...
गुरुवर ऐ भगवान
दोहा

गुरुवर ऐ भगवान

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य का भान। करूँ शुक्रिया आपका, गुरुवर ऐ भगवान।। खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। करूँ शुक्रिया ज़िन्दगी, गुरु से जो नवरंग।। यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान। करूँ शुक्रिया तात हे!, है जीना आसान।। नहीं ज्ञान बिन चेतना, जीवन जाता हार। प्रभुवर करता शुक्रिया, पाया मैं उजियार।। गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण। सदा शुक्रिया ज्ञान का, जिससे रक्षित प्राण।। हर दुर्गुण को दूर कर, गुरुवर लाते शान। करूँ शुक्रिया सूर्य का, मिलती जिससे आन।। गुरुवर का नित शुक्रिया, जिनका पावन काम। जिनको समझो शिष्य तुम, पूरे चारों धाम।। गुरुजी की महिमा बहुत, करो शुक्रिया खूब। जो देते हैं ज्ञान को, गहराई में डूब।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंड...
जन्मदिवस
कविता

जन्मदिवस

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बढ़ता चला जा रहा हूँ के करीब, शनैः शनैः,अनवरत- आगे बढ़ने की प्रक्रिया जारी है सतत... दिन-ब-दिन कुछ खोते हुए, सबकी बधाइयाँ लेते हुए, काफी समय बाद जब देखता हूं पीछे मुड़कर, लगता है जैसे बचपन से बुढ़ापे में आ गया हूँ उड़कर। खेलकूद, शिक्षा, प्रेयसी, पत्नी, पुत्र और पुत्री- जीवन चलता रहा मानो एक ही सूत्र में बँधी कड़ी। मौके आए कई अच्छे पद के, पर आड़े आईं सीमाएँ मेरी औकात और सामाजिक स्थिति की- वही सरहदें जो हर कदम पर मुझे रोकती रहीं, तोड़ती रहीं। भरोसा दिलाने वाले अपने एक-एक कर मुकर गए, अपनी जिम्मेदारियों का बोझ मुझ पर छोड़कर उबर गए। फिर शुरू हुआ दौर संघर्ष का- चंद सिक्के कमाने का, और शिक्षा के विमर्श में खुद को बचाए रखने का। राहें गुज़रीं कठिन परिश्रम से, मैं दूर होता गया अप...
नदी किनारे
कविता

नदी किनारे

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहीं कोई मिलता है बिछुड जाने के लिए क्यों हुक सी उठती है, फिर मिलने के लिए। तमाम शब खोया रहा खयाल में उसके जैसें चांद खो जाता है घटाओं में जैसें न जाने कब तक रोती रही आंखें बेदर्द हाल मेरा देख, दिवारे भी शिकवे करने लगी उसके कहीं कोई बीता लम्हा, बीता अरसा सावन बीता, भादौ बीता चंचल किरणों संग पुनम बीती अंधियारी बीती रिती रिती। हर कोई था यहां सबका अपना नदी किनारे मैं ही था, सिर्फ प्यासा, प्यासा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियो...
हक और शक
कविता

हक और शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** एक धोबी की आवाज़ पर बिना जाँच पड़ताल घर से निकाला माता सीता को मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने न जाने कैसी ये मर्यादा थी राम की या फिर था पुरुषोचित मन का शक.... भरे दरबार में स्वयंबर की आड़ में परम ज्ञानी, अति बलशाली प्रतापी भीष्म ने तलवार की नोक पर अम्बे, अम्बिका और अम्बालिका तीनों को इच्छा के विरुद्ध उठा लिया.... शायद... मर्यादा की छाँव में रहा हो पुरुषोचित हक..... सभी परिवार प्रमुखों के समक्ष धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर ने द्यूत क्रीड़ा में स्व भार्या द्रोपदी को बिना उसकी मर्जी जाने लगा दिया दाव पर मन कहाँ समझ पाया कि स्वांग था मर्यादा का या फिर पांडवों का पुरुषोचित हक..... कौरवों के राज दरबार में नीति कुशल विदुर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म जैसे अजेय व्यक्तित्वों के साम...
मन का कुरुक्षेत्र
कविता

मन का कुरुक्षेत्र

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन के भीतर रोज ही, छिड़ता नया संग्राम। अर्जुन-सा संशय खड़ा, कृष्ण बने सतनाम॥ लोभ-मोह की सेनियाँ, घेरे चारों धाम। विवेक धनुष जब तान दे, मिट जाए अंधियाम॥ क्रोध दुर्योधन बन गया, अहंकारी बलवान। प्रेम-सुदर्शन घूमकर, करे उसे निष्प्राण॥ ईर्ष्या की गांधारियाँ, बाँधे मन के नेत्र। सत्य सूर्य जब उग पड़े, जगमग हो कुरुक्षेत्र॥ कामनाओं के चक्र में, उलझे जीवन-तंतु। संयम बन अभिमन्यु जब, तोड़े सारे बंधु॥ धैर्य भीष्म-सा अटल हो, श्रद्धा बने कवच। विपदा कितनी भी बढ़े, न डिगे मन का रथ॥ सद्गुण पांडव बन खड़े, दुर्गुण कौरव जान। जीत उसी की अंत में, जो रखे धर्म विधानl मन का कुरुक्षेत्र है, जीवन का विस्तार। जो खुद को ही जीत ले, उसका हो उद्धार॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध...
इंसान में भगवान समाए हैं
कविता

इंसान में भगवान समाए हैं

डॉ. रमेशचंद्र मालवीय इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हम मंदिर-मंदिर में भगवान ढूंढते हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम इधर-उधर ही भटकते रहते हैं अपनी ही उलझन में अटकते रहते हैं आशा और निराशाओं के झूले पर हम हर दिन-रात हीलटकते रहते हैं हम तीर्थ और धामों में घूम आए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। हम नहीं जानते कि भगवान कहां है हम नहीं जानते उनकी पहचान कहां है कहते हैं कि वो कण-कण में समाया है लेकिन उनकी धरती-आसमान कहां है हम उनको मूर्तियों में सजाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। आखिर भगवान को हम कब पहचानेंगे वो हृदय में बसे है ऐसा हम कब मानेंगे हर इंसान के हृदय में भगवान विराजे हैं इंसान में है भगवान उसे हम कब जानेंगे हम पत्थर में ही भगवान को पाए हैं लेकिन इंसान में भगवान समाए हैं। परिचय :- डॉ. रमेशचंद्र मालवीय निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषण...
मरुधरा रा मान-धणी
कविता

मरुधरा रा मान-धणी

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** (राजस्थानी भाषा) जेता-कूंपा री तलवार घणै, थर-थर कांपै बैरी सारा, मालदेव रा दाह्या-बायां, गूंज्या रण में जकां रा नारा। मारवाड़ री माटी रा वे, मान-बढावण हार, रण में जुंझार बण'र लाड्या, धरम रा राखां धार। चित्तौड़गढ़ रो ऊंचो धज, गौर-बादल री ओळखांण, रतन सिंह रा अंगरक्षक, राख्यो कुल-मर्यादा रो मांण। केसरिया बाना पेर'र वे, रण-खेत में कीनो प्रवेश, छाती ठोक'र मिटा दियो, दुश्मन रो अळगौ भेष। उदय सिंह रा ओजस्वी वे, जयमल-फत्ता अणखिला, चित्तौड़ री प्राचीर माथै, सावळ बण'र उभा खिला। धड़ लड्या अर शीश कड्या, पर पग पाचो नी दियो, वीरता री ओ मूंछ्याळी गाथा, इतिहास माथै लिख दियो। महोबा रा आन-बाण, आल्हा-ऊदल रो प्रताप, रण-भेरी बाज्या पछै, दुश्मन पावै घणो संताप। पृथ्वीराज सूं भिड्या रण में, ओ तो अजब खेल दिखाय...
जीवित रहने के मायने
कविता

जीवित रहने के मायने

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां देखा है मैंने लोगों को जीवित रहने के लिए करते हुए कवायद, दुआओं से लेकर अपने इष्ठों से करते खुशामद, धन, दौलत, जमीन, घर व बर्तन, सब बेच चाहते हैं रखना स्वस्थ अपना तन-मन, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारों के साथ ही लगाते रहते हैं इस डॉक्टर से उस डॉक्टर के घर आंगन के निश दिन चक्कर, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से डटकर, सिर्फ बेहतर स्वास्थ्य के लिए, इनके तन-मन की पीड़ा किया जा सकता है महसूस, नजर आते कोई प्रसन्न तो लगते दिखते कई तो नाखुश, क्या नहीं आता होगा उनके मन में अपनी इह लीला समाप्त कर लेने का ख्याल, संघर्ष कर उबरने का मौका देता कुदरत बेमिसाल, तो बताओ अरबों खरबों के इस अमूल्य तन को समाप्त कर लेने के लिए हम खुदकुशी जैसा वाहियात कदम उठाएं क्यों, अपनी आंतरिक शक्ति को ...
बरखा की बहार
गीत

बरखा की बहार

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** ताल-तलैयां रीत गए थे नदियाँ भी थीं सूखी। बुझा-बुझा मन रहता था और काया भी थी रूखी।। बरखा की बूँदों से पर अब, मिला खुशी का खत है। बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।। कंठ शुष्क थे,जी घुटता था, बेचैनी मुस्काती। सारा आलम व्यथित हुआ था, साँसें भी थम जाती हरियाली धरती पर बिखरी, लगता सुखद सतत है। बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।। स्वेद बहा करता था निशिदिन पर अब जल साथी है। आसमान से अमिय बरसता, हर शय अब गाती है।। मौसम तो मनभावन लगता, हर पल उल्लासित है बहुत दिनों के बाद सभी की, खिली-खिली तबियत है।। बूँदें लाईं नवल सँदेशे, अमन-चैन के मेले। बच्चे नाव चलाते जल में, लिए हर्ष के रेले।। जीवन को नवरूप मिला, कृषक हुआ आनंदित है। बहुत दिनों के बाद सभी की खिली-खिली तबियत है।। परिचय ...
वंचनाओं की झड़ी है
गीत

वंचनाओं की झड़ी है

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** वंचनाओं की झड़ी है, दूर पर अपना ठिकाना। ढूँढ़ता बेचैन मन है, गीत मनभावन सुहाना।। भोर उजली है नहीं अब, घोर तम हर ओर छाया। पीर किसको हम बताएँ बन कुहासा स्वार्थ आया।। रोज बनती तालियाँ तक, अब शिकारी का निशाना। घाट सब सूने पड़े हैं, शांत है चौपाल देखो। हिल रही बुनियाद सारी, आ गया भूचाल देखो।। नफ़रतों के गिद्ध घूमें, सोच कर पग को बढ़ाना। पश्चिमी आँधी चली है, हो रही निष्पात डाली। धूल में संस्कार सब हैं, तरो रहा बस बैठ माली।। आज वसुधा भी विकल है, देख नूतन यह जमाना। गाँव का सौन्दर्य फीका, शाख - पीपल रोज कटती। वृद्ध तुलसी काँपती है, भींत घर की रोज़ फटती।। आह भरता मन मयूरा, भूल कर जीवन तराना। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स...
स्त्री
कविता

स्त्री

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** सच में अगर हम कविता रचते स्त्री पर रचे वो प्रकृति का साक्षात् रूप होती कविता और स्त्री दोनों ही सृजन करती और दोनों के बिना तो यह धरती बंजर होने में देर नहीं लगती I कविता और स्त्री जगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखती और हम अभिभूत होते जाते जीवन चक्र की भाति। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, धार (मध्य प्रदेश) व्यवसाय : ड़ी एम (जल संसाधन विभाग) प्रकाशन : देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ व समाचार पत्रों में निरंतर पत्र और रचनाओं का प्रकाशन, प्रकाशित काव्य कृति "दरवाजे पर दस्तक", खट्टे मीठे रिश्ते उपन्यास कनाडा-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के ६५ रचनाकारों में लेखनीयता में सहभागिता सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी र...
भरोसा टूटे तो …
कविता

भरोसा टूटे तो …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* भरोसा टूटे तो एक दफ़ा फिर उठ खड़े होना साथी को बिना कोसे बिना कुछ कहे। दुनिया बहुत बड़ी है बहुत से लोग हैं, जो शायद तुम्हें ही ढूँढ़ रहे हों आशा के मोती एक बार फिर पिरो लेना और विश्वास की एक मज़बूत माला बना लेना। यह नितांत व्यक्तिगत है कि तुम फिर कभी किसी को न चाहो या अपना मन किसी और को सौंपने का साहस न कर सको लेकिन, यदि कभी लगे कि साथ की आवश्यकता है तो अपनी इस अनुभूति से लज्जित मत होना उसे आकार देना, एक और प्रतिमा गढ़ना जिसे 'प्रेम' कहा जाए जिसे 'साथ' पुकारा जाए जिसे फिर से खड़े हो जाने का पर्याय माना जा सके। एक बार स्वयं पर यह उपकार करना अपने नए सृजन पर गर्व करना कृतज्ञ रहना उस नए आदम के प्रति जो तुम्हारे अधरों की मुस्कान का कारण बना मन धीरे-धीरे रमेगा तुम थ...
बढ़ती जनसंख्या
कविता

बढ़ती जनसंख्या

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (११ जुलाई विश्व जनसंख्या दिवस) जनसंख्या में देश हमारा, विश्व में अव्वल होगा ! हम दो हमारे दो से इस समस्या का हल होगा !! बेटा-बेटी दोनों को समान शिक्षा व अधिकार दो हर परिवार का हो एक ही नारा हम दो हमारे दो !! बेटा की चाहत में अपने परिवार को ना बढ़ने दो शिक्षा, और संस्कार के लिए बच्चों को खूब पढ़ने दो !! भुखमरी और बेरोजगारी से लोगों की जान बचायेंगे ! छोटा परिवार के नारे को सच कर हम दिखायेंगे !! छोटा सा परिवार हमारा, खुशियाँ का आधार हैं ! मिल जुल कर हम रहते है यही हमारा प्यार है !! शिक्षा-दीक्षा देकर बच्चों को काबिल हम बनायेंगे ! अशिक्षा को दूर भगाकर, शिक्षा की अलख जगायेंगे !! बेटा-बेटी दोनों अच्छा उसमें ना तुम भेद करो ! बेटियाँ, बेटों से कम नहीं यह सच स्वीकार करो ...
किस बात का ग़ुरूर है
दोहा

किस बात का ग़ुरूर है

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) किस बात का ग़ुरूर है, चले न कोई साथ। सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।। ज़िंदग़ी एक वहम है, कर्मों का है खेल। सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।। कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल। बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।। डॉक्टर और वैद्य को, सब कहते हैं भगवान। कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।। हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात। सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।। आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर।। अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।। सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ। दुकान उसकी झूठ की, धन्था है मत रूठ।। भाग गया सलवार में, डर की ऐसी पीर। सबको योग सीखा रहा, कहता खुद को वीर।। फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद। बुज़दिल इतना मत बनो, सब...
भोले पंछी क़ैद किए सब
गीत

भोले पंछी क़ैद किए सब

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** भोले पंछी क़ैद किए सब, निर्मम हुआ शिकारी। पश्चिम की चलती आँधी में, पूनम रातें कारी।। गईं काल के मुँह निष्ठाएँ, चुप दर्शक भी सारे। अंतहीन पीड़ा मानव की, घूम रही मन मारे। प्रजातंत्र की बलिहारी है, सोते खद्दरधारी। रोज़ समस्या नई खड़ी है, हृदय करें नित क्रंदन। उल्टी चली हवाएँ सारी, मरता प्यासा मधुवन।। पत्थर ही पत्थर राहों में, तपती सड़कें सारी। रही बदलती नित्य नीतियाँ, लुटती है रजधानी। नारों का हर तरफ़ शोर है, करते सब मनमानी।। चौसर के खेलों पर अब भी, लगे दाँव पर नारी। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका स...
आसार
कविता

आसार

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मुझे नफ़रत ज़रा सोच समझ कर करना मोहब्बत होने के आसार होते हैं। मेरी बात औरों से ज़रा सोच समझ कर करना इश्क होने पर सब कुर्बान होते हैं। दिल की बात सोच समझ कर करना अपनों में भी कई गद्दार होते हैं। हमराही को हमसफर सोच समझकर बनाना धोखा मिलने के भी आसार होते हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाई...
सफलता की ओर
कविता

सफलता की ओर

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** विपदाओं से लड़कर, जय को तुम पा जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। विपदाएँ तो नित ही मंगलगान सुनाती हैं। संघर्षों के भावों को, वे रोज़ जगाती हैं। जीवन हो खुशहाल, यही सबकी है चाहत, जो डर जाता उसको ही,वे रोज़ सताती हैं। साहस से प्रियवर तुम तो पूरे भर जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।। आपदाएँ कहती हैं बल को लेकर बढ़ना। एक नई गाथा को लेकर खुशियाँ गढ़ना। कभी न पीछे क़दम हटाना,कर्म यही है, अंधकार में उजियारे का वंदन करना। उल्लासित होकर प्रियवर मंगल बरसाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। वरना कहते रह जाओगे, हाथ न कुछ आया। जो करना चाहा था, वो कर नहीं पाया।।...
मैं नहीं मासूम या भोला
कविता

मैं नहीं मासूम या भोला

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत कह मुझे सीधासाधा, भोला या मासूम, वक्त पड़े तो दिखा सकता हूँ अपना अनदेखा रौद्र रूप। कर लो जितनी मनमानियाँ करनी हैं, जो कर रहे हो, करते रहो, औरों के हिस्से छीनकर अपने महल सजाते रहो। मैं उस दिलासे में नहीं जीता कि ऊपर बैठा कोई देख रहा है, या कहीं छिपकर तुम्हारे कर्मों पर आँखें सेंक रहा है। जिस दिन मैंने देखना शुरू कर दिया, हिसाब लगाना शुरू कर दिया, उस दिन से उठ सकता है ऐसा सैलाब जो बड़े-बड़ों को बहा सकता है, सच, हकीकत और व्यवहार का आईना दिखा सकता है। मैं प्रारंभ से ही खोता आया हूँ जिसे तुमने सहेज रखा है डर, धमकी और दंभ के सहारे। मेरी चुप्पी मेरी कमजोरी नहीं, सहन करना कोई सीनाजोरी नहीं। जिस दिन अपने नुकसान की कीमत ठीक-ठीक आँक लूँगा, उखाड़ दूँगा तुम्हारी किस्मत और भाग्य की जड़ें। ...
ज्ञात नहीं
कविता

ज्ञात नहीं

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमें लगता है शायद घाटी से घहराते नीचे आते पाषाण का अवसान हो गया परन्तु नहीं पाषाण के जीवन का आरम्भ है, यह उपर घाटी पर निश्तेज, निरीह, निश्चल, निर्विकल्प सा पडा वह बदलते मौसम के झंझावातों से झुकता हुआं पडा था अपनी जगह बनाएं हुएं एक कूप मणडुक की भांति परन्तु अब उसका भविष्य उज्जवल है सोचता है वह, हां वह सोचता है शायद देवो में पूजा जाऊं या किसी राजा की पहचान का प्रहरी बन जाऊं पर, पर उसे यह ज्ञात नहीं वर्तमान में मानव कितना कठोर है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं...
घूंघट की आड़
कविता

घूंघट की आड़

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (श्रृंगार रस) घूंघट की आड़ में झुकीं वे मृगनयनी आँखें, लज्जा की चाँदनी में सजे अनगिनत मधुर सपने। पलकों की ओट में प्रेम का सागर लहराता, हर चितवन प्रियतम के मन में मधुर राग जगाता। सिंदूरी भोर-सा मुख, मुस्कानों का मधुमास, घूंघट की हर सिलवट में बसता जीवन का उल्लास। नयनों में नवजीवन के रंगीन चित्र सँवरे, हर धड़कन कहती- साथ रहें हम जन्मों-जन्म भरे। लाज से झुकी पलकें, अधरों पर मौन कहानी, मन में प्रीत के दीप जले, महकी जीवन-रानी। सपनों की डोली लेकर आई नव अनुरागिनी, स्नेह, समर्पण, विश्वास बनी घर-आँगन की रागिनी। घूंघट की आड़ नहीं, मन का अनुपम श्रृंगार, जहाँ प्रेम की भाषा बोले हर कोमल व्यवहार। जब उठे घूंघट की कोमल डोरी, मुस्काए सारा संसार, लज्जा, प्रेम और सौंदर्य मिल रच दें जीवन का मधुर त्योहार। परिचय :...
संविधान के आंसू
कविता

संविधान के आंसू

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** संविधान की परिभाषा ही जब नेता न अपना पाया संविधान की आत्मा को लहर लहर संसद में लहराया। अपहरण हुआ तब संविधान का जब मूलमंत्र 'समता' को दबा डाला दस वर्षों के आरक्षण, अल्पसंख्यक को वोटों का हथियार बना डाला। एक देश एक विधान से बना संविधान देश को तोड़ा जातिगत जनगणना ने कैसे 'समता' लागू हो कितना रक्षित है 'संविधान'? सत्तर वर्षों का आरक्षण भी गृहविहीन, भूखे प्यासे अधवसनों को भोजन पानी छत की छाया न दे पाया , न दे पाया नब्बे रखें जेब में अपने दस में निर्बल को बहलाया। लागू हो सब पर समान विधान इस धारणा से बना संविधान पर रिश्वत की लूट मची कहां आत्मा शपथ और निष्ठा की कहां बचा है संविधान??? भ्रष्टाचार विरोधी कानून कड़ा नही‌ कोई बनकर आया आतंकी, अधिवक्ताओं की सांठगांठ से गद्दार वकीलों के बल पर छो...