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रिकॉर्ड तोड़ने नहीं आई बारिश

डॉ. मुकेश ‘असीमित’
गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
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इस बार बड़ी मायूसी से बरसात का इंतजार हो रहा है। लगता है, बारिश अपना वादा भूल गई है। मौसम विभाग, अखबार, समाचार चैनल, सरकार और बाढ़ नियंत्रण विभाग, सबको उसने भरोसा दिलाया था कि इस बार भी वह पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी। लगता है, इस बार उसने किसी चुनावी घोषणा-पत्र से प्रेरणा नहीं ली कि बारिश और वादे में रिकॉर्ड तथा उम्मीदों को तोड़ना जायज है। वैसे भी रिकॉर्ड और वायदों में गहरा रिश्ता होता है। दोनों बनते ही टूटने के लिए हैं। हमारे यहाँ तो रिकॉर्ड ही क्या, सरकारें, गठबंधन, सड़कें, पुल और सरकारी इमारतें तक सिर्फ टूटने के लिए ही बनती हैं। कई बार उद्घाटन की पट्टिका मजबूत रह जाती है और उसके पीछे की पूरी इमारत धराशायी हो जाती है। रेलवे विभाग का एक टिकटघर, जिसका अभी उद्घाटन भी नहीं हुआ और सुना है कि उसके टूटने का नंबर आ गया, इस सिद्धांत को और मजबूती प्रदान करता है। खिलाड़ी भी रिकॉर्ड बनाते हैं। कई बार अपना ही रिकॉर्ड तोड़ देते हैं और कभी उदारतापूर्वक दूसरे देशों के खिलाड़ियों को अवसर दे देते हैं कि भाई, अंतरराष्ट्रीय सद्भाव बनाए रखो। हमने तोड़ा, तुमने तोड़ा, बात तो एक ही है न!
रिकॉर्ड लगातार बनते रहें तो एक दिन आकाश छूने लगेंगे। फिर आम आदमी के हाथ कैसे आएँगे? इसलिए रिकॉर्ड का जमीन से जुड़ा होना बहुत जरूरी है, बिल्कुल आम आदमी की तरह । पिछले वर्षों में बारिश ने रिकॉर्ड तोड़ने की अपनी जिम्मेदारी बड़ी ईमानदारी से निभाई थी। नदियाँ खतरे के
निशान के ऊपर चली गई थीं, नाले अपनी मर्यादा तोड़कर सड़कों पर आ गए थे और सड़कें बहकर नालों में पहुँच गई थीं। पानी ने समाजवाद की ऐसी मिसाल कायम की कि कॉलोनी, बाजार, अस्पताल और सरकारी दफ्तर, सबको बराबर डुबो दिया। बड़े आदमी की एसयूवी और छोटे आदमी की साइकिल, दोनों एक ही पानी में तैरती दिखाई दीं।
इस बार न नदी खतरे के निशान से ऊपर निकली, न नाले ने सड़क पर कब्जा किया। शहर के नाले अपनी सूनी कोख लिए बैठे हैं। उन्हें उम्मीद थी कि रिकॉर्डतोड़ बारिश आएगी, उनमें कचरा, पॉलिथीन और प्रशासनिक दावों का जल भर जाएगा; फिर वे उफनकर समाचार चैनलों पर छा जाएँगे।संवाददाता घुटनों तक पानी में खड़ा होकर बताएगा, “आप देख सकते हैं, मेरे पीछे पूरा शहर जलमग्न है।” दर्शक भी पानी की गहराई का अनुमान संवाददाता की पैंट देखकर लगाएंगे। नगरपालिका ने भी शायद तैयारी कर रखी होगी। आपदा नियंत्रण कक्ष का फोन साफ कर दिया गया होगा, अधिकारियों के रेनकोट इस्त्री होकर तैयार होंगे और प्रेस-विज्ञप्ति में केवल तारीख भरना बाकी होगा। लिखा होगा, “अभूतपूर्व वर्षा के बावजूद स्थिति तनावपूर्ण, लेकिन नियंत्रण में है।” मगर बारिश ने सबकी योजना पर पानी फेरने के बजाय पानी ही रोक लिया।

समाचार चैनलों की परेशानी और भी बड़ी है। बारिश रिकॉर्ड तोड़ती तो उन्हें कई दिनों तक सोनम और सिया की सनसनीखेज खबरों से कुछ राहत मिलती। वे डूबती कार, बहती मोटरसाइकिल और नाव बने ट्रैक्टर दिखा सकते थे। किसी अधबने पुल के बह जाने पर बहस होती, “पुल कमजोर था या पानी राष्ट्रविरोधी?” फिलहाल तो विकास के रिकॉर्ड ही टूट रहे हैं। ये विकास के बोल-वचन वाले रिकॉर्ड, जो नेताजी और अधिकारियों के गले से बजते हैं, उनके गले में टूटी हुई कैसेट की तरह अटके हुए हैं। चुनाव आते ही वह कैसेट बजने लगती है, “हमने अभूतपूर्व विकास किया… अभूतपूर्व विकास किया… अभूतपूर्व विकास…” लेकिन एक बात बता दें, सड़कें, पुल और इमारतें भले ही टूट जाएँ, उनके रिकॉर्ड बहुत मजबूत होते हैं। पचास साल तक के रखरखाव के रिकॉर्ड, बिल, फॉरवर्डिंग नोट और कार्य-निष्पादन से जुड़े दस्तावेज दफ्तरों में सुरक्षित बने रहते हैं। सड़क का क्या है, उसकी नियति में टूटना है। टूटेगी, तभी तो नई बनेगी। सड़कें रोजगारपरक होती हैं। सड़क अगर टिक गई तो अगले वर्ष बजट किस बात का आएगा?
इस वर्ष बारिश कम होने से सड़कें भी चिंतित हैं। बिना पानी के वे टूटें तो दोष किसे देंगी? नालों में पानी नहीं, खेतों में नमी नहीं और प्रशासन के पास निरीक्षण के लिए पर्याप्त जलभराव नहीं। किसान आसमान की तरफ देख रहा है, नगरपालिका मौसम विभाग की तरफ और मौसम विभाग अपने अगले अनुमान की तरफ। अब बादलों से बस यही निवेदन है कि वे हमारी प्रतिष्ठा बचा लें। थोड़ा बरसें, थोड़ा डराएँ और कम से कम कोई छोटा-मोटा रिकॉर्ड तोड़ जाएँ। आखिर इतनी तैयारियाँ बेकार नहीं जानी चाहिए। नाले प्रतीक्षा में हैं, सड़कें टूटने को उत्सुक हैं, पुल अपनी क्षमता पर संदेह कर रहे हैं और समाचार चैनलों ने “बारिश का कहर” वाली पट्टी पहले से बनवा रखी है।

परिचय :-  डॉ. मुकेश ‘असीमित’
निवासी : गंगापुर सिटी, (राजस्थान)
व्यवसाय : अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ
लेखन रुचि : कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं
प्रकाशन : शीघ्र ही प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से), काव्य कुम्भ (साझा संकलन) नीलम पब्लिकेशन, काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन) लायंस पब्लिकेशन।
प्रकाशनाधीन : व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन)  किताबगंज   प्रकाशन,  गिरने में क्या हर्ज है -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह) भावना प्रकाशन। देश विदेश के जाने माने दैनिकी, साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित।
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है।

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