हिंदी से मेरी बातचीत
चित्रलेखा व्यास
कानोड़, उदयपुर (राजस्थान)
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मैंने पूछा- “हिंदी! कहो,
क्या तुम्हें कभी
राष्ट्रभाषा कहा जाएगा?”
वह मुस्कुराई- “नहीं,
अभी तो मेरे हिस्से में बस
प्रतीक्षा का वनवास है।”
मैंने फिर पूछा-
“फिर तुम्हारा भविष्य क्या है,
कहाँ तक जाएगी तुम?”
बोली- “जहाँ तक
अपनी मिट्टी की गंध को
संजोए मनुष्य जाएगा,
मैं भी वहीं रहूँगी।”
संस्कृत की गोद से निकली,
प्राकृत की गलियों में पली,
अपभ्रंश की देहरी लाँघकर,
जन-जन की वाणी बनी,
कबीर की साखी और
तुलसी के मानस में ढलकर।
पर सत्ता के गलियारों में
पराई चमक ने जब अपना
सिंहासन सजाया,
तब अपने ही घर में
मुझे कभी-कभी मौन,
उपेक्षित और विस्मृत पाया।
मैंने पूछा- “हिंदी, तुम
बीच राह में कहाँ गुम हो गई थीं?”
वह बोली- “गुम नहीं हुई थी,
तुम्हारी ज़ुबानों पर
चुपचाप जीवित थी।”
“तुमने मुझे बाज़ार में छोड़ा...




















