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पद्य

हिन्दी मेरी पहचान
कविता

हिन्दी मेरी पहचान

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** हर भाषा को मान मिला पर इसे अलग समान मिला, जो माँ समान पूजी जाती है उस भाषा को हिन्दी नाम मिला।। बिना स्वरो के ये गाई नही जाती बिना वर्णो के ये लिखी नही जाती, ये हिन्दी है हिन्दी मेरे माँझी बिना प्यार के ये कभी बोली नही जाती।। कोई मराठी मे मीठे बोल बोलता है कोई गुजराती मे रस घोलता है, और जिसे हिन्दी का ज्ञान है वो सब संग स्वर मे ताल ठोकता है।। माना हमें इतना ज्ञान नही कलम तो पकड़ ली पर, शब्दों पर कसी लगाम नहीं पर फिर भी ये हृदय यही बोल, बोल रहा है।। कितना भी घूम लो पूरे संसार मे आराम तो अपने घर मे ही आता है, किसी भी भाषा को बोल लो मिश्री के घुलने सा मिठा अहसास तो हिन्दी मे ही आता है।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षि...
वफ़ा
कविता

वफ़ा

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** फैला दो हवाओं में पैगाम मेरा कि हम तेरे शहर में वफ़ा बाटने आये है। लेकर ग़म तेरे नसीब में अपने, तेरा नाम अपनी तकदीर लिखने आये है। वो जो कहते हैं लोगों से कुछ भी न मिलता यूँ सोचने से उनको कह दो हम उनको अपने नसीब में लिखने आए हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail....
नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी
गीत

नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी

शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" ग्वालियर (मध्यप्रदेश) ******************** नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। श्याम हमसे करों ना बरजोरी, बरसाने की हम राधा गोरी। ग्वाल बाल सॅंग मारग में ठाढ़ो, भर पिचकारी तन-मन पें मारो, हाथ पकड़ मोरी वैंया मरोड़ी चुनरी कन्हैया ने फा डारी। नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। आओ सखी मिल श्याम को घेरें, आज पकड़ लै फिर न छोड़ें, मल- मल रंग अबीर लगावें, आज निकालें जाकी रंग दारी। नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। आज न में तोकूं छोड़ुंगी, प्रेम रंग से खूब रंगुंगी। छलिया तेरे संग चलुंगी, तेरी अदाओं पे बलिहारी, नहीं मारो श्याम रंग पिचकारी, मोरी कोरी चुनरिया रंग डारी। परिचय :- श्रीमती शिमला शर्मा "लक्ष्मी प्रिया" निवासी : ग्वालियर (मध्यप्रदेश) रुचि : गद्य...
दर्शन को अँखियाँ प्यासी
गीत

दर्शन को अँखियाँ प्यासी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** दर्शन को अँखियाँ प्यासी हैं, उर बसे मनमीत। चातक मन मेरा है व्याकुल, श्याम कैसी प्रीति।। मुझको नहीं दिन-रात चैना, है किशन संताप। चहुँओर दिखता है अँधेरा, हाथ थामो आप।। नित आचरण हो शुद्ध मेरा, दो प्रभु वरदान। कर क्षम्य सब अपराध मेरे, रख प्रभो कुछ ध्यान।। मीरा बनी भटकी किशन मैं, गा रही प्रभु गीत। चातक मन मेरा है व्याकुल, श्याम कैसी प्रीति।। पलकें बिछायें राह देखूँ, अब समझ लो पीर। सागर बिना प्यासी नदी मैं, अब नहीं है धीर।। चितचोर हो समझो प्रभो अब, श्याम हो आधार। मनमोहना दो मोक्ष मुझको, थाम लो पतवार।। जीवन सँवारों नाथ मेरा, भक्त की हो जीत। चातक मन मेरा है व्याकुल, श्याम कैसी प्रीति।। छोड़ मोह-माया सब आयी, बस तुम्हीं से आस। हूँ मूढ़मति पर दास तेरी, हो तुम्हीं विश्वास।। मिथ्या जगत कान्हा शरण लो, हो ...
आया फागुन झूम के
छंद

आया फागुन झूम के

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** (उल्लाला छंद) रंगों की बौछार है, खुशियों का त्यौहार है। पिचकारी भर रंग की, होली है आनंद की। नीला पीला लाल है, हरा गुलाबी गाल है। आया फागुन झूम के, रंग उड़ाता धूम के।। मस्ती में सब एक है, पहल बहुत ही नेक है। फागुन का जो राज है, लेकर आया आज है।। बजे नगाड़ा फाग का, अपनों के अनुराग का। आया फागुन झूम के, नाचो सारे घूम के।। इंद्रधनुष का रंग हो, रिश्ते सारे संग हो। ढोल नगाड़ा शोर है, नाचे मन का मोर है।। मिलकर सखी सहेलियांँ, करती है अठखेलियाँ। आया फागुन झूम के, सात रंग को चूम के।। भींगा तन मन साज है, खुशियों पर जो नाज़ है। रंग भरे संदेश है, रंगें सबके वेश है ।। बाजा भी है बाजता, जन-जन मन भर नाचता। आया फागुन झूम के, गाता मनवा घूम के।। आता जब मधुमास है, मन में तब उल्लास है। कोयल सुमधुर बोलती, मीठा र...
दिल में फगुनाहट हुई
दोहा

दिल में फगुनाहट हुई

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** दिल में फगुनाहट हुई, मनवा चंचल आज। अभिलाषा यह पल रही, करूँ प्रेम का काज।। रंग घुल गए प्रीति में, मौसम है रंगीन। दिल सजनी को खोजता, है प्रकरण संगीन।। यौवन है जज़्बात पर, बहकी-बहकी चाल। मधुमासी आवेश है, हर प्रेमी बेहाल।। साजन को तिरछी नज़र, देख रही भरपूर। सजनी के मुख पर खिला, आफ़ताब का नूर।। शीतल चलती है हवा, फागुन का अंदाज़। सकल उदासी दूर अब, प्रेम बना अधिराज।। अब अबीर इठला रहा, लिए सरस पैग़ाम। मीत याद आने लगा, सबको सुबहोशाम।। फागुन में है चेतना, गाता स्नेहिल गीत। मिलन-विरह का दौर है, प्रेम गया है जीत।। यौवन है आवेग में, बाँहों में आकाश। सिकुची धरती लाज से, अवसादों का नाश।। होली आशा को वरे, विश्वासों का काल। रंग घुल गए सोच में,प्यार हुआ बेहाल।। पुरवैया ज़ालिम हुई,मारे दिल पर तीर। होली ...
मनमानी
कविता

मनमानी

मनोरमा संजय रतले दमोह (मध्य प्रदेश) ******************** कैसा समय आ गया अब कोई, किसी की ना सुनेगा..। मनमानी करेगा अरे.....अरे.. ये कोई में ... माँ बाप भी शामिल है इस बात पे विचार करो चौथी पाँचवी के बच्चे माँ बाप को धमका रहे आप ने हमसे जिद्द की हम घर छोडकर चले जायेगे अब आप ही बताये ऐसे बच्चे समाज के क्या काम आयेगे.. इन्हें तो ना सुनने की आदत ही नहीं चाहे वो माँ बाप से चाहे आफिस में चाहे रिश्तेदार से... सोचिये...ये फिर कैसे शादी कर पायेगे.. एक दूसरे से सामंजस्य बनाना ही नहीं चाहते कैसे रिश्ते टिकेगे.. इसलिये ये लिव इन रिलेशनशिप चल रहा फल फूल रहा इस रिश्ते को हिन्दी मे क्या कहे.. सोच के भी शर्म आती है आज बेटो बेटी को विवाह तो नहीं करना पर विवाह के बाद का सुख चाहिए बच्चे चाहिए... आज के युवाओ के लिये बालीवुड ही आदर्श बना है तभी तो माँ बाप मुँह ...
भाई दूज
गीत

भाई दूज

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कहे बहिन की प्रीति सदा ही, भइया रीति चलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। बहिना का है प्रेम निराला, पावन जैसे गंगा धारा। रक्षक भाई है बहना का, नित दूजे पर तन-मन वारा।। जुग-जुग जिए बहिन का भाई, यह आशीष दिलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। भाई दूज का पर्व है प्यारा, खुशी हजारों लेकर आता। मंगल पावन तिलक लगाती, बहिना को त्योहार सुहाता।। प्रेम सदा छलकाता भाई, अद्भुत ज्योति जलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। जुग-जुग जिए बहिन का भाई, प्रभु से वर ये माँगे बहिना। सुख समृद्धि सदा घर आये, झोली खुशियों से प्रभु भरना।। कृष्ण सुभद्रा सी है जोड़ी, नेहिल अमिय पिलाते रहना। घर आयेगी रूठी बहिना, भइया नित्य बुलाते रहना।। ...
जीवन का अभिशाप
गीत

जीवन का अभिशाप

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** और रहा कितने दिन बाकी, राजन् पश्चाताप। हारा गणित हमारा लेकिन, जुमले सका न माप।। मुरझाई गमलों में सारी, रोपित आशाएँ। नागफनी-सी हुई पल्लवित, निंदित भाषाएँ।। तहज़ीबों की इस बस्ती में, पसरा है संताप।। सपने देखे उड़ने के जिस, उड़न-खटोले से। आडंबर का जिन्न बड़ा हो, निकला झोले से।। कुटिल नीति के कोड़े मारे, ये दिल्ली की खाप।। जकड़े हम बाजारवाद के, खूनी पंजों में। फँसे हुए हैं वोट बैंक के, बने शिकंजों में।। रखा हुआ है गिरवी अपना, अनुवांशिक आलाप।। उलझ गया सब ताना-बाना, भ्रमित नीतियों में। हिंसकपन बो रही व्यवस्था, राग-रीतियों में।। सूत्रधार ही लगता है अब, 'जीवन' का अभिशाप।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।...
माँ पार्वती शक्ति तांडव स्तुति
स्तुति

माँ पार्वती शक्ति तांडव स्तुति

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** प्रचंड शक्ति रूपिणीं, नमामि देवी अंबिकाम्। जगत् जननीं जगन्मयीं, नमामि दिव्य चंद्रिकाम्॥ नृत्यति शिव सान्निध्ये, शक्ति तांडव कारिणी। दुष्ट दलन हारिणी, भक्त कष्ट निवारिणी॥ कनत कनक कंकणम्, झणत झणत नूपुरम्। रणत रणत डमरूम्, भरत सकल अम्बरम्॥ जटा मुकुट शोभितां, अर्ध चन्द्र धारिणीम्। त्रिशूल खड्ग धारिणीं, असुर गर्व हारिणीम्॥ महागौरी महाकाली, महालक्ष्मी स्वरूपिणी। सृष्टि स्थिति विनाशनी, मोक्ष मार्ग दर्शिनी॥ बाल कृष्ण मिश्रा मति, शक्ति चरणे अर्पिता। पातु मां जगदम्बिका, भक्ति भाव वर्धिता॥ परिचय :- बाल कृष्ण मिश्रा निवासी : रोहिणी, (दिल्ली) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विच...
होली मा रंग लो
गीत

होली मा रंग लो

धर्मेन्द्र कुमार श्रवण साहू बालोद (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी गीत) उलझन मन ला दहन करें बर, बैठक रखही आज। काम क्रोध बैठक मा जरही, बरही खस्सू खाज।। दया क्षमा मन नियाय करही, बस्ती भर सकलाय। प्रेम प्रसादी सब ला मिलगे , रंग गुलाल उड़ाय।। अइसन बात धरव श्रोता जन, बदलव अब सब ढंग। असली रंग रंँगाहूँ सब झन, निकल जाय ये जंग।। कामी क्रोधी राजा जरगे, नइ बाँचिस हे राज। प्रहलाद पुत्र कैसे बचगे, सोचव सब झन आज।। काबर सच्चा भक्ति रिहिस हे, भगवन के अवतार । भजन भाव ला हिय मा धरथे, होथे जिनगी पार।। असली बचथे नकली जरथे, जलके होथे राख। पापी गगरी मा विष घुलथे, इही चुकाथे साख।। अत्याचारी भ्रष्टाचारी, भगवन करथे नाश। दू दिन के जिनगी सँगवारी, महको उपवन काश।। इही आय मधुबन वृंदावन, गीत भजन गा फाग। अहंकार के माथा फोड़व, रखव प्रेम अनुराग।। परिचय :- धर्मेन्द्र क...
शाल्मली: एक मौन सार्थकता
कविता

शाल्मली: एक मौन सार्थकता

विशाल त्रिवेदी "अल्पज्ञ" सेंधवा (मध्य प्रदेश) ******************** आकाश की नीलिमा को चुनौती देता, एक दरख्त खड़ा है नग्न शाखाओं पर सिंदूरी मशालें जलाए। उसे मलाल नहीं कि वह किसी के जूड़े की शोभा नहीं, न ही उसे दुख है कि देवताओं के चरणों तक उसका सफर नहीं पहुँचता। उसका सौंदर्य प्रदर्शन की वस्तु नहीं, वह तो एक 'होने' का उत्सव है। वह खिलता है तब, जब पतझड़ सब कुछ छीन लेता है, जब उम्मीद की टहनियाँ ठूँठ होने लगती हैं, तब वह रक्तिम आभा बनकर फूटता है- धैर्य का पर्याय बनकर। उसका धर्म किसी प्रशंसा का मोहताज नहीं, वह छाया नहीं देता, पर आश्रय देता है; वह खुशबू नहीं बाँटता, पर रंग भर देता है- उन रास्तों में, जिन्हें लोग 'सूखा' कह कर छोड़ देते हैं। उसकी सार्थकता उन पंछियों की चहचहाहट में है, जो उसकी ऊँचाई पर भरोसा करते हैं। सीखना हो तो सेमर से सीखें- कि समय पर ख...
मेरी मांँ
कविता

मेरी मांँ

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** मन की बातें किसे बताए कौन है जो गले लगाये, समझे जो कोई मेरी बातें, वह तो मेरी माँ ही जाने। दुख-दर्द, दुख-सुख को जो जाने, मन के भाव को जो पहचाने, प्यार और दुलार की जो है जननी। संबंधो की जो है टहनी, उज्जवल भविष्य की कामना जो करती, निर्मल मन निर्मल है विचार, संस्कार और संस्कृति का रखे जो ख्याल, मान मर्यादा का जो पाठ पढाती, बच्चों का रखती जो खयाल, माँ तो माँ बस माँ होती है चन्दा सी शीतल है मां ,सुरज सा प्रकाश हे माँ माँ तो बस माँ ही होती है। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्ज...
मन की नम् माटी
कविता

मन की नम् माटी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की नम मिट्टी में जब भावों का बीज गिराया, आँखों की कोरों ने चुपके से जल बरसाया। पीड़ा की हल्की धूप में सपनों ने अंगड़ाई ली, आशा की कोमल कोंपल ने फिर मुस्कान सजाया। मन की नम मिट्टी में श्रद्धा का दीप जले, विश्वास की खुशबू से जीवन के आँगन पले। संघर्षों की धूल भले ही राहों में बिखर जाए, धैर्य की फसल उगे तो भाग्य के द्वार खुले। मन की नम मिट्टी में रिश्तों के फूल खिलें, ममता की सरिता बहे, प्रेम के मोती मिलें। अंतर की करुणा जब बन जाए हरियाली, सूखे से जीवन में फिर सावन झूमे खिलें। मन की नम मिट्टी में संस्कारों की जड़ हो, सत्य की धूप मिले, मर्यादा का अंकुर हो। लोभ की आँधी आए तो भी न डिग पाए, नीति का वटवृक्ष बने, आदर्शों का स्वर हो। मन की नम मिट्टी में ईश्वर का नाम पले, भक्ति का अंकुर फूटे, आत्मा के दीप जले। ...
नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे
गीत

नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे। सबके तन-मन अति पुलकित हैं, झूम रहे सारे। रंग श्याम का चढ़ जाता है, होता उजियारा। जीवन में बहने लगती है, दिव्य अमृत धारा। माधव-राधा के दर्शन ये, जीवन को तारे। नंदलाल से होली खेलें, ग्वाल-बाल प्यारे। बाल-वृद्ध सब होली खेलें, राधा सखियों से, प्रीत भरी पिचकारी मारे, मोहन अँखियों से, होली का हुड़दंग मचा है, ज्यों द्वारे द्वारे। नंदलाल से होली खेलें, ग्वाल-बाल प्यारे। श्याम रंग की पिचकारी से, राधा शरमाईं, भीग गई चोली, चूनर सब, सखियाँ हरषाईं। मुरलीधर का प्रेम पड़ गया, राधा को भारे नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे। गोपी-ग्वाले मिलकर खेलें, गोकुल में होली, राधा गोरी वो मतवाली, खेले हमजोली, मटक रहे राधा मोहन के, नयना कजरारे। नंदलाल से होली खेलें ग्वाल-बाल प्यारे। गि...
होली के रंग मस्ती के संग
कविता

होली के रंग मस्ती के संग

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** मौसम हुआ है फागुनी, फागों पर छाया शवाब। हरम मन में सजने लगे, फिर रंग-बिरंगे ख्वाब। हर कली को है चूमता, चंचल भ्रर सदाबहार। फिजाओं में है घुल रही, देखो अब बसंती बयार। गली-गली में हो रही, अब रंगों की बरसात। रंग-बिरंगे से दिन हुए, हुई मस्ती वाली रात। बहके बहके से कदम, हो गई नशीली चाल। भंग की मस्ती में अब, तन मन हुए हैं बेहाल। अंगारों सा दहक उठा, गोरी का तन है आज। सुध बुध है बिसराय के, भूल गई वो सब काज। भींग गई लहंगा चोली, भींग गई चुनरी आज। गोरी का घूंघट सरका, तज करके सारी लाज। मुखड़ों पर हैं सज रहे, अब इंद्र धनुषी ये रंग। हुलियारी टोली निकली, फिर से मस्ती के संग। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी से...
रंगो की बौछार
कविता

रंगो की बौछार

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** होली आई, होली आई रंगो की बौछार ला ई टेसु ओढे लाल चुनरिया पलाश अगन लगा ए रे। रंग, रंग मे भीगी गौरी छुप, छुप कर रंग डाले रे चली पिचकारी की बौछारे तन भीगे, मन भीगे और भीगे आंचल रे। आरती की थाली सजा ऐ घुघंट ओढे निकली सजनी बौछारो से बचती जाती चाल चले मतवाली रे। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २...
कर रहे गुंजन भ्रमर हैं
गीत

कर रहे गुंजन भ्रमर हैं

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन। प्रेम से सुरभित जगत है, गीत गुपचुप गा रहा मन।। तन बँधा है मन सजन भी, प्रीत का बंधन निराला। देख नभ डोले धरा भी। नेह का ओढ़े दुशाला।। बह रही कलकल नदी भी, प्रीत सागर से सुहावन। कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन।। भावना का है समर्पण, नित नया उल्लास भी है। आस है अभिसार की तो, मन जगा विश्वास भी है।। सीप सा मोती बसा हिय, है खनक अब नित्य कंगन। कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन।। काँपता है गात मेरा, मोहती तेरी छुअन भी। काम रति संसर्ग है ये , है प्रणय का मधु मिलन भी।। सैकड़ों सपने सजा कर, आ गयी है आज दुल्हन। कर रहे गुंजन भ्रमर हैं, आ गया मधुमास साजन।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति...
मुझे नफरत है पापा
कविता

मुझे नफरत है पापा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हां मैं बहुत नाराज हूं आपसे, आपसे मुझे नफरत है पापा, हमेशा हमसे झूठ बोलते हो, जहां प्रखर आवाज चाहिए वहां क्यों सब कुछ म्यूट बोलते हो, सारी परेशानियां सर पर लेकर कहते हो कोई समस्या नहीं है, मैं हूं ना सारी समस्याओं का मुकम्मल समाधान यहीं है, हमसे सच छुपाने की ये नौबत आ गई, खून बेचकर राशन लाने की क्यों नौबत आ गई, हमारी भूख सहने पर क्या भरोसा नहीं है, हम पर अविश्वास क्या धोखा नहीं है, हां पैसा तो कमाते हो, पर पैसा आने का सोर्स क्यों नहीं बताते हो, कहीं औलाद की उदर भरने के लिए हम औलादों से धोखा नहीं है, हमें विश्वास में ले लेने खोते क्यों मौका नहीं है, भीख मांगना पाप है आपने ही सिखाया, रिश्तेदारों से मांगने का गुर कहां से आया, कर्ज में डूब हमें क्यों पाल रहे हो, हमारे संघर्ष मय जीवन से ...
रंग रसिया
भजन

रंग रसिया

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** होली खेलने बरसाना श्याम आया ग्वाल बालों की टोली संग लाया। प्रेम रसिया सब के मन को भाया राधा रानी को देख मन मे हर्षाया। होली….. सम दृष्टि है वो, कर्ता श्रृष्टि भी वो सारे रुपों मे है उसकी ही माया। भक्ति रस मे भाव विभोर भक्तों को अपने स्वरुप का दर्शन कराया। होली….. रगों का ग़ुबार बन छाया गगन मे केशरिया रंग श्याम के मन भाया। होली के रुप मे प्रेम की वर्षा कर रंग रसिया जगत मे वो कहलाया। होली….. परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्ययन के साथ कविता, गीत, नाटक लेखन मंचन आदि में गहन रूचि रही है। व्यवसाय सेवा : आप सार्वजनिक स्वास्थ्य वि...
मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं
कविता

मौन हूँ … अनभिज्ञ नहीं

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** शांत हूँ, मौन हूँ किन्तु अनभिज्ञ नहीं हूँ दर्द को मुस्कराहट में छुपाना जानती हूँ एक कहानी हूँ, पर अधूरी नहीं!! प्रेम धर्म निभाती हूँ करुणा से भरा हृदय रखती हूं संवेदनाओं से भरी हूँ आरंभ हूँ अंत नहीं! कभी उकेरी हुई भावनाओं से ओतप्रोत, कभी भ्रमित होती कल्पनाओं एवं वास्तविकता में, कभी तराशी गई कभी नकारी गई हूँ दिलों की अभिव्यक्ति बनी हूँ खामोशी नहीं!! खुशियों की बरसात में छुपकर रहने वालों को, हँसी की दो बूंद के लिए तरसते देखा है, अभिमान मे डूबे रहने वालों को तन्हाई में छुपकर रोते देखा है, सपनों को पूरा करने का हौसला रखती हूँ नारी हूँ, किन्तु बेबस-लाचार नहीं!! जीवन के सही अर्थ को समझना चाहती हूँ, स्नेह और करुणा का दीपक चारों ओर जलाना चाहती हूँ, स्व चेतना के प्रकाश से आंतरि...
कर्मो का फल
कविता

कर्मो का फल

पुष्पा खंगारोत जयपुर (राजस्थान) ******************** ये वक़्त का फेर कहो या कर्मो की गाथा क्योंकि, जब समय है आता तो ईश्वर भी नही बच पाता।। ना राजा दशरथ कर्मो के फल वश बाण चलाता, ना मंथरा विष की वाणी घोलती ना केकई राम को वन का मार्ग दिखाती।। ना युद्ध में कृष्ण ने छल किया होता ना माँ गांधारी को क्रोध आता, ना श्राप वश ईश्वर होने पर भी मानव मृत्यु का दंश मिलता।। ना भीष्म से नारी का अपमान होता ना अंबा ने श्रीखंडी का रूप मांगा होता, ना अर्जुन ने उनकी ओट ली होती ना भीष्म को बाणो की शय्या मिलती।। ना पिता की मृत्यु पर अस्वथामा ने क्रोध किया होता ना पांडवो के वंश को निंद्रा मे चिर निंद्रा देते, ना ज़ख़मो मे रिस्ते खून के संग चिरंजीवी होके अकेले वनों मे भटकने का श्राप मिलता।। परिचय : पुष्पा खंगारोत निवासी : जयपुर (राजस्थान) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाण...
एक इल्जाम
कविता

एक इल्जाम

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** एक इल्जाम मेरे नाम आया है न होते हुए भी मोहब्बत सरेआम मेरा नाम आया है। मैं ढूंढता रहा हर जगह खुद को ही न जाने क्यों फिर भी मेरा नाम किसी ओर के साथ आया है। लोग पूछते रहे मुझे मेरे गम का कारण और मैं हर गम में खुदा तेरा नाम हर बार लेता आये हूँ। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित...
होली खेल रहे कन्हाई
मुक्तक

होली खेल रहे कन्हाई

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** होली मस्ती लेकर आई, खेल रहे कन्हाई। बरसाने से राधारानी, दौड़ी-दौड़ी आई। खेल रहे ग्वाले-ग्वालाएँ, मुखड़े हैं रंगीन, रंग-अबीरों की आभा तो, सारे ब्रज में छाई।। खेल रहे देवर-भौजाई, उल्लासित है तन-मन। जीजू और सालियाँ खेलें, इतराता है आँगन। मची हुई हुड़दंग आज तो, हुरियारों का ज़ोर, लगता है पल में जी लेंगे, अब तो सारा जीवन।। गले मिल रहे प्रीति लिए दिल, ख़त्म हुई सब दूरी। आज सभी होली में डूबे, नहीं शेष मजबूरी। गाँव-शहर, गलियों-सड़कों में, रँग डालो का शोर, बीवी लगती मदिरा जैसी, और प्रेमिका नूरी।। चला रही है आज पड़ोसन, नयनों से तो तीर। अपुन हो गए घायल ज़्यादा, दिल ने पाई पीर। मैंने मौका पाकर उसका मुख कर डाला लाल, मैंने मन के अरमानों को पिला दिया मृदु नीर।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ ...
तुम पर ही फ़िदा हूँ
कविता

तुम पर ही फ़िदा हूँ

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** मैं तुम्हें चाहता हूँ, तुम पर ही मर मिटा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। धड़कनें कह रही हैं, कुछ सुनो तो ज़रा। पास आओ ना तुम, दूर क्यों हो भला? मन की बातें बता दूँ, वर्षों के बाद मिला हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। पास-पास हम हैं, मिलन की घड़ी आई है। रंग-बिरंगे बाग दिखे, रुत ने ली अंगड़ाई है।। खुशबू बिखेर दो ना, कुसुम बन खिला हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। तुम गीत बन जाओ, मैं संगीत बन जाऊँ। तुम हो हमजोली, मैं कविमीत बन जाऊँ।। लिख कर कविता, कल्पनाओं से घिरा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हूँ।। जीत की राहें, फैलाती हैं बाँहें, आ भी जा। खुशी के पल, ना जाए ढल, मान भी जा।। तुम हो बसंत बहार, मैं बदलती फ़िज़ा हूँ। प्यार करता हूँ तुझे, तुम पर ही फ़िदा हू...