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पद्य

अग्निवीर बन जाओ तुम
कविता

अग्निवीर बन जाओ तुम

प्रीतम कुमार साहू लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** उठो जागो और भागो तुम सुख,चैन को त्यागो तुम देशहित में मर मिटने को अग्निवीर बन जाओ तुम आपस मे लड़ने से बेहतर देश के काम आओ तुम देकर अपना खून देश को अग्निवीर बन जाओ तुम दुश्मनो से टक्कर लेने सीमा पर डट जाओ तुम दुश्मन को मार भगाकर अग्निवीर बन जाओ तुम देश की रक्षा करते करते दुश्मनो से लड़ते लड़ते देश का यश गाओ तुम अग्निवीर बन जाओ तुम परिचय :- प्रीतम कुमार साहू (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानिय...
भाई-बहनी के त्यौहार
आंचलिक बोली

भाई-बहनी के त्यौहार

परमानंद सिवना "परमा" बलौद (छत्तीसगढ) ******************** छत्तीसगढ़ी भाई-बहनी के त्यौहार हे, छाये खुशियों के बौछार हे, बड़े-छोटे के आशिस पाइस, इही हमर संस्कृति अउ संस्कार ये.! छोटे से धागा जेमा बहनी के मया भराय हे, वहीं धागा के मान रखे भाई, बहनी के रक्षा जीवन भर करें.! भाई के मया बहनी बर जीवन भर रथे, रक्षाबंधन, तीजा-पोरा, बहनी भाई बर उपवास रथे.! रक्षाबंधन परिवारीक त्यौहार ये, नन्हे हो या बड़े सब्बो बर एक समान ये, बहनी बर भाई अउ परिवार के मया ही ओकर बर उपहार ये.! जतका अपन बहनी ला इज्जत सम्मान देथो, उतका दुसर के बहनी ला भी इज्जत करबे ते, होही समाज राष्ट्र के उत्थान हे.!! परिचय :- परमानंद सिवना "परमा" निवासी : मडियाकट्टा डौन्डी लोहारा जिला- बालोद (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं म...
घर-घर तिरंगा
कविता

घर-घर तिरंगा

किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया (महाराष्ट्र) ******************** आई घर-घर तिरंगा मिशन बढ़े चलो की घड़ी आई घर-घर तिरंगा मिशन बढ़े चलो की घड़ी ७५ वें अमृत महोत्सव की मज़बूत कड़ी अगले २५ वर्षों की नई यात्रा की झड़ी समझो आत्मनिर्भर भारत की यात्रा आगे बढ़ी आई विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊंचा रहे हमारा की झड़ी जय-जय भारत देश हमारा जय-जय भारत देश नारे से युवाओं की फौज खड़ी आत्मनिर्भर भारत ज़रूर बनेगा जब लगेगी ऐसी श्रृंखलाओं की लड़ी हुनर हाट लोकल फॉर वोकल बेस्ट फ्रॉम वेस्ट की लगेगी झड़ी युवाओं बुजुर्गों महिलाओं की जुड़ेगी कड़ी कौछलता का विकास होगा कार्यबल शक्ति होगी भारत की बड़ी रोज़गार की उमड़ेगी झड़ी स्वप्न साकार होंगे स्वावलंबन के खुशियों की जल्द आएगी वह घड़ी हर नागरिक को कारीगर के हौसले को जबरदस्त देनी होगी प्रोत्साहन की झड़ी हर नागरिक को स्थानीय के ...
राखी का धागा
कविता

राखी का धागा

डॉ. कोशी सिन्हा अलीगंज (लखनऊ) ******************** राखी धागा है शुभ्र स्नेह का निश्छल, निर्मल, निष्कलुष नेह का भोले बचपन की मोहक स्मृतियों का भोलेपन की नोंकझोंक भरी विसंगतियों का लड़ झगड़ कर मनाने का अपना हिस्सा बाँटने का सीखने व सिखाने का अनूठा बंधन है प्यार का तोड़े से टूटे नहीं, ऐसे प्यार का रचा बसा है इसमें अपनापन अन्तरंगता का अनोखापन। थाल सजा कर लाई बहना बाँधेगी आज राखी बहना अपने भाइयों की कलाइयों पर सृजेता की सूक्ष्म कलाइयों पर प्राणवन्त तुलसी की कलाइयों पर देश के प्रहरियों की कलाइयों पर राष्ट्र के सीमा रक्षकों की कलाइयों पर, देश के कर्णधारों की कलाइयों पर बहनों का रक्षा-सूत्र शुभ्र दिव्य उज्ज्वल परम पवित्र बने भंडार अजस्र शक्ति का ज्ञान चरित्र की महा युक्ति का सत्व गुणों के महा उत्थान का देश-प्रेम के महा प्रमाण का शुभ्र, शुभ-शुभ कल्याण का...
एक कप समय
कविता

एक कप समय

प्रीति धामा दिल्ली ******************** एक कप का समय बस एक गरमा गरम प्याली का ख़्याल आया, उस वक़्त क्या-क्या किया ये सवाल आया। जैसे ही चाय प्याली में उड़ेली गई, प्याली ने भी लब खोल ठिठोली की, आधी चाय फर्श पे, तो आधी प्याली सँभाली गई। जब धीरे-धीरे प्याली से निकल रहीं थी भाँपें, उन भाँपों में बनने लगे, कुछ अक्स, कुछ सपने और कुछ तस्वीरें, जो लगने लगी थी प्यारी, लेकिन निरीह थी कल्पना सारी। धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी चाय, और उसे पीने की जद्दोजहद में मैं, सुध-बुध भूल बुन रही कुछ सपने, कुछ किस्से, अब बस आखिरी घूँट बाकी थी, या यूं कहें मेरी कल्पनायें जो टूटने की आदी थी। लो अब आ गया बिल्कुल पास, वो समय था, लो हो गई आखिरी घूँट भी ख़त्म, सोचने, बोलने की बस रुकी वहीं वो उधेड़बुन, उस थोड़े से समय में, ज्यादा कुछ हुआ नहीं, हक़ीक़त ज्यों की त्यों रह गयी, बस मेर...
रक्षाबंधन
कविता

रक्षाबंधन

हितेंद्र कुमार वैष्णव सांडिया, पाली (राजस्थान) ******************** सबके अधरों पर प्यारी सी मुस्कान लाया भाई बहन का त्यौहार "रक्षाबंधन" आया होता मन हर्षित "रक्षाबंधन" पर जब बहन आती हैं हमारे घर यह शुभदिवस हैं "रक्षाबंधन" का "रक्षाबंधन" नहीं त्यौहार मात्र धागों का "रक्षाबंधन" हैं कर्म, रक्षा और वचन का "रक्षाबंधन" हैं प्रतीक अटूट और निश्छल प्रेम का निस्वार्थ प्रेम का पाठ "रक्षाबंधन" सिखाता है। करनी सबको बहनो की रक्षा यह हमे बताता है। रक्षासूत्र बांधकर भाई की कलाई पर कहती भाई रक्षा करना मेरी ज़िंदगी भर वचन और अनमोल उपहार मिलते भाई से बहन शुभकामना करती निस्वार्थ भाव से परिचय :- हितेंद्र कुमार वैष्णव शिक्षा : बी.ए सम्प्रति : एसईओ, इंटरनेट मार्केटिंग मैनेजर निवासी : ग्राम - सांडिया, जिला : पाली (राजस्थान) विधा : कविता सर्जन शपथ : मेरे द्वारा यह प्रमाणित...
गाड़ियां लौहार
कविता

गाड़ियां लौहार

निहाल सिंह झुन्झुनू (राजस्थान) ******************** पीटता रहता है लौह को दिन भर बिना रूके बिना थके ताकि अपने बच्चों के लिए रोटी का जुगाड़ कर सके स्वयं बुढ्ढी चमड़ी से उतार फेकता है वो पसीने को और बाॅंध लेता है गठरी में अनगिनत दु:ख के सम्रग पलो को मैला कदम कमीज़ जिसके अंत में सिलवटें पड़ी हुई इक धोती की टुकड़ी वो भी तले से पूरी फट्टी हुई तपती सड़क पर गॉंव-गॉंव ढाणी- ढाणी पैदल चलकर सायंकाल को वापस आता है चिमटा, फूकनी बेचकर चिल मिलाती धूॅंप की टुकड़ी बुढ्ढी देह को जलाती है पथरीली राह नंगे पॉंव में कंकर कोई चुभाती है थकी पुरानी ऑंखों से वो नित ही देखता है स्वप्न नये ताकि उसके बच्चें अति पढ़े बड़े होकर के अफसर बने परिचय : निहाल सिंह निवासी : झुन्झुनू (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक ह...
ज्ञानमणि
कविता

ज्ञानमणि

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** कोई बन सपेरा नचा रहा है मुझे? अपनी बीन के सुमधुर धुन पर। लहराकर, झूमकर नाच रहा हूं, जादुई आवाज को सुन-सुन कर।। मेरे चारों ओर फैलाया मंत्र जाल, मुझे कोड़ा से पीट रहा है प्रेत दूत। तू ही रास्ता दिखाता है विश्व को, निकालो मस्तक से जो है अद्भुत।। मेरे पास है दिव्यमान ज्ञानमणि, जन मन को करता है प्रकाशित। छीनकर मुझसे ले जाएगा वंचक, जिसे दिया था गुरुदेव कर्मातीत।। फिर क्या रह जाएगा जीवन में ? इसे खोने के बाद तमस-ही-तमस। बन अंधा टकराऊंगा शिलाओं पर, सिर पटक करूंगा आत्म सर्वनाश।। कोई छीन नहीं सकता मेरी प्रतिभा ? बदलूंगा अपना रूप,मैं हूं इच्छाधारी। कर्म करके प्रभु से मिला है वरदान, जय आशीष दिया है भोले भंडारी।। परिचय : अशोक कुमार यादव निवासी : मुंगेली, (छत्तीसगढ़) संप्राप्ति : सहायक शिक्षक सम्मान : मुख्यमंत्र...
वर्षा का उत्सव
कविता

वर्षा का उत्सव

विवेक नीमा देवास (मध्य प्रदेश) ******************** ऋतु सुहानी सावन की चली पवन मनभावन सी श्यामल मेघा देखो छाए अमृत रूपी वृष्टि लाए।। चपला की है चमक निराली हलधर की आई है दिवाली ताल, तलैया नदी और सागर भर जाएगी अब सबकी गागर।। नाच रहे हैं मोर मुदित हो दादुर भी टर्राये क्षुधित हो कूके पपीहा, कोयल काली झूले पड़ गए अंबुआ की डाली।। रूप धरा का निखर उठा है हरित वर्ण-सा बिखर उठा है वर्षा का उत्सव आया है धन-धान्य खुशियाँ लाया है।। परिचय : विवेक नीमा निवासी : देवास (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी कॉम, बी.ए, एम ए (जनसंचार), एम.ए. (हिंदी साहित्य), पी.जी.डी.एफ.एम घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रका...
पद्मासना
स्तुति

पद्मासना

उषाकिरण निर्मलकर करेली, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** आराधना करूँ, देवी पद्मासना। मैं उपासना करूँ, देवी पद्मासना। मेरे अधरों में , सुर बनके बैठो हे माँ, स्वर साधना करूँ, देवी पद्मासना। आराधना करूँ .... स्वर की देवी कहूँ, सुरपूजिता हो तुम। धवल वसन धारिणी, परमपुनिता हो तुम। तान वीणा की जैसे, सुरसरिता बहे, तेरी वंदना करूँ, देवी हंसासना। आराधना करूँ .... वाग्देवी, रमा तू वारिजासना। सुरवन्दिता तू ही, माँ पद्मलोचना। ध्यान तेरा धरूँ, माँ ध्यान मेरा रखो, मैं प्रार्थना करूँ, देवी श्वेतासना। आराधना करूँ .... वाणी, संगीत हो, भाषा वेदों की तुम। अज्ञानी हूँ मैं, माँ ज्ञान दे दोगी तुम। अब तो विनती मेरी भी स्वीकारो हे माँ, जिस भावना कहूँ, देवी पद्मासना। आराधना करूं .... परिचय :- उषाकिरण निर्मलकर निवासी : करेली जिला- धमतरी (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्र...
संवेदन संदूक
दोहा

संवेदन संदूक

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** हुई रिक्त इंसान की, संवेदन संदूक। हर हमीद ने हाथ अब, थाम रखी बंदूक।।१ उर में रखे सँभालकर, नफरत वाले बीज। तभी परस्पर खून से, तर हो रही कमीज।।२ भाईचारे की नसें, काट रहे हम रोज। समरसता उन्माद में, कौन सका है खोज।।३ अलगू जुम्मन नित्य ही, करते वाद-विवाद। अब जख्मी सद्भाव से, रिसने लगा मवाद।।४ जहर फसल पर सींचकर, किया प्रदूषित खेत। बचा न कोई गीत अब, गाये हम समवेत।।५ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु...
मन दर्पण
कविता

मन दर्पण

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मना दर्पण सुना है, हिलती पत्ती के नोको सा शून्य आकाश सा सूनापन खलता है संध्या का सावन का बिन कौंधी बिजली का रिते चक्षुओ में प्रतीक्षा का सूनापन खलता है द्वार देहरी का क्योंकि दहरी पर पायल की झंकार नहीं। सूनापन खलता है वृक्षों का पतझड़ में उसके साथी परण साथ नहीं लहरें भी सूनापन दिए उदास है क्यों, क्योंकि बयार नहीं बहती। जब श्रृग पर वृक्ष नहीं होते तुंग श्रृंग सूनेे लगते हैं।। नीर भरी कारी बदरी को सूनापन खलता है जब ठंडी बयार नहीं बहती रवि शशि भी मौन, सूनेे होते हैं।। जब उन्हें ग्रहण लगता है।। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते ...
अमर प्रेमचंद
कविता

अमर प्रेमचंद

डॉ. निरुपमा नागर इंदौर (मध्यप्रदेश) ******************** हो चाहे नाटक, या, हो कथा संसार कलम के जादूगर ने समृद्ध किया हिंदी का संसार उपन्यास का अनमोल खजाना देकर बने उपन्यास सम्राट् कर्म पथ पर चलते-चलते हर विधा से किए दो-दो हाथ सुधारवाद का साहित्य रच-रच यथार्थवाद का परचम लहरा दे दी कितनी ही सीखों की सौगात "सौत" से "कफ़न" तक सफ़र किया आदर्शों के संग संग मुंशी थे वे, सिखा गये जीवन जीने का हिसाब दया, करुणा के धनपत प्रेम संदेश दे कर बने अमर प्रेमचंद परिचय :- डॉ. निरुपमा नागर निवास : इंदौर (मध्यप्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं,...
बरचस्व
कविता

बरचस्व

अमरीश कुमार उपाध्याय रीवा (मध्य प्रदेश) ******************** बरचस्व नीव जब खोता है गगन बिम्ब पर होता है, सतलुज सागर में जाते ही आदम सा हो जाता है, इस तरह ब्रम्हा ज्ञाता अपने चरम अंत तक आता है, कल की घोर गर्जना पर वो क्षितिज शून्य तक जाता है, भुज बाहु दमन करने को मानुष जग में मंडराता है, कर बाहु प्रखर दम भरता है विध्वंस राह पर बढ़ता है मैं हूँ...हूँ...हूँ...... कर गर्जन तीव्र बाहु प्रबल दिखलाता है, दम भरता, करता नित नये काम हरता विधता के रोज प्राण...। परिचय :- अमरीश कुमार उपाध्याय पिता : श्री सुरेन्द्र प्रसाद उपाध्याय माता : श्रीमती चंद्रशीला उपाध्याय जन्म तिथि : १६/०१/१९९५ निवासी : रीवा (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए. हिंदी साहित्य, डी.सी.ए. कम्प्यूटर, पीएच.डी. अध्ययनरत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी ...
योगेश्वर श्रीकृष्ण
स्तुति

योगेश्वर श्रीकृष्ण

निरुपमा मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** हे परम ब्रह्म श्री कृष्ण! गोलोक त्याग धरा पर आए; जगत कल्याण हेतु, असुर विनाश हेतु, ज्ञान भक्ति कर्म का मार्ग दिखाने, एवं धर्म संस्थापना हेतु। अवतरित हुए तुम, कारागार के बंधन में; फिर अशेष संघर्ष यात्रा, कंटकपूर्ण रहा हर पग; और आसुरी शक्तियों का आतंक, जिससे आर्तनाद कर उठा जग। बाधाओं का अतिक्रमण कर, हे कृष्ण! सफल योद्धा बन तुम, जीत गए हर युद्ध, जाना विश्व ने तुम्हें अपराजेय, प्रबुद्ध। प्रेम की कोमलता तथा उसकी शक्ति को, कण-कण में फैलाकर, प्रेम भाव से सराबोर संसार किया; प्रेम के शाश्वत तत्व को, मानव मन का आधार दिया। ब्रह्म और जीव की एकात्मता को, राधा संग रास रचाकर, कण-कण में विस्तार दिया। सोलह कला संपूर्ण तुम, योगेश्वर, पुरुष पूर्ण तुम। दीन सुदामा के परम सखा, भक्त के भगवान हो, गीता ज्ञान सुना...
आत्मीय बंधन सुख या सूख
कविता

आत्मीय बंधन सुख या सूख

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** शाख का टूटा पत्ता भी सूख जाता है। रिश्ता आत्मीय होने से सुख पाता है। मानव वनस्पति दोनों में है जान बसी बंधन ही है रिश्तों की जड़ खुशी हंसी व्यवहार प्रकृति जल हवा खाद खुशी उन कमियों ने जीवन लीला ही डसी संग होने से सोने पर सुहागा होता है। अहंकार वश में कोई अभागा रोता है। शाख का टूटा पत्ता सूख ही जाता है। रिश्ता आत्मीय होने से सुख पाता है। संघर्ष चुनौती सामना जीवन किस्सा निज नसीब में जितना लिखा हिस्सा पर बन जाते हैं मील के जैसे पत्थर स्मृति धरोहर भविष्य के बनते तत्पर समय समय पर दुर्भाव अखरता है तंज रंज दोनों रिश्तों को परखता है शाख का टूटा पत्ता सूख ही जाता है रिश्ता आत्मीय होने से सुख पाता है सिर्फ लालन पालन कैसा पूरा फर्ज प्यार दुलार दवा खाद सुधारता मर्ज बिन सुराख के बंसी कभी नहीं गाए पर बंसी सुर...
आगे संगवारी हरेली तिहार
आंचलिक बोली

आगे संगवारी हरेली तिहार

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कविता) मनाबो संगी हरेली तिहार, धरती माई ह देवत उपहार। बारह मास मॅं हरेक परब, हमर संस्कृति हमु ला गरब। चलो मनाथन पहली तिहार, धरती माई ह देवत उपहार.. अन्न उपजइया गंवइया किसान, भूंईया के हरे इही भगवान। हरियर दिखत हे खेत-खार, धरती माई ह देवत उपहार.. गरुवा-गाय बर बनगे दवा, रोग-राई भगाय बर मांगे दुआ। घर के डरोठी मॅं खोंचत डार, धरती माई ह देवत उपहार.. रुचमुच रुचमुच बाजत हे गेड़ी, सुग्घर दिखत हे संकरी बेड़ी। रोटी-पीठा महकत हे घर दुआर, धरती माई ह देवत उपहार.. रापा, कुदारी, बसुला, बिंधना, धोवा गे नागर सजगे गना। रहेर हरियागे दिखत मेड़-पार, धरती माई ह देवत उपहार.. पेड़ लगाबो चलो जस कमाबो, मिल-जुल के हरेली मनाबो। छत्तीसगढ़ मैइया होवत श्रृंगार, धरती माई ह देवत उपहार.. प्रकृति...
कर हौसला… कर हिम्मत
कविता

कर हौसला… कर हिम्मत

अशोक पटेल "आशु" धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** कर हौसला, कर हिम्मत, तुझमें तेरा तो अभी इंसान बाकी है। अभी तो संघर्ष शुरू हुआ है तेरा अभी इम्तिहान बाकी है। न डरना कभी न झुकना कभी अभी तो सारा जहान बाकी है। हौसला दिखा, और पर लगा अभी तो तेरा अरमान बाकी है। जो डर गया वो बिखर गया, अभी तो स्वाभिमान बाकी है। कब तक बेबस जिंदगी जीएगा अभी तो तेरा सम्मान बाकी है। कब तलक सम्मान खोते रहोगे अभी तेरा अधिकार बाकी है। यह तो, अधिकार की लड़ाई है अभी तो तेरा हुंकार बाकी है। कमर कसना होगा भिड़ना होगा अभी तो तेरा जोश बाकी है। किसी के बहकावे में मत आना अभी तो तुझमें होश बाकी है। मत हो परेशान, मत हो हलाकान अभी तो तेरा मंजिल बाकी है। मत हार हौसला, मत हार हिम्मत अभी तो तेरा साहिल बाकी है। परिचय :- अशोक पटेल "आशु" निवासी : मेघा-धमतरी (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : हिंदी- व...
अंतिम सत्य
कविता

अंतिम सत्य

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** बहुत दिनों से मेरी फड़क रही थी आँख। कोई शुभ संदेश अब हमें मिलने वाला है। फिर एकाएक तुम्हें आज यहाँ पर देखकर। रह गया अचंभित मैं तुम्हें सामने पाकर।। बहुतो को रुलाया है तुमने जवानी के दिनों में। कुछ तो अभी भी जिंदा है तेरे नाम को जपकर। लटक गये है पैर अब उनके कब्र में जाने को। पर फिर भी उम्मीदें रखे है आज भी दिल में बसाने की।। यहाँ पर सबको आना है एक दिन जलने गढ़ने को। कितने तो पहले ही यहाँ आकर जल गढ़ चुके है। तो तुम कैसे बच पाओगी जीवन के अंतिम सत्य से। और यहाँ आकर मिलता है समानता का अधिकार सबको।। यहाँ पर जलते गड़ते रहते है सुंदर मानव शरीर के ढाचे। जिस पर घमंड करते थे और लोगों को तड़पाते थे। पर अब जीवन का सत्य उन्हें समझ आ गया। इसलिए तो अंत में तुम आ गई हो अपनों के बीच में।। परिचय :- बीना (...
जलती है स्वयं
कविता

जलती है स्वयं

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** १० वर्ष की उम्र में जलती हुई अगरबत्ती को देखकर लिखी गई यह मेरी सबसे पहली रचना है। नील गगन से आने वाले मंद पवन के झोंके से हलचल करती ऊपर उठती देवो को प्रसन्न करने नील नभ विलुप्त होने उठती ऊंचे-ऊंचे पर। नाना विधि के चिर फैलाती जैसे हो द्रोपदी की चीर विचित्र है विचित्र प्रकृति तेरी लाल से बनती नीलभ जलती स्वयं है पर फैलाती सुगंध। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं व वर...
कान्हा स्वामी
छंद

कान्हा स्वामी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** मन्दाक्रान्ता विधान : वार्णिक छंद गण संयोजन मगण भगण नगण तगण तगण गुरु गुरु २२२ २११ १११ २२१ २२१ २२ १७ वर्ण प्रति चरण ४, ६, ७ वर्णों पर यति ४ चरण, दो दो चरण समतुकांत कान्हा स्वामी, नमन करिए, भावना नित्य बोले। वंशी देखो, बजत प्रभु की, राधिका मुग्ध डोले।। संगी ग्वाला, सुमिरत सुनो, श्याम प्यारे उबारो। राधा ध्यावे, नटवर सदा, नाम कान्हा पुकारो। राधे रानी, नित किशन का, नाम जापें विधाता। झूमें गोपी, नटवर कहें, आप हो श्याम दाता।। मीरा प्यारे, मनहर प्रभो, नाथ प्यारे नमामी। साँसो में भी, गिरधर रहो, आज आभार स्वामी।। नैया मेरी, भँवर फँसती, पार हो हे खिवैया। आई हूँ मैं, चरनन पड़ी, द्वार तेरे कन्हैया।। तारो कान्हा, प्रतिपल कहें, हो कृपा भी सहारे। कृष्णा कृष्णा, निशदिन रटूँ, हो दया क्यों बिसारे।। नैनो में हो...
कुछ बीज धरा पर बो दो
कविता

कुछ बीज धरा पर बो दो

संगीता पाठक धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** हे मनुज! पेड़ काट कर कल जो गलती तुमने की थी। अभी भी वक्त है कुछ बीज धरा पर बो दो। नई पौध धरती पर लगाओ। नई पौध उगा कर गलतियाँ सुधार लो। अवश्य ही बीज अंकुरित होकर कल पेड़ बनेगा । पंछी नीड़ का निर्माण करेंगे। तुम्हारे बच्चे पेड़ की छाया तले विश्राम करेंगे। परिचय :  संगीता पाठक निवासी : धमतरी (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु ड...
ये दूरियां-ये ख्वाब
कविता

ये दूरियां-ये ख्वाब

सिमरन कुमारी मुजफ्फरपुर (बिहार) ******************** ये दूरी हैं महज ज़मीन की, दिल की नहीं!! दूरी हैं मज़बूरी थोड़े ही, कमी हैं ना मिलने की, कमज़ोरी थोड़े ही!! निभाने का इरादा जरूरी हैं, विश्वास चाहिए वायदा नहीं!! राधा- कृष्ण की दूरी, सच्चे आस की निशानी हैं, तभी तो हर जुबां पर उनके मिलन की कहानी हैं!! मिलेंगे एक दिन वो खास होगा, मैं तेरे करीब तू मेरे पास होगा!! जब ये खिलता ख्वाब, और आँखों में शवाब होगा!! रब्त इश्क़ की दरियां, टूटती ये दूरीयां !! तब मिलना सबसे नायाब होगा, तब हमारा मिलना इत्तेफाक होगा!! ज़मीन की दूरी महज ये दूरी, ख्वाब बुनता दिल, जब मिलेंगे तब ख़ुद को, संभालना होगा मुश्किल!! परिचय :-सिमरन कुमारी निवासी : मुजफ्फरपुर (बिहार) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। ...
सुविधा पाबो
आंचलिक बोली

सुविधा पाबो

प्रभात कुमार "प्रभात" हापुड़ (उत्तर प्रदेश) ******************** जुरिस गाँ ह सड़ग ले भईया, अउ मन कस सुविधा पाबो चिखला चांदो के दिना ल, हमन अब तो भुलाबो बारी बखरी के साग भाजी, अब सहर मं बेचाही लेबो कमा जीये के पूरती, नी डउकी लइका ललाही धराय हे गहना खेत खार ह, ओला मुक्ता के लाबो चिखला.. बड़े इस्कूल मं लइकन पड़ही, अउ कालेज घलो जाही साहेब, सिपाही जम्मो बनके, जिनगी भर सुख पाही दुनो परानी हमन देखत, भाग ल सँहराबो चिखला.. रई आय पहिली कहूँ ल त ओ, बिन गोली के मरे कतको घोर्री घसन तभो, डॉक्टर ह नी हबरे एक सौ आठ ल बलवाके, निरोग काया ल बनाबो चिखला.. परिचय :-  प्रभात कुमार "प्रभात" निवासी : हापुड़, (उत्तर प्रदेश) भारत शिक्षा : एम.काम., एम.ए. राजनीति शास्त्र बी.एड. सम्प्रति : वाणिज्य प्रवक्ता टैगोर शिक्षा सदन इंटर कालेज हापुड़ विशेष रुचि : कविता, गीत व लघुकथा (सृजन) लेखन, समय...
जाने क्या बात है
कविता

जाने क्या बात है

विजय गुप्ता दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** हर गुफ्तगू कही अनकही में निश्चित कोई जात है, दिल बेचारा हलाकान हो सोचे, जाने क्या बात है। इर्द गिर्द चक्रव्यूह माहौल छिपी उलझन तो मात है, हर व्यूह रचना तोड़ बाहर आना, जाने क्या बात है। नेक सलाह काम परिणाम में अक्सर कोई हाथ है, खुद की दम से नेक काज सधे, जाने क्या बात है। हर वक्त जड़ तना फलती फूलती शाख की पात है, हवा खाद पानी लबालब हमेशा, जाने क्या बात है। गुजरते जीवन के धुंधलके में छिपी बैठी तो घात है, निडर एकाकी जीवन का सफर, जाने क्या बात है। दिन महीने साल गुजारते जब आया दशक सात है, पर देखी वही मशक्कत जुस्तजू, जाने क्या बात है। सुना छप्पर फाड़ धन मिले यकायक दिन या रात है, कुआं खोद प्यास बुझे चकाचक जाने क्या बात है। संघर्ष योद्धा की चुप्पी भली लगती जब मुलाकात है, चूंकि माना अपने तो अपने होते, जाने क्या बात ह...