Tuesday, October 20राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

BLOG

सतरंगी दुनिया- २३
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २३

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  जो लोग आपको नहीं समझते- उन्हें मत सममझाइए। समुंदर खारा है-खारा ही रहेगा, उसमें शक्कर मत मिलाइए। हम अक्सर खून की जांच करवाकर देखते हैं, कि शरीर में कैल्शियम और विटामिन घट तो नहीं रहे हैं। मेरे ख्याल से कभी ऐसे अपने व्यक्तित्व की भी जाँच करवा लेनी चाहिए। क्या पता दया, करुणा, मानवता, दोस्ती और इंसानियत भी घट रही हो। याद रखिए- तारीफ करने वाला आपकी स्थिति देखता है और परवाह करने वाला आपकी परिस्थिति देखता है। *भुट्टा बेचने वाला फूट-फूट कर रोया, जब एक एक मार्डन लड़‌की ने कहा- अंकल एक हैंडिल वाला पापकॉर्न देना।* हमारे साथ अक्सर वही लोग चलते हैं, जिन्हें हमसे फायदा नहीं बल्कि हमारी फिक्र होती है। १९९० में लड़कियाँ डरती थी कि सास कैसी मिलेगी ? २०२० में सास डर रही है, कि बहू कैसी मिलेगी ? देखिए अजीब संजोग कि जो लड़‌कियाँ १९९० ...
तलाक
कविता

तलाक

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रिश्तों में संवाद का दीप जब धीमे-धीमे बुझ जाता है, तब साथ रहते हुए भी मन का आँगन सूना रह जाता है। अहंकार की ऊँची दीवारें दिलों के बीच खड़ी हो जाती हैं, "मैं" की जिद में "हम" की डोर अक्सर टूट सी जाती है। विश्वास की नींव हिलते ही घरौंदा बिखरने लगता है, शंका का एक बीज भी जीवन को ज़हर करने लगता है। समय की कमी और व्यस्तता रिश्तों को दूर कर देती है, पास रहकर भी दूरी, जीवन को मजबूर कर देती है। अपेक्षाओं का बोझ जब हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तब प्रेम का कोमल पौधा भी मुरझा सा जाता है। धैर्य और सहनशीलता आज कम होती जा रही है, छोटी-छोटी बातों पर भी डोर टूटती जा रही है। (उपाय) यदि संवाद का दीप फिर से दोनों मिलकर जलाएं, तो बिखरे हुए रिश्ते भी मुस्कुराकर फिर जुड़ जाएं। (उपाय) अहंकार को त्याग कर यदि प्रेम को स्थान द...
एक, एक पल
कविता

एक, एक पल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक, एक दिन एक, एक पल शाम बितती है ज़िन्दगी यू हीं फिसलती जाती है जनाजे के किसी को करते हुए रुखसत ज़िन्दगी के अरमानों का गला घुटता है मचलते जज्बातों की मशाल धधकती है। धड़कनों के कहकहे सुनता है आफताब भी उन्हीं कहकहों में डुबता हैं सूरज कहीं मोहब्बत और प्यार से पालने वाले दिलदार न जाने कब, कैसे इस दुनिया से विदा हो गये। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप ...
राधा और द्वारिकाधीश संवाद
कविता

राधा और द्वारिकाधीश संवाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक दिन साथ विचरण करते राधा ने कृष्ण से पूछा, कैसे हो द्वारकाधीश कृष्ण आहत हुए सोचने लगे " राधा तो कान्हा कह कर पुकारती हैं फिर ये द्वारिकाधीश संबोधन क्यों. स्वयं को सम्भालते कृष्ण बोले आओ कुछ पल साथ बैठते हैं! कुछ मैं अपनी कहूँगा कुछ तुम अपनी सुनाना एक दूसरे के सुख दुःख बांटते हैं। कृष्ण बोले जब-जब तुम्हारी याद आइ आँखों से अश्रु बहते थे जीवन सूना सा था तुम्हारे बिन। राधा मुस्काई- तुम तो मेरे नैनो में बसे हो, मैं तो तुम्हें भूली ही कहां जो अश्रु बन बह जाने देती इन नैनो से तुमको। कृष्ण ने पूछा- हम तो सदैव से तुम्हारे कान्हा रहे हैं ये द्वारिकाधीश का संबोधन क्यूँ? राधा पुनः मुस्कराई बोली- जब तुम प्रेम से बंधे थे तो कान्हा थे, तुम्हारे हाथों में मधुर संगीत वाली बाँसुरी सुशोभित ...
उसने ख़ुद को लिखा
कविता

उसने ख़ुद को लिखा

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उसने ख़ुद को लिखा, रोटी बनाते- बनाते..... चौके में बिखरे आटेख़ुद से, और झट से मिटा दिया।। उसने ख़ुद को लिखा, कुर्सी-मेज दरवाज़े-खिड़की पे जमी धूल से.... और झट से मिटा दिया।। उसने ख़ुद को लिखा, समन्दर की रेत पे और देखा तेज़ बहाव को, मिटाते हुए उसका अस्तित्व, उसने भीगी पलकों में समेट लिया अपना लिखा।। उसने "जग" को लिखा, "जगदीश्वर" को..... शायद वह इक बेहतरीन लेखिका रही होगी न, झांककर खिड़की से बाहर... उसने ख़ुद को... कहां... कहां लिखा! पर ख़ुद को "कहां" लिखा...????? परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमान...
अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे
व्यंग्य

अगले जनम मोहे एनआरआई कीजे

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल का सबसे बड़ा अचीवमेंट क्या है? बस यही कि एनआरआई बन जाओ, या कोई एनआरआई दामाद घर ले आओ। मन में पहले कभी ऐसा कोई भाव नहीं था, पर पड़ोसी और रिश्तेदारों ने इतनी बार टोंट बाजी की कि मन में एक टीस-सी बस गई। हर तीसरे दिन कोई न कोई टोक देता, “यार, तुम एनआरआई क्यों नहीं बने? वहां डॉक्टरी में ज्यादा पैसा, ज्यादा ठाठ है !” कॉलेज के दिनों में देखा, कई साथी युएस एम्एलए की तैयारी ऐसे करते थे जैसे भारत की हवा से उन्हें अचानक एलर्जी हो गई हो। शरीर उनका भले यहाँ हो, पर आत्मा अमरीका-यूरोप की सड़कों पर ही टहलती रहती थी। शायद उनकी आत्मा को ग्रीन कार्ड पहले ही मिल चुका था। हमारी आत्मा जिद्दी निकली, इसे तो हमसे अलग होना ही नहीं था। हमने लाख मनाया, “जरा बाहर घूम आओ, कम से कम तुमको तो वीज़ा नहीं चाहिए।” आ...
भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर
आलेख

भोजशाला : केवल एक स्मारक नहीं, भारत की आत्मा का स्वर

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत केवल भूगोल का एक टुकड़ा नहीं है, यह हजारों वर्षों की संस्कृति, ज्ञान, साधना और अध्यात्म की जीवित चेतना है। इस चेतना को यदि कहीं मूर्त रूप में देखा जा सकता है, तो वह हमारी प्राचीन शिक्षण परंपराओं, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों में दिखाई देती है। मध्यप्रदेश की पावन धरती पर स्थित धार की भोजशाला भी ऐसी ही एक अमूल्य धरोहर है, जो केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, माँ सरस्वती की आराधना और राजा भोज के सांस्कृतिक वैभव की जीवंत गाथा है। मालवा की ऐतिहासिक नगरी धार सदियों से विद्या, कला और संस्कृति का केंद्र रही है। परमार वंश के महान प्रतापी राजा भोज ने इस भूमि को केवल शासन का केंद्र नहीं बनाया, बल्कि इसे ज्ञान की राजधानी के रूप में स्थापित किया। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि जिस प्रकार तक्षशिला औ...
बढ़ी है नफ़रत
ग़ज़ल

बढ़ी है नफ़रत

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** वज़्न- १२१२ २१२१ २१ बढ़ी है नफ़रत बढ़ें हैं शूल। खिला है जब से विषैला फूल।। ये ख़त्म कैसे हुआ है अम्न। कहाॅं पे हमसे हुई है भूल।। धुऑं बचा है बची है राख। बची न बस्ती बची है धूल।। गधे हैं ख़ुश सब यहाॅं पे आज। कि ढो रहे बोझ वो अमूल।। किया था झूठे ने वादा झूठ। थी उसकी बातें सभी फ़ुज़ूल।। जो कहते करते अच्छे लोग। गधों का कोई नहीं उसूल।। वफा के बदले जफ़ा निज़ाम। दिया है उसने मुझे ये मूल।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपन...
नींद से जागने के बाद
कविता

नींद से जागने के बाद

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ऊपर से नीचे तक कसीदे गढ़ रहे हैं, किसी को नहीं पता किस ओर बढ़ रहे हैं। राजा दिन को रात कह रहा है, और हम भी सिर झुकाकर वही कह रहे हैं। दिल, जिगर, शरीर छलनी पड़ा हुआ है, राजा का सैनिक हर घर में खड़ा हुआ है। जो कुछ भी घर में है, बस खाते जाओ, चरण-चाटन संग स्तुति-गान गाते जाओ। बर्बादी में भी बदलाव का नारा गूंज रहा है, डंका कब, कहाँ, कैसे बज रहा है- दुनिया सारा देख रहा है। झूठों के बाजार बड़े सजे हुए हैं, भोले-भाले खरीददार बीच फँसे हुए हैं। राशन तो लेना है, मगर कैसे लूँ? झोले में आभास भरा जा रहा है, बताओ-उसके पैसे कैसे दूँ? भविष्य के सुनहरे खयालों के सहारे, खाली पेट बच्चे ज़िंदगी कैसे गुज़ारें? अरमानों की पटरी पर धड़ाधड़ दौड़ रही रेल, किस वक्त में फँस गया हूँ मैं, क्या चल रहा यह खेल? ...
रहमदिल
लघुकथा

रहमदिल

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** अरे! अब इस बहरे को कैसे समझाऊँ कि कचरा ठीक से साफ करे। अजी सुनते हो! मैं परेशान हो गई हूँ। अपने बंगले में जरा ढंग के नौकर रखो। कहते-कहते थक गई हूँ। श्रीमती वर्मा झुँझलाकर वर्मा जी की ओर देखने लगीं, जो आराम से समाचार-पत्र पढ़ने में मग्न थे। “माली अपंग है, सफाई करने वाला गूंगा-बहरा। और रसोई वाली गंगा- जितना कहो, उतना ही काम करती है बस। देखो जी, आज ही इन सबको हटाओ और स्वस्थ, समझदार लोग रखो।” गुस्से में बड़बड़ाती हुई वे बाहर आ गईं। उन्होंने देखा, सभी कर्मचारी हाथ जोड़े खड़े थे। “रहम करो माताजी,” गंगा बोली, “बाबूजी हमारे लिए देवता हैं। उन्हीं की बदौलत हमारे घरों के चूल्हे जलते हैं।” तभी वर्मा जी धीरे से उठे और उन्होंने अपना दुर्घटना में क्षतिग्रस्त हाथ आगे बढ़ाया और मुस्कराकर बोले- माताजी, “समय कब किसे दूसरों के सहारे खड़ा कर दे, ...
रिटामटमेंट
लघुकथा

रिटामटमेंट

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  रामशरण जी कालेज में प्रोफेसर थे। स्वभाव के मस्त-मौला थे। अपने काम से मतलब रखते थे, अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा जागरूक रहते थे, इसलिए छात्रों में भी वे लोकप्रिय थे। समय बीतता गया, आखिर उनके रिटामटमेंट का समय भी आ गया। रिटायरमेन्ट के बाद उन्होंने एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया, जिसमें उनके प्रोफेसर साथी, कालेज का स्टॉफ, पूर्व छात्रों तथा अपने दोस्तों और रिश्तेदारों सभी को आमंत्रित किया। पार्टी आराम से चल रही थी। अचानक उनकी पत्नी शीला चक्कर खा कर गिर पड़ी। रंग में भंग पड़ गया गया। शीला जी को तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने जाँच करके कहा, "ये अब जिन्दा नहीं हैं।" खुशी का माहौल दु:ख में बदल गया। देखिए, प्रकृति का खेल-रामशरण जी कालेज से रिटायर हो गए और उनकी पत्नी इस दुनिया से रिटायर हो गयी। असली रिटामटमेंट किसका था, म...
माँ की ममता
कविता

माँ की ममता

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ तेरी ममता का, कैसे करूँ बखान। तेरे चरणों में बसा, मेरा सकल जहान।। जन्म दिया तूने मुझे, जीवन दिया महान।। अपने सपनों से रचा, मेरा उज्ज्वल मान।। मेरे हित हर श्वास में, तेरा रहा अनुराग। अपने सुख सब त्यागकर, रखा सदा ही ध्यान।। भोर हुई या रात हो, थकना तुझको नाय। मेरे उज्ज्वल भविष्य हेतु, दीप हृदय में जलाय।। शिक्षा मेरी हेतु तू, करती रही पुकार। ईश्वर से माँगा सदा, जीवन में उजियार।। मेरी छोटी भूल पर, डाँटा भी कई बार। किन्तु डाँट के बीच भी, बरसा माँ का प्यार।। मेरी पीड़ा देखकर, रोता तेरा मन। मेरे दुःख की आँच से, द्रवित हुआ जीवन।। चाह न थी वैभव की, न ऊँचा सम्मान। मैं जीवन में बढ़ सकूँ, बस यह तेरा अरमान।। जब तक तेरे शीश पर, आशीषों का हाथ। जीवन-पथ आसान था, मिला सदा विश्वास।। आज ...
जीवन का पड़ाव
कविता

जीवन का पड़ाव

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन के इन पन्नों पे लिखते हैं हम दासता? खुशी के पल लिखूं या ग़मों की दास्ताँ। बचपन के दिन थे नहीं बोझ नहीं ग़म कोई, हंसते-खेलते बीत गया नहीं बोझ था जीवन में। आगे बड़े किशोर अवस्था दबिश रहती अंकुश अपार नये जीवन की शुरुआत? "वयस्क की गिनती की शुरुआत" एक-एक कर आता जाता है दुनिया का झमेला, कुछ पल सुकून के ढूंढते है हम पर वक्त निकल जाता था। कभी शुभ यात्रा कर लेते थे मन में आता थोड़ा सुकून अच्छे लोग, अच्छे विचार, नया उत्साह, नई प्रभात। खूब मौज में बीते कुछ दिन पल, पर फिर आए वही डंडा-गुल्ली खड़े थे स्वागत में गमों को देने वाले? पूरा जीवन निकल गया सुख-दुख की परछाई में। यह कोई एक मन की बात नहीं यह सैकड़ो दिलों की कहानी है, थोड़ी कम थोड़ी ज्यादा यही जीवन की कहानी है। दुख तो हर पल खड़ा ...
ज़िन्दगी
कविता

ज़िन्दगी

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ज़िन्दगी के किसी कोने में धुआ भरा है जो कभी बाहर निकल कर घुटन, घबराहट में बदलकर मेरी छोटी ज़िन्दगी के कुछ दिन और कम कर जाता है और और मैं घुटकर रह जाती हूं मन मसोस कर चुप रहकर सब सहती हूं क्यों कि मैं जानती हूं कि जिंदगी का कोई कोना धुआं उगल सकता है मै फिर घुट जाउंगी। फिर भी जीवन जीती हूं इस जिंदगी को भोगने के लिए अपने भोग पुरे करने के लिए। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्...
बेटियां
कविता

बेटियां

आयुषी दाधीच भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** माँ का प्रश्न तो पिता का उत्तर होती हैं बेटियां, माँ की चाल तो पिता की उड़ान होती हैं बेटियां, माँ का स्वार्थ तो पिता का संतोष होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की चिंता तो पिता का प्यार होती हैं बेटियां, माँ की दुलारी तो पिता की परी होती हैं बेटियां, माँ की ममता तो पिता का अपनापन होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की सीख तो पिता की दिशा होती हैं बेटियां, माँ की गोद तो पिता की दुनिया होती हैं बेटियां, माँ की आस तो पिता का विश्वास होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की परछाई तो पिता का गर्व होती हैं बेटियां, माँ की हमदर्द तो पिता की दवा होती हैं बेटियां, माँ की अश्रुधारा तो पिता की धड़कन होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। परिचय :-  आयुषी दाधीच शि...
माता
कविता

माता

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** सुख देती बच्चों को माता। जग की देखो वही विधाता।। माँ ही जानो होती अम्बे। करे कृपा माता जगदम्बे।। स्वर्ग मिले चरणों में उसके। कर सेवा बच्चों जी भर के।। माता सीता माँ अनुसुइया मां जशुदा है माँ कौशल्या। आशीषों की है फुलवारी। बच्चों की करती रखवारी।। सद्गुण हमको मातु सिखाती। बच्चों को वह अमृत पिलाती।। मात हृदय को तुम न दुखाओ। बच्चों उसका साथ निभाओ।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन। प्रकाशित ...
मेरी पसंद
कविता

मेरी पसंद

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** माता दुर्गा की पूजा की श्री राम ने, वह तट पसंद है, माता सीता ने वनवास काटा, वह पंचवटी पसंद है। हनुमाना ने लंका की उजाड़ी, वह वाटिका पसंद है, राम-सीते का मिलन हुआ, वह वाटिका पसंद है। लव-कुश का जन्मोत्सव हुआ, वह आश्रम पसंद है, रामकृष्ण परमहंस ने ज्ञान दिया, वह आश्रम पसंद है। मीरा की भक्ति से पावन हुई, वह धरती पसंद है, कृष्ण ने गोपियों संग लीला की, वह धरती पसंद है। तुलसी ने रामचरित रची, वह गंगा तट पसंद है, श्रीराम ने जलसमाधि ली, वह सरयू घाट पसंद है। कपिश्वर लाए संजीवनी, वह पाषाण पसंद है, कृष्ण ने रक्षा हेतु उठाया, वह गोवर्धन पाषाण पसंद है। जिस रज पर जीवन संभव, वह धरती पसंद है, जिस रज पर मैं चरण रखूँ, वह अपनी धरती पसंद है। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" ...
श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं
आलेख

श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज- वह ज्वाला जिसे यातनाएँ भी बुझा न सकीं

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारतीय इतिहास का गगन अनेक वीरों की गाथाओं से आलोकित है, किंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल इतिहास का हिस्सा नहीं बनते, बल्कि राष्ट्र की आत्मा में सदैव जीवित रहते हैं। श्रीमंत छत्रपति संभाजी महाराज ऐसे ही एक अमर व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन साहस, स्वाभिमान, विद्वता और बलिदान का अद्वितीय संगम था। दुर्भाग्य से इतिहास के अनेक पन्नों में उनके व्यक्तित्व को उतनी व्यापकता नहीं मिली, जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। उनके जीवन को केवल युद्धों और बलिदान तक सीमित कर दिया गया, जबकि सत्य यह है कि संभाजी महाराज केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के प्रखर प्रहरी थे। आज जब समाज वैचारिक भ्रम, सांस्कृतिक विस्मृति और इतिहास की अधूरी व्याख्याओं से जूझ रहा है, तब संभाजी महाराज का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि राष्ट्र केवल तलवारों से नहीं...
जन सेवक- जनता
व्यंग्य

जन सेवक- जनता

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** हम जनता है, जन सेवक बनाना हमारा मौलिक अधिकार है ।जन सेवक बनने के लिए किसी को भी कोई विश्व विद्यालय की डिग्री की आवश्यकता नहीं है। जन सेवक बनने की शुरुआत अपने क्षेत्र मे छोटे-छोटे अपराधों जैसे कोई मारपीट या छेड़खानी आदि से शुरू कर सकते है। आप को कुछ माह की जेल भी हो सकती है लेकिन आपको कोई चिंता नहीं करनी चाहिये क्योंकि जेल मे रहकर वहाँ का अनुभव आप को आगे भी काम आयेगा। जेल मे रहने से आपकी पहचान पुलिस महकमे के साथ साथ बड़े अपराधियों से भी होगी जिससे आप को हौसला मिलेगा और आप आगे बढ़ेंगे। आप बड़े अपराध जेसे हप्ता वसूली शहर के बड़े लोगों को डराने, भू माफियाओं आदि के काम से आपका नाम अख़बारों मे व टीवी चैनलों के माध्यम से फेमस होगा। यदि आप लोगों की भावनाएं भड़का कर दंगा फसाद करवाते है तो इससे भी आप को कोई परेशानी नहीं होगी क्योंकि पुलिस आ...
लोहा ले लो शत्रु से …
दोहा

लोहा ले लो शत्रु से …

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** (भ्रमर दोहे) लोहा ले लो शत्रु से, जागो मेरे मीत। होगी तेरी जीत ही, त्यागो सारे भीत। त्यागो जिद्दी चाल को, मानो मेरी बात। छोड़ो सारी दुष्टता, देती जो आघात।। खाना खाओ शुद्ध ही, जो हो शाकाहार। हत्या जीवों की रुके, छोड़ो अत्याचार।। जीना सीखो शान से, गंदा धंधा छोड़। बेईमानी त्याग दो, नेकी से हो होड़।। आओ मेरे पास तू, सीखो प्रज्ञा गूढ़। दूँगा ऐसा ज्ञान मैं, मानो रे हे मूढ़।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 र...
मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया
संस्मरण

मेरी माँ ने ही मुझे कविता-प्रेम दिया

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मैं मध्यप्रदेश के गुना जिले (अब अशोकनगर) की चन्देरी तहसील के गाँव प्राणपुर का रहने वाला हूँ। छोटा-सा गाँव है। तब तो बहुत ही छोटा था।उन दिनों गाँव में भौतिक तरक्की तो बिल्कुल नहीं थी, पर प्रेम व अपनापन बहुत था। लोग बहुत ही हिल-मिलकर रहते थे। मेरे पिताजी शासन की राजस्व सेवा में थे, और माताजी गृहिणी थीं। हालांकि माताजी मात्र आठवीं तक ही पढ़ी थीं, पर उनकी नोलेज ज़बरदस्त थी। रामायण, महाभारत, वेद-पुराणों सबका उन्हें गहरा ज्ञान था। मुझे वे पौराणिक गाथाएँ व प्रसंग सुनाती रहती थीँ। उन्हें भजन व कविताएं भी बहुत सारी याद थीं। माँ ख़ुद भी कविताओं को गढ़ लेती थीं, और तुक मिलाकर मुझे सुनाया करती थीं। जिससे मेरा सहज ही कविता के प्रति अनुराग हो गया। माँ के निर्देश पर मैं रोज़ाना शाम को रामायण भी पढ़ता था, जिससे मुझे धर्म के प्रति अनु...
क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है
छंद

क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** (पीयूष वर्ष छ्न्द) २१२२ २१२२ २१२ पास जिसके माँ वही धनवान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। सृष्टि में माँ का सृजन अनमोल है। कष्ट हर लेता जननि का बोल है। सर्व सुख माँ के लिए संतान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। गोद में संसार भर का सुख मिला। स्नेह सिंचन से कली-सा मन खिला।। नित्य तन-मन से करें फिर सम्मान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। इस जगत की राह में सब शूल हैं। एक माँ की गोद में बस फ़ूल हैं। माँ खिलाती हाथ से पकवान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। शीश चरणों में झुकाया है जिसे। कष्ट जीवन में कहाँ फिर है इसे। तीर्थ का पावन वही गृह स्थान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। सर्व सुख संपत्ति की माँ नाव है। ग्रीष्म की दोपहर में वह छाँव है। माँ हमेशा चाहती उत्थान है। क्योंक...
मां शब्द की अभिव्यक्ति
कविता

मां शब्द की अभिव्यक्ति

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** मां शब्द की अभिव्यक्ति क्या करूं,1132 क्या लिखूं माँ पर कोई एक रचना! विधाता का श्रेष्ठ सृजन हमारे लिए, माँ के रूप में खुद आए हमारे लिए मां के दुलार बिन रह न पाया, हर जगह मौजूद मां का ही साया! कभी सोने न दिया भूखे पेट मुझे उठाकर नींद में, निवाला खिलाया।। मैं ईश्वर का नाम लूं न लूं दुआएं तेरी हमेशा लगती मुझे झोली में तेरी सदैव रहती मन्नतें, धागे बांधे न जाने कितने मेरे लिए।। लाख कोशिश कर लूं फिर भी, तेरा ऋण मैं उतार न पाऊंगी सलामत रहो बस मेरे लिए तुम तुम्हारी दुआओं से, यश पाऊंगी।। क्या लिखूं माँ तेरे लिए मैं शब्दों से तेरा ही दिया हुआ, ये जीवन हैं मेरा तुम्हारी स्वयं कि, मैं हूं एक रचना आज मां बनकर ही एहसास हुआ।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) ...
जीवन की पहचान
कविता

जीवन की पहचान

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** चित्र नही चरित्र बनाये, फोटो नही मुस्कान बढाये, द्वेष नही स्नेह बढाये, राग नही अनुराग बढाये। घृणा नही प्रेम बढाये, अपमान नही सम्मान बढाये, अकेला नही समूह बनाये, धोखा नही विश्वास बनाये। बेसहारो का सहारा बन जाये, बेरोजगारी नही रोजगार बढाये, माँ मातृभूमि, और जन्मभूमि का मान बढाये, जिसका खाये उसका गाऐ। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम्मानित ४. १५००+ कविताओं की रचना व भ...
सतरंगी दुनिया- २२
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- २२

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** *ज़िंदगी को ठंड और घमंड दोनों से बचाकर रखना चाहिए, क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों में आदमी अकड़ जाता है।* हम लोग घर के दरवाजे पर शुभ-लाभ लिखते हैं। केवल शुभ-लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा। शुभ विचार रखिए अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी, फिर लाभ ही लाभ होगा। भगवान ने हर इंसान को किसी वजह से बनाया है, इसलिए खुद को स्पेशल समझना शुरू कर दो। *वाणी और विचार ये दोनों प्रोडक्ट हमारी खुद की कम्पनी के हैं। इनकी क्वालिटी जितनी अच्छी रखेंगे, कीमत उतनी ही ज्यादा मिलेगी।* भिखारी भी कभी-कभी विशेष जवाब देकर सोचने को मजबूर कर देते हैं। एक व्यक्ति प्रतिदिन भिखारी को दस रुपए देता था। अचानक पिछले कुछ दिनों से उसने भिखारी को एक रूपया प्रतिदिन देना शुरू कर दिया। भिखारी ने कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया कि अब उसकी शादी हो गयी है। तब भिखारी न...