पृथ्वी दिवस
श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
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मात्र एक दिन
जिसको हमने
नाम दिया
"पृथ्वी दिवस"
पर क्या कोई
एक दिन पर्याप्त है
हमारी उस "माँ" के लिए,
जो हर पल, हमारी साँस में,
वायु, जल अन्न, बनकर
धड़कती है,
हमारे जीवन मे।
कभी थकती नहीं,
कभी हारती नहीं,
हम निरन्तर उसको
रौंदा करते हैं,
अद्भुत रंगों से
सजी धरती का
हम रक्त
बहाया करते हैं,
फिर भी वो हमे
देती ही जाती है
"जीवन"।।
इस माँ ने हमें
अनमोल उपहार दिए,
रंग-बिरंगे, वन-उपवन,
जीव-जंतु, पशु-पक्षी।
कुछ नादानी,
कुछ विकास की धुन...
हमने इन चीजों को नष्ट किया।
पर्वत-नदियां वन-उपवन
सबका सीना छलनी किया,
जीवों का संहार किया।।
माँ की छटपटाहट
को भी ना समझ सके,
हजारों बार वो चीखी
पहाड़ क्रोध से गरजे,
फिर भी हम इस "माँ" का
आँचल रक्तरंजित करते रहे।
धरती माँ का कर्ज है हम पर
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