वो एक लमहा
शिवदत्त डोंगरे
पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश)
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वो एक लमहा
अब तक नहीं
पकड़ पाया मैं
जब बदल गयीं थी
दिशाएँ हमारी
गुज़रते वक्त से
बार-बार गुज़रकर
मैं अब भी ढूँढता हूँ वो पल
जो ले गया तुम्हें दूर मुझसे
न जाने वो क्या था
जो अदृश्य सा तैरता
रहा हमारे बीच
और जिसके रहते
तय न हो सके
फासले कभी !
वक्त का एक
बड़ा सा टुकडा
बेरहमी से भाग
रहा है हमारे बीच
कहते हैं कि
वक्त के साथ
सब बदल जाता है
मै देखना
चाहता हूँ तुम्हे भी
तुम्हारे बदले हुए रूप में
तो क्या अब
तुम नहीं पहनती
वो आसमानी
नीली साड़ी
जिसे देखते ही
मैं बन जाता था
उफनता
पागल सा सागर !
शायद अब तुम्हारी
डायरी के पन्ने
किसी और
रास्ते से गुजरकर
मुकम्मल होते होंगे
और शायद तुमने
अब मीठे की जगह
नमकीन खाना
भी सीख लिया होगा
शायद तुम
छोड़ चुके होंगे
मेरे न होते हुए भी
मु...



