शक
छत्र छाजेड़ “फक्कड़”
आनंद विहार (दिल्ली)
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बिना आग का
धुँआ होता है शक
दम तो घुटेगा ही
जब हो जाये मन धुँआ धुँआ
येे शक
कहते हैं होता है लाइलाज
बस उठता है
धुँआ ही धुँआ
जलती मनाग्नि में
घी का काम करता है
इन्सान का अपना अहम्.....
दायरे विशाल हैं
दुसरे तो सदैव ही रहते हैं
शक के दायरे में
कभी आ जाते हैं खुद
अपने ही शक के दायरे में
मगर कभी कोई पनप पाया है
इन शक के दायरों में....
वर्चस्व जहाँ हो शक का
प्रश्न ही कहाँ उठता है
किसी और के अधिकार या
फिर उसके हक का
बस
सुलगता रहता है धुँआ शक का...
सबसे कमजोर कड़ी होती है
इन्सानी जज्बात और प्यार
वहीं लटकी रहती है सदा
शक की सुई
सड़ांध लाशों की भी
रह जाती है दब कर
जहाँ उठती है महक शक की....
प्रताड़ित करते औरों को
पर स्वयं भी तिल तिल मरते हैं
जहाँ फैला हो दबदबा
बेरहम शक का
मिलती ...

















